अध्याय १५
श्लोक 1
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चतुर्दशो ऽध्यायः सूत उवाच प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयंभुवा ।ससर्ज देवान् गन्धर्वान् ऋषींश्चैवासुरोरगान्
iti śrīkūrmapurāṇe ṣaṭsāhastryāṃ saṃhitāyāṃ pūrvavibhāge caturdaśo 'dhyāyaḥ sūta uvāca prajāḥ sṛjeti vyādiṣṭaḥ pūrvaṃ dakṣaḥ svayaṃbhuvā / sasarja devān gandharvān ṛṣīṃścaivāsuroragān
हिन्दी अर्थ
आसनपर भगवान् शिवके साथ सुशोभित होती हैं, उन अव्यय और अजन्माको मैं नमस्कार करता हूँ। सभी भेदोंसे रहित उन उमाको मैं प्रणाम करता हूँ, जिनके भीतर सम्पूर्ण संसार उत्पन्न होता है और विनाशको प्राप्त होता रहता है। जो न उत्पन्न होती हैं, न विनाशको प्राप्त होती हैं और न बढ़ती ही हैं, उन गुणातीत हिमालयकी पुत्री उमाको मैं नमस्कार करता हूँ । देवि! शैलपुत्रि! मैंने मोहित होकर जो किया उसके लिये आप मुझे क्षमा
English
There is no scripture other than the Vedas which lays down what is Dharma. A person who takes delight in other things (not sanctioned by the Vedas), should not be even talked to by twice-born persons viz. Brahmanas, Ksatriyas and Vaisyas.