श्लोक 2.1
अहो निरञ्जनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः । एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडंबितः ॥ १ ॥
गलत पहचान दिख जाए, तो राहत के साथ आश्चर्य भी होता है कि इतना समय कैसे बीत गया।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअध्याय 2 · दूसरा प्रकरण
जनक अपने बोध को आश्चर्य और उदाहरणों के साथ कहते हैं: संसार लहरों, कपड़े और रस्सी में साँप की तरह उसी चेतना में प्रतीत होता है जो सबको जानती है।
पहले प्रकरण में अष्टावक्र ने जनक के तीन प्रश्नों का उत्तर देकर आत्म-बोध की दिशा दिखाई थी। दूसरे प्रकरण में वक्ता राजा जनक हैं। पुस्तक की भावार्थ-टीका बताती है कि अष्टावक्र के उपदेश से जनक को आत्म-साक्षात्कार हुआ और अब वे अपना अनुभव बड़े आश्चर्य के साथ प्रकट करते हैं। इस प्रकरण के आरंभ में पुस्तक में वक्ता का नाम छपा नहीं है; संदर्भ और टीका से स्पष्ट है कि बोलने वाले जनक हैं।
इस प्रकरण में जनक पहले अपने स्वरूप की घोषणा करते हैं (2.1), फिर तर्क और उदाहरण देते हैं: जगत् मुझमें ही प्रकाशित है (2.2–2.3), लहर-जल, कपड़ा-धागा, रस-शक्कर (2.4–2.6), रस्सी-साँप, सीप-चाँदी और मृगतृष्णा (2.7–2.9), मिट्टी-घड़ा और सोना-कंगन (2.10)। फिर वे अपने अविनाशी, एक और असंग स्वरूप पर आश्चर्य करते हैं (2.11–2.14), ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय की त्रिपुटी और दुख की जड़ पर बात करते हैं (2.15–2.17), बंध-मोक्ष और कल्पना की बात करते हैं (2.18–2.20), असंगता और जीने की चाह की पकड़ पर आते हैं (2.21–2.22) और अंत में समुद्र और लहरों के रूपक से पूरा करते हैं (2.23–2.25)। आधुनिक पाठक के लिए यह प्रकरण इसलिए उपयोगी है कि यह दिखाता है कि हम जिन चीज़ों को बहुत ठोस और स्वतंत्र मान लेते हैं, उनके पीछे एक सरल आधार देखा जा सकता है।
यदि संसार का अनुभव मेरी जागरूकता में ही हो रहा है, तो उसकी पकड़ मुझ पर कैसी रहनी चाहिए?
पुस्तक के अनुसार जनक यह कहते हैं कि जगत्, शरीर और बंध-मोक्ष की मान्यता सब अज्ञान से उसी आत्मा में प्रतीत होती है, जैसे सीप में चाँदी या रस्सी में साँप; आत्मा लहरों का आधार समुद्र, कपड़े का धागा, घड़े की मिट्टी है। इसलिए जनक असंग रहकर भी सबको प्रकाशित करने वाली अपनी चेतना को नमस्कार करते हैं। साथ ही पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि ज्ञान के बाद भी जगत् की प्रतीति रह सकती है, पर उसकी पकड़ नहीं रहती (बाधितानुवृत्ति)। ये सब परम दृष्टि की बातें हैं; व्यावहारिक जीवन में निर्णय, संबंध, स्वास्थ्य की देखभाल और ज़िम्मेदारियाँ बनी रहती हैं।
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अहो निरञ्जनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः । एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडंबितः ॥ १ ॥
गलत पहचान दिख जाए, तो राहत के साथ आश्चर्य भी होता है कि इतना समय कैसे बीत गया।
पूरी व्याख्या पढ़ेंयथा प्रकाशयाम्येको देहमेनं तथा जगत् । अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किंचन ॥ २ ॥
देह और संसार जिस रोशनी में दिखते हैं, वह जागरूकता ही आप हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंसशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाऽऽधुना । कृतश्चित्कौशलादेव परमात्मा विलोक्यते ॥ ३ ॥
संसार को छोड़ना नहीं, उसे अपनी पूरी पहचान मानना छोड़ना ही यहाँ त्याग है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंयथा न तोयतो भिन्नास्तरङ्गाः फेनबुद्बुदाः । आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वामात्मविनिर्गतम् ॥ ४ ॥
लहर जल से अलग नहीं; जगत् चेतना से अलग नहीं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंतन्तुमात्रो भवेदेव पटो यद्वद्विचारतः । आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद्विश्वं विचारितम् ॥ ५ ॥
जैसे कपड़े में धागे ही हैं, वैसे संसार में चेतना ही है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंयथैवेक्षुरसे क्लृप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा । तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम् ॥ ६ ॥
शक्कर में मिठास जैसे रस की है, अनुभव में जागरूकता वैसे ही हमारी है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंआत्माऽज्ञानाज्जगद्भाति आत्मज्ञानान्न भासते । रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद्भासते न हि ॥ ७ ॥
अज्ञान से जो भासता है, ज्ञान से उसकी पकड़ बदल जाती है, जैसे रस्सी में साँप।
पूरी व्याख्या पढ़ेंप्रकाशो मे निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः । यदा प्रकाशते विश्वं तदाऽहं भास एव हि ॥ ८ ॥
जिस प्रकाश में संसार दिखता है, वह आपकी अपनी जागरूकता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते । रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा ॥ ९ ॥
सीप, रस्सी और मृगतृष्णा की तरह संसार की पक्की प्रतीति भी आधार की पहचान से बदलती है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंमत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति । मृदि कुम्भो जले वीचिः कनके कटकं यथा ॥ १० ॥
घड़ा मिट्टी में लौटता है, लहर जल में, कंगन सोने में; रूप बदलते हैं, आधार नहीं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअहो अहं नमो मह्यं विनाशी यस्य नास्ति मे । ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगन्नाशेऽपि तिष्ठतः ॥ ११ ॥
जगत् बदले और मिटे, पर जो उसे जानता है, वह उन सबके बीच बना रहता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअहो अहं नमो मह्यमेकोऽहं देहवानपि । क्वचिन्नगन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः ॥ १२ ॥
देह अलग-अलग हैं, पर सबको जानने वाली जागरूकता एक है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअहो अहं नमो मह्यं दक्षो नास्तीह मत्समः । असंस्पृश्य शरीरेण येन विश्वं चिरं धृतम् ॥ १३ ॥
जागरूकता बिना छुए सब कुछ को जगह देती है; आप उसके कर्ता नहीं, आधार हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किञ्चन । अथवा यस्य मे सर्वं यद्वाङ्मनसगोचरम् ॥ १४ ॥
मेरा कुछ अलग से नहीं, पर सब मुझमें है: यही असंग रहकर जुड़े रहने की समझ है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम् । अज्ञानाद्भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरञ्जनः ॥ १५ ॥
ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय के बँटवारे के पीछे एक निर्दोष जागरूकता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंद्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्यास्ति भेषजम् । दृश्यमेतन्मृषा सर्वमेकोऽहं चिद्रसोऽमलः ॥ १६ ॥
दुख की जड़ अलगाव की मान्यता है; समझ उसकी पकड़ ढीली करती है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंबोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः कल्पितो मया । एवं विमृश्यतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम ॥ १७ ॥
मैं बोध-मात्र हूँ; अपने ऊपर चढ़ाई सीमाएँ बार-बार के विचार से हल्की होती हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम् । न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्ता निराश्रया ॥ १८ ॥
जिस बंधन को हमने सच मान लिया था, उसका आधार केवल मान्यता थी।
पूरी व्याख्या पढ़ेंसशरीरमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चितम् । शुद्धचिन्मात्रआत्मा च तत्कस्मिन्कल्पनाऽऽधुना ॥ १९ ॥
असली पहचान एक बार दिख जाए, तो कल्पना को टिकने का आधार नहीं मिलता।
पूरी व्याख्या पढ़ेंशरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा । कल्पनामात्रमेवैतत्किं मे कार्यं चिदात्मनः ॥ २० ॥
भय को पहचानना और ज़िम्मेदारी निभाना, दोनों साथ चल सकते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअहो जनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम । अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम् ॥ २१ ॥
भीड़ के बीच भी आसक्ति ढीली हो तो शांति बनी रहती है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंनाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित् । अयमेव हि मे बंध आसीद्या जीविते स्पृहा ॥ २२ ॥
जीवन की देखभाल कीजिए, पर उसके खोने के डर की जकड़ को ढीला कीजिए।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअहो भुवनकल्लोलैर्विचित्रैर्द्राक् समुत्थितम् । मय्यनन्तमहाम्भोधौ चित्तवाते समुद्यते ॥ २३ ॥
मन की हलचल लहर है; उसे देखने वाली जागरूकता समुद्र है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंमय्यनन्तमहाम्भोधौ चित्तवाते प्रशाम्यति । अभाग्याज्जीववणिजो जगत्पोतो विनश्वरः ॥ २४ ॥
मन की हवा थमती है तो लहरें थमती हैं; पर जीवन की देखभाल हमेशा ज़रूरी रहती है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंमय्यनन्तमहाम्भोधावाश्चर्यं जीववीचयः । उद्यन्ति घ्नन्ति खेलन्ति प्रविशन्ति स्वभावतः ॥ २५ ॥
लहरें टकराती-खेलती रहती हैं; समुद्र अपनी जगह रहता है और ज़िम्मेदारी भी।
पूरी व्याख्या पढ़ेंदूसरा प्रकरण जनक के अनुभव-कथन का प्रकरण है। वे कहते हैं कि वे निरंजन और बोध-रूप हैं और इतने समय मोह में थे। फिर वे दिखाते हैं कि संसार उनकी ही चेतना में उसी तरह प्रतीत होता है जैसे लहरें जल में, कपड़ा धागे में, गहना सोने में और साँप रस्सी में। वे अपने अविनाशी, एक, असंग स्वरूप पर आश्चर्य करते हैं और ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय के बँटवारे को भी परखते हैं। पुस्तक के अनुसार दुख की जड़ द्वैत की मान्यता है, और बंधन-मोक्ष की धारणाएँ भी अज्ञान से हैं। जनक कहते हैं कि उन्हें भीड़ भी वन जैसी लगती है और जीने की जकड़ ही उनका बंधन थी। अंत में वे समुद्र और लहरों के रूपक से कहते हैं कि चेतना-समुद्र में जीव-लहरें उठती-गिरती रहती हैं, और समझ आ जाने पर भी उनकी प्रतीति रह सकती है, पर उसकी पकड़ नहीं रहती।
पाँच मिनट आराम से बैठिए। पहले एक मिनट साँस को देखिए। फिर मन में उठने वाले हर विचार या भावना को ‘लहर’ कहकर नाम दीजिए और जाने दीजिए। फिर पूछिए: ‘इन लहरों को देखने वाली जागरूकता कैसी है?’ किसी निष्कर्ष की जल्दी न करें। यह कोई चिकित्सा या उपचार नहीं, केवल एक चिंतन-अभ्यास है। कोई असुविधा या भारीपन बढ़े तो तुरंत रुकें और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात करें।
पुस्तक में इस प्रकरण के आरंभ में वक्ता का नाम छपा नहीं है, पर टीका के संदर्भ से वक्ता जनक हैं, जो अष्टावक्र के उपदेश के बाद अपना अनुभव कहते हैं।
नहीं। यह जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न है। यह व्यावहारिक अनुभव को नकारता नहीं और दुख की उपेक्षा की अनुमति नहीं देता।
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है। व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है।
यह जीवन की चिपकन और उसे खोने के डर की जकड़ ढीली होने की बात है। यह जीवन को तुच्छ ठहराने या स्वयं को हानि पहुँचाने की बात नहीं है। यदि जीवन से निराशा के विचार आएँ, तो किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या स्थानीय सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।
यह पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है कि ज्ञानी की भीतरी स्वतंत्रता भय या लालच पर नहीं टिकी होती। यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती।
पुस्तक के अनुसार जिसे ज्ञान से असत्य जाना जा चुका हो, उसका फिर भी दिखते रहना, जैसे मृगतृष्णा का जल। ज्ञानी उसके पीछे नहीं भागता, इसलिए उसे हानि नहीं पहुँचती।
नहीं। जनक के कथन उनके अनुभव की भाषा हैं। श्लोकों में एकता और असंगता की बात है, श्रेष्ठता की नहीं।