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प्रकरण 2: दूसरा प्रकरणश्लोक १५/२५60%

अध्याय 2 · आत्मबोध का आश्चर्य

अष्टावक्र गीता, श्लोक 2.15

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: जनक

ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम् । अज्ञानाद्भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरञ्जनः ॥ १५ ॥

IAST लिप्यंतरण

jñānaṃ jñeyaṃ tathā jñātā tritayaṃ nāsti vāstavam | ajñānād bhāti yatredaṃ so 'ham asmi nirañjanaḥ || 15 ||

सरल उच्चारण: jnyaanam jnyeyam tathaa jnyaataa tritayam naasti vaastavam ajnyaanaad bhaati yatredam so ham asmi niranyjanah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

ज्ञानम्, ज्ञेयम्, तथा, ज्ञाता, त्रितयम्, न, अस्ति, वास्तवम्, अज्ञानात्, भाति, यत्र, इदम्, सः, अहम्, अस्मि, निरञ्जनः

ज्ञानम् ज्ञेयम् ज्ञाता
ज्ञान, ज्ञेय (जानने योग्य) और ज्ञाता
त्रितयम्
तीनों
वास्तवम् न अस्ति
यथार्थ से नहीं है
अज्ञानात् भाति
अज्ञान से भासता है
निरञ्जनः
निर्दोष

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता, ये तीनों वास्तव में नहीं हैं। जिस पर यह अज्ञान से भासता है, वह निर्दोष मैं ही हूँ।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार जनक कहते हैं कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय, यह जो त्रिपुटी है, वह भी वास्तव में नहीं है; अज्ञान के कारण चेतन में ये तीनों प्रतीत होते हैं। वास्तव में चेतन का इनके साथ भी कोई सम्बन्ध नहीं है। जो माया और माया के कार्य से रहित चेतन आत्मा है, वह मैं ही हूँ।

सरल हिन्दी में समझें

हम आम तौर पर सोचते हैं कि जानने वाला (मैं), जानने की क्रिया और जो जाना जाता है, ये तीन अलग चीज़ें हैं। जनक कहते हैं कि इस बँटवारे की पक्की सच्चाई नहीं है; यह बँटवारा मन की सुविधा से बनता है।

जो इन तीनों को जानता है, वही शुद्ध, निर्दोष जागरूकता है। इसे पूरी तरह समझना कठिन है, इसलिए इसे धीरे-धीरे परखिए, जल्दबाज़ी में नहीं।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय की त्रिपुटी को वास्तविक न बताकर अपने निरंजन स्वरूप की घोषणा करता है। 2. यह जानने वाले, जानने और जाने जाने वाले को अलग-अलग सत्य मानने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह निरंजन चेतना को अद्वैत आधार बताता है। 4. अध्याय में यह द्वैत के निषेध की दिशा में अगला कदम है। 5. 2.14 के स्वामित्व-निषेध के बाद यहाँ ज्ञान की संरचना का निषेध है। 6. यह परम दृष्टि है; व्यवहार में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद काम चलाने के लिए बना रहता है। 7. इसका अर्थ यह नहीं कि पढ़ना-समझना बेकार है।

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती।

उदाहरण से समझें: जैसे सपने में देखने वाला, देखना और देखा गया दृश्य तीनों एक ही मन की रचना हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

साक्षी

बादल बदलते हैं, आकाश नहीं। विचार बदलते हैं, साक्षी नहीं।

चित्र का वर्णन: स्थिर नीले आकाश में कुछ बादल बाएँ से दाएँ गुज़रते हैं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति किसी तनाव की स्थिति में ‘मैं’, ‘यह समस्या’ और ‘मेरी चिंता’ को तीन अलग भारी चीज़ें मानता है। जब वह एक पल रुककर देखता है कि तीनों उसी के मन में चल रही हैं, तो बोझ थोड़ा हल्का होता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: जानने वाले, जानने और जाने गए की भीड़ के पीछे एक सादी, शांत जागरूकता भी है।

सामान्य गलतफहमी

त्रिपुटी को ‘वास्तविक नहीं’ कहने का अर्थ यह नहीं कि पढ़ाई, सोच या अभ्यास बेकार है। जगत् की प्रतीति की स्वतंत्र सत्ता पर प्रश्न है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारता नहीं और दुख की उपेक्षा की अनुमति नहीं देता।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज किसी समस्या को लिखिए और उसके तीन भाग पहचानिए: कौन सोच रहा है, क्या सोच रहा है और किसके बारे में। फिर तीनों को एक पल साथ-साथ देखिए। (लगभग 5 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: जब मैं किसी बात को जान रहा होता हूँ, तब ‘जानने वाला’ और ‘जाना जाने वाला’ कितने अलग हैं?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट के लिए किसी वस्तु को देखिए और अलग-अलग पहचानिए: (1) वस्तु (2) देखना (3) मैं देख रहा हूँ। फिर तीनों के पीछे की स्थिरता को देखिए।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय के बँटवारे के पीछे एक निर्दोष जागरूकता है।

English

Translation: Knowledge, the known and the knower: this triad has no real existence. I am that stainless one, in whom it appears through ignorance.

Simple explanation: The usual split into knower, knowing and known is treated as an appearance on awareness. This is a subtle point; it does not make study or practical thinking pointless.

विषय और संबंधित श्लोक

  • अद्वैत
  • चेतना
  • आत्मज्ञान
  • साक्षीभाव
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 2.14: स्वामित्व-भाव का निषेध।
  • श्लोक 2.16: द्वैत से उत्पन्न दुख का उपाय।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 61–62 (PDF पृ. 68–69)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया।