अध्याय ३५
श्लोक 1
अपे॒तो य॑न्तु प॒णयोऽसु॑म्ना देवपी॒यव॑: । अ॒स्य लो॒कः सु॒ताव॑तः ।द्युभि॒रहो॑भिर॒क्तुभि॒र्व्य॒क्तं य॒मो द॑दात्वव॒सान॑मस्मै
apeto yantu paṇayo'sumnā devapīyava: | asya lokaḥ sutāvataḥ | dyubhirahobhiraktubhirvyaktaṃ yamo dadātvavasānamasmai
हिन्दी अर्थ
जो व्यक्ति (क) पणिवृत्ति से दूर रहते है, (ख) प्रभु-स्तवन को अपनाते हे, (ग) देवत्व कौ वृद्धि के लिए प्रयत्नशील होते हैँ, (घ) जो दिन व रात्रि को स्वाध्याय से ज्योतिर्मय बनाये रखते हे, ये लोग उत्तमताओं का निरन्तर आदान करते हुए आदित्य ' कहलाते है ओर देवत्व की वृद्धि करने से "देव ' होते है। ये “ आदित्या देवाः' ही इन मन्त्रों
English
com The Texts of the White Yajurveda, tr. Ralph T.H. Griffith, [1899], BOOK THE THIRTY-FIFTH. BEGONE the Panis, hence away, rebellious, scorners of the Gods! The place is his who poured the juice.