अध्याय ५१
श्लोक 1
ब्रह्मणा भगवन्तं विष्णुं जगतः वर्तमानायाः अवस्थायाः वर्णनं कृत्वा पृथिव्याः भारं उद्धरणाय मन्त्रणं ब्रह्माजीका भगवान् विष्णुसे जगत्की वतमान अवस्थाका वर्णन करते हुए पृध्वीका भार उतारनेके लिये मन्त्रणा करनेका अनुरोध तच्छ्रुत्वा विष्णुगदितं ब्रह्मा लोकपितामहः ।उवाच परमं वाक्यं हितं सर्वदिवौकसाम्
brahmaṇā bhagavantaṃ viṣṇuṃ jagataḥ vartamānāyāḥ avasthāyāḥ varṇanaṃ kṛtvā pṛthivyāḥ bhāraṃ uddharaṇāya mantraṇaṃ brahmājīkā bhagavān viṣṇuse jagatkī vatamāna avasthākā varṇana karate hue pṛdhvīkā bhāra utāraneke liye mantraṇā karanekā anurodha tacchrutvā viṣṇugaditaṃ brahmā lokapitāmahaḥ | uvāca paramaṃ vākyaṃ hitaṃ sarvadivaukasām
हिन्दी अर्थ
कार्य करनेवाले हम दोनों भाइयोंने फिर वही अपना काम-धंधा आरम्भ कर दिया॥ ३८-३९ ॥ तदनन्तर राजा जरासंधने हम दोनोंके नगरपर घेरा डालनेके लिये निश्चित विचार कर लिया। यद्यपि हम दोनों उसके साथ बहुत युद्ध कर चुके हैं और उनमें अपना लक्ष्य सिद्ध करनेमें सफल भी हुए हैं तथापि अपने नगर और प्रजाजनोंकी रक्षाके लिये हमने जरासंधसे लड़नेके लिये कोई उद्योग नहीं किया। ब्रतधारी मुने! अभी हमलोगोंको शक्ति और साधनका संचय करना है, अत: अकृतार्थ होकर ही हमलोग वहाँसे चल पड़े ॥४०-४१॥ हमारे पास युद्धके लिये रथ नहीं है। हम पैदल ही हैं। हमारे शरीरपर कवच और हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र भी नहीं हैं। हम जरासंधके आक्रमणके भयसे नगरकों छोड़कर केवल दो ही जने वहाँसे निकल आये हैं
English
²²⁹ A sacrifice in honor of the mount Govardhana.