अध्याय ६
श्लोक 48.1
स्वस्तिवाचनम्।१-३ अङ्गिराः, प्रचेताः।१ श्येनः, २ ऋभुः, ३ वृषा।उष्णिक्।श्ये॒नोऽसि गाय॒त्रच्छन्दा॒ अनु॒ त्वा र॑भे ।स्व॒स्ति मा॒ सं व॑हा॒स्य य॒ज्ञस्यो॒दृचि॒ स्वाहा॑
svastivācanam| 1-3 aṅgirāḥ, pracetāḥ| 1 śyenaḥ, 2 ṛbhuḥ, 3 vṛṣā| uṣṇik| śyeno'si gāyatracchandā anu tvā rabhe | svasti mā saṃ vahāsya yajñasyodṛci svāhā
हिन्दी अर्थ
(है) है (तदं) हिसक ! (है) है (पतङ्ख)पतङ्खं के सदश शोध्रगतिक ! (जभ्य) हस्य ! (हा -है। है (उपक्वस -उप + कु अस) ओ ! लगभग कुत्सित गति अर्थात् चाल वाले आखु ! चूटै (हविः)हवि को (अनदन्तः) न खाते हृए (इमान् यवान्) इन जौँ कौ (अहिसन्तः) हिसा न करते हए (अपोदित) अपगत हो जाजा भाग जाओ। (ब्रह्म इव हविः) ब्रह्म के जा सकता, अतः सुरक्षित है । तद, पतङ्गं आदि में जात्येकवचन है । उपक्वस मे "अस का अथे है, "गति (स्वादिः)। अथवा श्रय वैसे यज्ञयो्य हविः अन्न भी सुरक्षित है इसे आखु खा नहीं सकता । तव इस के दो विभाग कर “नवसस्येष्टि"” तथा अन्य यज्ञो के लिधे एक विभाग अलग रब लेना चाहिए, ओौर खाद्य अन्न का विभाग उससे अलग ' पतङ्खं = पतन् गच्छतीति, जो उड़ता हुंजा जाता है, पतङ्गा । (त्दपिते) टे हिसक आखओं के पति ! (वर्घांपते) है आक्षप
English
May Agni, Soma mark through this libation: may Vāyu, Savitar, and Bhaga guard us.