अध्याय १९
श्लोक 48.1
रात्रिः।१-६ गोपथः।रात्रिः।अनुष्टुप्, १ त्रिपदाऽर्षी गायत्री, २ त्रिपदा विराडनुष्टुप्, ३ बृहतीगर्भाऽनुष्टुप्, ५ पथ्यापङ्क्तिः।अथो॒ यानि॑ च॒ यस्मा॑ ह॒ यानि॑ चा॒न्तः प॑री॒णहि॑ ।तानि॑ ते॒ परि॑ दद्मसि
rātriḥ| 1-6 gopathaḥ| rātriḥ| anuṣṭup, 1 tripadā'rṣī gāyatrī, 2 tripadā virāḍanuṣṭup, 3 bṛhatīgarbhā'nuṣṭup, 5 pathyāpaṅktiḥ| atho yāni ca yasmā ha yāni cāntaḥ parīṇahi | tāni te pari dadmasi
हिन्दी अर्थ
था । कामेन बृहता यजमान भी यजन करता है, यज्ञस्वरूप कर्मो को करत है । इन यज्ञिय कमो का कारण भी ““कामह ॥ यज्ञिय कर्मो के करने के लिये “काम” मी यज्ञिय मावना््रों वाला होना चाहिए 1 देवपूजा, सत्- संगति तथा दानमावना श्रादि से भ्रोत-प्रोत होना चाहिए, जसे कि पर मेदवरीय काम परोपकारं न्याय दानभावना श्रादि से ओोतप्रोत्त है। पर. ३८२. तं काम सहसा प्रतिष्ठितो विशुर्विभावां सख आ (काम) है सात्विक काम ! कामना वा इच्छा (त्वम्) तू (सहसा) मानसिक बल द्वारा (प्रतिष्ठितः) दुदृस्थित होता है, (विभूः) विभूतिरूप तथा (विभावा) तेजःसम्पन्न (असि) होता है (सले) है मित्र सात्विक काम (सखीयते) तेरे साथ सख्यमाव चाहनेवाले के लिये (त्वम्) तू का० १९। सु° ४२ पथववेद-माष्य ३४१
English
One, the sky’s exalted summit. Over me now the loving Night is spreading with her auspicious.