दृश्य, गति और थीम की सेटिंग(इस डिवाइस पर सहेजी जाती हैं)
दृश्य मोड
गति
थीम

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व

82 पद-समूह।

वक्तुम् एव न किञ्चन
  • और न उसके पास कहने के लिए कुछ बचता है (श्लोक 18.77)
वदन् व्रजन्
वन्द्यमानः न प्रीयते
  • दूसरों द्वारा वंदना और पूजा किए जाने पर वह प्रसन्न (अहंकारी) नहीं होता (श्लोक 18.99)
वस्तु-श्रवण-मात्रेण
  • केवल यथार्थ आत्मतत्त्व के श्रवण मात्र से (श्लोक 18.48)
वस्तुतः न स्थितम्
वा तत्त्व-विनिश्चयः क्व
  • और तत्त्व का निश्चय कहाँ? (वह इन सभी मानसिक अवस्थाओं से परे है) (श्लोक 18.92)
वा निरातङ्कता अपि क्व
  • और निर्भयता भी कहाँ? (वह इन सभी सद्गुणों की सीमाओं से भी परे है) (श्लोक 18.79)
वा मृत्युम् समुपस्थितम् दृष्ट्वा
  • अथवा सामने साक्षात मृत्यु को उपस्थित देखकर भी (श्लोक 17.14)
वा मोक्षः च क्व
वा विश्वम् क्व
वाग्मि-प्राज्ञ-महोद्योगम् जनम्
  • वाचाल, चतुर और अत्यधिक भागदौड़ करने वाले मनुष्य को भी (श्लोक 15.3)
वाग्विस्तरासहः
  • वाणी के विस्तार और शास्त्र-चर्चा को सहने में असमर्थ हुआ (श्लोक 12.1)
वारि सूर्यकरे
वारिधेः इव बुद्बुदः
वासना एव संसारः
वासनाशून्यः
  • समस्त वासनाओं और कामनाओं से रहित होकर (श्लोक 11.8)
वास्तवम् न अस्ति
विकलः
विकल्पना क्षीणा
  • समस्त मानसिक कल्पनाएं सर्वथा क्षीण हो जाती हैं (श्लोक 18.9)
विकल्पितम्
विक्षेपे अपि न विक्षिप्तः
  • संसार के कोलाहल (विक्षेप) में भी वह तनिक भी विक्षिप्त (अशांत) नहीं होता (श्लोक 18.97)
विक्षेपैकाग्र्यहृदयः
  • चित्त के भटकाव और बलपूर्वक एकाग्रता—दोनों के द्वन्द्व से मुक्त होकर (श्लोक 12.2)
विगतकौतुकः
  • जिसकी कौतूहल या अज्ञानता चली गई (श्लोक 3.11)
विचारतः
विचित्रैः
विज्ञ
विज्ञस्य एव
विज्ञाय
विज्वरः भव
  • तुम संताप और चिंताओं के ज्वर से मुक्त हो जाओ (श्लोक 15.7)
विदेहः इव राजते
  • मानो देहरहित (विदेह) होकर ही शोभा पाता है (श्लोक 18.22)
विद्धि
विद्या च क्व
विनश्वरः
विनिर्धूत-रजस्-तमः
  • और जिसके रजोगुण और तमोगुण सर्वथा धुल (नष्ट) चुके हैं (श्लोक 18.88)
विप्रादिकः वर्णः
विभीषिका
विभुः
विभो
विमूढः मोक्षम् न आप्नोति
  • अज्ञानी पुरुष मोक्ष को प्राप्त नहीं कर पाता (श्लोक 18.36)
विमूढताम् न जहाति
  • अपनी मूर्खता और अज्ञान को नहीं छोड़ता (श्लोक 18.76)
विमूढस्य निरोधः क्व
  • उस अज्ञानी का चित्त-निरोध कहाँ सिद्ध हो सकता है (श्लोक 18.41)
विमृश्य किम् करिष्यसि
  • अब व्यर्थ का विचार-मंथन करके क्या करोगे? (श्लोक 15.20)
विमृश्यतः
विरक्तस्य
विवेकित्वम् क्व
विशेषः न एव अस्ति
  • तनिक भी कोई भेद या अंतर नहीं होता (श्लोक 17.15)
विश्रान्तिम् आगतः धीरः
  • जो ज्ञानी अपनी आत्मा में परम विश्राम को प्राप्त हो चुका है (श्लोक 18.27)
विश्राम्य तिष्ठसि
  • विश्राम करके, चित्त को टिकाकर स्थित रहता है (श्लोक 1.4)
विश्व-विलये वाञ्छा न
  • न तो इस संसार के नष्ट (प्रलय) होने की कोई चाह होती है (श्लोक 17.7)
विश्व-वीचिः
विश्वं नाम विकल्पना
  • विश्व निश्चय से कल्पना-मात्र है (श्लोक 7.3)
विश्वपोतः
विश्वम्
विश्वम् इदम्
विश्वसाक्षी
विश्वासामृतम्
विषय-दन्तिनः तूष्णीम्
विषय-द्वीपिनः वीक्ष्य
  • संसार के विषय-भोग रूपी चीतों (बाघों) को देखकर (श्लोक 18.45)
विषय-द्वेष्टा विरक्तः
  • सांसारिक विषयों से घृणा या द्वेष करने वाला विरक्त कहलाता है (श्लोक 16.6)
विषय-लोलुपः रागी
  • और विषयों में लिप्त रहने वाला रागी कहलाता है (श्लोक 16.6)
विषय-वैरस्यम्
  • इंद्रियों के भोगों के प्रति विरक्ति और उदासीनता (श्लोक 15.2)
विषयभ्रमगोचरे
विषयान्
विषयेषु च निष्कामः
  • और सांसारिक विषय-भोगों के प्रति सर्वथा निष्काम (श्लोक 18.84)
विषवत् त्यज
विस्मृत-अशेष-संसृतेः
  • वह संपूर्ण संसार-भ्रम को पूरी तरह भूल चुका है (श्लोक 18.86)
विहस्य धिक्कृतः अपि
  • हँसी उड़ाये जाने और धिक्कारे जाने पर भी (श्लोक 18.55)
विहाय
वीचिसन्निभः
वीत-शोकाः विराजन्ते
  • शोक से सर्वथा मुक्त होकर दिव्य रूप से प्रकाशित होते हैं (श्लोक 18.6)
वीततृष्णः
वीतरागः हि निर्दुःखः
  • किंतु राग-रहित पुरुष तो स्वभाव से ही निर्दुःख है (श्लोक 16.9)
वैतृष्ण्यात् सर्वत्र समः
  • तृष्णा के अभाव से सब जगह और सब काल में समभाव रहता है (श्लोक 18.98)
वैराग्यम्
  • वैराग्य, विषयों के प्रति मानसिक निर्भरता से स्वतंत्रता (श्लोक 1.1)
वैराग्यम् क्व
वैरिणम् कामम्
वैषयिकः रसः
व्यवहारसमाधये
  • और स्वाभाविक व्यवहार भी समाधि का ही रूप है (श्लोक 12.3)
व्यवहारे अपि
  • लौकिक व्यवहार करते हुए भी वह सदा सुख में ही रहता है (श्लोक 18.59)
व्याप्ता
व्याप्य
व्यामोह-मात्र-विरतौ
  • केवल मोह (अज्ञान) के शांत हो जाने पर (श्लोक 18.6)