अध्याय १९
श्लोक 1.1
यशः।१-३ ब्रह्मा।यज्ञः, चन्द्रमाश्च।१-२ पथ्याबृहती, ३ पङ्क्तिः।सं सं स्र॑वन्तु न॒द्यः॑१ सं वाताः॒ सं प॑त॒त्रिणः॑ ।य॒ज्ञमि॒मं व॑र्धयता गिरः संस्रा॒व्येऽण ह॒विषा॑ जुहोमि
yaśaḥ| 1-3 brahmā| yajñaḥ, candramāśca| 1-2 pathyābṛhatī, 3 paṅktiḥ| saṃ saṃ sravantu nadyaḥ1 saṃ vātāḥ saṃ patatriṇaḥ | yajñamimaṃ vardhayatā giraḥ saṃsrāvye'ṇa haviṣā juhomi
हिन्दी अर्थ
का० १९ ।सूु०३ भरवर्ववेद-भाष्य १५७ हे मनुष्य ! (ते) तेरे लिये (हैमवतीः) हिमवाले पर्वतो के ( भ्रापः) भूमि या दलदल भूमि के जल (शम्) शान्तिदायकं. भ्रौर रोगच्चामक हों। (ते) तेरे लिये (खनिच्रिमाः) भूमि खोदेकर निकाले गये कृप्य जल तथा खानों के जल (राम्) शान्तिदायक्र भ्रौर रोगदामक हों। (याः) जो भिकरम्यौ मिषक्तरा आपो अच्छा वदामसि ॥६॥ (भरनश्नयः) विना कुहाल कै (खनमानाः) पर्वत प्रादि को निज
English
An accompaniment to the offering of a Mixt Oblation Let the streams flow together, let the winds and birds assembled come.