दृश्य, गति और थीम की सेटिंग(इस डिवाइस पर सहेजी जाती हैं)
दृश्य मोड
गति
थीम

आपके डिवाइस की “कम गति” सेटिंग हमेशा मानी जाती है। “केवल पाठ” मोड में कोई सजावटी चित्र या गति नहीं रहती।

अ

106 पद-समूह।

अकर्तृ स्पन्द-वर्जितम्
  • कर्तापन से रहित और चंचलता (कम्पन) से शून्य (श्लोक 18.30)
अकिञ्चनः
  • परिग्रह (संपत्ति के अभिमान) से रहित (श्लोक 18.87)
अकिञ्चनभवम्
  • परिग्रह और ममता-शून्यता से मिलने वाली (श्लोक 13.1)
अकृतम् कृतम्
अक्रियः
अक्षगोचरः
अक्षयम् गत-सन्तापम् आत्मानम्
  • अविनाशी और समस्त संतापों से रहित अपनी आत्मा को (श्लोक 18.74)
अक्षुब्धः
अखिलान् अर्थान् अर्जयित्वा
  • संसार के सारे धन-संपत्ति को कमाकर (श्लोक 18.2)
अगाधबुद्धिः
अङ्गनाम् भूपतिम् प्रियम्
  • सुंदर स्त्री, राजा अथवा किसी प्रियजन को (श्लोक 18.54)
अचिन्त्यम् चिन्त्यमानः अपि
  • चिंतन से परे (अचिन्त्य) आत्मा का जब चिंतन किया जाता है (श्लोक 12.7)
अज्ञानात्
अज्ञानात् भाति
अतः
अतत्क्षणात् आप्नोति कर्तुम्
अतद्वादी इव कुरुते
  • जो अकर्ता होने पर भी साधारण कर्ता के समान आचरण करता है (श्लोक 18.26)
अतिदुर्बलः
अतिरिक्तः न
अतिशान्तः
अतिसुन्दरम्
अत्यन्तसंसक्तः
अत्र बहुना उक्तेन किम्
अत्र मोहम् न कुरुष्व भोः
  • इस विषय में लेशमात्र भी संशय या भ्रम मत करो (श्लोक 15.8)
अथ
अथवा सङ्कोचम् याति
  • अथवा भयवश संकोच में पड़ जाता है (श्लोक 18.32)
अदृष्टि-रूपिणी
  • अदृष्टि-रूप (शुद्ध दृष्टा-स्वरूप) हो जाती है (श्लोक 18.63)
अद्य अपि उपरम्यताम्
अद्य एव वा पुनः गच्छतु
  • अथवा आज ही अभी इसी क्षण नष्ट हो जाए (श्लोक 15.10)
अद्य हे ब्रह्मन्
अद्वैतम्
अधिवासितः न भवति
  • उनसे संस्कारित (आसक्त या लिप्त) नहीं होता (श्लोक 17.4)
अधुना एव
अनन्त-रूपेण स्फुरतः
  • अनंत रूपों में प्रकाशित होने वाले (श्लोक 18.72)
अनन्तमहाम्भोधौ
अनन्ते निरञ्जने
  • अनन्त, निर्द्वन्द्व आत्मा में (श्लोक 7.4)
अनर्थसंकुलम् अर्थम्
अनवच्छिन्ने अकृत्रिमः
  • अनंत अखंड ब्रह्म में स्वाभाविक (बिना किसी प्रयास के) (श्लोक 18.67)
अनित्यम्
अनिर्वाच्य-स्वभावस्य
  • जिसका स्वभाव वाणी द्वारा अनिर्वचनीय (शब्दों से परे) है (श्लोक 18.79)
अनुवर्तते
अनृतम्
अनेन एव उपदेशेन
अनेन ज्ञानेन कृतार्थः
  • इस आत्मज्ञान से वह पूर्ण कृतकृत्य हो चुका है (श्लोक 17.8)
अन्तः न जायते
अन्तः परितः
अन्तः यत् अनुभूयेत
  • भीतर जो अलौकिक परमानंद अनुभव किया जाता है (श्लोक 18.93)
अन्तर्-गलित-सर्व-आशः
  • जिसके भीतर की समस्त आशाएं और तृष्णाएं पूरी तरह विगलित हो चुकी हैं (श्लोक 17.19)
अन्तर्गलितसर्वाशः
  • जिसके भीतर की समस्त आशाएँ और तृष्णाएँ गल चुकी हैं (श्लोक 11.2)
अन्तर्विकल्प-शून्यस्य
  • भीतर से समस्त संकल्प-विकल्पों और अहंकार से रहित (श्लोक 14.4)
अन्तस्त्यक्तकषायस्य
  • जिसने भीतर से विषय-वासनारूपी कषाय त्याग दिया (श्लोक 3.14)
अन्यशरीरवत्
अन्यस्य कस्यचित् न
  • अन्य किसी कर्ता-अभिमानी को वह सुख नहीं मिल सकता (श्लोक 16.4)
अपरः न किञ्चित् भावकः
  • कोई दूसरा शून्य या शून्यता का चिंतन करता है (श्लोक 18.42)
अबद्धाः मुक्त-बुद्धयः
  • सर्वथा अबद्ध (असंग) और मुक्त बुद्धि वाले होकर (श्लोक 18.53)
अभाग्यात्
अभुक्तेषु निराकाङ्क्षी
  • और जो भोग न मिले हों उनके प्रति पूर्ण आकांक्षारहित रहता है (श्लोक 17.4)
अभोक्तृत्वम्
  • और सर्वथा अभोक्ता (फल न भोगने वाली) है (श्लोक 18.51)
अभ्यास-रूपिणा कर्मणा
  • हठपूर्वक किए जाने वाले अभ्यासरूपी कर्मों से (श्लोक 18.36)
अमले त्वयि
अमी के अपि विषयाः
अयम् अहम् न
  • अथवा ‘यह दृश्य जगत मैं नहीं हूँ’ (श्लोक 15.15)
अयम् तत्त्व-बोधः
अयम् न अहम् इति
  • और 'यह (शरीर आदि) मैं नहीं हूँ’ ऐसी (श्लोक 18.9)
अयम् भवः भावना-मात्रः
  • यह संसार केवल मन की कल्पना और विचार मात्र है (श्लोक 18.4)
अयम् सः अहम्
अरण्यम् इव
अर्थार्जने रतिः
अलक्ष्य-स्फुरणः शुद्धः
  • इंद्रियों से न देखे जा सकने वाले आत्म-प्रकाश से युक्त शुद्ध ज्ञानी (श्लोक 18.70)
अलम् अर्थेन कामेन
  • अर्थ और काम से बस (बहुत हो चुका) (श्लोक 10.7)
अवधार्य
अवस्तुत्वात्
अविद्या अपि न किञ्चित्
अविनाशिनम्
अविह्वल-मनाः
  • जिसका मन तनिक भी विचलित, व्याकुल या भयभीत नहीं होता (श्लोक 17.14)
अव्रती
  • व्रत-आग्रह से रहित (पुस्तक: हठ-रहित) (श्लोक 9.1)
असंसारस्य तु
  • संसार (जन्म-मरण के भ्रम) से सर्वथा मुक्त पुरुष को (श्लोक 18.22)
असंसारी च कश्चन न
  • और न कोई तुमसे अलग मुक्त होने वाला ज्ञानी है (श्लोक 15.16)
असंस्पृश्य शरीरेण
असक्तः अस्पृहः शान्तः
असक्तम् सर्वदृष्टिषु
असङ्गः
असङ्गः निःस्पृहः
असमाधेः अविक्षेपात्
  • न समाधि का हठ होने से और न चित्त में विक्षेप होने से (श्लोक 18.28)
असहिष्णुता
असारम्
असौ
असौ न च ज्ञानी न वा योगी
असौ सर्वदा अकृत्रिमः
  • यह निरोध सदा स्वाभाविक (अकृत्रिम) रूप से बना रहता है (श्लोक 18.41)
अस्तम् आयातु
अस्मात्
अस्मिन् जगति तत्त्वज्ञः
  • इस संसार में आत्मतत्त्व को जानने वाला ज्ञानी (श्लोक 17.2)
अस्मिन् शरीरे
अस्य महात्मनः चिन्ता न
  • इस महात्मा ज्ञानी को इसकी तनिक भी कोई चिंता नहीं होती (श्लोक 18.86)
अहं कर्ता
अहंभासः
अहंमान
अहम् आस्थितः
अहम् एव
  • मैं ही एक चेतन आत्मा व्याप्त हूँ (श्लोक 11.7)
अहम् मम इति वा क्व
  • और ‘यह मैं हूँ’ अथवा ‘यह मेरा है’ का भाव कहाँ? (श्लोक 18.74)
अहम् यथासुखम् आसे
  • मैं परम सुख और तृप्ति में स्थित रहता हूँ (श्लोक 13.7)
  • मैं सर्वदा सहज सुख में स्थित रहता हूँ (श्लोक 13.5)
  • मैं सहज सुख में स्थित रहता हूँ (श्लोक 13.6)
अहम् शुक्तिसंकाशः
अहिः
अहो