अध्याय ९
श्लोक 1
॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ।मन्त्र १ [II.Ii.1] द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च मर्त्यं चामृतं च स्थितं च यच्च सच्च त्यच्च
|| tR^itIyaM brAhmaNam . mantra 1 ##[II.Ii.1]## dve vAva brahmaNo rUpe mUrtaM chaivAmUrtaM cha martyaM chAmR^itaM cha sthitaM cha yachcha sachcha tyachcha
हिन्दी अर्थ
२३७८ बृहदारण्यकोषनिषद् अध्याय १ जल ओर चन््रमासे इसमें हैव प्राणका अवेराहो जाताहै। हैव प्राण वही है जो सञ्चार करते ओर सश्चारन करते हुए भी व्यथित अद्धयथरेनं चन्द्रमसश्च देवः जल ओर चन्द्रमासे इसमे देव प्राण आविष्टहो जाताहै। वह् हैव र प्राण किन लक्ष्णोवालाहै? सो (त एते स॒वं एव समाः सर्व वे ये समी समान है मौर सभी । अनन्त है" इस मन्वे वाक्, मन भौर प्राणको उपासना सामान्यरूपसे
English
There are two forms of Brahman, the material and the immaterial, the mortal and the immortal, the solid and the fluid, sat (being) and tya (that), (i.e. sat-tya, true) .