अध्याय ६
श्लोक 1.1
अमृतप्रदाता १-३ अथर्वा।सविता।उष्णिक्, १ त्रिपदा पिपिलिकमध्या साम्नी जगती, २-३ पिपीलिकमध्या पुरउष्णिक्।दो॒षो गा॑य बृ॒हद् गा॑य द्यु॒मद् धे॑हि ।आथ॑र्वण स्तु॒हि दे॒वं स॑वि॒तार॑म्
amṛtapradātā 1-3 atharvā| savitā| uṣṇik, 1 tripadā pipilikamadhyā sāmnī jagatī, 2-3 pipīlikamadhyā purauṣṇik| doṣo gāya bṛhad gāya dyumad dhehi | ātharvaṇa stuhi devaṃ savitāram
हिन्दी अर्थ
का० ६। अनु० १। सूु०२ अथवेवेद-भाष्य रै इससे प्रतीत होता है कि मन्त्र मे “सोम द्वारा सोम॒ ओषधि भौर उसका रस ही नही, अपितु प्रकरणानुसार सोम के अन्याथं भी हते ईहै। पृथिवी भोगी = पाथिव भोगों में भासक्त पुरुष । वाली, (मृधः) तथा संग्रामकारौ हमरो दुर्भावनां का (विजहि) विक्ष- युवा जेतेशानः स पुरुष्टुतः ॥३॥ (पुरुष्टूतः) बहुत स्तुत हुभा (जता) विजय प्राप्त करता है । वह (युवा) सदा युवा है, (ईशानः) ओर अधीश्वर है ।
English
In praise of Savitar Sing, Atharvana, at eve, sing loudly, bring a splendid present: hymn God Savitar with praises. Yea, praise him whose home is in the river, Son of Truth, the youthful, gracious friend whose