Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
44
अध्याय 44 / 318

Adhyaya 44

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अध्याय ४४

श्लोक 1

आश्चर्यमये तारकामयसङ्ग्रामे देवसेनायाः युद्धाय उद्यमं श्रुतस्ते दैत्यसैन्यस्य विस्तरस्तात विग्रहे ।सुराणां सर्वसैन्यस्य विस्तरं वैष्णवं शृणु

āścaryamaye tārakāmayasaṅgrāme devasenāyāḥ yuddhāya udyamaṃ śrutaste daityasainyasya vistarastāta vigrahe | surāṇāṃ sarvasainyasya vistaraṃ vaiṣṇavaṃ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

पुत्री समझो और वहाँ जो श्रीकृष्ण है, वही वसुदेव (तथा देवकी)-का पुत्र है॥५०॥ तुम्हारे मित्ररूपधारी शत्रु वसुदेवने रातंके समय छलपूर्वक तुम्हारे वधके लिये इन दोनों बच्चोंकी अदला-बदली कर ली थी॥५१॥ यशोदाकी वह कन्या पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्य- गिरिपर जाकर रहती है। वहाँ उस पर्वतपर विचरनेवाले जो शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दानव थे, उनका वध करके प्रतिष्ठित हुई है॥ ५२ ॥ प्राणियोंके समुदायद्वारा सेवित वह देवी उपासकोंको अभीष्ट वर देनेवाली है। उसे महती पूजन-सामग्री और वहाँ विचरनेवाले पशु प्रिय हैं। वहाँ भयानक दस्यु उस देवीका अभिषेक करके पूजन करते हैं॥५३॥ वह मधु तथा फलके गूदोंसे भरे हुए दो कलशोंसे सुशोभित होती है। मोरपंखके बने हुए विचित्र भुजदण्ड तथा मोरोंकी पाँखसे ही बनाये गये दूसरे-दूसरे आभूषण उस देवीके अलंकार हैं॥५४॥ उस विन्ध्यपर्वतपर उसके अपने

English

¹⁸⁸ The ninth day of the dark half of the month.

अध्याय ४४

श्लोक 2

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च महाबलौ ।सबलाः सानुगाश्चैव सन्नह्यन्त यथाबलम्

ādityā vasavo rudrā aśvinau ca mahābalau | sabalāḥ sānugāścaiva sannahyanta yathābalam

हिन्दी अर्थ

ही तेजसे निर्मित हुआ स्थान एक सुन्दर वन है, जहाँ हर्षमें भरे हुए मुर्गोका कलनाद सुनायी देता है। कौओंके काँव-काँवकी आवाज भी गूँजती रहती है। मृग आदि पशुओंके समुदाय भी वहाँ भरे रहते हैं तथा मनके अनुकूल पक्षियोंसे भी वह स्थान सुशोभित रहता है। वहाँ सिंहों, व्याप्रों और वराहोंकी गर्जनाका गम्भीर शब्द प्रतिध्वनित होता रहता है। वृक्षोंके बाहुल्यसे वह गम्भीर एवं गहन प्रतीत होता है। सब ओरसे दुर्गम स्थानोंद्वारा वह घिरा हुआ है। दिव्य गड़आ, चँवर और दर्पण देवीके उस स्थानकी शोभा बढ़ाते हैं। सैकड़ों देववाद्योंकी ध्वनियोंसे वह वन गूँजता रहता है। शत्रुओंको त्रास देनेवाली वह देवी सदा उसी मनोरम वनमें बसते परमप्रीता देवतैरपि पूजिता। यस्त्वयं नन्दगोपस्य कृष्ण इत्युच्यते सुत:

English

Vaishampayana said:—Having saluted the goddess Nārāyani, the mistress of the three worlds I shall recite the sacred hymn as sung by the ancient

अध्याय ४४

श्लोक 3

पुरुहूतस्तु पुरतो लोकपालः सहस्रदृक् ।ग्रामणीः सर्वदेवानामारुरोह सुरद्विपम्

puruhūtastu purato lokapālaḥ sahasradṛk | grāmaṇīḥ sarvadevānāmāruroha suradvipam

हिन्दी अर्थ

अत्र मे नारदः प्राह सुमहत्कर्मकारणम्। द्वितीयो वसुदेवाद् वै वासुदेवो भविष्यति स एवं वासुदेवों वै वसुदेवसुतो बली। बान्धवो धर्मतो मह्ांं हृदयेनान्तको रिपु: वसुदेवस्तथेवायं सपुत्रज्ञातिबान्धव:। छिनत्ति मम मूलानि भुड्न्ते च मम पार्श्रत: न कृतप्चस्थ लोको5स्ति बान्धवस्य विशेषत:

English

"O goddess, thou art the salvation, intelligence, glory, bashfulness, learning, advancement and inclination of all the worlds. Thou art identical with twilight, night, ray, sleep and the night of death (2). Thou art designated as the worshipful goddess Kātyāyani, Koushiki, observant of the vow of celibacy and the mother of Kārtikeya. Thou art highly powerful and dost practise hard austerities (3). O goddess, thou art Jayā, Vijayā, satisfaction, nourishment, forgiveness and mercy. Thou art clad in a blue silken raiment and the eldest sister of Yama (4). Thou art of various forms, art without any, hast dreadful and large eyes and art the protector of thy votaries (5). O great goddess, living on the summits of fearful mountains, in rivers, caves, and forest and being adored by Savaras,¹⁸⁹ Varvaras¹⁹⁰ and Pulindas¹⁹¹ thou dost traverse the worlds in a car consisting of peacock-feathered flags (6-7). Surrounded by cocks, goats, lambs, lions and tigers and worshipped by the ringing of bells thou dost always live in the mount Vindhyā (8). Thou dost hold trident, Pattisha and other weapons. The sun and the moon are thy flags. Thou art the ninth day of the dark half of the month and the eleventh day of the light half (9). Thou art the quarrelsome Rajani, the sister of Baladeva, the abode of all creatures, the death and the supreme end of all animals and the daughter of the milk-man Nanda who carries the victory of the gods. Thou dost wear bark, excellent cloth and art the dreadful twilight (10-11). Thou art of dishevelled hairs and the death. Thou art fond of wine and meat. Although thou art Lakshmi (of beautiful form) thou dost assume a dreadful form for the destruction of the Dānavas (12). Thou art Sāvitri¹⁹² of the Vedas, the mother of _mantras_, the celibacy of the maidens, the good luck of women, the external altar of the sacrifices, the gift of the priest, the plough of the cultivators, the earth of all creatures, the success of sea-faring merchants, the bank of the ocean, the first woman of the Yakshns,¹⁹³ Surasa¹⁹⁴ of Nāgas, art conversant with the knowledge of Brahman, initiation and great beauty. Thou art the effulgence of luminous bodies, Rohini of stars, the consummate prosperity in courts, forts, confluences of rivers and the full-moon (13–17). Thou art the goddess of learning in Valmiki,¹⁹⁵ the memory of Dwaipayana¹⁹⁶ the intellect of the Rishis in religious matters, the determination of the gods and dost live in all creatures as the goddess of wine adored by thy own deeds (18). O goddess, thou art the charming look of the thousand eyes of the king of gods, the Arani of the Agnihotra ascetics, the hunger of all creatures, the gratification, oblation, intellect and brain of the celestials, the receptable of all the Vasus, the hope of men and the pleasure of all those who are crowned with success. Thou art the direction, the contrary direction, the flame of fire, ray, Shakuni, Putanā, the terrible Revati, the over-powering sleep of all creatures and Kshatrya (19-22). Thou art Brahmavidya¹⁹⁷ in learning, Om¹⁹⁸ and Vasha¹⁹⁹. The Rishis know thee as the ancient Parvati amongst women (23). As said by Brahmā thou art Arundhati²⁰⁰ amongst chaste women. Truly thou hast been designated by the gods as Indrani²⁰¹ (24). This universe, mobile and immobile, is permeated by thee. Undoubtedly thou art the saviour in battle, burning fire, rivers, fear of thieves, caves, foreign countries, courts, in assailing the enemies and in all other matters where life is at stake (25–26). My heart, mind and reasoning faculty are all devoted to thee. Do thou save me from all sins; show me this favour (27).

अध्याय ४४

श्लोक 4

सव्ये चास्य रथः पार्श्वे पक्षिप्रवरवेगवान् ।सुचारुचक्रचरणो हेमवज्रपरिष्कृतः

savye cāsya rathaḥ pārśve pakṣipravaravegavān | sucārucakracaraṇo hemavajrapariṣkṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

यः कृतप्नो5नुबन्धेन प्रीतिं वहति दारुणाम् नरकाध्युषित: पन्था गन्तव्यस्तेन दारुण: । अपापे पापहदयो यः पापमनुतिष्ठति नियमैर्गुणवृत्तेन त्वया बान्धवकाम्यया बान्धवानामपि तथा भेदकाले समुत्थिते। वध्यते योउन्तरप्रेप्सु: स्वजनो यदि वेतर:

English

"O goddess, thou art always propitiated with him, who, rising up early in the morning, purifying himself and controlling his mind, will read this heavenly hymn (28). Thou dost give their desired-for objects to those who recite it for three months, and a most excellent boon to those who do it for six months, and celestial vision to those who continue it for nine months and _Siddhi_ as they desire to those who sing it for one full year (29–30). O goddess, as recorded by the great saint Krishna Dwaipayana thou art the supreme Brahman identical with truth. Thou dost drive away the fear of men, proceeding from chains, death, the destruction of children and wealth and disease. Assuming various forms at thy will, thou dost confer boons (31–32). Stupifying Kansa thou shalt alone enjoy the world. And I shall adopt the life of a milk-man amongst kine. For accomplishing my own work I shall become Kansa's milk-man"

अध्याय ४४

श्लोक 5

देवगन्धर्वयक्षौघैरनुयातः सहस्रशः ।दीप्तिमद्भिः सदस्यैश्च ब्रह्मर्षिभिरभिष्टुतः

devagandharvayakṣaughairanuyātaḥ sahasraśaḥ | dīptimadbhiḥ sadasyaiśca brahmarṣibhirabhiṣṭutaḥ

अध्याय ४४

श्लोक 6

वज्रविस्फूर्जितोद्धूतैर्विद्युदिन्द्रायुधान्वितैः ।गुप्तो बलाहकगणैः कामगैरिव पर्वतैः

vajravisphūrjitoddhūtairvidyudindrāyudhānvitaiḥ | gupto balāhakagaṇaiḥ kāmagairiva parvataiḥ

अध्याय ४४

श्लोक 7

समारूढः स भगवान् पर्येति मघवा गजम् ।हविर्धानेषु गायन्ति विप्राः सोममखे स्थिताः

samārūḍhaḥ sa bhagavān paryeti maghavā gajam | havirdhāneṣu gāyanti viprāḥ somamakhe sthitāḥ

अध्याय ४४

श्लोक 8

स्वर्गे शक्रानुयानेषु देवतूर्यनिनादिषु ।इन्द्रं समुपनृत्यन्ति शतशो ह्यप्सरोगणाः

svarge śakrānuyāneṣu devatūryaninādiṣu | indraṃ samupanṛtyanti śataśo hyapsarogaṇāḥ

अध्याय ४४

श्लोक 9

केतुना वंशजातेन राजमानो यथा रविः ।युक्तो हरिसहस्रेण मनोमारुतरंहसा

ketunā vaṃśajātena rājamāno yathā raviḥ | yukto harisahasreṇa manomārutaraṃhasā

अध्याय ४४

श्लोक 10

स स्यन्दनवरो भाति युक्तो मातलिना तदा ।कृत्स्नः परिवृतो मेरुर्भास्करस्येव तेजसा

sa syandanavaro bhāti yukto mātalinā tadā | kṛtsnaḥ parivṛto merurbhāskarasyeva tejasā

हिन्दी अर्थ

“बूढ़े वसुदेव ! मैंने जो तुम्हें पुरस्कृत किया--सदा अगुआ बनाकर रखा, वह सब व्यर्थ हो गया। सिरके बाल सफेद हो जायूँ और सौ वर्षोकी आयु हो जाय-- इतनेसे ही कोई वृद्ध (श्रेष्ठ) नहीं हो सकता, जिसकी बुद्धि परिपक्त हो, वही मनुष्योंमें वृद्धतर (श्रेष्ठठतम या बड़ा-बूढ़ा) माना गया है॥७२-७३॥ तुम्हारा स्वभाव तो कर्कश (क्रूर) है। तुम बुद्धिसे भी बहुश्रुत (अधिक बातोंके जानकार) नहीं हो। शरदू-ऋतुके बादलकी भाँति केवल अवस्थामें ही बूढ़े हो ( अनुभवमें नहीं) इतना ही नहीं, व्यर्थ बुद्धि रखनेवाले वसुदेव! तुम यह अच्छी तरह समझने लगे हो कि कंसके मर जानेपर मेरा बेटा मथुराका पालन करेगा--वही यहाँका राजा होगा

English

¹⁹³ The mother of Kuvera.

अध्याय ४४

श्लोक 11

यमस्तु दण्डमुद्यम्य कालयुक्तं च मुद्गरम् ।तस्थौ सुरगणानीके दैत्यान् नादेन भीषयन्

yamastu daṇḍamudyamya kālayuktaṃ ca mudgaram | tasthau suragaṇānīke daityān nādena bhīṣayan

हिन्दी अर्थ

परंतु तुम्हारी यह आशा छिलन्न-भिन्न हो जायगी। तुम व्यर्थ ही बूढ़े हुए। तुमने झूठे ही ऐसा विचार किया है। अरे! जो मेरे सामने प्रतिद्वन्द्ती बनकर खड़ा हो, उसके तुमने दुष्टतापूर्ण चित्तसे मुझपर प्रहार करनेकी अभिलाषा की। इसका बदला मैं तुम्हारे दोनों पुत्रोंसे लूँगा और तुम उसे अपनी आँखों देखोगे॥ ७७॥ मैंने पहले कभी भी किसी बूढ़ेका, ब्राह्मणका अथवा स्त्रीका वध नहीं किया है तथा न आगे ही ऐसा करूँगा; विशेषत: अपने बन्धु- बान्धवपर तो मैं हाथ उठाऊँगा ही नहीं ॥ ७८ ॥ वसुदेव ! तुम यहीं पैदा हुए, यहीं बढ़े और मेरे पिताने ही तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया। तुम मेरी चचेरी बहिनके पति हो और यदुवंशियोंमें सर्वश्रेष्ठ गुरुूूप माने जाते हो

English

¹⁹⁴ The mother of the Nagas.

अध्याय ४४

श्लोक 12

चतुर्भिः सागरैर्गुप्तो लेलिहानैश्च पन्नगैः ।शङ्खमुक्ताङ्गदधरो बिभ्रत्तोयमयं वपुः

caturbhiḥ sāgarairgupto lelihānaiśca pannagaiḥ | śaṅkhamuktāṅgadadharo bibhrattoyamayaṃ vapuḥ

अध्याय ४४

श्लोक 13

कालपाशं समाविध्य हयैः शशिकरोपमैः ।वाय्वीरितजलोद्गारैः कुर्वंल्लीलाः सहस्रशः

kālapāśaṃ samāvidhya hayaiḥ śaśikaropamaiḥ | vāyvīritajalodgāraiḥ kurvaṃllīlāḥ sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

अशाम्यं वैरमुत्पन्नं मम कृष्णस्य चोभयो:। शान्तिमेकतरे शान्तिं गते यास्यन्ति यादवा: नन्दगोपं च गोपां श्व करदान् मम शासनात् वाच्यश्व नन्दगोपो वै करमादाय वार्षिकम्। शीघ्रमागच्छ नगरं गोपै: सह समन्वितः कृष्णसंकर्षणौ चैव वसुदेवसुतावुभौ। द्रष्टमच्छति वै कंस: सभूत्य: सपुरोहितः

English

¹⁹⁶ Dwaipayana Vyasa was celebrated for his memory for he had by heart all the Vedas and Puranas.

अध्याय ४४

श्लोक 14

पाण्डुरोद्धूतवसनः प्रवालरुचिराधरः ।मणिश्यामोत्तमवपुर्हारभारार्पितोदरः

pāṇḍuroddhūtavasanaḥ pravālarucirādharaḥ | maṇiśyāmottamavapurhārabhārārpitodaraḥ

हिन्दी अर्थ

एतौ युद्धविदौ रड्ढे कालनिर्माणयोधिनौ। दूढौ च कृतिनौ चैव श्रुणोमि व्यायतोद्यमौ राजा धनुर्म्ं नाम कारयिष्यति वै सुखी यथाकामप्रदानाय भोज्याधिश्रयणाय च “वसुदेवकी दुर्नीतिसे मेश वध हो अथवा विजय, आजसे यदुकुलके पुरुष सजनोंके समाजमें अपना मुँह ढँककर जायूँगे॥ ८२॥ वसुदेव ! तुमने युद्धमें मेरे वधका उपाय सोचते-सोचते ऐसा कर्म कर डाला, जिसके कारण यादवोंके ऊपरसे सबका विश्वास उठ गया। तुमने यदुवंशियोंको कलड्लडित करके निन्दाके योग्य बना दिया॥ ८३॥ अब तो हम दोनोंमें--मुझ कंस और कृष्णमें कभी शान्त न होनेवाला वैर उत्पन्न हो गया है। हममेंसे

English

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अध्याय ४४

श्लोक 15

वरुणः पाशभृन्मध्ये देवानीकस्य तस्थिवान् ।युद्धवेलामभिलषत् भिन्नवेल इवार्णवः

varuṇaḥ pāśabhṛnmadhye devānīkasya tasthivān | yuddhavelāmabhilaṣat bhinnavela ivārṇavaḥ

अध्याय ४४

श्लोक 16

यक्षराक्षससैन्येन गुह्यकानां गणैरपि ।मणिश्यामोत्तमवपुः कुबेरो नरवाहनः

yakṣarākṣasasainyena guhyakānāṃ gaṇairapi | maṇiśyāmottamavapuḥ kubero naravāhanaḥ

हिन्दी अर्थ

बालक मेरी चचेरी बहिनके प्रधान पुत्र हैं, जो इस समय ब्रजमें रहते और वनमें विचरते हैं। मुझे अवश्य उन दोनोंको देखना चाहिए॥९०॥ उस ब्रजमें जाकर ब्रजवासियोंके समीप तुम्हें यह कहना चाहिए कि सुखी राजा कंस धनुर्यज्ञका उत्सव करायेंगे॥ ९१॥ इस उत्सवमें आमन्त्रित हुए लोगोंको जिस प्रकार हर तरहसे आराम मिले, उसके लिये तुम सब ब्रजवासी मथुराके समीपवर्ती वनमें आकर सुखपूर्वक रहो ॥ ९२॥ दूध, घी, दही और तक्र आदिको अतिथियोंकी इच्छाके अनुसार जुटाकर देना और खीर आदि बनानेके लिये जब जितने दूधको आगपर रखना आवश्यक हो, तब-तब उस आवश्यकताकी पूर्तिके लिये पर्याप्त दूध प्रस्तुत करना--इसी उद्देश्यसे तुम्हें नगरके निकट निवास करना है! संकर्षणं च कृष्णं च् द्रष्ट कौतूहलं हि मे

English

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अध्याय ४४

श्लोक 17

युक्तश्च शङ्खपद्माभ्यां निधीनामधिपः प्रभुः ।राजराजेश्वरः श्रीमान् गदापाणिरदृश्यत

yuktaśca śaṅkhapadmābhyāṃ nidhīnāmadhipaḥ prabhuḥ | rājarājeśvaraḥ śrīmān gadāpāṇiradṛśyata

अध्याय ४४

श्लोक 18

विमानयोधी धनदो विमाने पुष्पके स्थितः ।स राजराजः शुशुभे युद्धार्थी नरवाहनः ।प्रेक्ष्यमाणः शिवसखः साक्षादिव शिवः स्वयम्

vimānayodhī dhanado vimāne puṣpake sthitaḥ | sa rājarājaḥ śuśubhe yuddhārthī naravāhanaḥ | prekṣyamāṇaḥ śivasakhaḥ sākṣādiva śivaḥ svayam

हिन्दी अर्थ

नागच्छेतां यथाकालं निग्राह्मावपि तौ मम यदि वा नोपजप्तोडसि वसुदेवेन सुत्रत। तथा कर्तव्यमेतद्द्धि यथा तावागमिष्यत: एवमाक्षिप्पमाणो5पि वसुदेवो वसूपम: । सागराकारमात्मानं निष्प्रकम्पमधारयत् वाक्छल्यैस्ताड्यमानस्तु कंसेनादीर्घदर्शिना । क्षमां मनसि संधाय नोत्तरं प्रत्यभाषत

English

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अध्याय ४४

श्लोक 19

पूर्वं पक्षं सहस्राक्षः पितृराजस्तु दक्षिणम् ।वरुणः पश्चिमं पक्षमुत्तरं नरवाहनः

pūrvaṃ pakṣaṃ sahasrākṣaḥ pitṛrājastu dakṣiṇam | varuṇaḥ paścimaṃ pakṣamuttaraṃ naravāhanaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रीतिमान् पुण्डरीकाश्षं द्रष्ट दानपति: स्वयम् 'अक्रूर! शीघ्र जाओ। मेरी आज्ञासे उन दोनों संकर्षण और कृष्णको यहाँ ले आओ। मुझे उन्हें देखनेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है॥९४॥ उनके आ जानेसे मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी (जिसका श्रेय तुम्हें मिलेगा)। उन दोनों महापराक्रमी बालकोंको देखकर मैं वही करूँगा, जिसमें मेरा हित होगा॥९५॥ मेरी यह आज्ञा तथा बातें सुनकर यदि वे दोनों यहाँ ठीक समयपर आनेको तैयार न हों तो मेरी रायमें वे बंदी बना लेनेके भी योग्य हैं (अर्थात् तुम उन्हें कैद करके भी ला सकते हो) ॥ ९६॥ समझा-बुझाकर काम लेना ही बालकोंके प्रति प्रधान एवं प्रमुख नीति है; इसलिये तुम उन दोनों मूर्खोको मीठी बातोंसे स्वयं ही राजी करके यहाँ शीघत्र ले आओ॥९७॥ उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले अक्रूर ! यदि वसुदेवने तुम्हािरे भी कान न भर दिये हों तो तुम मेरी इस परम दुर्लभ प्रीतिका सम्पादन करो। तुम्हें वैसा ही प्रयत्त करना चाहिए, जिससे वे

English

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अध्याय ४४

श्लोक 20

चतुर्षु युक्ताश्चत्वारो लोकपाला बलोत्कटाः ।स्वासु दिक्ष्वभ्यरक्षन् वै तस्य देवबलस्य ह

caturṣu yuktāścatvāro lokapālā balotkaṭāḥ | svāsu dikṣvabhyarakṣan vai tasya devabalasya ha

अध्याय ४४

श्लोक 21

सूर्यः सप्ताश्वयुक्तेन रथेनाम्बरगामिना ।श्रिया जाज्वल्यमानेन दीप्यमानैश्च रश्मिभिः

sūryaḥ saptāśvayuktena rathenāmbaragāminā | śriyā jājvalyamānena dīpyamānaiśca raśmibhiḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अक्रूरप्रस्थाने द्वाविंशो5ध्याय: इस प्रकार श्रीयहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अक्वूरका ग्रस्थानविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ अन्धकका कंसको मुँहतोड़ उत्तर निपीड्य श्रवणान् हस्तैमेंनिरे तं गतायुषम् अन्धकोडनुद्विग्रमना धैर्यादविकृतं वच:। प्रोवाच वबदतां श्रेष्ठ; समाजे कंसमोजसा

English

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अध्याय ४४

श्लोक 22

उदयास्तमयं चक्रे मेरुपर्यन्तगामिना ।त्रिदिवद्वारचक्रेण तपता लोकमव्ययम्

udayāstamayaṃ cakre meruparyantagāminā | tridivadvāracakreṇa tapatā lokamavyayam

अध्याय ४४

श्लोक 23

सहस्ररश्मियुक्तेन भ्राजमानः स्वतेजसा ।चचार मध्ये देवानां द्वादशात्मा दिनेश्वरः

sahasraraśmiyuktena bhrājamānaḥ svatejasā | cacāra madhye devānāṃ dvādaśātmā dineśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

तुमने जो इतनी देरतक भाषण देनेका कष्ट उठाया है, तुम्हारा यह परिश्रम मेरे मतमें आदर या प्रशंसाके योग्य नहीं है। यह सर्वथा अनुचित है। श्रेष्ठ पुरुषोंने इसकी सदा निन्‍्दा की है। विशेषतः अपने बन्धु-बान्धवोंके प्रति ऐसा आक्षेप सर्वथा निन्दित है॥३॥ वीर! अब इस समय मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। यदि तुम यादव नहीं हो या अपनेको यादव नहीं मानते हो तो ये यदुवंशी तुम्हें जबरदस्ती यादव नहीं बना रहे हैं (और न बनाना चाहते हैं)॥४॥ वत्स! जिनके शासक तुम हो, वे वृष्णिवंशी आदर और प्रशंसाके योग्य हो ही नहीं सकते हैं। इक्ष्वाकुवंशमें एक प्रजापीड़क राजा उत्पन्न हुआ था, जो स्वयं ही किसी समय राज्य छोड़कर भाग गया अथवा मिट गया (इस यदुकुलमें तुम भी वैसे ही जान पड़ते हो, अतः तुम्हारी भी वैसी ही दशा होनेवाली है) ॥ ५॥ तात! तुम भोज हो, यादव हो अथवा कंस हो या जैसा-तैसा कोई भी हो, तुम्हारा मस्तक तुम्हारे साथ ही उत्पन्न हुआ है (और वह अभीतक मौजूद है) । तुम उसपर बड़ी-बड़ी जटाएँ रखा लो अथवा मूँड़ मुड़ा लो (यदि तुम यादव रहना नहीं चाहते तो जो चाहो, वही बन जाओ) ॥ ६॥ मेरी दृष्टिमें

English

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अध्याय ४४

श्लोक 24

सोमः श्वेतहयैर्भाति स्यन्दने शीतरश्मिवान् ।हिमतोयप्रपूर्णाभिर्भाभिराह्लादयञ्जगत्

somaḥ śvetahayairbhāti syandane śītaraśmivān | himatoyaprapūrṇābhirbhābhirāhlādayañjagat

अध्याय ४४

श्लोक 25

तमृक्षयोगानुगतं शिशिरांशुं द्विजेश्वरम् ।जगच्छायाङ्किततनुं नैशस्य तमसः क्षयम्

tamṛkṣayogānugataṃ śiśirāṃśuṃ dvijeśvaram | jagacchāyāṅkitatanuṃ naiśasya tamasaḥ kṣayam

अध्याय ४४

श्लोक 26

ज्योतिषामीश्वरं व्योम्नि रसानां रसनं प्रभुम् ।ओषधीनां परित्राणं निधानममृतस्य च

jyotiṣāmīśvaraṃ vyomni rasānāṃ rasanaṃ prabhum | oṣadhīnāṃ paritrāṇaṃ nidhānamamṛtasya ca

अध्याय ४४

श्लोक 27

जगतः प्रथमं भागं सौम्यं शीतमयं रसम ।ददृशुर्दानवाः सोमं हिमप्रहरणस्थितम्

jagataḥ prathamaṃ bhāgaṃ saumyaṃ śītamayaṃ rasama | dadṛśurdānavāḥ somaṃ himapraharaṇasthitam

हिन्दी अर्थ

आन्तरिक साधनाओंसे प्राप्त हुए लोकोंको भी जलाकर भस्म कर सकता है॥१२॥ तात! जिसका आत्मा उन्नतिके पथपर अग्रसर है तथा जो जितेन्द्रिय एवं विवेकशील विद्वान् है, उस पुरुषको धर्मकी गतिका सदा ही अन्वेषण करना चाहिए, जैसे जलमें मछलीकी गति अत्यन्त सूक्ष्म या अव्यक्त होती है, उसी प्रकार धर्मकी गति भी सूक्ष्म है॥ १३॥ तुम तो केवल अहंकारवश यहाँ बैठे हुए अग्निके समान तेजस्वी वृद्ध पुरुषोंको अपनी मर्मभेदिनी वाणीद्वारा पीड़ा दे रहे हो। जैसे है, उसी प्रकार तुम्हारी ये आश्षेपपूर्ण बातें निष्फल हैं॥ १४॥ वसुदेवने अपने पुत्रकी रक्षाके लिये जो कुछ किया है, उसके लिये जो तुम इनपर आक्षेप करते हो, वह सब तुम्हारा मिथ्या प्रलाप है। उस विषयमें कही गयी तुम्हारी इन कायरतापूर्ण बातोंकी मैं निन्‍दा करता हूँ॥ १५॥ पुत्र क्रूर स्वभावका हो जाय तो भी पिता उसके प्रति निष्ठर नहीं हो सकता; क्योंकि पुत्रोंके लिये पिताओंको कितनी ही कष्टदायिनी विपत्तियाँ झेलनी

English

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अध्याय ४४

श्लोक 28

यः प्राणः सर्वभूतानां पञ्चधा भिद्यते नृषु ।सप्तस्कन्धगतो लोकांस्त्रीन्दधार चराचरान्

yaḥ prāṇaḥ sarvabhūtānāṃ pañcadhā bhidyate nṛṣu | saptaskandhagato lokāṃstrīndadhāra carācarān

हिन्दी अर्थ

पड़ती हैं॥१६॥ यदि वसुदेवने उस समय अपने पुत्रको उसकी रक्षाके लिये छिपा दिया था तो यह कोई अनुचित कर्म नहीं किया। यदि तुम इसे न करनेयोग्य बुरा कर्म मानते हो तो इस विषयमें अपने पितासे ही पूछो ॥ १७॥ वसुदेवपर आक्षेप और यादवकुलकी निन्दा करके तुमने यहाँ यादवकुमारोंके बैरजनित विषका ही उपार्जन किया है॥१८॥ यदि वसुदेवने अपने पुत्रके प्राण बचाकर अनुचित कर्म किया है तो उग्रसेनने शैशवाबस्थामें तुम्हें क्यों नहीं मार डाला था' पुन्नाम्नो नरकात् पुत्रो यस्मात् त्राता पितृंस्तदा। तस्माद् ब्रुवन्ति पुत्रेति पुत्रं धर्मविदो जना:

English

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अध्याय ४४

श्लोक 29

यमाहुरग्नेर्यन्तारं सर्वप्रभवमीश्वरम् ।सप्तस्वरगता यस्य योनिर्गीतिरुदीर्यते

yamāhuragneryantāraṃ sarvaprabhavamīśvaram | saptasvaragatā yasya yonirgītirudīryate

अध्याय ४४

श्लोक 30

यं वदन्त्युत्तमं भूतं यं वदन्त्यशरीरिणम् ।यमाहुराकाशगमं शीघ्रगं शब्दयोनिजम्

yaṃ vadantyuttamaṃ bhūtaṃ yaṃ vadantyaśarīriṇam | yamāhurākāśagamaṃ śīghragaṃ śabdayonijam

अध्याय ४४

श्लोक 31

स वायुः सर्वभूतायुरुद्भूतः स्वेन तेजसा ।ववौ प्रव्यथयन् दैत्यान् प्रतिलोमः सतोयदः

sa vāyuḥ sarvabhūtāyurudbhūtaḥ svena tejasā | vavau pravyathayan daityān pratilomaḥ satoyadaḥ

अध्याय ४४

श्लोक 32

मरुतो देवगन्धर्वा विद्याधरगणैः सह ।चिक्रीडुरसिभिः शुभ्रैर्निर्मुक्तैरिव पन्नगैः

maruto devagandharvā vidyādharagaṇaiḥ saha | cikrīḍurasibhiḥ śubhrairnirmuktairiva pannagaiḥ

हिन्दी अर्थ

है) ॥ २६॥ धूमकेतु नामक उत्पात-ग्रहके पुच्छभागसे भरणी आदि तेरह नक्षत्र विद्ध हो गये हैं, इसलिये वे चन्द्रमाका अनुसरण नहीं करते हैं॥ २७॥ पूर्वकालकी संध्या परिघसे॥ ग्रस्त है। वह अपनी प्रभाओंद्वारा सूर्यदेवको बाधा पहुँचाती है तथा पशु और पक्षी अपनी बोली बोलते हुए प्रतिकूल दिशासे होकर जाते हैं॥ २८ ॥ दोनों संध्याओंके समय एक भयानक गीदड़ी श्मशानभूमिसे निकलकर अपने नि:श्वाससे अड्भारकी वर्षा करती और बहुत बोलती हुई मथुरापुरीके चारों ओर चक्कर लगाती है! ज्योतिषके अनुसार सर्वतोभद्र नामक चक्रमें मृगशशिरा कंसका जन्म-नक्षत्र है, उससे दशम नक्षत्र चित्रा है, जो उसीका कर्म- नक्षत्र है। वहीं भयंकर ग्रह राहु, जो क्रूर ग्रह माना गया है, स्थित है। मंगल भी वक्रगतिसे वहीं आ गया है। इन दोनोंने कर्म-नक्षत्रको व्याप्त करके जन्म-नक्षत्रको विद्ध कर दिया है। इसका फल बताते हुए अन्धक कहते हैं--'कंस ! तुम्हारा जीवित रहनेके लिये जो प्रयत्न है, वह निष्फल होगा और तुम्हारे देहका भी नाश हो जायगा।” (नीलकण्ठी)

English

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अध्याय ४४

श्लोक 33

सृजन्तः सर्पपतयस्तीव्रं रोषमयं विषम् ।शरभूताः सुरेन्द्राणां चेरुर्व्यात्तमुखा दिवि

sṛjantaḥ sarpapatayastīvraṃ roṣamayaṃ viṣam | śarabhūtāḥ surendrāṇāṃ cerurvyāttamukhā divi

हिन्दी अर्थ

त सूर्यमण्डलमें उगा हुआ तिरछा डंडा परिघ कहलाता है। उल्का निर्घातनादेन पपात धरणीतले। चलत्यपर्वणि मही गिरीणां शिखराणि च धूमोत्पातर्दिशों व्याप्ता: शुष्काशनिसमाहता: चलिता देवता: स्थानात् त्यजन्ति विहगा नगान् यानि राजविनाशाय हैवज्ञा: कथयन्ति ह। तानि सर्वाणि पश्यामो निमित्तान्यशुभानि वै

English

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अध्याय ४४

श्लोक 34

पर्वतास्तु शिलाशृङ्गैः शतशाखैश्च पादपैः ।उपतस्थुः सुरगणान् प्रहर्तुं दानवं बलम्

parvatāstu śilāśṛṅgaiḥ śataśākhaiśca pādapaiḥ | upatasthuḥ suragaṇān prahartuṃ dānavaṃ balam

हिन्दी अर्थ

त्वं चापि स्वजनद्वेषी राजधर्मपराड्मुख:। अनिमित्तागतक्रोध: संनिकृष्टठभयो हासि यस्त्वं देवोपमं वृद्धं वसुदेवं॑ वसूपमम्। भोहात् क्षिपसि दुर्बुद्धे कुतस्ते शान्तिरात्मन: पुण्डरीकविशालाक्ष॑ कृष्णमक्लिषप्टकारिणम् कृष्णो ज्ञातीनू समानाय्य स संधानं करिष्यति

English

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अध्याय ४४

श्लोक 35

यः स देवो इषीकेशः पद्मनाभस्त्रिविक्रमः ।कृष्णवर्त्मा युगान्ताभो विश्वस्य जगतः प्रभुः

yaḥ sa devo iṣīkeśaḥ padmanābhastrivikramaḥ | kṛṣṇavartmā yugāntābho viśvasya jagataḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

क्षान्तमेव तवानेन वसुदेवेन धीमता। कालसम्यक्परिज्ञानो ब्रूहि त्वं यद्यदिच्छसि महां तु रोचते कंस वसुदेवसहायवान्। गच्छ कृष्णस्य निलयं संधिस्तेन च रोचताम् “कुछ ही समय पहले वज्रपातकी-सी ध्वनिके साथ पृथ्वीपर उल्कापात हुआ है। यह पृथ्वी तथा पर्वतोंके शिखर अकस्मात् काँपने लगते हैं जिससे दिनमें ही रात हो गयी थी। धूम और उत्पातोंसे सम्पूर्ण दिशाएँ व्याप्त हैं। सूखेमें ही बिजलियाँ गिरती हैं॥३१॥ मेघ बिजली और गड़गड़ाहटके साथ रक्तकी वर्षा करते हैं। देवताओंकी प्रतिमाएँ अपने स्थानसे हट जाती हैं और पक्षी वृक्षोंको त्याग देते हैं ॥ ३२॥ ज्योतिषी लोग राजाके विनाशकी सूचना देनेवाले जो-जो अशुभ निमित्त (अपशकुन) बताते हैं, उन सबको हमलोग देख रहे हैं॥३३॥ तुम भी

English

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अध्याय ४४

श्लोक 36

समुद्रयोनिर्मधुहा हव्यभुक्क्रतुसत्कृतः ।भूरापोव्योमभूतात्मा समः शान्तिकरोऽरिहा

samudrayonirmadhuhā havyabhukkratusatkṛtaḥ | bhūrāpovyomabhūtātmā samaḥ śāntikaro'rihā

अध्याय ४४

श्लोक 37

जगद्योनिर्जगद्बीजो जगद्गुरुरुदारधीः ।सोऽर्कमग्निमिवोद्यन्तमुद्यम्योत्तमतेजसम्

jagadyonirjagadbījo jagadgururudāradhīḥ | so'rkamagnimivodyantamudyamyottamatejasam

अध्याय ४४

श्लोक 38

अरिघ्नममरानीके चक्रं चक्रगदाधरः ।सपरीवेषमुद्यन्तं सवितुर्मण्डलं यथा

arighnamamarānīke cakraṃ cakragadādharaḥ | saparīveṣamudyantaṃ saviturmaṇḍalaṃ yathā

अध्याय ४४

श्लोक 39

सव्येनालम्ब्य महतीं सर्वासुरविनाशिनीम् ।करेण कालीं वपुषा शत्रुकालप्रदां गदाम्

savyenālambya mahatīṃ sarvāsuravināśinīm | kareṇa kālīṃ vapuṣā śatrukālapradāṃ gadām

हिन्दी अर्थ

न किंचिदब्रवीत् क्रोधाद् विवेश स्व॑ निकेतनम् अक्रूरोषपि यथा55ज्ञप्त: कृष्णदर्शनलालस: । जगाम रथमुख्येन मनसा तुल्यगामिना कृष्णस्थापि निमित्तानि शुभान्यड्रगतानि वै। प्रागेोव च नरेन्‍्द्रेण माथुरेणौग्रसेनिना। केशिनः प्रेषितो दूतो वधायोपेन्द्रकारणातू

English

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अध्याय ४४

श्लोक 40

शेषैर्भुजैः प्रदीप्तानि भुजगारिध्वजः प्रभुः ।दधारायुधजालानि शार्ङ्गादीनि महायशाः

śeṣairbhujaiḥ pradīptāni bhujagāridhvajaḥ prabhuḥ | dadhārāyudhajālāni śārṅgādīni mahāyaśāḥ

हिन्दी अर्थ

सच दूतवच:ः श्रुत्वा केशी क्लेशकरो नृणाम्। वृन्दावनगतो गोपान् बाधते सम दुरासद: दुर्दान्तो वाजिदेत्योड्सावकरोत् कदनं महत् दुर्मद: कामचारी च स केशी निरवग्रह: यत्रास्ते स हि दुष्टात्मा केशी तुरगदानव: ईरिणं तद् वन॑ सर्व तेनासीत् पापकर्मणा। कृतं तुरगहैत्येन सर्वान् गोपाज्चलिघांसता

English

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अध्याय ४४

श्लोक 41

स कश्यपस्यात्मभवं द्विजं भुजगभोजनम् ।पवनाधिकसम्पातं गगनक्षोभणं खगम् ।भुजगेन्द्रेण वदने निविष्टेन विराजितम्

sa kaśyapasyātmabhavaṃ dvijaṃ bhujagabhojanam | pavanādhikasampātaṃ gaganakṣobhaṇaṃ khagam | bhujagendreṇa vadane niviṣṭena virājitam

अध्याय ४४

श्लोक 42

अमृतारम्भनिर्मुक्तं मन्दराद्रिमिवोच्छ्रितम् ।देवासुरविमर्देषु शतशो दृष्टविक्रमम्

amṛtārambhanirmuktaṃ mandarādrimivocchritam | devāsuravimardeṣu śataśo dṛṣṭavikramam

अध्याय ४४

श्लोक 43

महेन्द्रेणामृतस्यार्थे वज्रेण कृतलक्षणम् ।शिखिनं चूडिनं चैव तप्तकुण्डलभूषणम् ।विचित्रपक्षवसनं धातुमन्तमिवाचलम्

mahendreṇāmṛtasyārthe vajreṇa kṛtalakṣaṇam | śikhinaṃ cūḍinaṃ caiva taptakuṇḍalabhūṣaṇam | vicitrapakṣavasanaṃ dhātumantamivācalam

अध्याय ४४

श्लोक 44

स्फीतक्रोडावलम्बेन शीतांशुसमतेजसा ।भोगिभोगावसक्तेन मणिरत्नेन भास्वता

sphītakroḍāvalambena śītāṃśusamatejasā | bhogibhogāvasaktena maṇiratnena bhāsvatā

हिन्दी अर्थ

केशिना सह युद्धाय मतिं चक्रे 5रिसूदन: मुखे लम्बसटे चास्य स्कन्धे केशघनावृते। वलयोभ्रतरड्राभा: सुख्रुवुः क्रोधजं॑ जलम् उस दुराचारीने वह विशाल वन दूषित कर डाला था। वनसे ही जीवन-निर्वाह करनेवाले मनुष्य और गोधन भी कभी उस वनका सेवन नहीं करते थे मदके कारण वह सदाचारसे भ्रष्ट हो चुका था और अधिकतर मनुष्योंके ही मांस खाता था। उसके निवास- स्थानमें होकर जो रास्ता जाता था, उसे उसने अगम्य बना दिया था॥ १४॥ एक समय मनुष्योंके शब्दका अनुसरण

English

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अध्याय ४४

श्लोक 45

पक्षाभ्यां चारुचित्राभ्यामावृत्य दिवि लीलया ।युगान्ते सेन्द्रचापाभ्यां तोयदाभ्यामिवाम्बरम्

pakṣābhyāṃ cārucitrābhyāmāvṛtya divi līlayā | yugānte sendracāpābhyāṃ toyadābhyāmivāmbaram

अध्याय ४४

श्लोक 46

नीललोहितपीताभिः पताकाभिरलङ्कृतम् ।केतुवेषप्रतिच्छन्नं महाकायनिकेतनम्

nīlalohitapītābhiḥ patākābhiralaṅkṛtam | ketuveṣapraticchannaṃ mahākāyaniketanam

हिन्दी अर्थ

बालक हो और यह पापात्मा एक दुर्धर्ष हैत्य है तात! यह कंसका बाहर विचरनेवाला सहज प्राण है, बड़े-बड़े अश्वराजोंमें उत्तम है। युद्धमें इस दानवकी समानता करनेवाला कोई नहीं है ॥ २२ ॥ समस्त प्राणियोंको त्रास देनेवाला यह हैत्य घोड़ोंमें सबसे अधिक बलवान् है। सम्पूर्ण भूतोंमेंसे किसीके लिये भी यह वध्य नहीं है। पापाचारियोंमें यह सबसे अग्रगण्य है'॥ २३॥ उपर्युक्त बातें कहनेवाले गोपोंका वह कथन सुनकर शत्रुसूदन भगवान् मधुसूदनने केशीके साथ युद्धके लिये विचार किया॥ २४॥ तदनन्तर वह अश्व दायें-बायें चक्कर काटता हुआ अपने दोनों पैरोंसे क्रोधपूर्वक वृक्षोंको तोड़ने लगा॥ २५॥ उसके लम्बे अयालवाले मुख और घने केशोंसे ढके हुए कंधेपर जो मेघोंकी लहरोंके समान

English

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अध्याय ४४

श्लोक 47

अरुणावरजं श्रीमानारुह्य समरे हरिः ।सुवर्णं स्वेन वपुषा सुपर्णं खेचरोत्तमम्

aruṇāvarajaṃ śrīmānāruhya samare hariḥ | suvarṇaṃ svena vapuṣā suparṇaṃ khecarottamam

अध्याय ४४

श्लोक 48

तमन्वयुर्देवगणा मुनयश्च तपोधनाः ।गीर्भिः परममन्त्राभिस्तुष्टुवुश्च गदाधरम्

tamanvayurdevagaṇā munayaśca tapodhanāḥ | gīrbhiḥ paramamantrābhistuṣṭuvuśca gadādharam

अध्याय ४४

श्लोक 49

तद्वैश्रवणसंश्लिष्टं वैवस्वतपुरस्सरम् ।वारिराजपरिक्षिप्तं देवराजविराजितम्

tadvaiśravaṇasaṃśliṣṭaṃ vaivasvatapurassaram | vārirājaparikṣiptaṃ devarājavirājitam

अध्याय ४४

श्लोक 50

चन्द्रप्रभाभिर्विमलं युद्धाय समुपस्थितम् ।पवनाबद्धनिर्घोषं सम्प्रदीप्तहुताशनम्

candraprabhābhirvimalaṃ yuddhāya samupasthitam | pavanābaddhanirghoṣaṃ sampradīptahutāśanam

अध्याय ४४

श्लोक 51

विष्णोर्जिष्णोः सहिष्णोश्च भ्राजिष्णोस्तेजसा वृतम् ।बलं बलवदुद्भूतं युद्धाय समवर्तत

viṣṇorjiṣṇoḥ sahiṣṇośca bhrājiṣṇostejasā vṛtam | balaṃ balavadudbhūtaṃ yuddhāya samavartata

हिन्दी अर्थ

भुजाके अग्रभागको दाँत गड़ाकर घायल कर दिया लम्बे-लम्बे अयालसे सुशोभित केशी श्रीकृष्णके साथ जूझता हुआ उसी तरह शोभा पाने लगा, जैसे आकाशमें अंशुमाली सूर्य मेघके साथ उलझ गये हों॥ ३४॥ उस बलवान घोड़ेका पराक्रम उसके क्रोधके कारण दूना बढ़ गया था। उसने श्रीकृष्णकी छातीपर अपनी छातीसे वेग- पूर्वक चोट पहुँचानेका विचार किया॥ ३५॥ तब अमित पराक्रमी बलवान श्रीकृष्णने भी कुपित होकर उस घमंडी हैत्यके मुखमें अपनी एक बाँहको बहुत बड़ी करके डाल दिया॥ ३६॥ वह उनकी उस बाँहको अपने दाँतोंसे चबाने या विदीर्ण करनेमें समर्थ न हो सका, उलटे उसके दाँत ही जड़से उखड़ गये; साथ ही वह मुखसे फेनसहित रक्त वमन करने लगा॥ ३७॥ उसके ओठ और गलफर 'फटकर दो दलोंमें विभक्त हो गये। स््रायु-बन्धनके ढीले हो जानेसे केशीकी आँखें फटकर बाहर निकल आयीं

English

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अध्याय ४४

श्लोक 52

स्वस्त्यस्तु देवेभ्य इति स्तुत्वा तत्राङ्गिराऽब्रवीत् ।स्वस्त्यस्तु दैत्येभ्य इति उशना वाक्यमाददे

svastyastu devebhya iti stutvā tatrāṅgirā'bravīt | svastyastu daityebhya iti uśanā vākyamādade

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

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संशोधन इतिहास · Correction History:

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