Yajur Veda· Yajurveda Saṁhitā
31
अध्याय 31 / 40

Adhyāya 31

अध्याय 31

22 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ22 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय ३१

श्लोक 1

स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः सहस्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात् ।स भूमि॑ᳪ स॒र्वत॑ स्पृ॒त्वाऽत्य॑तिष्ठद्दशाङ्गु॒॒लम्

sahasraśīrṣā puruṣaḥ sahasrākṣaḥ sahasrapāt | sa bhūmi sarvata spṛtvā'tyatiṣṭhaddaśāṅgulam

हिन्दी अर्थ

१. वे प्रभु अनन्त सिरो, ओंखों व पोँवोंवाले हे। २. इस ब्रह्माण्ड को आवृत करके इसकी रक्षा कर रहे है ओर इसके अन्दर निवास कर रहे हेँ। ३. वे प्रभु इस दशांगुल पुरुषऽ एवेद ःसर्व यद् भूतं यच्च॑ भाव्यम्। उतामुंतत्वस्येशानो यदत्र नातिरोहं ति।।२॥ १. इस संसार में जन्म के दृष्टिकोण से जीव तीन भागों में विभक्त है (क) प्रथम

English

com The Texts of the White Yajurveda, tr. Ralph T.H. Griffith, [1899], BOOK THE THIRTY-FIRST. PURUSHA hath a thousand heads, a thousand eyes, a thousand feet. Pervading earth on every side he fills a space ten fingers broad.

अध्याय ३१

श्लोक 2

पुरु॑ष ए॒वेदᳪ सर्वं॒ यद्भू॒तं यच्च॑ भा॒व्य॒म् ।उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति

puruṣa eveda sarvaṃ yadbhūtaṃ yacca bhāvyam | utāmṛtatvasyeśāno yadannenātirohati

हिन्दी अर्थ

वे पुरुष प्रभु ' भूत, भाव्य व अमर ' तीनों प्रकार के प्राणियों के ईशान है। उस समन्तात् सेवनीय (आनम्) अन्न नामक प्रभु की अनुकम्पा से जीव जन्म-मरण को १. अस्य इस पुरुष की एतावान्=इतनी महिमा-महिमा हे। प्रथम मन्त्र मे दशांगुल जगत् का संकेत है, पञ्चस्थूलभूत व पञ्चसृक्ष्मभूतों से बना हुआ यह दशांगुल जगत् उस

English

Purusha is in truth this All, what hath been and what yet shall be; Lord, too, of immortality which waxes greater still by food.

अध्याय ३१

श्लोक 3

ए॒तावा॑नस्य महि॒मातो॒ ज्यायाँ॑श्च॒ पूरु॑षः ।पादो॑ऽस्य॒ विश्वा॑ भू॒तानि॑ त्रि॒पाद॑स्या॒मृतं॑ दि॒वि

etāvānasya mahimāto jyāyā~śca pūruṣaḥ | pādo'sya viśvā bhūtāni tripādasyāmṛtaṃ divi

हिन्दी अर्थ

सारा चराचर संसार ब्रह्म की ओर जा रहा है, वे ब्रह्म ही गति के स्रोत हेै। १. ततः=उस पुरुष (निमित्तकारण) से विराट्-एक देदीप्यमान पिण्ड अजायतउत्पन्न हुआ। सांख्यदर्शन मेँ यही महत्' नाम से कहा गया है। जो प्रकृति के कणों का साम्यावस्था का पुञ्ज सर्वत्र समरूप से फैला हुआ था, वह सृष्टि के प्राम्भ में प्रभु द्वारा

English

So mighty in his grandeur; yea, greater than this is Purusha. All creatures are one fourth of him, three fourths eternal life in heaven.

अध्याय ३१

श्लोक 4

त्रि॒पादू॒र्ध्व उदै॒त्पुरु॑ष॒: पादो॑ऽस्ये॒हाभ॑व॒त् पुन॑: ।ततो॒ विष्व॒ङ् व्य॒क्रामत्साशनानश॒ने अ॒भि

tripādūrdhva udaitpuruṣa: pādo'syehābhavat puna: | tato viṣvaṅ vyakrāmatsāśanānaśane abhi

हिन्दी अर्थ

यह संसार प्रभु द्वारा प्राम्भ में एक विराट् पिण्ड के रूप में उत्पन्न किया जाता हे। उस विराट् पिण्ड से ही इन लोकों व शरीरों कौ उत्पत्ति होती हे। तस्मांदयज्ञात्सर्वह तः सम्भुतं पृषदाज्यम्। १. अब तक प्रभु को ' पुरुष ' नाम से स्मरण किया था। इसी पुरुष को अब “ यज्ञ' नाम

English

With three fourths Purusha rose up: one fourth of him again was here. Thence he moved forth to every side over what eats not and what eats.

अध्याय ३१

श्लोक 5

ततो॑ वि॒राड॑जायत वि॒राजो॒ अधि॒ पूरु॑षः ।स जा॒तो अत्य॑रिच्यत प॒श्चाद्भूमि॒मथो॑ पु॒रः

tato virāḍajāyata virājo adhi pūruṣaḥ | sa jāto atyaricyata paścādbhūmimatho puraḥ

हिन्दी अर्थ

उस सर्वदाता यज्ञ नामक प्रभुने अन्नवदूध का संभरण किया। उसके लिए ही पक्षियों, आरण्य व ग्राम्य पशुओं का निर्माण किया। नोट -यहौँ “वायव्य पशुओं" से एेसा नहीं समञ्लना चाहिए कि किसी युग में कु उडनेवाले पशु भी भथे। उडनेवाले पर्वतो कौ कल्पना से एेसा भ्रम हो जाता है। वास्तव में

English

From him Virâj was born; again Purusha from Virâj was born. When born, he spread to west and east beyond the boundaries of earth.

अध्याय ३१

श्लोक 6

तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॒: सम्भृ॑तं पृषदा॒ज्यम् ।प॒शूँस्ताँश्च॑क्रे वाय॒व्या॒नार॒ण्या ग्रा॒म्याश्च॒ ये

tasmādyajñātsarvahuta: sambhṛtaṃ pṛṣadājyam | paśū~stā~ścakre vāyavyānāraṇyā grāmyāśca ye

हिन्दी अर्थ

प्रभु- प्रदत्त वेद-्लान से हम प्रतिदिन उन्नति करते हुए प्रभु को प्राप्त करने मनुष्य जीवन व पश्णुजीवन-दार्फौँ व ल्रार्णँ हाथ तस्मादश्वाऽअजायन्त ये के चोंभयाद॑तः। गावों ह जजिरे तस्मात्तस्मांज्जाताऽअंजावय॑ः।। ८ ॥

English

From that great General Sacrifice the dripping fat was gathered up. He formed the creatures of the air and animals both wild and tame.

अध्याय ३१

श्लोक 7

तस्मा॑द्य॒ज्ञात् स॑र्व॒हुत॒ ऋच॒: सामा॑नि जज्ञिरे ।छन्दा॑ᳪसि जज्ञिरे॒ तस्मा॒द्यजु॒स्तस्मा॑दजायत

tasmādyajñāt sarvahuta ṛca: sāmāni jajñire | chandāsi jajñire tasmādyajustasmādajāyata

हिन्दी अर्थ

प्रभु को धारण करनेवाले मनुष्य के मुख आदि में एक विशेष शक्ति उत्पत्न हो जाती है, जो उसे सामान्य पुरुषों से विशिष्ट बना देती है। १. अस्य इस प्रभुभक्त का मुखम्-मुख ब्राह्मणः =ब्राह्यण आसीत् हो जाता है। यह प्रभुभक्त अपने मुख से सदा ब्रह्म का प्रतिपादन करनेवाला (ब्राह्मण) बनता हे, इसका मुख

English

From that great General Sacrifice Richas and Sâma hymns were born: Therefrom were spells and charms produced; the Yajus had its birth from it.

अध्याय ३१

श्लोक 8

तस्मा॒दश्वा॑ अजायन्त॒ ये के चो॑भ॒याद॑तः ।गावो॑ ह जज्ञिरे॒ तस्मा॒त्तस्मा॑ज्जा॒ता अ॑जा॒वय॑:

tasmādaśvā ajāyanta ye ke cobhayādataḥ | gāvo ha jajñire tasmāttasmājjātā ajāvaya:

हिन्दी अर्थ

प्रभुभक्त ज्ञान का प्रचारक, निर्बलों का रक्षक, सभी का पालक तथा शीघ्रता से कार्यो को करनेवाला होता है, दूसरे शब्दों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र बनता ह। नोट- १. प्रस्तुत मन्त्र में प्रसंगवश वर्णव्यवस्था का भी संकेत हो गया है। समाज का शरीर ब्राह्मणरूप मुखवाला हे, क्षत्रिय इसकी भुजा है, इसका मध्यभाग ही वैश्य है ओर

English

From it were horses born, from it all cattle with two rows of teeth From it were generated kine, from it were goats and sheep produced.

अध्याय ३१

श्लोक 9

तं य॒ज्ञं ब॒र्हिषि॒ प्रौक्ष॒न् पुरु॑षं जा॒तम॑ग्र॒तः ।तेन॑ दे॒वा अ॑यजन्त सा॒ध्या ऋष॑यश्च॒ ये

taṃ yajñaṃ barhiṣi praukṣan puruṣaṃ jātamagrataḥ | tena devā ayajanta sādhyā ṛṣayaśca ye

हिन्दी अर्थ

प्रभुभक्त सदा प्रसन्न, प्रकाशमय, गतिशील-प्राणशक्तिसम्पन्न ओर अग्नि के समान योजक व भेदक बन जाता हे। पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोर्कों२।।ऽअकल्पयन्।। ९३॥ १. नाभ्या (नाभ्ये) नाभि के लिए अथवा नाभि के हेतु से अन्तरिक्षम्-अन्तरिक्ष

English

They balmed as victim on the grass Purusha born in earliest time. With him the Deities and all Sâdhyas and Rishis sacrificed.

अध्याय ३१

श्लोक 10

यत्पुरु॑षं॒ व्यद॑धुः कति॒धा व्य॑कल्पयन् ।मुखं॒ किम॑स्यासी॒त् किं बा॒हू किमू॒रू पादा॑ उच्येते

yatpuruṣaṃ vyadadhuḥ katidhā vyakalpayan | mukhaṃ kimasyāsīt kiṃ bāhū kimūrū pādā ucyete

हिन्दी अर्थ

यह प्रभुभक्त सदा मध्यमार्ग पर चलनेवाला, जगमगाते मस्तिष्कवाला, निर्माणात्मक क्रियाओं मे लगा हुआ, वेद के अनुसार जीवन-मार्ग पर चलता हुआ शक्तिशाली अङ्खोंवाला नोट - प्रस्तुत मन्त्रों में विराट् को पुरुष का शरीर मानकर यह भी संकेत दिया गया दहै कि उस विराट् शरीर की नाभि से अन्तरिक्ष, सिर से द्युलोक, पवि से भूमि, श्रोत्र से दिशां

English

When they divided Purusha how many portions did they make? What was his mouth? what were his arms? what are the names of thighs and feet?

अध्याय ३१

श्लोक 11

ब्रा॒ह्म॒णो॒ऽस्य॒ मुख॑मासीद्बा॒हू रा॑ज॒न्य॒: कृ॒तः ।ऊ॒रू तद॑स्य॒ यद्वै॑श्यः प॒द्भ्याᳪ शू॒द्रो अ॑जायत

brāhmaṇo'sya mukhamāsīdbāhū rājanya: kṛtaḥ | ūrū tadasya yadvaiśyaḥ padbhyā śūdro ajāyata

हिन्दी अर्थ

' देवपूजा, संगतिकरण व दान" ही मुख्य धर्म है, इन्हें आपनानेवाला प्रभु को अयैथुनी स्रष्टि-जाजान देवत्व अद्भ्यः सम्भरंतः परथिव्यै रसाच्च विषुवकर्मणः सम॑वर््तताग्र । तस्य त्वष्टा विदधंद्रूपमेति तन्मर्त्यस्य देवत्वमाजानमग्र ॥ ९७॥

English

The Brâhman was his mouth, of both his arms was the Râjanya made. His thighs became the Vaisya, from his feet the Sûdra was produced.

अध्याय ३१

श्लोक 12

च॒न्द्रमा॒ मन॑सो जा॒तश्चक्षोः॒ सूर्यो॑ अजायत ।श्रोत्रा॑द्वा॒युश्च॑ प्रा॒णश्च॒ मुखा॑द॒ग्निर॑जायत

candramā manaso jātaścakṣoḥ sūryo ajāyata | śrotrādvāyuśca prāṇaśca mukhādagnirajāyata

हिन्दी अर्थ

प्रभु-कृपा से हम अपने आजनदेवत्व को स्थिर रख पार्णे। संसार के प्रलोभनं में फेसकर असुर न बन जारएँ। जतिमृत्यु-जयन- मृत्यु के पार वेदाहमेतं पुरुषं महान्त॑मादित्यवंर्ण तम॑सः परस्ता।त्।

English

The Moon was gendered from his mind, and from his eye the Sun had birth; Vâyu and Prâna from his ear, and from his mouth was Agni born.

अध्याय ३१

श्लोक 13

नाभ्या॑ आसीद॒न्तरि॑क्षᳪ शी॒र्ष्णो द्यौ॒: सम॑वर्तत ।प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिश॒: श्रोत्रा॒त्तथा॑ लो॒काँ२ अ॑कल्पयन्

nābhyā āsīdantarikṣa śīrṣṇo dyau: samavartata | padbhyāṃ bhūmirdiśa: śrotrāttathā lokā~2 akalpayan

हिन्दी अर्थ

प्रभु को जानकर हम मृत्यु से ऊपर उट ओर मोक्ष का लाभ करे। आजायमान-कविजायमान-न होते हुए, होना पिछले मन्त्र में कहा था कि "मैं इस महान् पुरुष को जानता हूँ" प्रस्तुत मन्त्र में कहते है कि “किस रूप मे?" (क) प्रजापतिःत्वे प्रभु प्रजा के पति है। सबके रक्षक है। मेरी

English

Forth from his navel came mid-air; the sky was fashioned from his head; Earth from his feet, and from his ear the Quarters. Thus they formed the worlds.

अध्याय ३१

श्लोक 14

यत्पुरु॑षेण ह॒विषा॑ दे॒वा य॒ज्ञमत॑न्वत ।व॒स॒न्तो॒ऽस्यासी॒दाज्यं॑ ग्री॒ष्म इ॒ध्मः श॒रद्ध॒विः

yatpuruṣeṇa haviṣā devā yajñamatanvata | vasanto'syāsīdājyaṃ grīṣma idhmaḥ śaraddhaviḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभु प्रजापति है, नानारूपों को वो जन्म दे रहे हें, वही सब लोको का धारण यो देवेभ्य॑ऽओतप॑ति यो देवान पुरोहिंतः। पूर्वो यो देवेभ्यो जातो नमो रुचाय ब्राह्य॑ये।। २०॥ गतमन्त्र की समाप्ति इन शब्दों पर थी कि "उस प्रभुमेंदही ये सब लोक आश्रित हें'।

English

When Gods performed the sacrifice with Purusha as offering Spring was the butter, Autumn the oblation, Summer was the wood.

अध्याय ३१

श्लोक 15

स॒प्तास्या॑सन् परि॒धय॒स्त्रिः स॒प्त स॒मिध॑: कृ॒ताः ।दे॒वा यद्य॒ज्ञं त॑न्वा॒ना अब॑ध्न॒न् पुरु॑षं प॒शुम्

saptāsyāsan paridhayastriḥ sapta samidha: kṛtāḥ | devā yadyajñaṃ tanvānā abadhnan puruṣaṃ paśum

हिन्दी अर्थ

प्रभु ही सब सूर्यादि देवों को दीप्ति देनेवाले हैँ। उस ब्रह्मरुचि दीप्ति को प्राप्त करने के लिए मै भी नमस्-नग्रता की भावना को धारण करता हूं। रुचं ब्राह्यं जनय॑न्तो देवाऽअग्रे तदं ्रुवन्। गतमन्त्र की भावना यह है कि ' सूर्यादि सब देव उस ब्राह्यतेज से ही दीप्त हो रहे हे।'

English

Then seven were his enclosing-sticks, his kindling-brands were three times seven, When Gods, performing sacrifice, bound as their victim Purusha.

अध्याय ३१

श्लोक 16

य॒ज्ञेन॑ य॒ज्ञम॑यजन्त दे॒वास्तानि॒ धर्मा॑णि प्रथ॒मान्या॑सन् ।ते ह॒ नाकं॑ महि॒मान॑: सचन्त॒ यत्र॒ पूर्वे॑ सा॒ध्याः सन्ति॑ दे॒वाः

yajñena yajñamayajanta devāstāni dharmāṇi prathamānyāsan | te ha nākaṃ mahimāna: sacanta yatra pūrve sādhyāḥ santi devāḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मवेत्ता को सब देवों की अनुकूलता प्राप्त होती है। एक आदर्ण ब्रह्मवेत्ता का जीवन श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पल्यावहोरात्रे पाश्वे नक्ष॑त्राणि रूपमश्विनौ व्यात्त॑म् । "सब देव उसके अनुकूल होते है' इस वाक्य का अभिप्राय यह है कि कोई भी

English

Gods, sacrificing, sacrificed the victim: these were the earliest holy ordinances. The Mighty Ones attained the height of heaven, there where the Sâdhyas, Gods of old, are dwelling.

अध्याय ३१

श्लोक 17

अ॒द्भ्यः सम्भृ॑तः पृथिव्यै॒ रसा॑च्च वि॒श्वक॑र्मण॒: सम॑वर्त॒ताग्रे॑ ।तस्य॒ त्वष्टा॑ वि॒दध॑द्रू॒पमे॑ति॒ तन्मर्त्य॑स्य देव॒त्वमा॒जान॒मग्रे॑

adbhyaḥ sambhṛtaḥ pṛthivyai rasācca viśvakarmaṇa: samavartatāgre | tasya tvaṣṭā vidadhadrūpameti tanmartyasya devatvamājānamagre

हिन्दी अर्थ

नर से नारायण बनने के लिए मन्त्र में वर्णित ७ बातों को अपनाना है।

English

In the beginning he was formed, collected from waters, earth, and Visvakarman's essence. Fixing the form thereof Tvashtar proceedeth. This was at first the mortal's birth and godhead.

अध्याय ३१

श्लोक 18

वेदा॒हमे॒तं पुरु॑षं म॒हान्त॑मादि॒त्यव॑र्णं॒ तम॑सः प॒रस्ता॑त् ।तमे॒व वि॑दि॒त्वाति॑ मृ॒त्युमे॑ति॒ नान्यः पन्था॑ विद्य॒तेऽय॑नाय

vedāhametaṃ puruṣaṃ mahāntamādityavarṇaṃ tamasaḥ parastāt | tameva viditvāti mṛtyumeti nānyaḥ panthā vidyate'yanāya

हिन्दी अर्थ

सारा ब्रह्याण्ड प्रभु के एकदेश में हे, उस प्रभु का त्रिपात् द्योतनमय अमृतरूप त्रिपादूर्ध्व उहैत्पुरुषः पादो ऽस्येहाभंवत्पुन॑ः। १. त्रिपात् पुरुषः=यह तीन पादोंवाला पुरुष ऊर्ध्वः उहैत्-इस विविध हलचलवाले अशान्त संसार से ऊपर उठा हुआ है। यह सारे दृश्यमान ब्रह्माण्ड कौ हलचल उसके इस

English

I know this mighty Purusha whose colour is like the Sun, beyond the reach of darkness. He only who knows him leaves Death behind him. There is no path save this alone to travel.

अध्याय ३१

श्लोक 19

प्र॒जाप॑तिश्च॒रति॒ गर्भे॑ अ॒न्तरजा॑यमानो बहु॒धा वि जा॑यते ।तस्य॒ योनिं॒ परि॑ पश्यन्ति॒ धीरा॒स्तस्मि॑न् ह तस्थु॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑

prajāpatiścarati garbhe antarajāyamāno bahudhā vi jāyate | tasya yoniṃ pari paśyanti dhīrāstasmin ha tasthurbhuvanāni viśvā

हिन्दी अर्थ

हम पशुओं की उपयोगिता को समञ्लकर उनका भी ध्यान करनेवाले वने "गौ" को तो घर का अत्यन्त आवश्यक अङ्क समञ्कर अवश्य ही पाले। तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरूषं जातमंग्रतः। तेन॑ देवाऽअयजन्त साध्याऽ ऋषयश्च ये।।९॥

English

In the womb moves Prajâpati: he, never becoming born, is born in sundry figures. The wise discern the womb from which he springeth. In him alone stand all existing creatures.

अध्याय ३१

श्लोक 20

यो दे॒वेभ्य॑ आ॒तप॑ति॒ यो दे॒वानां॑ पु॒रोहि॑तः ।पूर्वो॒ यो दे॒वेभ्यो॑ जा॒तो नमो॑ रु॒चाय॒ ब्राह्म॑ये

yo devebhya ātapati yo devānāṃ purohitaḥ | pūrvo yo devebhyo jāto namo rucāya brāhmaye

हिन्दी अर्थ

हम अपने हृदयो को पवित्र बना, वहोँ प्रभु कौ ज्योति को जगार््। देव, साध्य व ऋषि बनकर अर्थात् हदय, हस्त व मस्तिष्क तीनों कौ उन्नति करके प्रभु से अपना मेल यत्पुरुषं व्यद॑धुः कतिधा व्य॑कल्पयन्। १. यत्-जव पुरुषम्-उस पुरुष प्रभु से व्यदधुः ये देव , साध्य व ऋषि" व्यकल्पयन्

English

He who gives light and heat to Gods, first, foremost Agent of the Gods, Born ere the Gods—to him the bright, the holy One, be reverence

अध्याय ३१

श्लोक 21

रु॒चं ब्रा॒ह्म्यं ज॒नय॑न्तो दे॒वा अग्रे॒ तद॑ब्रुवन् ।यस्त्वै॒वं ब्रा॑ह्म॒णो वि॒द्यात्तस्य॑ दे॒वा अ॑स॒न् वशे॑

rucaṃ brāhmyaṃ janayanto devā agre tadabruvan | yastvaivaṃ brāhmaṇo vidyāttasya devā asan vaśe

हिन्दी अर्थ

प्रभुभक्त के लिए वसन्त प्रभु कौ महिमा को दिखाती है तो ग्रीष्म ज्लानदीप्ति को ओर शरत् त्यागशीलता को। वसन्त सौन्दर्य को, ग्रीष्म ज्योति को, शरत् त्याग को देवा यद्यज्ञं त॑न्वानाऽअव॑ध्नन् पुरुषं पशुम्॥। ९५५॥ ९. देवाः =देवलोग यत्-जब यज्ञम्-प्रभु के साथ मेल को तन्वानाः विस्तृत करते हए प्रभुभक्ति व प्रभुसे मेल के तीन परिणाम है १. काम-क्रोध का वशीकरण २. इन्द्रियों का मर्यादा में रहना ओर ३. शक्तियों का वर्धन व दीपन। यज्ञेन य॒ज्ञम॑यजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यांसन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे" साध्याः सन्ति देवाः ॥ १६॥

English

Thus spake the Gods at first, as they begat the bright and holy One: The Brahman who may know thee thus shall have the Gods in his control.

अध्याय ३१

श्लोक 22

श्रीश्च॑ ते ल॒क्ष्मीश्च॒ पत्न्या॑वहोरा॒त्रे पा॒र्श्वे नक्ष॑त्राणि रू॒पम॒श्विनौ॒ व्यात्त॑म् ।इ॒ष्णन्नि॑षाणा॒मुं म॑ इषाण सर्वलो॒कं म॑ इषाण

śrīśca te lakṣmīśca patnyāvahorātre pārśve nakṣatrāṇi rūpamaśvinau vyāttam | iṣṇanniṣāṇāmuṃ ma iṣāṇa sarvalokaṃ ma iṣāṇa

हिन्दी अर्थ

- ब्रह्मवेत्ता को सब देवों की अनुकूलता प्राप्त होती है। एक आदर्ण ब्रह्मवेत्ता का जीवन श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पल्यावहोरात्रे पाश्वे नक्ष॑त्राणि रूपमश्विनौ व्यात्त॑म् । "सब देव उसके अनुकूल होते है' इस वाक्य का अभिप्राय यह है कि कोई भी

English

Beauty and Fortune are thy wives: each side of thee are Day and Night. The constellations are thy form: the Asvins are thine open jaws. Wishing, wish yonder world for me, wish that the Universe be mine.

स्रोत: bhavykhatri/DharmicData · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Yajur Veda — Chapter 31
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.