दृश्य, गति और थीम की सेटिंग(इस डिवाइस पर सहेजी जाती हैं)
दृश्य मोड
गति
थीम

आपके डिवाइस की “कम गति” सेटिंग हमेशा मानी जाती है। “केवल पाठ” मोड में कोई सजावटी चित्र या गति नहीं रहती।

प

53 पद-समूह।

पटः
परः
  • किंतु अन्य (अशुद्ध बुद्धि वाला मनुष्य) (श्लोक 15.1)
परब्रह्म-स्वरूप-भाक्
  • स्वयं परब्रह्मस्वरूप का ही अनुभव करता है (श्लोक 18.37)
परमार्थतः किञ्चित् न
  • परमार्थ दृष्टि से यह वास्तव में कुछ भी नहीं है (श्लोक 18.4)
परमार्थतः त्वम् एकः
  • वास्तविक सत्य रूप में तुम अकेले ही अद्वितीय हो (श्लोक 15.16)
परमेश्वरः
परिग्रहेषु वैराग्यम्
  • बाहरी वस्तुओं (धन, वस्त्र, मकान) के त्याग का वैराग्य (श्लोक 18.62)
परिभावय
  • विचार कर, निश्चयपूर्वक भाव कर (श्लोक 1.13)
पलायन्ते
पश्य
पश्यतः मुनेः
  • साक्षात देखने वाले मननशील ज्ञानी के लिए (श्लोक 18.74)
पश्यन् अपि न पश्यति
  • देखता हुआ भी (भेद-दृष्टि से) नहीं देखता (श्लोक 18.90)
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन्
पश्यन्ति आत्मानम् अव्ययम्
  • वे केवल अविनाशी आत्मा का ही नित्य दर्शन करते हैं (श्लोक 18.40)
पश्यसि
पाण्डित्ये अपि न पण्डितः
  • और भारी विद्वत्ता में भी वह पंडित (अहंकारी विद्वान) नहीं बनता (श्लोक 18.97)
पीड्यमानः
पीयूषवत् भज
पुण्यपापाभ्याम् स्पर्शः
पुत्र-दारा-आदौ निःस्नेहः
  • पुत्र, पत्नी आदि संबंधियों में मोह (अंधी आसक्ति) से रहित (श्लोक 18.84)
पुत्रक
पुनर्भवसम्भवः
  • फिर से जन्म-संसार की उत्पत्ति (श्लोक 1.18)
पुरुषार्थे स्थितः
  • परम पुरुषार्थ (सहज आत्मस्वरूप) में स्थित होकर (श्लोक 13.2)
पुष्कलान् भोगान् आप्नोति
  • और प्रचुर विषय-भोगों को प्राप्त करके भी (श्लोक 18.2)
पूर्ण-स्व-रस-विग्रहः
  • जो अपने पूर्ण आत्मानंद के रस का ही साक्षात विग्रह (मूर्त रूप) है (श्लोक 18.67)
पूर्णः
पूर्णः एकः
पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, द्यौः
  • पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश: पाँच तत्त्व (श्लोक 1.3)
प्रकाशः
प्रकाशते
प्रकाशयामि
प्रकृतेः परः
प्रकृतेः परः आत्मा (असि)
  • प्रकृति और उसके तीनों गुणों से परे परमात्मा हो (श्लोक 15.8)
प्रकृत्या शून्य-चित्तस्य
  • स्वभाव से ही संकल्प-विकल्प शून्य चित्त वाले (श्लोक 18.24)
प्रत्यक्षम् अपि
प्रपञ्चः
प्रभो
प्रमादात् भाव-भावनः
  • और यदि कभी प्रारब्धवश किसी सांसारिक विषय का विचार आ भी जाए (श्लोक 14.1)
प्रयत्नात् अप्रयत्नात् वा
  • चाहे वह हठपूर्वक प्रयत्न करे या प्रयत्न छोड़ दे (श्लोक 18.34)
प्रविशन्ति
प्रवृत्तः अपि
  • संसार के कार्यों में प्रवृत्त दिखता हुआ भी (श्लोक 11.8)
प्रवृत्तिः एव जायते
  • मानसिक कर्म (प्रवृत्ति) ही बन जाता है (श्लोक 18.61)
प्रवृत्तौ रागः जायते
  • संसार के कर्मों में उलझने पर आसक्ति (राग) बढ़ती है (श्लोक 16.8)
प्रशम-पीयूष-धारा-असारम् ऋते
  • उस पुरुष को परम शांति रूपी अमृत की मूसलाधार वर्षा के बिना (श्लोक 18.3)
प्रशाम्यति
प्राकृतस्य इव धीरस्य
  • साधारण अज्ञानी मनुष्य की भाँति व्यवहार करते हुए भी ज्ञानी का (श्लोक 18.24)
प्राज्ञः निर्वृतः भवति
  • किंतु बुद्धिमान ज्ञानी परम शांत हो जाता है (श्लोक 18.34)
प्राप्त-अप्राप्तम् उपाश्नुते
  • जो मिले उसे और जो न मिले उसे भी समभाव से अनुभव करता है (श्लोक 17.17)
प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः
  • जो प्राप्त है और जो अप्राप्त है, दोनों में सदा तृप्त रहता है (श्लोक 11.7)
प्राप्तितुष्टिः मुहुर्मुहुः
  • बार-बार (आत्मा की) प्राप्ति और तृप्ति (श्लोक 10.4)
प्रायः मूढस्य दृश्यते
  • प्रायः अज्ञानी साधकों में ही देखा जाता है (श्लोक 18.62)
प्रेप्सवः
प्रौढवैराग्यम्