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दृश्य मोड
गति
थीम

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श

34 पद-समूह।

शक्राद्याः सर्वदेवताः
शब्दादेः प्रीत्यभावेन
  • शब्द, स्पर्श, रूप आदि बाह्य विषयों में आसक्ति न रहने से (श्लोक 12.2)
शम-हेतुकम् च वा क्व
  • और मन को शांत करने के साधन (शमहेतु) कहाँ हैं? (श्लोक 18.71)
शमम् गतः
  • भीतर से परम शांति को प्राप्त रहता है (श्लोक 11.8)
शयनेन वा
शरीराणि सुखानि च
शर्करा
शान्त-धीः
शान्तः
शान्ता निराश्रया
शान्ताय तेजसे नमः
  • परम शान्त और तेजोमय आत्मतत्त्व को नमस्कार है (श्लोक 18.1)
शीतल-अच्छतर-आत्मनः
  • जिसका अंतःकरण परम शीतल और अत्यंत निर्मल (स्वच्छ) है (श्लोक 18.23)
शीतलम् अमृतेन एव पूरितम्
  • आत्म-शांति रूपी अमृत से परिपूर्ण होकर सदा शीतल रहता है (श्लोक 18.81)
शीतलाशयः
  • शांति और मुक्ति का स्थान, शीतल मन वाला (श्लोक 1.17)
शुक्तेः अज्ञानतः
शुचिः
शुद्ध-बुद्धिः निराकुलः
  • जिसकी बुद्धि परम शुद्ध और व्याकुलता-रहित हो गई है (श्लोक 18.48)
शुद्ध-बोधस्य
  • विशुद्ध ज्ञानस्वरूप आत्मा के लिए (श्लोक 18.69)
शुद्ध-रूपिणा मया न
  • मुझ विशुद्ध चैतन्यस्वरूप आत्मा द्वारा नहीं (श्लोक 18.25)
शुद्ध-स्फुरण-रूपस्य विदुषः
  • विशुद्ध चैतन्य प्रकाश रूप ज्ञानी के लिए (श्लोक 18.71)
शुद्धः
शुद्धचैतन्यम्
शुद्धबुद्धस्वरूपः
शुद्धम् अद्वयम् आत्मानम्
शुद्धम् बुद्धम् प्रियम् पूर्णम्
  • जो सर्वथा शुद्ध, ज्ञानस्वरूप, परमानंदप्रद और परिपूर्ण है (श्लोक 18.35)
शुभ-अशुभे विहाय
  • शुभ और अशुभ (अनुकूल-प्रतिकूल) के आग्रह को विदा कर (श्लोक 13.7)
शुभम् वा अपि अशुभम् वा अपि
  • चाहे वह सांसारिक दृष्टि से शुभ हो या अशुभ (श्लोक 18.49)
शून्य-आकाराः निराकाराः
  • क्योंकि वे अहंकार-शून्य, देहाकार-रहित (श्लोक 18.57)
शून्य-चित्तः
  • समस्त वासनाओं और विकल्पों से शून्य चित्त वाला ज्ञानी (श्लोक 17.18)
शोचति
शोभते
श्रद्धस्व श्रद्धस्व
  • श्रद्धा करो, पूर्ण विश्वास करो (श्लोक 15.8)
श्रुत्वा अपि
श्रोत्रियम् देवताम् तीर्थम्
  • वेदज्ञ ब्राह्मण, देवता, पवित्र तीर्थ (श्लोक 18.54)