Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
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अध्याय 15 / 90

Adhyaya 15

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अध्याय १५

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे जडोपाख्याने यमकिङ्करसंवादो नाम चतुर्दशो ऽध्यायः पञ्चदशो ऽध्यायः यमकिङ्कर उवाच पतितात् प्रतिगृह्यार्थं खरयोनिं व्रजेद् द्विजः ।नरकात् प्रतिमुक्तस्तु कृमिः पतितयाजकः

iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe jaḍopākhyāne yamakiṅkarasaṃvādo nāma caturdaśo 'dhyāyaḥ pañcadaśo 'dhyāyaḥ yamakiṅkara uvāca patitāt pratigṛhyārthaṃ kharayoniṃ vrajed dvijaḥ / narakāt pratimuktastu kṛmiḥ patitayājakaḥ

हिन्दी अर्थ

पतिके यों कहनेपर श्रेष्ठ नारी मदालसा अपने पुत्र अलर्कको बहलाती हुई इस प्रकार

English

Thus interrogated then by that high-souled king in oi hearing, Yama’s officer, though dreadful, with modest gpeec replied.

अध्याय १५

श्लोक 2

उपाध्यायव्यलीकन्तु कृत्वा श्वा भवति द्विजः ।तज्जायां मनसावाञ्छन् तद्द्रव्यञ्चाप्यसंशयम्

upādhyāyavyalīkantu kṛtvā śvā bhavati dvijaḥ / tajjāyāṃ manasāvāñchan taddravyañcāpyasaṃśayam

हिन्दी अर्थ

धर्मात् फल प्राप्स्यसि चामरत्वम् ।।

English

" Mahdr^ja! it is even as thou hast said, undonbtedl Nevertheless thou didst commit, Sir! a very trifling misdeed

अध्याय १५

श्लोक 3

गर्दभो जायते जन्तुः पित्रोश्चाप्यवमानकः ।मातापितरावाक्रुश्य शारिका सम्प्रजायते

gardabho jāyate jantuḥ pitroścāpyavamānakaḥ / mātāpitarāvākruśya śārikā samprajāyate

हिन्दी अर्थ

परापवादश्रवणाद्धिभी था

English

I will recall it to thy mind. The wife whom thou hadst, princess of Vidarbha, named Pivari, — her season of aptitud for sexual intercourse was formerly rendered barren by tliei

अध्याय १५

श्लोक 4

भ्रातुः पत्न्यवमन्ता च कपोतत्वं प्रपद्यते ।तामेव पीडयित्वा तु कच्छपत्वं प्रपद्यते

bhrātuḥ patnyavamantā ca kapotatvaṃ prapadyate / tāmeva pīḍayitvā tu kacchapatvaṃ prapadyate

हिन्दी अर्थ

बेटा! तू धन्य है, जो शत्रुरहित होकर अकेला ही चिरकालतक इस पृथ्वीका पालन करता रहेगा। पृथ्वीके पालनसे तुझे सुखभोगकी प्राप्ति हो और धर्मके फलस्वरूप तुझे अमरत्व मिले। पर्वोके दिन ब्राह्मणोंको भोजनके द्वारा तृप्त करना, बन्धु-बान्धवोंकी इच्छा पूर्ण करना, अपने हृदयमें दूसरोंकी भलाईका ध्यान रखना और परायी स्त्रियोंकी ओर कभी

English

who wast enamoured of the resplendent Kaikeyi; hence fc

अध्याय १५

श्लोक 5

भर्तृपिण्डमुपाश्नन् यस्तदिष्टं न निषेवते ।सो ऽपि मोहसमापन्नो जायते वानरो मृतः

bhartṛpiṇḍamupāśnan yastadiṣṭaṃ na niṣevate / so 'pi mohasamāpanno jāyate vānaro mṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

मनको न जाने देना। अपने मनमें सदा श्रीविष्णुभगवान्का चिन्तन करना, उनके ध्यानसे अन्त:ःकरणके काम-क्रोध आदि छहों शत्रुओंको जीतना, ज्ञानके द्वारा मायाका निवारण करना और जगत्की अनित्यताका विचार करते रहना। धनकी आयके लिये राजाओंपर विजय प्राप्त करना, यशके लिये धनका सद्व्यय करना, परायी निनन्‍्दा सुननेसे डरते रहना

English

approved season. A righteous man who disregarding tha season., may become absorbed in objects of desire, would sti] incur sin by reason of the debt due to his ancestors an

अध्याय १५

श्लोक 6

न्यासापहर्ता नरकाद्विमुक्तो जायते कृमिः ।असूयकश्च नरकान्मुक्तो भवति राक्षसः

nyāsāpahartā narakādvimukto jāyate kṛmiḥ / asūyakaśca narakānmukto bhavati rākṣasaḥ

हिन्दी अर्थ

तथा विपत्तिके समुद्रमें पड़े हुए लोगोंका उद्धार करना। वीर! तू अनेक यज्ञोंके द्वारा देवताओंको तथा धनके द्वारा ब्राह्मणों एवं शरणागतोंको सन्तुष्ट करना। कामनापूर्तिके द्वारा स्त्रियोंको प्रसन्न रखना और युद्धके द्वारा शत्रुओंके छक्के छुड़ाना। बाल्यावस्थामें तू भाई-बन्धुओंको आनन्द देना, कुमारावस्थामें

English

approved season. A righteous man who disregarding tha season., may become absorbed in objects of desire, would sti] incur sin by reason of the debt due to his ancestors an

अध्याय १५

श्लोक 7

विश्वासहन्ता च नरो मीनयोनौ प्रजायते ।धान्यं यवांस्तिलान् माषान् कुलत्थान् सर्षपांश्चणान्

viśvāsahantā ca naro mīnayonau prajāyate / dhānyaṃ yavāṃstilān māṣān kulatthān sarṣapāṃścaṇān

हिन्दी अर्थ

आज्ञापालनके द्वारा गुरुजनोंको सन्तुष्ट रखना। युवावस्थामें उत्तम कुलको सुशोभित करनेवाली स्त्रीको प्रसन्न रखना और वृद्धावस्थामें वनके भीतर निवास करते हुए वनवासियोंको सुख देना।

English

would fall into hell. Such indeed was thy sin; naugh else is found; come then! go, 0 king, to the enjoyment of th, meritorious acts."

अध्याय १५

श्लोक 8

कलायान कलमान् मुद्गान् गोधूमानतसीस्तथा ।शस्यान्यन्यानि वा हृत्वा मोहाज्जन्तुरचेतनः

kalāyāna kalamān mudgān godhūmānatasīstathā / śasyānyanyāni vā hṛtvā mohājjanturacetanaḥ

हिन्दी अर्थ

साधून् रक्ष॑स्तात यज्ञैर्यजेथा: ।

English

"I will go, 0 servant of the god, where thou shalt lead me Something I ask, deign to declare it to me aright. Tlies<

अध्याय १५

श्लोक 9

सञ्जायते महावक्त्रो मूषिको बभ्रुसन्निभः ।परदाराभिमर्षात्तु वृको घोरो ऽभिजायते

sañjāyate mahāvaktro mūṣiko babhrusannibhaḥ / paradārābhimarṣāttu vṛko ghoro 'bhijāyate

हिन्दी अर्थ

तात! राज्य करते हुए अपने सुहृदोंको प्रसन्न रखना, साधु पुरुषोंकी रक्षा करते हुए यज्ञोंद्वार भगवानका यजन करना, संग्राममें दुष्ट शत्रुओंका संहार करते हुए गौ और ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये अपने प्राण निछावर कर देना।

English

crows with adamant beaks are tearing out men's eyes; and these men are having their eyes renewed again and again.

अध्याय १५

श्लोक 10

श्वा शृगालो वको गृध्रो व्याडः कङ्कस्तथा क्रमात् ।भ्रातृभार्याञ्च दुर्बुद्धिर्यो धर्षयति पापकृत्

śvā śṛgālo vako gṛdhro vyāḍaḥ kaṅkastathā kramāt / bhrātṛbhāryāñca durbuddhiryo dharṣayati pāpakṛt

हिन्दी अर्थ

मदालसाका अलर्कको राजनीतिका उपदेश

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 11

पुंस्कोकिलत्वमाप्नोति स चापि नरकाच्च्युतः ।सखिभार्यां गुरोर्भार्यां राजभार्याञ्च पापकृत्

puṃskokilatvamāpnoti sa cāpi narakāccyutaḥ / sakhibhāryāṃ gurorbhāryāṃ rājabhāryāñca pāpakṛt

हिन्दी अर्थ

सुमति कहते हैं--इस प्रकार माताके द्वारा प्रतेदिन बहलाया जाता हुआ बालक अलर्क कुछ बड़ी अवस्थाको प्राप्त हुआ। कुमारावस्थामें पहुँचनेपर उसका उपनयन-संस्कार हुआ। तत्पश्चात् उस बुद्धिमान् राजकुमारने माताको प्रणाम करके कहा--'माँ! मुझे इस लोक और परलोकमें सुख प्राप्त करनेके

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 12

प्रधर्षयित्वा कामात्मा शूकरो जायते नरः ।यज्ञ-दान-विवाहानां विघ्रकर्ता भवेत् कृमिः

pradharṣayitvā kāmātmā śūkaro jāyate naraḥ / yajña-dāna-vivāhānāṃ vighrakartā bhavet kṛmiḥ

हिन्दी अर्थ

लिये यहाँ क्या करना चाहिए? यह सब मुझे बताओ।'

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 13

पुनर्दात् च कन्यायाः कृमिरेवोपजायते ।देवता-पितृ-विप्राणामदत्वा यो ऽन्नमश्नुते

punardāt ca kanyāyāḥ kṛmirevopajāyate / devatā-pitṛ-viprāṇāmadatvā yo 'nnamaśnute

हिन्दी अर्थ

मदालसा बोली--बेटा! राज्याभिषेक होनेपर राजाको उचित है कि वह अपने धर्मके अनुकूल चलता हुआ आरम्भसे ही प्रजाको प्रसन्न रखे। सातों व्यसनोंका परित्याग कर दे; क्योंकि वे राजाका मूलोच्छेद करनेवाले हैं। अपनी गुप्त मन्त्रणाके बाहर फूटनेसे उसके द्वारा लाभ उठाकर शत्रु आक्रमण कर देते

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 14

प्रमुक्तो नरकात् सो ऽपि वायसः सम्प्रजायते ।ज्येष्ठं पितृसमं वापि भ्रातरं यो ऽवमन्यते

pramukto narakāt so 'pi vāyasaḥ samprajāyate / jyeṣṭhaṃ pitṛsamaṃ vāpi bhrātaraṃ yo 'vamanyate

हिन्दी अर्थ

हैं; अत: ऐसा न होने देकर शत्रुओंसे अपनी रक्षा करे। जैसे रथी रथकी गति वक्र होनेपर आठों प्रकारसे नाशको प्राप्त होता है, उसके ऊपर आठों दिशाओंसे प्रहार होने लगते हैं, उसी प्रकार गुप्त मन्त्रणाके बाहर फ़ूटनेपर राजाके आठों+ वर्गोंका निश्चय ही नाश होता है। राजाको इस बातका भी पता लगाते रहना

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 15

नरकात् सो ऽपि विभ्रष्टः क्रौञ्चयोनौ प्रजायते ।शूद्रश्च ब्राह्मणरिं गत्वा कृमियोनौ प्रजायते

narakāt so 'pi vibhraṣṭaḥ krauñcayonau prajāyate / śūdraśca brāhmaṇariṃ gatvā kṛmiyonau prajāyate

हिन्दी अर्थ

चाहिए कि शत्रुद्वारा उत्पन्न किये गये दोषसे अथवा शत्रुओंके बहकावेमें आकर अपने मन्त्रियोंमेंसे कौन दुष्ट हो गया है और कौन अदुष्ट--कौन अपना साथी है और कौन शत्रुसे मिला हुआ। इसी प्रकार बुद्धिमान् चर नियुक्त करके शत्रुके चरोंपर भी प्रयत्नपूर्वक दृष्टि रखनी चाहिए। राजाको अपने मित्रों तथा माननीय

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 16

तस्यामपत्यमुत्पाद्य काष्ठान्तः कीटको भवेत् ।शूकरः कृमिको मद्गुश्चण्डालश्च प्रजायते

tasyāmapatyamutpādya kāṣṭhāntaḥ kīṭako bhavet / śūkaraḥ kṛmiko madguścaṇḍālaśca prajāyate

हिन्दी अर्थ

बन्धु-बान्धवोंपर भी पूर्णतः विश्वास नहीं करना चाहिए। किन्तु काम आ पड़नेपर उसे शत्रुपर भी विश्वास कर लेना चाहिए। किस अवस्थामें शत्रुपर चढ़ाई न करके अपने स्थानपर स्थित रहना उचित है, क्या करनेसे अपनी वृद्धि होगी और किस कार्यसे अपनी हानि होनेकी सम्भावना है--इन सब बातोंका

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 17

अकृतज्ञो ऽधमः पुंसां विमुक्तो नरकान्नरः ।कृतघ्रः कृमिकः कीटः पतङ्गो वृश्चिकस्तथा

akṛtajño 'dhamaḥ puṃsāṃ vimukto narakānnaraḥ / kṛtaghraḥ kṛmikaḥ kīṭaḥ pataṅgo vṛścikastathā

हिन्दी अर्थ

राजाको ज्ञान होना चाहिए। वह छ:3 गुणोंका उपयोग करना जाने और कभी कामके अधीन न हो। राजा पहले अपने आत्माको, फिर मन्त्रियोंको जीते। तत्पश्चात् अपनेसे भरण-पोषण पानेवाले कुट॒म्बीजनों एवं सेवकोंके हृदयपर अधिकार प्राप्त करे। तदनन्तर पुरवासियोंको अपने गुणोंसे जीते। यह सब हो

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 18

मत्स्यस्तु वायसः कूर्मः पुक्कसो जायते ततः ।अशस्त्रं पुरुषं हत्वा नरः सञ्जायते खरः

matsyastu vāyasaḥ kūrmaḥ pukkaso jāyate tataḥ / aśastraṃ puruṣaṃ hatvā naraḥ sañjāyate kharaḥ

हिन्दी अर्थ

जानेपर शत्रुओंके साथ विरोध करे। जो इन सबको जीते बिना ही शत्रुओंपर विजय पाना चाहता है, वह अपने आत्मा तथा मन्त्रियोंपर अधिकार न रखनेके

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 19

कृमिः स्त्रीवधकर्ता च बालहन्ता च जायते ।भोजनं चोरयित्वा तु मक्षिका जायते नरः

kṛmiḥ strīvadhakartā ca bālahantā ca jāyate / bhojanaṃ corayitvā tu makṣikā jāyate naraḥ

हिन्दी अर्थ

कारण शत्रुसमुदायके वशमें पड़कर कष्ट भोगता है।-

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 20

तत्राप्यस्ति विशेषो वै भोजनस्य शृणुष्व तत् ।ह्त्वान्नन्तु स मार्जारो जायते नरकाच्च्युतः

tatrāpyasti viśeṣo vai bhojanasya śṛṇuṣva tat / htvānnantu sa mārjāro jāyate narakāccyutaḥ

हिन्दी अर्थ

इसलिये बेटा! पृथ्वीका पालन करनेवाले राजाको पहले काम आदि शत्रुओंको जीतनेकी चेष्टा करनी चाहिए। उनके जीत लेनेपर विजय अवश्यम्भावी है। यदि राजा ही उनके वशमें हो गया तो वह नष्ट हो जाता है। काम, क्रोध, लोभ, मद, मान और हर्ष--ये राजाका विनाश करनेवाले शत्रु हैं।

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 21

तिलपिण्याकसंमिश्रमन्नं हृत्वा तु मूषिकः ।घृतं हृत्वा च नकुलः काको मद्गुरजामिषम्

tilapiṇyākasaṃmiśramannaṃ hṛtvā tu mūṣikaḥ / ghṛtaṃ hṛtvā ca nakulaḥ kāko madgurajāmiṣam

हिन्दी अर्थ

राजा पाण्डु काममें आसक्त होनेके कारण मारे गये तथा अनुह्ाद क्रोधके कारण ही अपने पुत्रसे हाथ धो बैठा। यह विचारकर अपनेको काम और क्रोधसे अलग रखे। राजा पुरूरवा लोभसे मारे गये और वेनको मदके कारण ही ब्राह्मणोंने मार डाला। अनायुषके पुत्रको मानके कारण प्राणोंसे हाथ धोना पड़ा तथा

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 22

मत्स्यमांसापहृत् काकः श्येनो मार्गामिषापहृत् ।वीचीकाकस्त्वपहृते लवणे दधनि कृमिः

matsyamāṃsāpahṛt kākaḥ śyeno mārgāmiṣāpahṛt / vīcīkākastvapahṛte lavaṇe dadhani kṛmiḥ

हिन्दी अर्थ

पुरण्जयकी मृत्यु हर्षके कारण हुई; किन्तु महात्मा मरुत्तने इन सबको जीत लिया था, इसलिये वे सम्पूर्ण विश्वपर विजयी हुए। यह सोचकर राजा उपर्युक्त दोषोंका सर्वथा त्याग करे। वह कौवे, कोयल, भौंरे, हरिन, साँप, मोर, हंस, मुर्गे और लोहेके व्यवहारसे शिक्षा ग्रहण करे। राजा अपने शत्रुके प्रति उल्लूका-सा

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 23

चोरयित्वा पयश्चापि बलाका सम्प्रजायते ।यस्तु चोरयते तैलं तैलपायी स जायते

corayitvā payaścāpi balākā samprajāyate / yastu corayate tailaṃ tailapāyī sa jāyate

हिन्दी अर्थ

बर्ताव करे। जैसे उल्लू पक्षी रातमें सोये कौओंपर चुपचाप धावा करता है, उसी प्रकार राजा शत्रुकी असावधान-दशामें ही उसपर आक्रमण करे तथा

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 24

मधु हृत्वा नरो दंशः पूपं हृत्वा पिपीलिकः ।चोरयित्वा तु निष्पावान् जायते गृहगोलकः

madhu hṛtvā naro daṃśaḥ pūpaṃ hṛtvā pipīlikaḥ / corayitvā tu niṣpāvān jāyate gṛhagolakaḥ

हिन्दी अर्थ

समयानुसार चींटीकी-सी चेष्टा करे--धीरे-धीरे आवश्यक वस्तुओंका संग्रह

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 25

आसवं चोरयित्वा तु तित्तिरित्वमवाप्नुयात् ।अयो हृत्वा तु पापात्मा वायसः सम्प्रजायते

āsavaṃ corayitvā tu tittiritvamavāpnuyāt / ayo hṛtvā tu pāpātmā vāyasaḥ samprajāyate

हिन्दी अर्थ

राजाको आगकी चिनगारियों तथा सेमलके बीजसे कर्तव्यकी शिक्षा लेनी चाहिए। जैसे आगकी छोटी-सी चिनगारी बड़े-से-बड़े वनको जला डालनेकी शक्ति रखती है, उसी प्रकार छोटा-सा शत्रु भी यदि दबाया न जाय तो बहुत बड़ी हानि कर सकता है। जैसे छोटा-सा सेमलका बीज एक महान वृक्षके रूपमें

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 26

हृते कांस्ये च हारीतः कपोतो रुप्यभाजने ।हृत्वा तु काञ्चनं भाण्डं कृमियोनौ प्रजायते

hṛte kāṃsye ca hārītaḥ kapoto rupyabhājane / hṛtvā tu kāñcanaṃ bhāṇḍaṃ kṛmiyonau prajāyate

हिन्दी अर्थ

परिणत होता है, उसी प्रकार लघु शत्रु भी समय आनेपर अत्यन्त प्रबल हो जाता है। अतः दुर्बलावस्थामें ही उसे उखाड़ फेंकना चाहिए। जैसे चन्द्रमा और सूर्य अपनी किरणोंका सर्वत्र समान रूपसे प्रसार करते हैं, उसी प्रकार नीतिके लिये राजाको भी समस्त प्रजापर समान भाव रखना चाहिए। वेश्या, कमल, शरभ,

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 27

पत्रोर्णं चोरयित्वा तु क्रकरत्वञ्च गच्छति ।कोषकारश्च कौषेये हृते वस्त्रे ऽभिजायते

patrorṇaṃ corayitvā tu krakaratvañca gacchati / koṣakāraśca kauṣeye hṛte vastre 'bhijāyate

हिन्दी अर्थ

शूलिका, गर्भिणी स्त्रीके स्तन तथा ग्वालेकी स्त्रीसे भी राजाको बुद्धि सीखनी चाहिए। राजा वेश्याकी भाँति सबको प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करे, कमल-पुष्पके समान सबको अपनी ओर आकृष्ट करे, शरभके समान पराक्रमी बने, शूलिकाकी भाँति सहसा शत्रुका विध्वंस करे। जैसे गर्भिणीके स्तनमें भावी

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 28

दुकूले शार्ङ्गकः पापो हृते चैवांशुके शुकः ।तथैवाजाविकं हृत्वा वस्त्रं क्षौमं च जायते

dukūle śārṅgakaḥ pāpo hṛte caivāṃśuke śukaḥ / tathaivājāvikaṃ hṛtvā vastraṃ kṣaumaṃ ca jāyate

हिन्दी अर्थ

सन्तानके लिये दूधका संग्रह होने लगता है, उसी प्रकार राजा भविष्यके लिये सञ्चयशील बने और जिस प्रकार ग्वालेकी स्त्री दूधसे नाना प्रकारके खाद्य पदार्थ तैयार करती है, वैसे ही राजाको भी भाँति-भाँतिकी कल्पनामें पटु होना चाहिए। वह पृथ्वीका पालन करते समय इन्द्र, सूर्य, यम, चन्द्रमा तथा वायु--

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 29

कार्पासिके हृते क्रौञ्चो वाल्कहर्ता बकस्तथा ।मयूरो वर्णकान् हृत्वा शाकपत्रं च जायते

kārpāsike hṛte krauñco vālkahartā bakastathā / mayūro varṇakān hṛtvā śākapatraṃ ca jāyate

हिन्दी अर्थ

इन पाँचोंके रूप धारण करे। जैसे इन्द्र चार महीने वर्षा करके पृथ्वीपर रहनेवाले प्राणियोंको तृप्त करते हैं, उसी प्रकार राजा दानके द्वारा प्रजाजनोंको सन्तुष्ट करे। जिस प्रकार सूर्य आठ महीनोंतक अपनी किरणोंसे पृथ्वीका जल सोखते रहते हैं, इसी प्रकार सूक्ष्म उपायोंसे धीरे-धीरे कर आदिका संग्रह करे। जैसे

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 30

जीवज्जीवकतां याति रक्तवस्त्रापहृन्नरः ।छुच्छुन्दरिः शुभान् गन्धान् वासो हृत्वा शशो भवेत्

jīvajjīvakatāṃ yāti raktavastrāpahṛnnaraḥ / chucchundariḥ śubhān gandhān vāso hṛtvā śaśo bhavet

हिन्दी अर्थ

यमराज समय आनेपर प्रिय-अप्रिय सभीको मृत्युपाशमें बाँधते हैं, उसी प्रकार राजा भी प्रिय-अप्रिय तथा साधु और दुष्टके प्रति समान भावसे राजनीतिका प्रयोग करे। जैसे पूर्ण चन्द्रमा देखकर सब मनुष्य प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार जिस राजाके प्रति समस्त प्रजाको समानरूपसे सनन्‍्तोष हो, वही श्रेष्ठ एवं

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 31

षण्ढः फलापहरणात् काष्ठस्य घुणकीटकः ।पुष्पापहृद् दरिद्रश्च पङ्गुर्यानापहृन्नरः

ṣaṇḍhaḥ phalāpaharaṇāt kāṣṭhasya ghuṇakīṭakaḥ / puṣpāpahṛd daridraśca paṅguryānāpahṛnnaraḥ

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमाके व्रतका पालन करनेवाला है। जैसे वायु गुप्तरूपसे समस्त प्राणियोंके भीतर सज्चार करती रहती है, उसी प्रकार राजा भी गुप्तचरके द्वारा पुरवासियों,

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 32

शाकहर्ता च हारीतस्तोयहर्ता च चातकः ।भूहर्ता नरकान् गत्वा रौरवादीन् सुदारुणान्

śākahartā ca hārītastoyahartā ca cātakaḥ / bhūhartā narakān gatvā rauravādīn sudāruṇān

हिन्दी अर्थ

बेटा! जिसके चित्तको दूसरे लोग लोभ, कामना अथवा अर्थसे नहीं खींच सकते, वह राजा स्वर्गलोकमें जाता है। जो अपने धर्मसे विचलित हो कुमार्गपर जानेवाले मूर्ख मनुष्योंको फिर धर्ममें लगाता है, वह राजा स्वर्गमें जाता है।

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 33

तृण-गुल्म-लता-वल्लि-त्वक्सारतरुतां क्रमात् ।प्राप्य क्षीणाल्पपापस्तु नरो भवति वै ततः

tṛṇa-gulma-latā-valli-tvaksāratarutāṃ kramāt / prāpya kṣīṇālpapāpastu naro bhavati vai tataḥ

हिन्दी अर्थ

वत्स! जिसके राज्यमें वर्णधर्म और आश्रमधर्मको हानि नहीं पहुँचती, उसे इस लोक और परलोकमें भी सनातन सुख प्राप्त होता है। स्वयं दुष्टबुद्धि पुरुषोंद्वारा धर्मसे विचलित न होकर ऐसे लोगोंको अपने धर्ममें लगाना ही राजाका सबसे बड़ा कर्तव्य है और यही उसे सिद्धि प्रदान करनेवाला है। राजा सब प्राणियोंका

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 34

कृमिः कीटः पतङ्गो ऽथ पक्षी तोय चरो मृगः ।गोत्वं प्राप्य च चण्डाल-पुक्कसादि जुगुप्सितम्

kṛmiḥ kīṭaḥ pataṅgo 'tha pakṣī toya caro mṛgaḥ / gotvaṃ prāpya ca caṇḍāla-pukkasādi jugupsitam

हिन्दी अर्थ

पालन करनेसे ही कृतकृत्य होता है। जो यत्नपूर्वक भलीभाँति प्रजाका पालन करनेवाला है, वह प्रजाके धर्मका भागी होता है। जो राजा इस प्रकार चारों वर्णोंकी रक्षामें तत्पर रहता है, वह सर्वत्र सुखी होकर विचरता है और अन्तमें उसे इन्द्रलोककी प्राप्ति होती है।-

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 35

पङ्ग्वन्धो वधिरः कुष्ठी यक्ष्मणा च प्रपीडितः ।मुखरोगाक्षिरोगैश्च गुदरोगैश्च बाध्यते

paṅgvandho vadhiraḥ kuṣṭhī yakṣmaṇā ca prapīḍitaḥ / mukharogākṣirogaiśca gudarogaiśca bādhyate

हिन्दी अर्थ

३. कटु वचन बोलना, कठोर दण्ड देना, धनका अपव्यय करना, मदिरा पीना, स्त्रियोंमें आसक्ति रखना, शिकार खेलनेमें व्यर्थ समय लगाना और जूआ खेलना--ये राजाके सात व्यसन हैं।

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 36

अपस्मारी च भवति शूद्रत्वं च स गच्छति ।एष एव क्रमो दृष्टो गोसुवर्णापहारिणाम्

apasmārī ca bhavati śūdratvaṃ ca sa gacchati / eṣa eva kramo dṛṣṭo gosuvarṇāpahāriṇām

हिन्दी अर्थ

२. खेतीकी उन्नति, व्यापारकी वृद्धि, दुर्गनिर्माण, पुल बनाना, जंगलसे हाथी पकड़कर मँगवाना, खानोंपर अधिकार प्राप्त करना, अधीन राजाओंसे कर लेना और निर्जन प्रदेशको आबाद करना--ये आठ वर्ग कहलाते हैं।

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 37

विद्यापहारिणश्चोग्रा निष्क्रयभ्रंशिनो गुरोः ।जायामन्यस्य पुरुषः पारख्यां प्रतिपादयन्

vidyāpahāriṇaścogrā niṣkrayabhraṃśino guroḥ / jāyāmanyasya puruṣaḥ pārakhyāṃ pratipādayan

हिन्दी अर्थ

3. सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय--ये छः गुण हैं। इनमें शत्रुसे मेल रखना सन्धि, उससे लड़ाई छेड़ना विग्रह, आक्रमण करना यान, अवसरकी प्रतीक्षामें बैठे रहना आसन, दुरंगी नीति बरतना द्वैधीभाव और अपनेसे बलवान् राजाकी शरण लेना समाश्रय कहलाता है।

English

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अध्याय १५

श्लोक 38

प्राप्नोति षण्ढतां मूढो यातनाभ्यः परिच्युतः ।यः करोति नरो होममसमिद्धे विभावसौ

prāpnoti ṣaṇḍhatāṃ mūḍho yātanābhyaḥ paricyutaḥ / yaḥ karoti naro homamasamiddhe vibhāvasau

हिन्दी अर्थ

- वत्स राज्येअभिषिक्तेन प्रजारज्जनमादित: । कर्तव्यमविरोधेन स्वधर्मस्य महीभृता ।।

English

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अध्याय १५

श्लोक 39

सो ऽजिर्णव्याधिदुः खार्तो मन्दाग्निः संप्रजायते ।परनिन्दा कृतघ्रत्वं परमर्मावघट्टनम्

so 'jirṇavyādhiduḥ khārto mandāgniḥ saṃprajāyate / paranindā kṛtaghratvaṃ paramarmāvaghaṭṭanam

हिन्दी अर्थ

अष्टधा नाशमाप्रोति स्ववक्रात् स्यन्दनाद्यथा । तथा राजाप्यसन्दिग्धं

English

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अध्याय १५

श्लोक 40

नैष्ठुर्यं निर्घृणत्वञ्च परदारोपसेवनम् ।परस्वहरणाशौचं देवतानाञ्च कुत्सनम्

naiṣṭhuryaṃ nirghṛṇatvañca paradāropasevanam / parasvaharaṇāśaucaṃ devatānāñca kutsanam

हिन्दी अर्थ

विश्वासो न तु कर्तव्यो राज्ञा मित्राप्तबन्धुषु । कार्ययोगादमित्रेडपि विश्वसीत नराधिप: ।। स्थानवृद्धिक्षयज्ञेन श्वैव षाड्गुण्यविदितात्मना । भवितव्य॑ नरेन्द्रेण न कामवशवर्तिना ।।

English

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अध्याय १५

श्लोक 41

निकृत्या कञ्चनं नृणां कार्पण्यं च नृणां वधः ।यानि च प्रतिषिद्धानि तत्प्रवृत्तिश्च सन्तता

nikṛtyā kañcanaṃ nṛṇāṃ kārpaṇyaṃ ca nṛṇāṃ vadhaḥ / yāni ca pratiṣiddhāni tatpravṛttiśca santatā

हिन्दी अर्थ

तात्पर्य यह कि राजा कौवेके समान आलस्यरहित और सावधान हो। जैसे कोयल अपने अण्डेका कौवोंसे पालन कराती है, वैसे ही राजा भी दूसरोंसे अपना कार्य साधन करे। वह भौंरौंके समान रसग्राही और मृगके समान सदा चौकजन्ना रहे। जैसे सर्प बड़ा-बड़ा फन निकालकर दूसरोंको डराता और मेढकको चुपके-से निगल जाता है, उसी प्रकार राजा दूसरोंपर आतड्क जमाये रहे और सहसा आक्रमण करके

English

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अध्याय १५

श्लोक 42

उपलक्ष्याणि जानीयान्मुक्तानां नरकादनु ।दया भूतेषु संवादः परलोकप्रतिक्रिया

upalakṣyāṇi jānīyānmuktānāṃ narakādanu / dayā bhūteṣu saṃvādaḥ paralokapratikriyā

हिन्दी अर्थ

शत्रुको अपने अधीन कर ले। जैसे मोर अपने समेटे हुए पंखको कभी-कभी फैलाता है, उसी प्रकार राजा भी समयानुसार अपने संकुचित सैन्य और बलका विस्तार करे। वह हंसोंके समान नीर-क्षीरका विवेक करनेवाला गुणग्राही हो। मुर्गोंके समान रात रहते ही शयनसे उठकर कर्तव्यका विचार करे और लोहेकी भाँति शत्रुओंके लिये अभेद्य एवं कर्तव्यपालनमें कठोर हो।

English

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अध्याय १५

श्लोक 43

सत्यं भूतहितार्थोक्तिर्वेदप्रामाण्यदर्शनम् ।गुरु-देवर्षि-सिद्धर्षिपूजनं साधुसङ्गमः

satyaṃ bhūtahitārthoktirvedaprāmāṇyadarśanam / guru-devarṣi-siddharṣipūjanaṃ sādhusaṅgamaḥ

हिन्दी अर्थ

२ तस्मात्कामादय: पूर्व जेया: पुत्र महीभुजा तज्जये हि जयोवश्यं राजा नश्यति

English

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अध्याय १५

श्लोक 44

सत्क्रियाभायसनं मैत्रीमिति बुध्यते पण्डितः ।अन्यानि चैव सद्धर्मङ्क्रियाभूतानि यानि च

satkriyābhāyasanaṃ maitrīmiti budhyate paṇḍitaḥ / anyāni caiva saddharmaṅkriyābhūtāni yāni ca

हिन्दी अर्थ

काम: क्रोधश्व लोभश्व मदो मानस्तथैव च हर्षश्न शत्रवो होते विनाशाय महीभूताम् ।। कामप्रसक्तमात्मान॑ स्मृत्वा पाण्डुं निपातितम् । निवर्तयेत्तथा क्रोधादनुहादं हतात्मजम् ।।

English

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अध्याय १५

श्लोक 45

स्वर्गच्युतानां लिङ्गानि पुरुषाणामपापिनाम् ।एतदुद्देशतो राजन् भवतः कथितं मया

svargacyutānāṃ liṅgāni puruṣāṇāmapāpinām / etaduddeśato rājan bhavataḥ kathitaṃ mayā

हिन्दी अर्थ

काककोकिलभृज्णां मृगव्यालशिखण्डिनाम् हंसकुक्कुटलोहानां शिक्षेत चरितं नृप: ।। कौशिकस्य क्रियां कुर्याद् विपक्षे मनुजेश्वर: । चेष्टां पिपीलिकानां च काले भूय:

English

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अध्याय १५

श्लोक 46

स्वकर्मफलभोक्तॄणां पुण्यानां पापिनां तथा ।तदेह्यन्यत्र गच्छामो दृष्टं सर्वं त्वयाधुना ।त्वया दृष्टो हि नरकस्तदेह्यन्यत्र गम्यताम्

svakarmaphalabhoktṝṇāṃ puṇyānāṃ pāpināṃ tathā / tadehyanyatra gacchāmo dṛṣṭaṃ sarvaṃ tvayādhunā / tvayā dṛṣṭo hi narakastadehyanyatra gamyatām

हिन्दी अर्थ

बन्धकीपडद्मशरभशूलिकागुर्विणीस्तनात् । प्रज्ञा नूपेण चादेया तथा गोपालयोषितः ।। शक्रार्कयमसोमानां तद्वद् वायोर्महीपति: । रूपाणि पञ्च कुर्वीत महीपालनकर्मणि ।। यथेन्द्रश्नतुरो मासान् तोयोत्सगेण भूगतम् आप्यामयेत् तथा लोकं परिहारैर्महीपति: ।। मासानष्टौ यथा सूर्यस्तोयं हरति रश्मिभि: । सूक्ष्मेणैवाभ्युपायेन तथा शुल्कादिकं नृप: ।।

English

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अध्याय १५

श्लोक 47

पुत्र उवाच ततस्तमग्रतः कृत्वा स राजा गन्तुमुद्यतः ।ततश्च सर्वैरुत्क्रुष्टं यातनास्थायिभिर्नृभिः

putra uvāca tatastamagrataḥ kṛtvā sa rājā gantumudyataḥ / tataśca sarvairutkruṣṭaṃ yātanāsthāyibhirnṛbhiḥ

हिन्दी अर्थ

यथा यम: प्रियद्वेष्यौ प्राप्तकाले नियच्छति । तथा प्रियाप्रिये राजा दुष्टादुष्टे समो भवेत् ।। पूर्णन्दुमालोक्य यथा प्रीतिमान् जायते नर: । एवं यत्र प्रजा: सर्वा निर्वुतास्तच्छशिव्रतम् ।।

English

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अध्याय १५

श्लोक 48

प्रसादं कुरु भूपेति तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् ।त्वदङ्गसङ्गी पवनो मनो ह्लादयते हि नः

prasādaṃ kuru bhūpeti tiṣṭha tāvanmuhūrtakam / tvadaṅgasaṅgī pavano mano hlādayate hi naḥ

हिन्दी अर्थ

-न लोभाद्वा न कामद्वा नार्थाद्वा यस्य मानसम् । यथान्यै: कृष्यते वत्स स राजा

English

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अध्याय १५

श्लोक 49

परितापञ्च गात्रेभ्यः पीडाबाधाश्च कृत्स्नशः ।अपहन्ति नरव्याघ्र यदां कुर महीपते

paritāpañca gātrebhyaḥ pīḍābādhāśca kṛtsnaśaḥ / apahanti naravyāghra yadāṃ kura mahīpate

हिन्दी अर्थ

उत्पथग्राहिणो मूढान् स्वधर्माच्चलितो नरान् । यः करोति निजे धर्मे स राजा

English

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अध्याय १५

श्लोक 50

एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां तं याम्यपुरुषं नृपः ।पप्रच्छ कथमेतेषामाह्लादो मयि तिष्ठति

etacchrutvā vacasteṣāṃ taṃ yāmyapuruṣaṃ nṛpaḥ / papraccha kathameteṣāmāhlādo mayi tiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

वर्णधर्मा न सीदन्ति यस्य राज्ये तथाश्रमा: । वत्स तस्य सुख प्रेत्य परत्रेह च शाश्वतम् ।। एठद्राज्ञ: पर कृत्यं तथैतत् सिद्धिकारकम् स्वधर्मस्थापनं नृणां चाल्यते न कुबुद्धिभि: ।। पालनेनैव भूतानां कृतकृत्यो महीपति: । सम्यक् पालयिता भागं धर्मस्याप्रोति यत्नतः ।। एवं यो वर्तते राजा चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे स सुखी विहरत्येष शक्रस्यैति सलोकताम् ।।

English

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अध्याय १५

श्लोक 51

किं मया कर्म तत् पुण्यं मर्त्यलोके महत् कृतम् ।आह्लाददायिनी व्युष्टिर्येनेयं तदुदीरय

kiṃ mayā karma tat puṇyaṃ martyaloke mahat kṛtam / āhlādadāyinī vyuṣṭiryeneyaṃ tadudīraya

हिन्दी अर्थ

मदालसाके द्वारा वर्णाश्रमधर्म एवं गृहस्थके कर्तव्यका वर्णन

English

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अध्याय १५

श्लोक 52

यमपुरुष उवाच पितृदेवातिथिप्रैष्य-शिष्टेनान्नेन ते तनुः ।पुष्टिमभ्यागता यस्मात् तद्गतं च मनो यतः

yamapuruṣa uvāca pitṛdevātithipraiṣya-śiṣṭenānnena te tanuḥ / puṣṭimabhyāgatā yasmāt tadgataṃ ca mano yataḥ

हिन्दी अर्थ

अलर्कने कहा--महा भागे! आपने राजनीति-सम्बन्धी धर्मका वर्णन किया। अब मैं वर्णाश्रमधर्म सुनना चाहता हूँ।

English

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अध्याय १५

श्लोक 53

ततस्त्वद्गात्रसंसर्गो पवनो ह्लाददायकः ।पापकर्मकृतो राजन् यातना न प्रबाधते

tatastvadgātrasaṃsargo pavano hlādadāyakaḥ / pāpakarmakṛto rājan yātanā na prabādhate

हिन्दी अर्थ

मदालसा बोली--दान, अध्ययन और यज्ञ--ये ब्राह्मणके तीन धर्म हैं तथा यज्ञ कराना, विद्या पढ़ाना और पवित्र दान लेना--यह तीन प्रकारकी उसकी आजीविका बतायी गयी है। दान, अध्ययन और यज्ञ--ये तीन क्षत्रियके भी धर्म हैं। पृथ्वीकी रक्षा तथा शस्त्र ग्रहण करके जीवननिर्वाह करना यह उसकी

English

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अध्याय १५

श्लोक 54

अश्वमेधादयो यज्ञास्त्वयेष्टा विधिवद्यतः ।ततस्त्वद्दर्शनाद्याम्या यन्त्रशस्त्राग्निवायसाः

aśvamedhādayo yajñāstvayeṣṭā vidhivadyataḥ / tatastvaddarśanādyāmyā yantraśastrāgnivāyasāḥ

हिन्दी अर्थ

जीविका है। वैश्यके भी दान, अध्ययन और यज्ञ--ये तीनों ही धर्म हैं। व्यापार, पशुपालन और खेती--ये उसकी जीविका हैं। दान, यज्ञ और द्विजातियोंकी सेवा--यह तीन प्रकारका धर्म शूद्रके लिये बताया गया है। शिल्पकर्म, द्विजातियोंकी सेवा और खरीद-बिक्री--ये उसकी जीविका हैं। इस प्रकार ये

English

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अध्याय १५

श्लोक 55

पीडन-च्छेद-दाहादि-महादुः खस्य हेतवः ।मृदुत्वमागता राजन् तेजसापहतास्तव

pīḍana-ccheda-dāhādi-mahāduḥ khasya hetavaḥ / mṛdutvamāgatā rājan tejasāpahatāstava

हिन्दी अर्थ

वर्णधर्म बतलाये गये हैं। अब आश्रमधर्मोंका वर्णन सुनो। यदि मनुष्य अपने वर्णधर्मसे भ्रष्ट न हो तो वह उसके द्वारा उत्तम सिद्धिको प्राप्त होता है और निषिद्धकर्मोके आचरणसे वह मृत्युके पश्चात् नरकमें पड़ता है।

English

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अध्याय १५

श्लोक 56

राजोवाच न स्वर्गे ब्रह्मलोके वा तत् सुखं प्राप्यते नरैः ।यदार्तजन्तुनिर्वाण-दानोत्थमिति मे मतिः

rājovāca na svarge brahmaloke vā tat sukhaṃ prāpyate naraiḥ / yadārtajantunirvāṇa-dānotthamiti me matiḥ

हिन्दी अर्थ

उपनयन-संस्कार होनेपर ब्रह्मचारी बालक गुरुके घरमें निवास करे। वहाँ उसके लिये जो धर्म बताया गया है, वह सुनो। ब्रह्मचारी वेदोंका स्वाध्याय करे, अन्निहोत्र करे, त्रिकाल स्नान करे, भिक्षाके लिये भ्रमण करे, भिक्षामें मिला हुआ अन्न गुरुको निवेदित करके उनकी आज्ञाके अनुसार ही सदा उसका उपयोग

English

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अध्याय १५

श्लोक 57

यदि मत्सन्निधावेतान् यातना न प्रबाधते ।ततो भद्रमुखात्राहं स्थास्ये स्थाणुरिवाचलः

yadi matsannidhāvetān yātanā na prabādhate / tato bhadramukhātrāhaṃ sthāsye sthāṇurivācalaḥ

हिन्दी अर्थ

करे, गुरुके कार्यमें सदा उद्यत रहे, भलीभाँति उन्हें प्रसन्न रखे, गुरुके बुलानेपर एकाग्रचित्तसे तत्परतापूर्वक पढ़े, गुरुक मुखसे एक-दो या सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके गुरुके चरणोंमें प्रणाम करे और उन्हें गुरुदक्षिणा देकर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करे। इस आश्रममें आनेका उद्देश्य होना चाहिए--गृहस्थाश्रम-सम्बन्धी

English

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अध्याय १५

श्लोक 58

यमपुरुष उवाच एहि राजन् प्रगच्छामो निजपुण्यसमर्जितान् ।भुङ्क्ष्व भोगानपास्येह यातनाः पापकर्मणाम्

yamapuruṣa uvāca ehi rājan pragacchāmo nijapuṇyasamarjitān / bhuṅkṣva bhogānapāsyeha yātanāḥ pāpakarmaṇām

हिन्दी अर्थ

धर्मोका पालन। अथवा अपनी इच्छाके अनुसार वह वानप्रस्थ या संन्यास- आश्रममें प्रवेश करे अथवा वहीं गुरुके घरमें सदा निवास करते हुए ब्रह्मचर्यनिष्ठताको प्राप्त हो--नैष्ठिक ब्रह्मचारी बन जाय। गुरुके न रहनेपर उनके पुत्रकी और पुत्रके न रहनेपर उनके प्रधान शिष्यकी सेवा करे। अभिमानशून्य

English

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अध्याय १५

श्लोक 59

राजोवाच तस्मान्न तावद्यास्यामि यावदेते सुदुः खिताः ।मत्सन्निधानात् सुखिनो भवन्ति नरकौकसः

rājovāca tasmānna tāvadyāsyāmi yāvadete suduḥ khitāḥ / matsannidhānāt sukhino bhavanti narakaukasaḥ

हिन्दी अर्थ

होकर ब्रह्मचर्य-आश्रममें रहे।

English

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अध्याय १५

श्लोक 60

धिक् तस्य जीवनं पुंसः शरणार्थिनमातुरम् ।यो नार्तमनुगृह्णाति वैरिपक्षमपि ध्रुवम्

dhik tasya jīvanaṃ puṃsaḥ śaraṇārthinamāturam / yo nārtamanugṛhṇāti vairipakṣamapi dhruvam

हिन्दी अर्थ

जब गृहस्थाश्रममें आनेकी इच्छा लेकर ब्रह्मचर्य-आश्रमसे निकले, तब अपने अनुरूप नीरोग स्त्रीसे विधिपूर्वक विवाह करे। वह स्त्री अपने समान गोत्र और प्रवरकी न हो। उसके किसी अड़में न्यूनाधिकता अथवा कोई विकार न हो।

English

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अध्याय १५

श्लोक 61

यज्ञ-दान-तपांसीह परत्र च न भूतये ।भवन्ति तस्य यस्यार्त-परित्राणे न मानसम्

yajña-dāna-tapāṃsīha paratra ca na bhūtaye / bhavanti tasya yasyārta-paritrāṇe na mānasam

हिन्दी अर्थ

गृहस्थाश्रमका ठीक-ठीक सजञ्चालन करनेके लिये ही विवाह करना चाहिए। अपने पराक्रमसे धन पैदा करके देवता, पितर एवं अतिथियोंको भक्तिपूर्वक भलीभाँति तृप्त करे तथा अपने आश्रितोंका भरण-पोषण करता रहे। भृत्य, पुत्र, कुलकी स्त्रियाँ, दीन, अन्ध और पतित मनुष्योंको तथा पशु-पक्षियोंको भी

English

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अध्याय १५

श्लोक 62

नरस्य यस्य कठिनं मनो बालातुरादिषु ।वृद्धेषु च न तं मन्ये मानुषं राक्षसो हि सः

narasya yasya kaṭhinaṃ mano bālāturādiṣu / vṛddheṣu ca na taṃ manye mānuṣaṃ rākṣaso hi saḥ

हिन्दी अर्थ

यथाशक्ति अन्न देकर उनका पालन करे। गृहस्थका यह धर्म है कि वह ऋतुकालनमें स्त्री-सलहवास करे। अपनी शक्तिके अनुसार पाँचों यज्ञोंका अनुष्ठान न छोड़े। अपने विभवके अनुसार पितर, देवता, अतिथि एवं कुट॒म्बीजनोंके भोजन करनेसे बचे हुए अन्नको ही स्वयं भृत्यजनोंके साथ बैठकर आदरपूर्वक

English

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अध्याय १५

श्लोक 63

एतेषां सन्निकर्षात् तु यद्यग्निपरितापजम् ।तथोग्रगन्धजं वापि दुः खं नरकसम्भवम्

eteṣāṃ sannikarṣāt tu yadyagniparitāpajam / tathogragandhajaṃ vāpi duḥ khaṃ narakasambhavam

हिन्दी अर्थ

ग्रहण करे। यह मैंने संक्षेपसे गृहस्थाश्रमके धर्मका वर्णन किया है।

English

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अध्याय १५

श्लोक 64

क्षुत्पिपासाभवं दुः खं यच्च मूर्च्छाप्रदं महत् ।एतेषां त्राणदानन्तु मन्ये स्वर्गसुखात् परम्

kṣutpipāsābhavaṃ duḥ khaṃ yacca mūrcchāpradaṃ mahat / eteṣāṃ trāṇadānantu manye svargasukhāt param

हिन्दी अर्थ

अब वानप्रस्थके धर्मका वर्णन करती हूँ, ध्यान देकर सुनो। बुद्धिमान पुरुषको उचित है कि वह अपनी सन्तानको देखकर तथा देह झुकी जा रही है, इस बातका विचार करके आत्मशुद्धिके लिये वानप्रस्थ आश्रममें जाय। वहाँ वनके फल-मूलोंका उपभोग करे और तपस्यासे शरीरको सुखाता रहे। पृथ्वीपर

English

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अध्याय १५

श्लोक 65

प्राप्स्यन्त्यार्ता यदि सुखं बहवो दुः खिते मयि ।किन्नु प्राप्तं मया न स्यात् तस्मात् त्वं व्रज माचिरम्

prāpsyantyārtā yadi sukhaṃ bahavo duḥ khite mayi / kinnu prāptaṃ mayā na syāt tasmāt tvaṃ vraja māciram

हिन्दी अर्थ

सोये, ब्रह्मचर्यका पालन करे, देवताओं, पितरों और अतिथियोंकी सेवामें संलग्न रहे। अग्निहोत्र, त्रिकाल-स्नान तथा जटा-वल्कल धारण करे; सदा योगाभ्यासमें लगा रहे और वनवासियोंपर स्नेह रखे। इस प्रकार यह पापोंकी शुद्धि तथा आत्माका उपकार करनेके लिये वानप्रस्थ-आश्रमका वर्णन किया है।

English

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अध्याय १५

श्लोक 66

यमपुरुष उवाच एष धर्मश्च शक्रश्च त्वां नेतुं समुपागतौ ।अवश्यमस्माद् गन्तव्यं तस्मात् पार्थिव ! गम्यताम्

yamapuruṣa uvāca eṣa dharmaśca śakraśca tvāṃ netuṃ samupāgatau / avaśyamasmād gantavyaṃ tasmāt pārthiva ! gamyatām

हिन्दी अर्थ

अब चतुर्थ आश्रमका स्वरूप बतलाती हूँ, सुनो। धर्मज्ञ महात्माओंने इस आश्रमके लिये जो धर्म बतलाया है, वह इस प्रकार है। सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग, ब्रह्मचर्यका पालन, क्रोधशून्यता, जितेन्द्रियता, एक स्थानपर अधिक दिनोंतक न रहना, किसी कर्मका आरम्भ न करना, भिक्षामें

English

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अध्याय १५

श्लोक 67

धर्म उवाच नयामि त्वामहं स्वर्गं त्वया सम्यगुपासितः ।विमानमेतदारुह्य मा विलम्बस्व गम्यताम्

dharma uvāca nayāmi tvāmahaṃ svargaṃ tvayā samyagupāsitaḥ / vimānametadāruhya mā vilambasva gamyatām

हिन्दी अर्थ

मिले हुए अन्नका एक बार भोजन करना, आत्मज्ञान होनेकी इच्छाको जगाये रखना तथा सर्वत्र आत्माका दर्शन करना। यह मैंने चतुर्थ आश्रमका धर्म

English

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अध्याय १५

श्लोक 68

राजोवाच नरके मानवा धर्म पीड्यन्ते ऽत्र सहस्रशः ।त्राहीति चार्ताः क्रन्दन्ति मामतो न व्रजाम्यहम्

rājovāca narake mānavā dharma pīḍyante 'tra sahasraśaḥ / trāhīti cārtāḥ krandanti māmato na vrajāmyaham

हिन्दी अर्थ

अब अनन्‍्यान्य वर्णों तथा आश्रमोंके सामान्य धर्मका वर्णन सुनो। सत्य, शौच, अहिंसा, दोषदृष्टिका अभाव, क्षमा, क्रूरताका अभाव, दीनताका न होना तथा सनन्‍्तोष धारण करना--ये वर्ण और आश्रमोंके धर्म संक्षेपसे बताये गये हैं। जो पुरुष अपने वर्ण और आश्रम-सम्बन्धी धर्मको छोड़कर उसके विपरीत आचरण

English

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अध्याय १५

श्लोक 69

इन्द्र उवाच कर्मणा नरकप्राप्तिरेतेषां पापकर्मिणाम् ।स्वर्गस्त्वयापि गन्तव्यो नृप ! पुण्येन कर्मणा

indra uvāca karmaṇā narakaprāptireteṣāṃ pāpakarmiṇām / svargastvayāpi gantavyo nṛpa ! puṇyena karmaṇā

हिन्दी अर्थ

करता है, वह राजाके लिये दण्डनीय है। जो मानव अपने धर्मका त्याग करके पापकर्ममें लग जाते हैं, उनकी उपेक्षा करनेवाले राजाके इष्ट४ और आपूर्त- धर्म नष्ट हो जाते हैं।

English

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अध्याय १५

श्लोक 70

राजोवाच यदि जानासि धर्म ! त्वं त्वं वा शक्र ! शचीपते ।मम यावत् प्रमाणन्तु शुभं तद्वक्तुमर्हथः

rājovāca yadi jānāsi dharma ! tvaṃ tvaṃ vā śakra ! śacīpate / mama yāvat pramāṇantu śubhaṃ tadvaktumarhathaḥ

हिन्दी अर्थ

बेटा! गृहस्थ-धर्मका आश्रय लेकर मनुष्य इस सम्पूर्ण जगत्का पोषण करता है और उससे मनोवाञ्छित लोकोंको जीत लेता है। पितर, मुनि, देवता,

English

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अध्याय १५

श्लोक 71

धर्म उवाच अब्बिन्दवो यथाम्भोधौ यथा वा दिवि तारकाः ।यथा वा वर्षता धारा गड्गायां सिकता यथा

dharma uvāca abbindavo yathāmbhodhau yathā vā divi tārakāḥ / yathā vā varṣatā dhārā gaḍgāyāṃ sikatā yathā

हिन्दी अर्थ

भूत, मनुष्य, कृमि, कीट, पतड़, पशु-पक्षी तथा असुर--ये सभी गृहस्थसे ही जीविका चलाते हैं। उसीके दिये हुए अन्न-पानसे तृप्ति लाभ करते हैं तथा “क्या यह हमें भी कुछ देगा?” इस आशासे सदा उसका मुँह ताकते रहते हैं। वत्स! वेदत्रयीरूप धेनु सबकी आधारभूता है, उसीमें सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है तथा

English

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अध्याय १५

श्लोक 72

असंख्येया महाराज यथा बिन्द्वादयो ह्यपाम् ।तथा तवापि पुण्यस्य संख्या नैवोपपद्यते

asaṃkhyeyā mahārāja yathā bindvādayo hyapām / tathā tavāpi puṇyasya saṃkhyā naivopapadyate

हिन्दी अर्थ

वही विश्वकी उत्पत्तिका कारण मानी गयी है। ऋग्वेद उसकी पीठ, यजुर्वेद उसका मध्यभाग तथा सामवेद उसका मुख और गर्दन है। इष्ट और आपूर्त धर्म ही उसके दो सींग हैं। अच्छी-अच्छी सूक्तियाँ ही उस धेनुके रोम हैं, शान्तिकर्म गोबर और पुष्टिकर्म उसका मूत्र है। अकार आदि वर्ण उसके अड़ोंके आधारभूत

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 73

अनुकम्पामिमामद्य नारकेष्विह कुर्वतः ।तदेव शतसाहस्त्रं संख्यामुपगतं तव

anukampāmimāmadya nārakeṣviha kurvataḥ / tadeva śatasāhastraṃ saṃkhyāmupagataṃ tava

हिन्दी अर्थ

चरण हैं। सम्पूर्ण जगत्का जीवन उसीसे चलता है। वह वेदत्रयीरूप धेनु अक्षय है, उसका कभी क्षय नहीं होता। स्वाहा (देवयज्ञ), स्वथा (पितृयज्ञ), वषट्कार (ऋषि आदिकी प्रसन्नताके लिये किये जानेवाले यज्ञ) तथा हन्तकार (अतिथियज्ञ)--ये उसके चार स्तन हैं। स्वाहारूप स्तनको देवता, स्वथधाको

English

And what deed have they done? Explain this abominable thing. Likewise they are tearing out the tongue from these

अध्याय १५

श्लोक 74

तद् गच्छ त्वं नृपश्रेष्ठ तद्भाक्तुममरालयम् ।एते ऽपि पापं नरके क्षपयन्तु स्वकर्मजम्

tad gaccha tvaṃ nṛpaśreṣṭha tadbhāktumamarālayam / ete 'pi pāpaṃ narake kṣapayantu svakarmajam

हिन्दी अर्थ

पितर, वषट्कारको मुनि तथा हन्तकाररूप स्तनको मनुष्य सदा पीते हैं। इस प्रकार यह त्रयीमयी धेनु सबको तृप्त करती है। जो मनुष्य उन देवता आदिकी वृत्तिका उच्छेद करता है, वह अत्यन्त पापाचारी है। उसे अन्धतामिस््र एवं तामिस्र नरकमें गिरना पड़ता है। जो इस धेनुको इसके देवता आदि बछड़ोंसे

English

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अध्याय १५

श्लोक 75

राजोवाच कथं स्पृहां करिष्यन्ति मत्सम्पर्केषु मानवाः ।यदि सत्सन्निधावेषामुकत्कर्षो नोपजायते

rājovāca kathaṃ spṛhāṃ kariṣyanti matsamparkeṣu mānavāḥ / yadi satsannidhāveṣāmukatkarṣo nopajāyate

हिन्दी अर्थ

मिलाता है और उन्हें उचित समयपर पीनेका अवसर देता है, वह स्वर्गमें जाता है। अतः बेटा! जैसे अपने शरीरका पालन-पोषण किया जाता है, उसी प्रकार मनुष्यको प्रतिदिन देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य तथा अन्य भूतोंका भी पोषण करना चाहिए। इसलिये प्रातःकाल स्नान करके पवित्र हो एकाग्रचित्तसे

English

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अध्याय १५

श्लोक 76

तस्माद्यत् सुकृतं किञ्चिन्ममास्ति त्रिदशाधिप ।तेन मुच्यन्तु नरकात् पापिनो यातनां गताः

tasmādyat sukṛtaṃ kiñcinmamāsti tridaśādhipa / tena mucyantu narakāt pāpino yātanāṃ gatāḥ

हिन्दी अर्थ

जलद्वारा देवता, ऋषि, पितर और प्रजापतिका तर्पण करना चाहिए। मनुष्य फूल, गन्ध और धूप आदि सामग्रियोंसे देवताओंकी पूजा करके आहुतिके द्वारा अग्निको तृप्त करे। तत्पश्चात् बलि दे।

English

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अध्याय १५

श्लोक 77

इन्द्र उवाच एवमूर्ध्वतरं स्थानं त्वयावाप्तं महीपते ।एतांश्च नरकात् पश्य विमुक्तान् पापकारिणः

indra uvāca evamūrdhvataraṃ sthānaṃ tvayāvāptaṃ mahīpate / etāṃśca narakāt paśya vimuktān pāpakāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मा और विश्वेदेवोंके उद्देश्यसे घरके मध्यभागमें बलि (पूजोपहार) अर्पण करे। पूर्व और उत्तरके कोणमें मन्वन्तरके लिये बलि प्रस्तुत करे। पूर्व दिशामें इन्द्रको, दक्षिण दिशामें यमको, पश्चिममें वरुणको तथा उत्तरमें सोमको बलि दे। घरके दरवाजेपर धाता और विधाताके लिये बलि अर्पण करे। घरके बाहर चारों

English

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अध्याय १५

श्लोक 78

पुत्र उवाच ततो ऽपतत् पुष्पवृष्टिस्तस्योपरि महीपतेः ।विमानञ्चाधिरोप्यैनं स्वर्लोकमनयद्धरिः

putra uvāca tato 'patat puṣpavṛṣṭistasyopari mahīpateḥ / vimānañcādhiropyainaṃ svarlokamanayaddhariḥ

हिन्दी अर्थ

ओर अर्यमा देवताके निमित्त बलि प्रस्तुत करे। निशाचरों और भूतोंको आकाशमें बलि दे। गृहस्थ पुरुष एकाग्रचित्त हो दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके तत्परतापूर्वक पितरोंके उद्देश्यसे पिण्ड दे। तदनन्तर विद्वान् पुरुष जल लेकर उन्हीं-उन्हीं स्थानोंपर उन्हीं-उन्हीं देवताओंके उद्देश्स्से आचमनके लिये जल

English

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अध्याय १५

श्लोक 79

अहञ्चान्ये च ये तत्र यातनाभ्यः परिच्युताः ।स्वकर्मफलनिर्दिष्टं ततो जात्यन्तरं गताः

ahañcānye ca ye tatra yātanābhyaḥ paricyutāḥ / svakarmaphalanirdiṣṭaṃ tato jātyantaraṃ gatāḥ

हिन्दी अर्थ

छोड़े। इस प्रकार गृहस्थ पुरुष घरमें पवित्रतापूर्वक गृह-देवताओंके उद्देश्यसे बलि देकर अन्य भूतोंकी तृप्तिके लिये आदरपूर्वक अन्नका त्याग करे। कुत्तों,

English

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अध्याय १५

श्लोक 80

एवमेते समाख्याता नरका द्विजसत्तम ।येन येन च पापेन यां यां योनिमुपैति वै

evamete samākhyātā narakā dvijasattama / yena yena ca pāpena yāṃ yāṃ yonimupaiti vai

हिन्दी अर्थ

चाण्डालों तथा पक्षियोंके लिये पृथ्वीपर अन्न रख दे। यह वैश्वदेव नामक कर्म है। इसे प्रात:काल और सायंकाल आवश्यक बताया गया है।

English

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अध्याय १५

श्लोक 81

तत् तत् सर्वं समाख्यातं यथा दृष्टं मया पुरा ।पुरानुभवजं ज्ञानमवाप्यावितथं तव ।अतः परं महाभाग किमन्यत् कथयामि ते

tat tat sarvaṃ samākhyātaṃ yathā dṛṣṭaṃ mayā purā / purānubhavajaṃ jñānamavāpyāvitathaṃ tava / ataḥ paraṃ mahābhāga kimanyat kathayāmi te

हिन्दी अर्थ

इसके बाद बुद्धिमान् पुछष आचमन करके कुछ कालतक अतिथिकी प्रतीक्षा करते हुए घरके दरवाजेकी ओर दृष्टि रखे। यदि कोई अतिथि वहाँ आ जाय तो यथाशक्ति अन्न, जल, गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा उसका सत्कार करे। अपने ग्रामवासी पुरुषको या मित्रको अतिथि न बनाये। जिसके कुल और नाम

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 15
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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