अध्याय १०
श्लोक 1
॥ चतुर्थं ब्राह्मणम् ।मन्त्र १ [II.iv.1] मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्य उद्यास्यन्वा अरेऽहमस्मात्स्थानादस्मि ।हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति
|| chaturthaM brAhmaNam . mantra 1 ##[II.iv.1]## maitreyIti hovAcha yAj~navalkya udyAsyanvA are.ahamasmAtsthAnAdasmi | hanta te.anayA kAtyAyanyA.antaM karavANIti
हिन्दी अर्थ
श्रीमच्छ्करभगवतः कृतौ ब्रहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये ८ चतुर अच्यायसे उपतिषद्का दवितीय -- व जय सव चि । चहो जब्राह्मणका चतुर्थं अध्याय है । आत्मेत्येवोपासीत, तदन्वेषणे “आत्मा है" इस प्रकार उपासना । ॐ किसी समय कोई गाग्यंगोत्रोत्पन्न च्छ ( गर्वीला ) वालाकि बड़ा बोलनेवाला था । उसने काशिराज अजातशतुके पास जाकर कहा-- भ तुम्हे ब्रह्मका उपदेश कर 1 उस अजातशतरुने कहा, इस वचनके लिये
English
Now when Yâgñavalkya was going to enter upon another state, he said: 'Maitreyî , verily I am going away from this my house (into the forest ). Forsooth, let me make a settlement between thee and that Kâtyâyanî (my other wife).'