अध्याय ७
श्लोक 1.1
आत्मा।१-२ अथर्वा (ब्रह्मवर्चसकामः) ।आत्मा।त्रिष्टुप्, २ विराड् जगती।धी॒ती वा॒ ये अन॑यन् वा॒चो अग्रं॒ मन॑सा वा॒ येऽव॑दन्नृ॒ तानि॑ ।तृ॒तीये॑न॒ ब्रह्म॑णा वावृ॒धा॒नास्तु॒रीये॑णामन्वत॒ नाम॑ धे॒नोः
ātmā| 1-2 atharvā (brahmavarcasakāmaḥ) | ātmā| triṣṭup, 2 virāḍ jagatī| dhītī vā ye anayan vāco agraṃ manasā vā ye'vadannṛ tāni | tṛtīyena brahmaṇā vāvṛdhānāsturīyeṇāmanvata nāma dhenoḥ
हिन्दी अर्थ
नमुक्त नहीं हुए उन मूमृक्षुशों को स्थिति तुतीयधाममें होती दहै । यथा संसारी होता है, वे अभी जीवन्मुक्तावस्था मे नहीं होते, अतः वे प्रनापति- ओर पालन के साथ सम्बद्ध रहतारहै, इस संसार के साथ सम्बद्ध वह पृथिवी माता को (वेद) जानता है, (सः सूनुः) वह् जगत् का प्रेरक .
English
Glorification of the power of prayer and to Agni They who by thought have guided all that Speech hath best, or they who with their heart have uttered words of truth,