अध्याय ७
श्लोक 1
इति श्रीकूर्मपुराणे षटसाहस्त्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षष्ठो ऽध्यायः श्रीकूर्म उवाच सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य कल्पादिषु यथा पुरा ।अबुद्धिपूर्वकः सर्गः प्रादुर्भूतस्तमोमयः
iti śrīkūrmapurāṇe ṣaṭasāhastryāṃ saṃhitāyāṃ pūrvavibhāge ṣaṣṭho 'dhyāyaḥ śrīkūrma uvāca sṛṣṭiṃ cintayatastasya kalpādiṣu yathā purā / abuddhipūrvakaḥ sargaḥ prādurbhūtastamomayaḥ
हिन्दी अर्थ
लोकसृष्टिके कार्यमें उनके इस प्रकार निरपेक्ष (उदासीन) हो जानेपर प्रजापति (ब्रह्मा) मायापति परमेष्ठीकी मायाके द्वारा तत्काल मोहित कर लिये गये। योगियोंके चित्तका अनुरञ्जन करनेवाले जगत्कर्ता महायोगी, महामुनि नारायणने (अपने) उस पुत्र (ब्रह्मा)-को प्रबुद्ध किया। (तब) उनके द्वारा प्रबुद्ध किये गये विश्वात्मा (ब्रह्मा)-ने परम तप किया, (किंतु) तप करनेपर भी उन भगवान् ब्रह्माको कुछ प्राप्त नहीं हुआ॥ २१--२३॥
English
Originally I, God Narayana (God reposing on cosmic waters) alone existed there was nothing else except me. Lying on the coils of serpent Sesa's body as a couch, I resorted to ex¬ tensive deep slumber.