Brihadaranyaka Upanishad· Bṛhadāraṇyakopaniṣad
12
अध्याय 12 / 45

Adhyāya 12

3 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय १२

श्लोक 1

॥ षष्ठं ब्राह्मणम् मन्त्र १ [II.vi.1] अथ वँशः पौतिमाष्यो गौपवनाद् गौपवनः पौतिमाष्यात् पौतिमाष्यो गौपवनाद् गौपवनः कौशिकात् कौशिकः कौण्डिन्यात् कौण्डिन्यः शाण्डिल्याच् छाण्डिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च गौतमः

|| ShaShThaM brAhmaNam mantra 1 ##[II.vi.1]## atha va{\m+}shaH pautimAShyo gaupavanAd gaupavanaH pautimAShyAt pautimAShyo gaupavanAd gaupavanaH kaushikAt kaushikaH kauNDinyAt kauNDinyaH shANDilyAch ChANDilyaH kaushikAchcha gautamAchcha gautamaH

हिन्दी अर्थ

५५२ बृहदारण्यकोपनिषद्‌ अध्याय २ प्रात्मा सबसे श्रसिन्त है, इसका प्रतिपादन नलु कथमन्पसिपन्विदितेऽन्य- शङ्का-क्रितु अन्यका ज्ञान होने जानता हे। क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती है जो क्षत्रियजातिको आत्सासे भिन्च देखता है । लोक उसे परास्त कर देते है जो लोकोंको आमास भिन्न देखता है । देवगण उसे परास्त कर देते है जो देवताओंको आत्मासे धिन्न ब्रह्म बाह्मणजातिस्तं पुरूपं ब्रह्म-त्ाह्मणजाति उ पुरपको कम्‌ १ यो उन्यत्रारमन च्रारमस्व- 8. है; क्सि ¦ र पः तिरेक --आतमैबन भव छोर अथात्‌ यह ब्रह्णनाति

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अध्याय १२

श्लोक 2

मन्त्र २ [II.vi.2] आग्निवेश्याद् अग्निवेश्यः शाण्डिल्याच्चानभिम्लाताच्च् आनभिम्लात आनभिम्लाताद् अनभिम्लात अनभिम्लाताद् अनभिम्लातो गौतमाद् गौतमः सैतवप्राचीनयोग्याभ्याँ, सैतवप्राचीनयोग्यौ पाराशर्यात् पाराशर्यो भारद्वाजाद् भारद्वाजो भारद्वाजाच्च गौतमाच्च गौतमो भारद्वाजाद् भारद्वाजः पाराशर्यात् पाराशर्यो वैजवापायनाद् वैजवापायनः कौशिकायनेः कौशिकायनिः

mantra 2 ##[II.vi.2]## AgniveshyAd agniveshyaH shANDilyAchchAnabhimlAtAchch AnabhimlAta AnabhimlAtAd anabhimlAta anabhimlAtAd anabhimlAto gautamAd gautamaH saitavaprAchInayogyAbhyA{\m+}, saitavaprAchInayogyau pArAsharyAt pArAsharyo bhAradvAjAd bhAradvAjo bhAradvAjAchcha gautamAchcha gautamo bhAradvAjAd bhAradvAjaH pArAsharyAt pArAsharyo vaijavApAyanAd vaijavApAyanaH kaushikAyaneH kaushikAyaniH

हिन्दी अर्थ

आत्मामे ही हँ । जो यह आत्मा बकी श्रातमस्वरूपताे ग्रहणम दनदुभि, ङ्ख श्रौ र वौ एाका दन्त ४४५४ बृहदारण्यकोपनिषद्‌ अध्याय २ तदातमस्वमेव लोके दृष्टम्‌ । वह्‌ दृष्टान्त एसा है किं जिस प्रकार ताडन किये जाते हृए दुन्दुमि ( नक्गारे ) के बाह्य शब्दोको कोई ग्रहण नहीं कर सकता, कितु दुन्दुभि स यथा-स इति दष्टान्तः, स यथा अर्थात्‌ वह्‌ दृष्टान्त लोके यथा दुन्दुभेर्भयदिः,हन्य- एेसा है- लोकम जिस प्रकार मानस्य ताख्वमानस्य दण्डा- दण्डादिसे हनन-ताडन किये जाते

English

from Âgnivesya,

अध्याय १२

श्लोक 3

मन्त्र ३ [II.vi.3] घृतकौशिकाद् घृतकौशिकः पाराशर्यायणात् पारशर्यायणः पाराशर्यात् पाराशर्यो जातूकर्ण्याज् जातूकर्ण्य आसुरायणाच्च यास्काच्च् ऽऽसुरायणस्त्रैवणेस् त्रैवणिरौपजन्धनेर् औपजन्धनिरासुर्र् आसुरिर्भारद्वाजाद् भारद्वाज आत्रेयाद् अत्रेयो माण्टेर् माण्टिर्गौतमाद् गौतमो गौतमाद् गौतमो वात्स्याद् वात्स्यः शाण्डिल्याच् छाण्डिल्यः कैशोर्यात्काप्यात् कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात् कुमारहारितो गालवाद् गालवो विदर्भीकौण्डिन्याद् विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवाद् वत्सनपाद्बाभ्रवः पथः सौभरात् पन्थाः सौभरोऽयास्यादाङ्गिरसाद् अयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्राद् आभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात्त्वाष्ट्राद् विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्याम् अश्विनौ दधीच आथर्वणाद् दध्यङ्ङाथर्वणोऽथर्वणो दैवाद् अथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वँसनान् मृत्युः प्राध्वँसनः प्रध्वँसनात् प्रध्वँसन एकर्षेः एकर्षिर्विप्रचित्तेर् विप्रचित्तिर्व्यष्टेर् व्यष्टिः सनारोः सनारुः सनातनात् सनातनः सनगात् सनगः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयम्भु ब्रह्मणे नमः

mantra 3 ##[II.vi.3]## ghR^itakaushikAd ghR^itakaushikaH pArAsharyAyaNAt pArasharyAyaNaH pArAsharyAt pArAsharyo jAtUkarNyAj jAtUkarNya AsurAyaNAchcha yAskAchch .a.asurAyaNastraivaNes traivaNiraupajandhaner aupajandhanirAsurr AsurirbhAradvAjAd bhAradvAja AtreyAd atreyo mANTer mANTirgautamAd gautamo gautamAd gautamo vAtsyAd vAtsyaH shANDilyAch ChANDilyaH kaishoryAtkApyAt kaishoryaH kApyaH kumArahAritAt kumArahArito gAlavAd gAlavo vidarbhIkauNDinyAd vidarbhIkauNDinyo vatsanapAto bAbhravAd vatsanapAdbAbhravaH pathaH saubharAt panthAH saubharo.ayAsyAdA~NgirasAd ayAsya A~Ngirasa AbhUtestvAShTrAd AbhUtistvAShTro vishvarUpAttvAShTrAd vishvarUpastvAShTro.ashvibhyAm ashvinau dadhIcha AtharvaNAd dadhya~N~NAtharvaNo.atharvaNo daivAd atharvA daivo mR^ityoH prAdhva{\m+}sanAn mR^ityuH prAdhva{\m+}sanaH pradhva{\m+}sanAt pradhva{\m+}sana ekarSheH ekarShirviprachitter viprachittirvyaShTer vyaShTiH sanAroH sanAruH sanAtanAt sanAtanaH sanagAt sanagaH parameShThinaH parameShThI brahmaNo brahma svayambhu brahmaNe namaH

हिन्दी अर्थ

उदाक्नुयाद्यहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन राङ्खध्मस्य वा वह्‌ दूसरा दृष्टान्त एसा है-जेसे कोई बजाये जाते हुए शद्कके बाह्य शब्दको ग्रहण करनेमे समं नहीं होता, कितु शङ्खके अथवा शङ्खं क बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता हे एसा है--जिस प्रकार बजाये जाते तथा वह दूसरा दृष्टान्त अर्थात्‌ पूकं जाते हुए श्भुके

English

from Ghritakausika,

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/brihadaaraNyaka.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Brihadaranyaka Upanishad — Chapter 12
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.