Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
16
अध्याय 16 / 90

Adhyaya 16

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अध्याय १६

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे पितापुत्रसंवादो नाम पञ्चदशो ऽध्यायः षोडशो ऽध्यायः पितावाच कथितं मे त्वया वत्स संसारस्य व्यवस्थितम् ।स्वरूपमतिहेयस्य घटीयन्त्रवदव्ययम्

iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe pitāputrasaṃvādo nāma pañcadaśo 'dhyāyaḥ ṣoḍaśo 'dhyāyaḥ pitāvāca kathitaṃ me tvayā vatsa saṃsārasya vyavasthitam / svarūpamatiheyasya ghaṭīyantravadavyayam

हिन्दी अर्थ

आदिका ज्ञान न हो, जो उसी समय वहाँ उपस्थित हुआ हो, भोजनकी इच्छा रखता हो, थका-माँदा आया हो, अन्न माँगता हो, ऐसे अकिज्चन ब्राह्मणको अतिथि कहते हैं। विद्वान् पुरुषोंको उचित है कि वे अपनी शक्तिके अनुसार उस अतिथिका पूजन करें। उसका गोत्र और शाखा न पूछें। उसने कहाँतक अध्ययन

English

Having heard the Rishi speak thus, king Arjtma, Knta- virya’s son, proceeded to Dattatreya’s hermitage and wor- 2' shipped him with faith; by kneading his feet and other services, and by offering honey and other delicacies, and by bring- ing garlands, sandal, and other perfumes, water, fruit (tc.; S' also with preparations of rice, and by removing the Rishi’s fragments of food. Pleased therewith the Muni addressed the

अध्याय १६

श्लोक 2

तदेवमेतदखिलं मयावगतमीदृशम् ।किं मया वद कर्तव्यमेवस्मिन् व्यवस्थिते

tadevametadakhilaṃ mayāvagatamīdṛśam / kiṃ mayā vada kartavyamevasmin vyavasthite

हिन्दी अर्थ

किया है, इसकी जिज्ञासा भी न करें। उसकी आकृति सुन्दर हो या असुन्दर, उसे साक्षात् प्रजापति समझें। वह नित्य स्थित नहीं रहता, इसीलिये उसे अतिथि कहते हैं। उसकी तृप्ति होनेपर गृहस्थ पुरुष मनुष्य-यज्ञके ऋणसे मुक्त हो जाता है। जो उस अतिथिको अन्न दिये बिना ही स्वयं भोजन करता है, वह मनुष्य

English

king in the very same way, as he had formerly addressed the gods.

अध्याय १६

श्लोक 3

पुत्र उवाच यदि मद्वचनं तात श्रद्दधास्यविशङ्कितः ।तत् परित्यज्य गार्हस्थ्यं वानप्रस्थपरो भव

putra uvāca yadi madvacanaṃ tāta śraddadhāsyaviśaṅkitaḥ / tat parityajya gārhasthyaṃ vānaprasthaparo bhava

हिन्दी अर्थ

पापभोजी है; वह केवल पाप भोजन करता है और दूसरे जन्ममें उसे विष्ठा खानी पड़ती है। अतिथि जिसके घरसे निराश होकर लौटता है, उसको अपना पाप दे स्वयं उसका पुण्य लेकर चल देता है। अतः मनुष्यको उचित है कि वह जल और साग देकर अथवा स्वयं जो कुछ खाता है, उसीसे अपनी शक्तिके

English

Thus the Muni addressed him; and Arjuna Kdrtavirya, calling that speech of Garga’s, replied then, bowing before him,

अध्याय १६

श्लोक 4

तमनुष्ठाय विधिवद् विहायाग्निपरिग्रहम् ।आत्मन्यात्मानमाधया निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः

tamanuṣṭhāya vidhivad vihāyāgniparigraham / ātmanyātmānamādhayā nirdvandvo niṣparigrahaḥ

हिन्दी अर्थ

अनुसार आदरपूर्वक अतिथिका पूजन करे।

English

king in the very same way, as he had formerly addressed the gods.

अध्याय १६

श्लोक 5

एकान्तराशी वश्यात्मा भव भिक्षुरतन्द्रितः ।तत्र योगापरो भूत्वा बाह्यस्पर्शविवर्जितः

ekāntarāśī vaśyātmā bhava bhikṣuratandritaḥ / tatra yogāparo bhūtvā bāhyasparśavivarjitaḥ

हिन्दी अर्थ

गृहस्थ पुरुष प्रतिदिन पितरोंके उद्देश्यसे अन्न और जलके द्वारा श्राद्ध करे और अनेक या एक ब्राह्मणको भोजन कराये। अन्नमेंसे अग्राशन निकालकर ब्राह्मणको दे। ब्रह्मचारी और संन्यासी जब भिक्षा माँगनेके लिये आयें, तब उन्हें भिक्षा अवश्य दे। एक ग्रास अन्नको भिक्षा, चार ग्रास अन्नको अग्राशन और

English

Thus invoked, the benign brahman answered him, the illus* trious Kartavirya, the subduer of the earth.

अध्याय १६

श्लोक 6

ततः प्राप्स्यति तं योगं दुः शसंयोगभेषजम् ।मुक्तिहेतुमनौपम्यमनाख्येयमसङ्गिनम् ।यत्संयोगान्न ते योगो भूयो भूतैर्भविष्यति

tataḥ prāpsyati taṃ yogaṃ duḥ śasaṃyogabheṣajam / muktihetumanaupamyamanākhyeyamasaṅginam / yatsaṃyogānna te yogo bhūyo bhūtairbhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

अग्राशनसे चौगुने अन्नको श्रेष्ठ द्विज हन्तकार कहते हैं। भोजनमेंसे अपने वैभवके अनुसार हन्तकार, अग्राशन अथवा भिक्षा दिये बिना कदापि उसे ग्रहण न करे। अतिथियोंका पूजन करनेके बाद प्रियजनों, कुटुम्बियों, भाई-बन्धुओं, याचकों, आकुल व्यक्तियों, बालकों, वृद्धों तथा रोगियोंको भोजन कराये। इनके

English

Thus the Muni addressed him; and Arjuna Kdrtavirya, calling that speech of Garga’s, replied then, bowing before him,

अध्याय १६

श्लोक 7

पितावाच वत्स योगं ममाचक्ष्व मुक्तिहेतुमतः परम् ।येन भूतैः पुनर्भूतो नेदृगः खमवाप्नुयाम्

pitāvāca vatsa yogaṃ mamācakṣva muktihetumataḥ param / yena bhūtaiḥ punarbhūto nedṛgaḥ khamavāpnuyām

हिन्दी अर्थ

अतिरिक्त यदि कोई दूसरा अकिज्चन मनुष्य भी भूखसे व्याकुल होकर अन्नकी याचना करता हो तो गृहस्थ पुरुष वैभव होनेपर उसे अवश्य भोजन कराये। जो सजातीय बन्धु अपने किसी धनी सजातीयके पास जाकर भी भोजनका कष्ट पाता है, वह उस कष्टकी अवस्थामें जो पाप कर बैठता है, उसे वह धनी मनुष्य

English

" Why dost thou beguile mo, my lord, resorting to thy illusory devices. Sinless thou art, and this brahman lady is

अध्याय १६

श्लोक 8

यत्रासक्तिपरस्यात्मा मम संसारबन्धनैः ।नैति योगमयोगो ऽपि तं योगमधुना वद

yatrāsaktiparasyātmā mama saṃsārabandhanaiḥ / naiti yogamayogo 'pi taṃ yogamadhunā vada

हिन्दी अर्थ

भी भोगता है। सायंकालमें भी इसी नियमका पालन करे। सूर्यास्त होनेपर जो

English

Thus invoked, the benign brahman answered him, the illus* trious Kartavirya, the subduer of the earth.

अध्याय १६

श्लोक 9

संसारादित्यतापार्ति-विप्लुष्यद्देहमानसम् ।ब्रह्मज्ञानाम्बुशीतेन सिञ्च मां वाक्यवारिणा

saṃsārādityatāpārti-vipluṣyaddehamānasam / brahmajñānāmbuśītena siñca māṃ vākyavāriṇā

हिन्दी अर्थ

अतिथि वहाँ आ जाय, उसकी यथाशक्ति शय्या, आसन और भोजनके द्वारा पूजा करे। बेटा! जो इस प्रकार अपने कंधोंपर रखा हुआ गृहस्थाश्रमका भार ढोता है, उसके लिये स्वयं ब्रह्माजी, देवता, पितर, महर्षि, अतिथि, बन्धु-बान्धव, पशु-पक्षी तथा छोटे-छोटे कीड़े भी, जो उसके अन्नसे तृप्त हुए रहते हैं,

English

" Choose thou a boon; since thou hast declared my secret, I have felt thereby intense gratification in thee to-day,

अध्याय १६

श्लोक 10

अविद्याकृष्णसर्पेण दष्टं तद्विषपीडितम् ।स्ववाक्यामृतपानेन मां जीवय पुनर्मृतम्

avidyākṛṣṇasarpeṇa daṣṭaṃ tadviṣapīḍitam / svavākyāmṛtapānena māṃ jīvaya punarmṛtam

हिन्दी अर्थ

कल्याणकी वर्षा करते हैं।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 11

पुत्र-दार-गृह-क्षेत्र-ममत्वनिगजडार्दितम् ।मां मोचयेष्टसद्भाव-विज्ञानोद्घाटनैस्त्वरन्

putra-dāra-gṛha-kṣetra-mamatvanigajaḍārditam / māṃ mocayeṣṭasadbhāva-vijñānodghāṭanaistvaran

हिन्दी अर्थ

३. देवपूजा, अग्निहोत्र तथा यज्ञ-यागादि कर्म “इष्ट” कहलाते हैं। २. कुआँ और बावली खुदवाना, बगीचे लगवाना तथा धर्मशाला बनवाना आदि कार्य 'आपूर्त” धर्मके अन्तर्गत हैं।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 12

पुत्र उवाच शृणु तात ! यथा योगो दत्तात्रेयेण धीमता ।अलर्काय पुरा प्रोक्तः सम्यक् पृष्टेन विस्तरात्

putra uvāca śṛṇu tāta ! yathā yogo dattātreyeṇa dhīmatā / alarkāya purā proktaḥ samyak pṛṣṭena vistarāt

हिन्दी अर्थ

२-ग्रासप्रमाणा भिक्षा स्यादग्रं ग्रासचतुष्टयम् । अग्रं चतुर्गुणं प्राहु्न्तकारं द्विजोत्तमा: ।।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 13

पितोवाच दत्तात्रेयः सुतः कस्य कथं वा योगमुक्तवान् ।कश्चालर्को महाभागो यो यौगं परिपृष्टवान्

pitovāca dattātreyaḥ sutaḥ kasya kathaṃ vā yogamuktavān / kaścālarko mahābhāgo yo yaugaṃ paripṛṣṭavān

हिन्दी अर्थ

श्राद्ध-कर्मका वर्णन

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 14

पुत्र उवाच कौशिको ब्राह्मणः कश्चित् प्रतिष्ठाने ऽभवत् पुरे ।सो ऽन्यजन्मकृतैः पापैः कुष्ठरोगातुरो ऽभवत्

putra uvāca kauśiko brāhmaṇaḥ kaścit pratiṣṭhāne 'bhavat pure / so 'nyajanmakṛtaiḥ pāpaiḥ kuṣṭharogāturo 'bhavat

हिन्दी अर्थ

मदालसा बोली--बेटा! गृहस्थके कर्म तीन प्रकारके हैं। नित्य, नैमित्तिक तथा नित्यनैमित्तिक। इनका वर्णन सुनो। पञठ्चयज्ञसम्बन्धी कर्म, जिसका अभी वर्णन किया है, नित्य कहलाता है। पुत्र-जन्म आदिके उपलक्षमें किये हुए कर्मको नैमित्तिक कहते हैं। पर्वके अवसरपर जो श्राद्ध आदि किये जाते हैं, उन्हें

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 15

तं तथा व्याधितं भार्या पतिं देवमिवार्च्चयत् ।पादाभ्यङ्गाङ्गसंवाह-स्त्रानाच्छादनभोजनैः

taṃ tathā vyādhitaṃ bhāryā patiṃ devamivārccayat / pādābhyaṅgāṅgasaṃvāha-strānācchādanabhojanaiḥ

हिन्दी अर्थ

विद्वान् पुरुषोंको नित्यनैमित्तिक कर्म समझना चाहिए। उनमेंसे नैमित्तिक कर्मका वर्णन करती हूँ। आभ्युदयिक श्राद्ध नैमित्तिक कर्म है, जिसे पुत्र-जन्मके अवसरपर जातकर्म संस्कारके साथ करना चाहिए। विवाह आदिमें भी, जिस क्रमसे वह बताया गया है, भलीभाँति उसका अनुष्ठान करना उचित है।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 16

श्लेष्म-मूत्र-पुरीषासृक्-प्रवाहक्षालनेन च ।रहश्चैवोपचारेण प्रियसम्भाषणेन च

śleṣma-mūtra-purīṣāsṛk-pravāhakṣālanena ca / rahaścaivopacāreṇa priyasambhāṣaṇena ca

हिन्दी अर्थ

नानदीमुख नामके जो पितर हैं, उनन्‍्हींका इसमें पूजन करना चाहिए और उन्हें दधिमिश्रित जौके पिण्ड देने चाहिए। उस समय यजमानको एकाग्रचित्त होकर उत्तर या पूर्वकी ओर मुँह करके बैठना चाहिए। कुछ लोगोंका मत है कि इसमें बलिवैश्वदेव कर्म नहीं होता। आभ्युदयिक श्राद्धमें युग्म ब्राह्मणोंको निमन्त्रित

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 17

स तया पूज्यमानो ऽपि सदातीव विनीतया ।अतीव तीव्रकोपत्वान्निर्भर्त्सयति निष्ठुरः

sa tayā pūjyamāno 'pi sadātīva vinītayā / atīva tīvrakopatvānnirbhartsayati niṣṭhuraḥ

हिन्दी अर्थ

करना और प्रदक्षिणापूर्वक उनका पूजन करना उचित है। यह वृद्धिके अवसरोंपर किया जानेवाला नैमित्तिक श्राद्ध है। इससे भिन्न और्ध्वहैहिक श्राद्ध है, जो मृत्युके पश्चात् किया जाता है।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 18

तथापि प्रणता भार्या तममन्यत दैवतम् ।तं तथाप्यतिबीभत्सं सर्वश्रेष्ठममन्यत

tathāpi praṇatā bhāryā tamamanyata daivatam / taṃ tathāpyatibībhatsaṃ sarvaśreṣṭhamamanyata

हिन्दी अर्थ

मृत व्यक्ति जिस दिन (तिथिमें) मरा हो, उस तिथिको एकोद्िष्ट श्राद्ध करना चाहिए; उसका वर्णन सुनो। उसमें विश्वेदेवोंकी पूजा नहीं होती। एक ही पवित्रकका उपयोग किया जाता है। आवाहन तथा अग्नौकरणकी क्रिया भी नहीं होती। ब्राह्मणके उच्छिष्टके समीप प्रेतको तिल और जलके साथ अपसव्य

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 19

अचङ्क्रमणशोलो ऽपि स कदाचिद् द्विजोत्तमः ।प्राह भार्यां नयस्वेति त्वं मां तस्या निवेशनम्

acaṅkramaṇaśolo 'pi sa kadācid dvijottamaḥ / prāha bhāryāṃ nayasveti tvaṃ māṃ tasyā niveśanam

हिन्दी अर्थ

होकर (जनेऊको दाहिने कंधेपर डालकर) उसके नाम-गोत्रका स्मरण करते हुए एक पिण्ड देना चाहिए। तत्पश्चात् हाथमें जल लेकर कहे--“अमुकके श्राद्धमें दिया हुआ अन्न-पान आदि अक्षय हो।” यह कहकर वह जल पिण्डपर छोड़ दे; फिर ब्राह्मणोंका विसर्जन करते समय कहे--“अभिरम्यताम्” (आपलोग सब

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 20

या सा वेश्या मया दृष्टा राजमार्गे गृहोषिता ।तां मां प्रापय धर्मज्ञे ! सैव मे हृदि वर्तते

yā sā veśyā mayā dṛṣṭā rājamārge gṛhoṣitā / tāṃ māṃ prāpaya dharmajñe ! saiva me hṛdi vartate

हिन्दी अर्थ

तरहसे प्रसन्न हों)) उस समय ब्राह्मणलोग यह कहें--“अभिरता: स्म:” (हम भलीभाँति सन्तुष्ट हैं)। यह एकोद्दिष्ट श्राद्ध एक वर्षतक प्रतिमास करना उचित है। वर्ष पूरा होनेपर जब भी श्राद्ध किया जाय, पहले सपिण्डीकरण करना आवश्यक होता है। उसकी भी विधि बतलायी जाती है--यह सपिण्डीकरण भी

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 21

दृष्टा सूर्योदये बाला रात्रिश्चेयमुपागता ।दर्शनानन्तरं सा मे हृदयान्नापसर्पति

dṛṣṭā sūryodaye bālā rātriśceyamupāgatā / darśanānantaraṃ sā me hṛdayānnāpasarpati

हिन्दी अर्थ

विश्वेदवोंकी पूजासे रहित होता है। इसमें भी एक ही अर्घ्य और एक ही पवित्रकका विधान है। अग्नौकरण और आवाहनकी क्रिया इसमें भी नहीं होती। इसमें अपसव्य होकर अयुम्म ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिए। इसमें जो विशेष क्रिया है, उसे बतलाती हूँ, एकाग्रचित्तसे सुनो। इसमें तिल, चन्दन और

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 22

यदि सा चारुसर्वाङ्गी पीनश्रोणिपयोधरा ।नोपगूहति तन्वङ्गी तन्मां द्रक्ष्यसि वै मृतम्

yadi sā cārusarvāṅgī pīnaśroṇipayodharā / nopagūhati tanvaṅgī tanmāṃ drakṣyasi vai mṛtam

हिन्दी अर्थ

जलसे युक्त चार पात्र होते हैं; उनमेंसे तीन तो पितरोंके लिये और एक प्रेतके लिये होता है। प्रेतके पात्र और अर्घ्यको लेकर “ये समाना: समनस: पितरो यमराज्ये” इत्यादि मन्त्रका जप करते हुए पितरोंके तीनों पात्रोंमें सींचना चाहिए। शेष कार्य पूर्ववत् करना चाहिए। स्त्रियोंके लिये भी ऐसे ही एकोदिष्टका

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 23

वामः कामो मनुष्याणां बहुभिः प्रार्थ्यते च सा ।ममाशक्तिश्च गमने सङ्कुलं प्रतिभाति मे

vāmaḥ kāmo manuṣyāṇāṃ bahubhiḥ prārthyate ca sā / mamāśaktiśca gamane saṅkulaṃ pratibhāti me

हिन्दी अर्थ

विधान है। यदि पुत्र न हो तो स्त्रियोंका सपिण्डीकरण नहीं होता। पुरुषोंको उचित है कि वे स्त्रियोंके लिये भी प्रतिवर्ष उनकी मृत्युतिथिको विधिपूर्वक एकोद्िष्ट श्राद्ध करें। उनके लिये भी पुरुषोंके समान ही विधान है। पुत्रके अभावमें सपिण्ड, सपिण्डके अभावमें सहोदक, उनके भी अभावमें माताके

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 24

तत् तदा वचनं श्रुत्वा भर्तुः कामातुरस्य सा ।तत्पत्नी सत्कुलोत्पन्ना महाभागा पतिव्रता

tat tadā vacanaṃ śrutvā bhartuḥ kāmāturasya sā / tatpatnī satkulotpannā mahābhāgā pativratā

हिन्दी अर्थ

सपिण्ड5 और सहोदकः इस विधिको पूर्ण करें। जिसके कोई पुत्र नहीं है, उसका श्राद्ध उसके दौहित्र कर सकते हैं। पुत्रीके पुत्र नानाका नैमित्तिक श्राद्ध करनेके भी अधिकारी हैं। जिनकी द्वयामुष्यायणः संज्ञा है, ऐसे पुत्र नाना और बाबा दोनोंका नैमित्तिक श्राद्धोंमें भी विधिपूर्वक पूजन कर सकते हैं। कोई भी न

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 25

गाग्ं परिकरं बद्ध्वा शुल्कमादाय चाधिकम् ।स्कन्धे भर्तारमादाय जगाम मृदुगामिनी

gāgṃ parikaraṃ baddhvā śulkamādāya cādhikam / skandhe bhartāramādāya jagāma mṛdugāminī

हिन्दी अर्थ

हो तो स्त्रियाँ ही अपने पतियोंका मन्त्रोच्चारण किये बिना श्राद्ध कर सकती हैं। वे भी न हों तो राजा अपने कुट॒म्बी मनुष्यसे अथवा मृतकके सजातीय मनुष्योंद्वारा दाह आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ पूर्ण करावें; क्योंकि राजा सब वर्णोंका बन्धु होता है।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 26

निशि मेघास्तृते व्योम्नि चलद्विद्युत्प्रदर्शिते ।राजमार्गे प्रियं भर्तुश्चिकीर्षन्ती द्विजाङ्गना

niśi meghāstṛte vyomni caladvidyutpradarśite / rājamārge priyaṃ bhartuścikīrṣantī dvijāṅganā

हिन्दी अर्थ

सपिण्डीकरणके पश्चात् पिताके प्रपितामह लेपभागभोजी पितरोंकी श्रेणीमें चले जाते हैं। उन्हें पितृ-पिण्ड पानेका अधिकार नहीं रहता। उनसे आरम्भ करके चार पीढ़ी ऊपरके पितर, जो अबतक पुत्रके लेपभागका अन्न ग्रहण करते थे, उसके सम्बन्धसे रहित हो जाते हैं। अब उनको लेपभागका अन्न पानेका भी

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 27

पथि शूले तथा प्रोतमचौरं यौरशङ्कया ।माण्डव्यमतिदुः खार्तमन्धकारे ऽथ स द्विजः

pathi śūle tathā protamacauraṃ yauraśaṅkayā / māṇḍavyamatiduḥ khārtamandhakāre 'tha sa dvijaḥ

हिन्दी अर्थ

अधिकार नहीं रहता। वे सम्बन्धहीन अन्नका उपभोग करते हैं। पिता, पितामह और प्रपितामह--इन तीन पुरुषोंको पिण्डके अधिकारी समझना चाहिए। इनसे अर्थात् पिताके पितामहसे ऊपर जो तीन पीढ़ीके पुरुष हैं, वे लेपभागके अधिकारी हैं। इस प्रकार छः ये और सातवाँ यजमान, सब मिलाकर सात

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 28

पत्नीस्कन्धे समारूढश्चालयामास कौशिकः ।पादावमर्षणात् क्रुद्धो माण्डव्यस्तमुवाच ह

patnīskandhe samārūḍhaścālayāmāsa kauśikaḥ / pādāvamarṣaṇāt kruddho māṇḍavyastamuvāca ha

हिन्दी अर्थ

पुरुषोंका घनिष्ठ सम्बन्ध होता है--ऐसा मुनियोंका कथन है। यह सम्बन्ध यजमानसे लेकर ऊपरके लेपभागभोजी पितरोंतक माना जाता है। इनसे ऊपरके सभी पितर पूर्वज कहलाते हैं। इनमेंसे जो नरकमें निवास करते हैं, जो पशु-पक्षीकी योनिमें पड़े हैं तथा जो भूत-प्रेत आदिके रूपमें स्थित हैं, उन

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 29

येनाहमेवमत्यर्थं दुः खितश्चालितः पदा ।दशां कष्टामनुप्राप्तः स पापात्मा नराधमः

yenāhamevamatyarthaṃ duḥ khitaścālitaḥ padā / daśāṃ kaṣṭāmanuprāptaḥ sa pāpātmā narādhamaḥ

हिन्दी अर्थ

सबको विधिपूर्वक श्राद्ध करनेवाला यजमान तृप्त करता है। किस प्रकार तृप्त करता है, यह बतलाती हूँ; सुनो। मनुष्य पृथ्वीपर जो अन्न बिखेरते हैं, उससे पिशाच-योनिमें पड़े हुए पितरोंकी तृप्ति होती है। बेटा! स्नानके वस्त्रसे जो जल पृथ्वीपर टपकता है, उससे वृक्ष-योनिमें पड़े हुए पितर तृप्त होते हैं। नहानेपर

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 30

सूर्योदये ऽवशः प्राणैर्विमोक्ष्यति न संशयः ।भास्करालोकनादेव स विनाशमवाप्स्यति

sūryodaye 'vaśaḥ prāṇairvimokṣyati na saṃśayaḥ / bhāskarālokanādeva sa vināśamavāpsyati

हिन्दी अर्थ

अपने शरीरसे जो जलके कण इस पृथ्वीपर गिरते हैं, उनसे उन पितरोंकी तृप्ति होती है, जो देवभावको प्राप्त हुए हैं। पिण्डोंके उठानेपर जो अन्नके कण पृथ्वीपर गिरते हैं, उनसे पशु-पक्षीकी योनिमें पड़े हुए पितरोंकी तृप्ति होती है। कुलमें जो बालक श्राद्धकर्मके योग्य होकर भी संस्कारसे वज्चित रह गये हैं

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 31

तस्य भार्याततः श्रुत्वा तं शापमतिदारुणम् ।प्रोवाच व्यथिता सूर्यो नैवोदयमुपैष्यति

tasya bhāryātataḥ śrutvā taṃ śāpamatidāruṇam / provāca vyathitā sūryo naivodayamupaiṣyati

हिन्दी अर्थ

अथवा जलकर मरे हैं, वे बिखेरे हुए अन्न और सम्मार्जनके जलको ग्रहण करते हैं। ब्राह्मणतोग भोजन करके जब हाथ-मुँह धोते हैं और चरणोंका प्रक्षालन करते हैं, उस जलसे भी अन्यान्य पितरोंकी तृप्ति होती है। बेटा! उत्तम विधिसे श्राद्ध करनेवाले पुरुषोंके अन्य पितर यदि दूसरी-दूसरी योनियोंमें चले गये हों तो

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 32

ततः सूर्योदयाभावादभवत् सन्तता निशा ।बहून्यहः प्रमाणानि ततो देवा भयं ययुः

tataḥ sūryodayābhāvādabhavat santatā niśā / bahūnyahaḥ pramāṇāni tato devā bhayaṃ yayuḥ

हिन्दी अर्थ

भी उस श्राद्धसे उन्हें बड़ी तृप्ति होती है। अन्यायोपार्जित धनसे जो श्राद्ध किया जाता है, उससे चाण्डाल आदि योनियोंमें पड़े हुए पितर तृप्त होते हैं। वत्स! इस प्रकार यहाँ श्राद्ध करनेवाले भाई-बन्धु अन्न और जलके कणमात्रसे अनेक पितरोंको तृप्त करते हैं। इसलिये मनुष्यको उचित है कि वह पितरोंके प्रति

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 33

निः स्वाध्यायवषट्कार-स्वधास्वाहाविवर्जितम् ।कथं नु खल्विदं सर्वं न गच्छेत् संक्षयं जगत्

niḥ svādhyāyavaṣaṭkāra-svadhāsvāhāvivarjitam / kathaṃ nu khalvidaṃ sarvaṃ na gacchet saṃkṣayaṃ jagat

हिन्दी अर्थ

भक्ति रखते हुए शाकमात्रके द्वारा भी विधिपूर्वक श्राद्ध करे। श्राद्ध करनेवाले पुरुषके कुलमें कोई दुःख नहीं भोगता।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 34

अहोरात्रव्यवस्थाया विना मासर्तुसंक्षयः ।तत्संक्षयान्न त्वयने ज्ञायेते दक्षिणोत्तरे

ahorātravyavasthāyā vinā māsartusaṃkṣayaḥ / tatsaṃkṣayānna tvayane jñāyete dakṣiṇottare

हिन्दी अर्थ

अब मैं नित्य-नैमित्तिक श्राद्धोंक काल बतलाती हूँ और मनुष्य जिस विधिसे श्राद्ध करते हैं, उसका भी वर्णन करती हूँ; सुनो। प्रत्येक मासकी अमावस्याको जिस दिन चन्द्रमाकी सम्पूर्ण कलाएँ क्षीण हो गयी हों तथा अष्टकाः तिथियोंको अवश्य श्राद्ध करना चाहिए। अब श्राद्धका इच्छाप्राप्त काल सुनो। किसी

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 35

विना चायनविज्ञानात् कालः संवत्सरः कुतः ।संवत्सरं विना नान्यत् कालज्ञानं प्रवर्तते

vinā cāyanavijñānāt kālaḥ saṃvatsaraḥ kutaḥ / saṃvatsaraṃ vinā nānyat kālajñānaṃ pravartate

हिन्दी अर्थ

विशिष्ट ब्राह्मणके आनेपर, सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणमें, अयन आरम्भ होनेपर, विषुवयोगमें, सूर्यकी संक्रान्तिके दिन, व्यतीपात योगमें, श्राद्धके योग्य सामग्रीकी प्राप्ति होनेपर, दुःस्वप्न दिखायी देनेपर, जन्म-नक्षत्रके दिन एवं ग्रहजनित पीड़ा होनेपर स्वेच्छासे श्राद्धका अनुष्ठान करे।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 36

पतिव्रताया वचसा नोद्गच्छति दिवाकरः ।सूर्योदयं विना नैव स्त्रानदानादिकाः क्रियाः

pativratāyā vacasā nodgacchati divākaraḥ / sūryodayaṃ vinā naiva strānadānādikāḥ kriyāḥ

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ ब्राह्मण, श्रोत्रिय, योगी, वेदज्ञ, ज्येष्ठ सामग, त्रिणाचिकेतः, त्रिमधुडें, त्रिसुपर्णिड, षडड़वेत्ता, दौहित्र, ऋत्विकू, जामाता, भानजा, पज्चाग्नि-कर्ममें तत्पर, तपस्वी, मामा, माता-पिताके भक्त, शिष्य, सम्बन्धी एवं भाई-बन्धु--ये सभी श्राद्धमें उत्तम माने गये हैं। इन्हें निमन्त्रित करना चाहिए। धर्मभ्रष्ट, रोगी,

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 37

नाग्नेर्विहरणञ्चैव क्रात्वभावश्च लक्ष्यते ।नैवाप्ययनमस्माकं विना होमेन जायते

nāgnerviharaṇañcaiva krātvabhāvaśca lakṣyate / naivāpyayanamasmākaṃ vinā homena jāyate

हिन्दी अर्थ

हीनाड़, अधिकाड़, दो बार ब्याही गयी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न, काना, पतिके जीते-जी जार पुरुषसे पैदा की हुई सन्‍्तान, पतिके मरनेपर परपुरुषसे उत्पन्न हुई सन्तान, मित्रद्रोही, खराब नखोंवाला, नपुंसक, काले दाँतोंवाला, कुरूप, पिताके द्वारा कलड़्कित, चुगलखोर, सोमरस बेचनेवाला, कन्याको दूषित करनेवाला,

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 38

वयमाप्यायिता मर्त्यैर्यज्ञभागैर्यथोचितैः ।वृष्ट्या ताननुगृह्णीमो मर्त्यान् शस्यादिसिद्धये

vayamāpyāyitā martyairyajñabhāgairyathocitaiḥ / vṛṣṭyā tānanugṛhṇīmo martyān śasyādisiddhaye

हिन्दी अर्थ

वैद्य, गुरु एवं माता-पिताका त्याग करनेवाला, वेतन लेकर पढ़ानेवाला, शत्रु, जो पहले दूसरे पुरुषकी पत्नी रह चुकी हो, ऐसी स्त्रीका पति, वेदाध्ययन तथा

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 39

निष्पादितास्वोषधीषु मर्त्या यज्ञैर्यजन्ति नः ।तेषां वयं प्रयच्छामः कामान् यज्ञादिपूजिताः

niṣpāditāsvoṣadhīṣu martyā yajñairyajanti naḥ / teṣāṃ vayaṃ prayacchāmaḥ kāmān yajñādipūjitāḥ

हिन्दी अर्थ

अन्निहोत्रका त्याग करनेवाला, शूद्रजातीय स्त्रीके पति होनेके दोषसे दूषित तथा शास्त्रविरुद्ध कर्ममें लगे रहनेवाले अन्यान्य द्विज श्राद्धमें त्याग देने योग्य हैं। पहले बताये हुए श्रेष्ठ द्विजोंको देवयज्ञ अथवा श्राद्धमें एक दिन पहले ही निमन्त्रण देना चाहिए। उसी समयसे ब्राह्मणों तथा श्राद्धकर्ताको भी संयमसे

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 40

अधो हि वर्षाम वयं मर्त्याश्चोर्ध्वप्रवर्षिणः ।तोयवर्षेण हि वयं हविर्वर्षेण मानवाः

adho hi varṣāma vayaṃ martyāścordhvapravarṣiṇaḥ / toyavarṣeṇa hi vayaṃ havirvarṣeṇa mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

रहना चाहिए। जो श्राद्धमें दान देकर अथवा श्राद्धमें भोजन करके मैथुन करता है, उसके रज-वीर्यमें एक मासतक पितरोंको शयन करना पड़ता है। जो स्त्री- सहवास करके श्राद्धमें जाता और खाता है, उसके पितर उसीके वीर्य और मूत्रका एक मासतक आहार करते हैं। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको एक दिन

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 41

ये नास्माकं प्रयच्छन्ति नित्यनैमित्तकीः क्रियाः ।क्रतुभागं दुरात्मानः स्वयञ्चाश्नन्ति लोलुपाः

ye nāsmākaṃ prayacchanti nityanaimittakīḥ kriyāḥ / kratubhāgaṃ durātmānaḥ svayañcāśnanti lolupāḥ

हिन्दी अर्थ

पहले ही ब्राह्मणोंके पास निमन्त्रण भेजना चाहिए। यदि पहले दिन ब्राह्मण न मिल सकें तो भी श्राद्धके दिन स्त्री-प्रसंगी ब्राह्मगोंको कदापि भोजन न कराये। बल्कि समयपर भिक्षाके लिये स्वतः पधारे हुए संयमी यतियोंको नमस्कार आदिसे प्रसन्न करके शुद्ध चित्तसे भोजन कराये। जैसे शुक्ल-पक्षकी अपेक्षा

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 42

विनाशाय वयं तेषां तोयसूर्याग्निमारुतान् ।क्षितिञ्च सन्दूषयामः पापानामपकारिणाम्

vināśāya vayaṃ teṣāṃ toyasūryāgnimārutān / kṣitiñca sandūṣayāmaḥ pāpānāmapakāriṇām

हिन्दी अर्थ

कृष्णपक्ष पितरोंको विशेष प्रिय है, वैसे ही पूर्वाह्ककी अपेक्षा अपराह्न उन्हें अधिक प्रिय है। घरपर आये हुए ब्राह्मणोंका स्वागतपूर्वक पूजन करके उन्हें पवित्रयुक्त हाथसे आचमन करानेके बाद आसनोंपर बिठावे। श्राद्धमें विषम और देवयज्ञमें सम संख्याके ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे अथवा अपनी शक्तिके

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 43

दुष्टतोयादिभोगेन तेषां दुष्कृतकर्मिणाम् ।उपसर्गाः प्रवर्तन्ते मरणाय सुदारुणाः

duṣṭatoyādibhogena teṣāṃ duṣkṛtakarmiṇām / upasargāḥ pravartante maraṇāya sudāruṇāḥ

हिन्दी अर्थ

अनुसार दोनों कार्योमें एक-ही-एक ब्राह्मणको भोजन कराये। यही बात मातामहोंके श्राद्धमें भी होनी चाहिए। विश्वेदेवोंका श्राद्ध भी ऐसा ही है। कुछ लोगोंका ऐसा मत है कि पितरों और मातामहोंके विश्वेदेव-कर्म पृथक्-पृथक हैं। देव-श्राद्धमें ब्राह्मणोंको पूर्वांभिमुख और पितृ-श्राद्धमें उत्तराभिमुख बिठाना

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 44

ये त्वस्मान् प्रीणयित्वा तु भुञ्जते शेषमात्मना ।तेषां पुण्यान् वयं योकान् विदधाम महात्मनाम्

ye tvasmān prīṇayitvā tu bhuñjate śeṣamātmanā / teṣāṃ puṇyān vayaṃ yokān vidadhāma mahātmanām

हिन्दी अर्थ

चाहिए। मातामहोंके श्राद्धमें भी मनीषी पुरुषोंने इसी विधिका प्रतिपादन किया है। पहले ब्राह्मणोंको बैठनेके लिये कुश देकर विद्वान् पुरुष अर्घ्य आदिसे उनकी पूजा करे। फिर उन्हें पवित्रक आदि दे उनसे आज्ञा लेकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 45

तन्नास्ति सर्वमेवैतद्विनैषां व्युष्टिसंस्थैतम् ।कथं नु दिनसर्गः स्यादन्यो ऽन्यमवदन् सुराः

tannāsti sarvamevaitadvinaiṣāṃ vyuṣṭisaṃsthaitam / kathaṃ nu dinasargaḥ syādanyo 'nyamavadan surāḥ

हिन्दी अर्थ

देकर गन्ध, पुष्प, माला, जल, धूप और दीप आदि विधिपूर्वक निवेदन करे। पितरोंके लिये ये सारी वस्तुएँ अपसव्य होकर प्रस्तुत करनी चाहिए। पितृ- श्राद्धमें बैठे हुए ब्राह्मणोंको आसनके लिये द्विगुणभुग्न (दोहरे मुड़े हुए) कुश देकर उनकी आज्ञा ले विद्वान् पुरुष मन्त्रोच्चारणपूर्वक पितरोंका आवाहन करे

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 46

तेषामेव समेतानां यज्ञव्युच्छित्तिशङ्किनाम् ।देवानां वचनं श्रुत्वा प्राह देवः प्रजापतिः

teṣāmeva sametānāṃ yajñavyucchittiśaṅkinām / devānāṃ vacanaṃ śrutvā prāha devaḥ prajāpatiḥ

हिन्दी अर्थ

और अपसव्य होकर पितरोंकी प्रसन्नताके लिये तत्पर हो उन्हें अर्घ्य निवेदन करे। उसमें जौके स्थानपर तिलोंका उपयोग करना चाहिए। तदनन्तर ब्राह्मणोंके आज्ञा देनेपर अग्निकार्य करे। नमक और व्यज्जनसे रहित अन्न लेकर विधिपूर्वक अग्निमें आहुति दे। “अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा” इस मन्त्रसे

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 47

तेजः परं तेजसैव तपसा च तपस्तथा ।प्रशाम्यते ऽमरास्तस्माच्छृणुध्वं वचनं मम

tejaḥ paraṃ tejasaiva tapasā ca tapastathā / praśāmyate 'marāstasmācchṛṇudhvaṃ vacanaṃ mama

हिन्दी अर्थ

पहली आहुति दे, 'सोमाय पितृमते स्वाहा” इस मन्त्रसे दूसरी आहुति दे तथा

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 48

पतिव्रताया माहात्म्यान्नोद्गच्छति दिवाकरः ।तस्य चानुदयाद्धानिर्मर्त्यानां भवतां तथा

pativratāyā māhātmyānnodgacchati divākaraḥ / tasya cānudayāddhānirmartyānāṃ bhavatāṃ tathā

हिन्दी अर्थ

“यमाय प्रेतपतये स्वाहा” इस मन्त्रसे तीसरी आहुतिको अमग्निमें डाले। आहुतिसे बचे हुए अन्नको ब्राह्मणोंके पात्रमें परोसे। फिर पात्रमें हाथका सहारा दे विधिपूर्वक कुछ और अन्न डाले एवं कोमल वचनोंमें प्रार्थना करे कि अब आपलोग सुखसे भोजन कीजिये। फिर उन ब्राह्मणोंको चाहिए कि वे

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 49

तस्मात् पतिव्रतामत्रेरनुभूयां तपस्विनीम् ।प्रसादयत वै पत्नीं भानोरुदयकाम्यया

tasmāt pativratāmatreranubhūyāṃ tapasvinīm / prasādayata vai patnīṃ bhānorudayakāmyayā

हिन्दी अर्थ

एकाग्रचित्त एवं मौन होकर सुखपूर्वक भोजन करें। जो-जो अन्न उन्हें अत्यन्त प्रिय लगे, वह-वह तुरंत उनके सामने प्रस्तुत करे। उस समय क्रोधको त्याग दे और ब्राह्मणोंको आग्रहपूर्वक प्रलोभन दे-दे भोजन कराये। उनके भोजनकालमें रक्षाके लिये पृथ्वीपर तिल और सरसों बिखेरे तथा रक्षोघ्न मन्त्रोंका पाठ करे;

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 50

पुत्र उवाच तैः सा प्रसादिता गत्वा प्रोहेष्टं व्रियतामिति ।अयाचन्त दिनं देवा भवत्विति यथा पुरा

putra uvāca taiḥ sā prasāditā gatvā proheṣṭaṃ vriyatāmiti / ayācanta dinaṃ devā bhavatviti yathā purā

हिन्दी अर्थ

क्योंकि श्राद्धमें अनेक प्रकारके विघ्न उपस्थित होते हैं। जब ब्राह्मणलोग पूर्ण भोजन कर लें तो पूछे--“क्या आपलोग भलीभाँति तृप्त हो गये?” इसके उत्तरमें ब्राह्मण कहें--'हाँ, हम पूर्ण तृप्त हो गये।! फिर उनकी आज्ञा लेकर पृथ्वीपर सब ओर कुछ अन्न बिखेरे। इसी प्रकार आचमन करनेके लिये एक-एक

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 51

अनसूयोवाच पतिव्रताया माहात्म्यं न हीयेत कथन्त्विति ।संमान्य तस्मात् तां साध्वीमहः स्त्रक्ष्याम्यहं सुराः

anasūyovāca pativratāyā māhātmyaṃ na hīyeta kathantviti / saṃmānya tasmāt tāṃ sādhvīmahaḥ strakṣyāmyahaṃ surāḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणको बारी-बारीसे जल दे। तत्पश्चात् फिर उनकी आज्ञा ले मन, वाणी और शरीरको संयममें रखकर तिलसहित सम्पूर्ण अन्नसे पितरोंके लिये पृथक्-पृथक् पिण्ड दे। यह पिण्डदान ब्राह्मणोंके उच्छिष्टके समीप ही कुशोंपर करना चाहिए; फिर पितृतीर्थसे5 उन पिण्डोंपर एकाग्रचित्तसे जल दे। इसी प्रकार मातामह

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 52

यथा पुनरहोरात्र-संस्थानमुपजायते ।यथा च तस्याः स्वपतिर्न साध्व्या नाशमेष्यति

yathā punarahorātra-saṃsthānamupajāyate / yathā ca tasyāḥ svapatirna sādhvyā nāśameṣyati

हिन्दी अर्थ

आदिके लिये भी विधिपूर्वक पिण्डदान देकर गन्ध-माला आदिके साथ आचमनके लिये जल दे। अन्तमें यथाशक्ति दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंसे कहे --'सुस्वधा अस्तु” (यह श्राद्धकर्म भलीभाँति सम्पन्न हो)। ब्राह्मण भी सन्तुष्ट होकर “तथास्तु' कहें। फिर विश्वेदेव-सम्बन्धी ब्राह्मणोंसे कहे--'हे विश्वेदेवगण!

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 53

पुत्र उवाच एवमुक्त्वा सुरांस्तस्या गत्वा सा मन्दिरं शुभा ।उवाच कुशलं पृष्टा धर्मं भर्तुस्तथात्मनः

putra uvāca evamuktvā surāṃstasyā gatvā sā mandiraṃ śubhā / uvāca kuśalaṃ pṛṣṭā dharmaṃ bhartustathātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

आपका कल्याण हो। आपलोग प्रसन्न रहें।' तब ब्राह्मणलोग “तथास्तु” कहें। इसके बाद उनसे आशीर्वादकी याचना करे और प्रिय वचन कहते हुए भक्तिपूर्वक प्रणाम करके उन्हें विदा दे। दरवाजेतक उन्हें पहुँचानेके लिये पीछे- पीछे जाय और उनकी आज्ञा लेकर लौटे।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 54

अनसूयोवाच कच्चिन्नन्दसि कल्याणि स्वभर्तुर्मुखदर्शनात् ।कच्चिच्चाखिलदेवेभ्यो मन्यसे ऽभ्यधिकं पतिम्

anasūyovāca kaccinnandasi kalyāṇi svabharturmukhadarśanāt / kacciccākhiladevebhyo manyase 'bhyadhikaṃ patim

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर नित्यक्रिया करे और अतिथियोंको भोजन कराये। किन्हीं-किन्हीं श्रेष्ठ पुरुषोंका विचार है कि यह नित्यकर्म भी पितरोंके ही उद्देश्यसे होता है। दूसरे लोग ऐसा कहते हैं कि इससे पितरोंका कोई सम्बन्ध नहीं है। शेष कार्य पूर्ववत् करे। किन्हीं-किन्हींका मत है कि पितरोंके लिये पृथक् पाक बनाकर

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 55

भर्तृशुश्रूषणादेव मया प्राप्तं महत् फलम् ।सर्वकामफलावाप्त्या प्रत्यूहाः परिवर्तिताः

bhartṛśuśrūṣaṇādeva mayā prāptaṃ mahat phalam / sarvakāmaphalāvāptyā pratyūhāḥ parivartitāḥ

हिन्दी अर्थ

श्राद्ध करना चाहिए। कुछ लोगोंका विचार है--ऐसा नहीं करना चाहिए।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 56

पञ्चर्णानि मनुष्येण साध्वि ! देयानि सर्वदा ।तथात्मवर्णधर्मेण कर्तव्यो धनसंचयः

pañcarṇāni manuṣyeṇa sādhvi ! deyāni sarvadā / tathātmavarṇadharmeṇa kartavyo dhanasaṃcayaḥ

हिन्दी अर्थ

इसके बाद यजमान अपने भृत्य आदिके साथ अवशिष्ट अन्न भोजन करे। धर्मज्ञ पुरुषको इसी प्रकार एकाग्रचित्त होकर पितरोंका श्राद्ध करना चाहिए और जिस प्रकार ब्राह्मणोंको सन्‍्तोष हो, वैसी चेष्टा करनी चाहिए। श्राद्धमें दौहित्र (पुत्रीका पुत्र), कुतप (दिनके पंद्रह भागोंमेंसे आठवाँ भाग) और तिल--

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 57

प्राप्तश्चार्थस्ततः पात्रे विनियोज्यो विधानतः ।सत्यार्जव-तपो-दानैर्दयायुक्तो भवेत् सदा

prāptaścārthastataḥ pātre viniyojyo vidhānataḥ / satyārjava-tapo-dānairdayāyukto bhavet sadā

हिन्दी अर्थ

ये तीन अत्यन्त पवित्र माने गये हैं। श्राद्धमें आये ब्राह्मणोंको तीन बातें छोड़ देनी चाहिए--क्रोध, मार्गकका चलना और उतावली।- बेटा! श्राद्धमें चाँदीका पात्र बहुत उत्तम माना गया है। उसमें चाँदीका दर्शन या दान अवश्य करना चाहिए। सुना जाता है, पितरोंने चाँदीके पात्रमें ही गोरूपधारिणी पृथ्वीसे स्वधाका दोहन

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 58

क्रियाश्च शास्त्रनिर्दिष्टा रागद्वेषविवर्जिताः ।कर्तव्या अन्वहं श्रद्धा-पुरस्कारेण शक्तितः

kriyāśca śāstranirdiṣṭā rāgadveṣavivarjitāḥ / kartavyā anvahaṃ śraddhā-puraskāreṇa śaktitaḥ

हिन्दी अर्थ

किया था। अतः पितरोंको चाँदीका दान अभीष्ट एवं प्रसन्नता बढ़ानेवाला है।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 59

स्वजातिविहितानेव लोकानाप्नोति मानवः ।क्लेशेन महता साध्वि ! प्राजापत्यादिकान् क्रमात्

svajātivihitāneva lokānāpnoti mānavaḥ / kleśena mahatā sādhvi ! prājāpatyādikān kramāt

हिन्दी अर्थ

. पितासे लेकर ऊपरकी सात पीढ़ीतक और मातासे लेकर नाना आदि पाँच पीढ़ीतक सपिण्डता मानी जाती है। किसीके मतमें छः: पीढ़ी ऊपर और छ: पीढ़ी नीचेतकके लोग सपिण्डकी गणनामें आते हैं।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 60

स्त्रियस्त्वेवं समस्तस्य नरैर्दुः खार्जितस्य वै ।पुण्यस्यार्धापहारिण्यः पतिशुश्रूषयैव हि

striyastvevaṃ samastasya narairduḥ khārjitasya vai / puṇyasyārdhāpahāriṇyaḥ patiśuśrūṣayaiva hi

हिन्दी अर्थ

२. जिनकी ग्यारहवींसे लेकर चौदहवींतक ऊपरकी पीढ़ी एक हो, वे सहोदक या समानोदक कहलाते

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 61

नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न श्राद्धं नाप्युपोषितम् ।भर्तृशुश्रूषयैवैतान् लोकानिष्टान् व्रजन्ति हि

nāsti strīṇāṃ pṛthagyajño na śrāddhaṃ nāpyupoṣitam / bhartṛśuśrūṣayaivaitān lokāniṣṭān vrajanti hi

हिन्दी अर्थ

३. वह पुत्र, जो एकसे तो उत्पन्न हुआ हो और दूसरेके द्वारा दत्तकके रूपमें ग्रहण किया हो और दोनों पिता उसको अपना-अपना पुत्र मानते हों, द्वयामुष्यायण (दोनोंका) कहलाता है। ऐसा पुत्र दोनोंको पिण्डदान देता है और दोनोंकी सम्पत्तिका अधिकारी होता है।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 62

तस्मात् साध्वि ! महाभागे ! पतिशुश्रूषणं प्रति ।त्वया मतिः सदा कार्या यतो भर्ता परा गतिः

tasmāt sādhvi ! mahābhāge ! patiśuśrūṣaṇaṃ prati / tvayā matiḥ sadā kāryā yato bhartā parā gatiḥ

हिन्दी अर्थ

२. जिस समय सूर्य विषुव रेखापर पहुँचते और दिन-रात बराबर होते हैं, उसे “विषुव” कहते हैं।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 63

यद्देवेभ्यो यच्च पित्रागतेभ्यः कुर्याद्भर्ताभ्यर्च्चनं सत्क्रियातः ।तस्याप्यर्धं केवलानन्यचित्ता नारी भुङ्क्ते भर्तृशुश्रूषयैव

yaddevebhyo yacca pitrāgatebhyaḥ kuryādbhartābhyarccanaṃ satkriyātaḥ / tasyāpyardhaṃ kevalānanyacittā nārī bhuṅkte bhartṛśuśrūṣayaiva

हिन्दी अर्थ

३. द्वितीय कठके अन्तर्गत “अयं वाव यः पवते” इत्यादि तीन त्रिणाचिकेत नामक अनुवाकोंको पढ़ने या उसका अनुष्ठान करनेवाला।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 64

पुत्र उवाच तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा प्रतिपूज्य तथादरात् ।प्रत्युवाचात्रिपत्नीं तामनसूयामिदं वचः

putra uvāca tasyāstadvacanaṃ śrutvā pratipūjya tathādarāt / pratyuvācātripatnīṃ tāmanasūyāmidaṃ vacaḥ

हिन्दी अर्थ

. मधु वाता०' इत्यादि ऋचाका अध्ययन और मधुव्रतका आचरण करनेवाला। . ब्रह्म मेतु माम्' इत्यादि तीन अनुवाकोंका अध्ययन और तत्सम्बन्धी व्रत करनेवाला। - अंगूठा और तर्जनीके बीचका भाग। - त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रं कुतपस्तिला: । वर्ज्यानि चाहुर्विप्रेन्द्री: कोपो5ध्वगमनं

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 65

धन्यास्म्यनुगृहीतास्मि देवैश्चाप्यवलोकिता ।यन्मे प्रकृतिकल्याणि ! श्रद्धां वर्धयसे पुनः

dhanyāsmyanugṛhītāsmi devaiścāpyavalokitā / yanme prakṛtikalyāṇi ! śraddhāṃ vardhayase punaḥ

हिन्दी अर्थ

श्राद्धमें विहित और निषिद्ध ९४288 का वर्णन तथा गृहस्थोचित सदाचारका

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 66

जानाम्येतन्न नारीणां काचित् पतिसमा गतिः ।तत्प्रीतिश्चोपकाराय इह लोके परत्र च

jānāmyetanna nārīṇāṃ kācit patisamā gatiḥ / tatprītiścopakārāya iha loke paratra ca

हिन्दी अर्थ

मदालसा कहती है--बेटा! भक्तिपूर्वक लायी हुई कौन वस्तु पितरोंको प्रिय है और कौन वस्तु अप्रिय, इस बातका वर्णन करती हूँ; सुनो। हविष्यान्नसे पितरोंको एक मासतक तृप्ति बनी रहती है। गायका दूध अथवा उसमें बनी हुई खीर उन्हें एक वर्षतक तृप्त रखती है। जिस कन्याका विवाह गौरी-अवस्थामें

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 67

पतिप्रसादादिह च प्रेत्य चैव यशस्विनि ।नारी सुखमवाप्नोति नार्या भर्ता हि देवता

patiprasādādiha ca pretya caiva yaśasvini / nārī sukhamavāpnoti nāryā bhartā hi devatā

हिन्दी अर्थ

हुआ है, उससे उत्पन्न पुत्रसे और गयाके श्राद्धसे पितर अनन्तकालतक तृप्त रहते हैं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। अन्नोंमें श्यामाक (सावाँ), राजश्यामाक, प्रसातिका, नीवार और पौष्कल--ये पितरोंको तृप्त करनेवाले हैं। जौ, धान, गेहूँ, तिल, मूँग, सरसों, कैगनी, कोदो और मटर--ये बहुत ही उत्तम हैं। मकई,

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 68

सा त्वं ब्रूहि महाभागे ! प्राप्ताया मम मन्दिरम् ।आर्याया यन्मया कार्यं तथार्येणापि वा शुभे

sā tvaṃ brūhi mahābhāge ! prāptāyā mama mandiram / āryāyā yanmayā kāryaṃ tathāryeṇāpi vā śubhe

हिन्दी अर्थ

काला उड़द, विप्रूषि और मसूर--ये श्राद्धकर्ममें निन्दित माने गये हैं। लहसुन, गाजर, प्याज, मूली, सत्तू, रस और वर्णसे हीन अन्यान्य वस्तुएँ, गान्धारिक, लौकी, खारा नमक, लाल गोंद, भोजनके साथ पृथक् नमक--ये श्राद्धमें वर्जित हैं। इसी प्रकार जिसकी वाणीसे कभी प्रशंसा नहीं की जाती, वह वस्तु श्राद्धमें

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 69

अनसूयोवाच एते देवाः सहेन्द्रेण मामुपागम्य दुः खिताः ।त्वद्वाख्यापास्तसत्कर्मदिननक्तनिरूपणाः

anasūyovāca ete devāḥ sahendreṇa māmupāgamya duḥ khitāḥ / tvadvākhyāpāstasatkarmadinanaktanirūpaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

निषिद्ध है। सूदमें मिला हुआ, पतित मनुष्योंके यहाँसे आया हुआ, अन्यायसे तथा कन्याको बेचनेसे प्राप्त किया हुआ धन श्राद्धके लिये अत्यन्त निन्दित है। दुर्गन्धित, फेनयुक्त, थोड़े जलवाले सरोवरसे लाया हुआ, जहाँ गायकी प्यास न बुझ सके--ऐसे स्थानसे प्राप्त किया हुआ, रातका भरा हुआ, सब लोगोंका

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 70

याचन्ते ऽहर्निशासंस्थां यथावदविखण्डिताम् ।अहं तदर्थमायाता शृणु चैतद्वचो मम

yācante 'harniśāsaṃsthāṃ yathāvadavikhaṇḍitām / ahaṃ tadarthamāyātā śṛṇu caitadvaco mama

हिन्दी अर्थ

छोड़ा हुआ, अपेय तथा पौंसलेका जल श्राद्धमें सदा ही वर्जित है। मृगी, भेड़ ऊँटनी, घोड़ी आदि, भैंस और चँवरी गायका दूध श्राद्धमें निषिद्ध है। हालकी ब्यायी हुई गौका भी दस दिनके भीतरका दूध वर्जित है। “मुझे श्राद्धके लिये दूध दो' यों कहकर लाया हुआ दूध भी श्राद्धकर्ममें ग्रहण करनेयोग्य नहीं है।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 71

दिनाभावात् समस्तानामभावो यागकर्मणाम् ।तदभावात् सुराः पुष्टिं नोपयान्ति तपस्विनि

dinābhāvāt samastānāmabhāvo yāgakarmaṇām / tadabhāvāt surāḥ puṣṭiṃ nopayānti tapasvini

हिन्दी अर्थ

जहाँ बहुत-से जन्तु रहते हों, जो रूखी और आगसे जली हुई हो, जहाँ अनिष्ट एवं दुष्ट शब्द सुनायी पड़ते हों, जो भयानक दुर्गन्‍न्धसे भरी हो--ऐसी भूमि श्राद्धकर्ममें वर्जित है। कुलका अपमान तथा हिंसा करनेवाले, कुलाधम, ब्रह्महत्यारा, रोगी, चाण्डाल, नग्न और पातकी--ये अपनी दृष्टिसे श्राद्धकर्मको

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 72

अह्नश्चैव समुच्छेदादुच्छेदः सर्वकर्मणाम् ।तदुच्छेदादनावृष्ट्या जगदुच्छेदमेष्यति

ahnaścaiva samucchedāducchedaḥ sarvakarmaṇām / taducchedādanāvṛṣṭyā jagaducchedameṣyati

हिन्दी अर्थ

दूषित कर देते हैं। नपुंसक, जातिबहिष्कृत, मुर्गा, ग्रामीण सूअर, कुत्ता और राक्षस भी अपनी दृष्टिसे श्राद्धको नष्ट कर देते हैं। इसलिये चारों ओरसे ओट करके श्राद्ध करे। पृथ्वीपर तिल बिखेरे। ऐसा करनेसे श्राद्धमें रक्षा होती है। श्राद्धकी जिस वस्तुको मरणाशौच या जननाशौचसे युक्त मनुष्य छू दे, बहुत

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 73

तत् त्वमिच्छसि चेदेतत् जगदुद्धर्तुमापदः ।प्रसीद साध्वि ! लोकानां पूर्ववद्धर्ततां रविः

tat tvamicchasi cedetat jagaduddhartumāpadaḥ / prasīda sādhvi ! lokānāṃ pūrvavaddhartatāṃ raviḥ

हिन्दी अर्थ

दिनोंका रोगी, पतित एवं मलिन पुरुष स्पर्श कर ले, वह पितरोंकी पुष्टि नहीं

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 74

ब्राह्मण्युवाच माण्डव्येन महाभागे ! शप्तो भर्ता ममेश्वरः ।सूर्योदये विनाशं त्वं प्राप्स्यसीत्यतिमन्युना

brāhmaṇyuvāca māṇḍavyena mahābhāge ! śapto bhartā mameśvaraḥ / sūryodaye vināśaṃ tvaṃ prāpsyasītyatimanyunā

हिन्दी अर्थ

करती। इसलिये श्राद्धमें ऐसी वस्तुका त्याग करना चाहिए। रजस्वला स्त्रीकी दृष्टि श्राद्धमें वर्जित है। संन्यासी और जुआरियोंका आना-जाना भी रोकना चाहिए। जिसमें बाल और कीड़े पड़ गये हों, जिसे कुत्तोंने देख लिया हो, जो बासी एवं दुर्गन्धित हो--ऐसी वस्तुका श्राद्धमें उपयोग न करे। बैंगन और

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 75

अनसूयोवाच यदि वा रोचते भद्रे ! ततस्त्वद्वचनादहम् ।करोमि पूर्ववद्देहं भर्तारञ्च नवं तव

anasūyovāca yadi vā rocate bhadre ! tatastvadvacanādaham / karomi pūrvavaddehaṃ bhartārañca navaṃ tava

हिन्दी अर्थ

शराबका भी त्याग करे। जिस अन्नपर पहने हुए वस्त्रकी हवा लग जाय, वह भी भ्राद्धमें वर्जित है।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 76

मया हि सर्वथा स्त्रीणां माहात्म्यं वरवर्णिनि ।पतिव्रतानामाराध्यमिति संमानयामि ते

mayā hi sarvathā strīṇāṃ māhātmyaṃ varavarṇini / pativratānāmārādhyamiti saṃmānayāmi te

हिन्दी अर्थ

पितरोंको उनके नाम और गोत्रका उच्चारण करके पूर्ण श्रद्धाके साथ जो कुछ दिया जाता है, वह वे जैसा आहार करते होते हैं, उसी रूपमें उन्हें प्राप्त होता है। इसलिये पितरोंकी तृप्ति चाहनेवाले श्रद्धालु पुरुषको उचित है कि जो वस्तु उत्तम हो, वही श्राद्धमें सुपात्र ब्राह्मणको दान करे। विद्वान् पुरुष योगी

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 77

पुत्र उवाच तथेत्युक्ते तया सूर्यमाजुहाव तपस्विनी ।अनसूयार्घ्यमुद्यम्य दशरात्रे तदा निशि

putra uvāca tathetyukte tayā sūryamājuhāva tapasvinī / anasūyārghyamudyamya daśarātre tadā niśi

हिन्दी अर्थ

पुरुषोंको सदा ही श्राद्धमें भोजन कराये; क्योंकि पितरोंका आधार योग ही है। इसलिये योगियोंका सर्वदा पूजन करे। हजार ब्राह्मणोंकी अपेक्षा यदि एक ही योगीको पहले भोजन करा दिया जाय तो वह पानीसे नौकाकी भाँति यजमान और श्राद्धभोजी ब्राह्मणोंका भवसागरसे उद्धार कर देता है। इस विषयमें

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 78

ततो विवस्वान् भगवान् फुल्लपद्मारुणाकृतिः ।शैलराजानमुदयमारुरोहोरुमण्डलः

tato vivasvān bhagavān phullapadmāruṇākṛtiḥ / śailarājānamudayamārurohorumaṇḍalaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मवगादी पुरुष उस पितृगाथाका गान किया करते हैं, जिसे पूर्वकालमें राजा पुरूरवाके पितरोंने गाया था। “हमारी वंशपरम्परामें किसीको ऐसा श्रेष्ठ पुत्र कब उत्पन्न होगा, जो योगियोंको भोजन करानेसे बचे हुए अन्नको लेकर पृथ्वीपर हमारे लिये पिण्ड देगा। अथवा गयामें जाकर उत्तम हविष्यका पिण्ड, सामयिक

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 79

समनन्तरमेवास्या भर्ता प्राणैर्व्ययुज्यत ।पपत च महीपृष्ठे पतन्तं जगृहे च सा

samanantaramevāsyā bhartā prāṇairvyayujyata / papata ca mahīpṛṣṭhe patantaṃ jagṛhe ca sā

हिन्दी अर्थ

शाक एवं तिल-मिली हुई खिचड़ी देगा। ये वस्तुएँ हमें एक मासतक तृप्त रखनेवाली हैं। त्रयोदशी तिथि और मघा नक्षत्रमें विधिपूर्वक श्राद्ध करे तथा दक्षिणायनमें मधु और घीसे मिली हुई खीर दे।'

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 80

अनसूयोवाच न विषादस्त्वया भद्रे ! कर्तव्यः पश्य मे बलम् ।पतिशुश्रूषयावाप्तं तपसः किं चिरेण ते

anasūyovāca na viṣādastvayā bhadre ! kartavyaḥ paśya me balam / patiśuśrūṣayāvāptaṃ tapasaḥ kiṃ cireṇa te

हिन्दी अर्थ

इसलिये पुत्र! सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति तथा पापसे मुक्ति चाहनेवाले प्रत्येक मनुष्यको उचित है कि वह भक्तिपूर्वक पितरोंकी पूजा करे। श्राद्धमें तृप्त किये हुए पितर मनुष्योंपर वसु, रुद्र, आदित्य, नक्षत्र, ग्रह और तारोंकी प्रसन्नताका संपादन करते हैं। श्राद्धमें तृप्त पितर आयु, प्रज्ञा, धन, विद्या, स्वर्ग,

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 81

यथा भर्तृसमं नान्यमपश्यं पुरुषं क्वचित् ।रूपतः शीलतो बुद्ध्या वाङ्माधुर्ंय्यादिभूषणैः

yathā bhartṛsamaṃ nānyamapaśyaṃ puruṣaṃ kvacit / rūpataḥ śīlato buddhyā vāṅmādhurṃyyādibhūṣaṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

मोक्ष, सुख तथा राज्य प्रदान करते हैं।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 82

तेन सत्येन विप्रो ऽयं व्याधिमुक्तः पुनर्युवा ।प्राप्नोतु जीवितं भार्यासहायः शरदां शतम्

tena satyena vipro 'yaṃ vyādhimuktaḥ punaryuvā / prāpnotu jīvitaṃ bhāryāsahāyaḥ śaradāṃ śatam

हिन्दी अर्थ

बेटा! इस प्रकार गृहस्थ पुरुषको हव्यसे देवताओंका, कव्य (श्राद्ध)से पितरोंका और अन्नसे अतिथियों एवं भाई-बन्धुओंका पूजन करना चाहिए। इनके सिवा भूत, प्रेत, समस्त भृत्यगण, पशु-पक्षी, चींटी, वृक्ष तथा अन्यान्य याचकोंकी तृप्ति भी सदाचारी गृहस्थ पुरुषको करनी चाहिए। जो नित्य-

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 83

यथा भर्तृसमं नान्यमहं पश्यामि दैवतम् ।तेन सत्येन विप्रो ऽयं पुनर्जोवत्वनामयः

yathā bhartṛsamaṃ nānyamahaṃ paśyāmi daivatam / tena satyena vipro 'yaṃ punarjovatvanāmayaḥ

हिन्दी अर्थ

नैमित्तिक क्रियाओंका उल्लड्घन करके पूजन करता है, वह पाप भोगता है।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 84

कर्मणा मनसा वाचा भर्तुराराधनं प्रति ।यथा ममोद्यमो नित्यं तथायं जीवतां द्विजः

karmaṇā manasā vācā bharturārādhanaṃ prati / yathā mamodyamo nityaṃ tathāyaṃ jīvatāṃ dvijaḥ

हिन्दी अर्थ

अलर्क बोले--माताजी! आपने पुरुषके नित्य, नैमित्तिक तथा नित्य- नैमित्तिक--ये तीन प्रकारके कर्म बतलाये। अब मैं आपके मुँहसे सदाचारका

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 85

पुत्र उवाच ततो विप्रः समुत्तस्थौ व्याधिमुक्तः पुनर्युवा ।स्वभाभिर्भासयन् वेश्म वृन्दारक इवाजरः

putra uvāca tato vipraḥ samuttasthau vyādhimuktaḥ punaryuvā / svabhābhirbhāsayan veśma vṛndāraka ivājaraḥ

हिन्दी अर्थ

वर्णन सुनना चाहता हूँ, जिसका पालन करनेवाला मनुष्य इस लोक और परलोकमें भी सुख पाता है।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 86

ततो ऽपतत् पुष्पवृष्टिर्देववाद्यादिनिस्वनः ।लेभिरे च मुदं देवा अनसूयामथाब्रुवन्

tato 'patat puṣpavṛṣṭirdevavādyādinisvanaḥ / lebhire ca mudaṃ devā anasūyāmathābruvan

हिन्दी अर्थ

मदालसाने कहा--बेटा! गृहस्थ पुरुषको सदा ही सदाचारका पालन करना चाहिए। आचारहीन मनुष्यको न इस लोकमें सुख मिलता है, न परलोकमें। जो सदाचारका उल्लड्घन करके मनमाना बर्ताव करता है, उस पुरुषका कल्याण यज्ञ, दान और तपस्यासे भी नहीं होता। दुराचारी पुरुषको इस लोकमें बड़ी आयु

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 87

देवा ऊचुः वरं वृणीष्व कल्याणि देवकार्यं महत् कृतम् ।त्वया यस्मात् ततो देवा वरदास्ते तपस्विनि

devā ūcuḥ varaṃ vṛṇīṣva kalyāṇi devakāryaṃ mahat kṛtam / tvayā yasmāt tato devā varadāste tapasvini

हिन्दी अर्थ

नहीं मिलती। अतः सदाचारके पालनका सदा ही यत्न करे। सदाचार बुरे लक्षणोंका नाश करता है। वत्स! अब मैं सदाचारका स्वरूप बतलाती हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो और उसका पालन करो। गृहस्थको धर्म, अर्थ और काम --तीनों साधनका यत्न करना चाहिए। उनके सिद्ध होनेपर उसे इस लोक और

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 88

अनसूयोवाच यदि देवाः प्रसन्ना मे पितामहपुरोगमाः ।वरदा वरयोग्या च यद्यहं भवतां मता

anasūyovāca yadi devāḥ prasannā me pitāmahapurogamāḥ / varadā varayogyā ca yadyahaṃ bhavatāṃ matā

हिन्दी अर्थ

परलोकमें भी सिद्धि प्राप्त होती है। मनको वशमें करके अपनी आयका एक चौथाई भाग पारलौकिक लाभके लिये संगृहीत करे। आधे भागसे नित्य- नैमित्तिक कार्योंका निर्वाह करते हुए अपना भरण-पोषण करे तथा एक चौथाई भाग अपने लिये मूल पूँजीके रूपमें रखकर उसे बढ़ावे। बेटा! ऐसा करनेसे धन

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 89

तद्यान्तु मम पुत्रत्वं ब्रह्म-विष्णु-महेश्वराः ।योगञ्च प्राप्नुयां भर्तृसहिता क्लेशमुक्तये

tadyāntu mama putratvaṃ brahma-viṣṇu-maheśvarāḥ / yogañca prāpnuyāṃ bhartṛsahitā kleśamuktaye

हिन्दी अर्थ

सफल होता है। इसी प्रकार पापकी निवृत्ति तथा पारलौकिक उजन्नतिके लिये विद्वान् पुरुष धर्मका अनुष्ठान करे। ब्राह्ममुहूर्तमें उठे। उठकर धर्म और अर्थका चिन्तन करे। अर्थके कारण जो शरीरको कष्ट उठाना पड़ता है, उसका भी विचार करे। फिर वेदके तात्विक अर्थ--परब्रह्म परमात्माका स्मरण करे। इसके

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

अध्याय १६

श्लोक 90

एवमस्त्विति तां देवा ब्रह्म-विष्णु-शिवादयः ।प्रोक्त्वा जग्मुर्यथान्यायमनुमान्य तपस्विनीम्

evamastviti tāṃ devā brahma-viṣṇu-śivādayaḥ / proktvā jagmuryathānyāyamanumānya tapasvinīm

हिन्दी अर्थ

बाद शयनसे उठकर नित्यकर्मसे निवृत्त हो, स्नान आदिसे पवित्र होकर मनको संयममें रखते हुए पूर्वाभिमुख बैठे और आचमन करके सन्ध्योपासन करे। प्रातःकालकी सन्ध्या उस समय आरम्भ करे, जब तारे दिखायी देते हों। इसी प्रकार सायंकालकी सन्ध्योपासना सूर्यास्तसे पहले ही विधिपूर्वक आरम्भ करे।

English

king. And the men who shall worship me with perfumes, garlands and such like, with offerings also of meat and strod

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 16
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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