Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
43
अध्याय 43 / 318

Adhyaya 43

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अध्याय ४३

श्लोक 1

देवेभिः सार्द्धं युद्धाय उद्यतस्य दैत्यसैन्यस्य वर्णनं ततो भयं विष्णुमयं श्रुत्वा दैतेयदानवाः ।उद्योगं विपुलं चक्रुर्युद्धाय युधि दुर्जयाः

devebhiḥ sārddhaṃ yuddhāya udyatasya daityasainyasya varṇanaṃ tato bhayaṃ viṣṇumayaṃ śrutvā daiteyadānavāḥ | udyogaṃ vipulaṃ cakruryuddhāya yudhi durjayāḥ

अध्याय ४३

श्लोक 2

मयस्तु काञ्चनमयं त्रिनल्वान्तरमव्ययम् ।चतुश्चक्रं विक्रमन्तं सुकल्पितमहायुधम्

mayastu kāñcanamayaṃ trinalvāntaramavyayam | catuścakraṃ vikramantaṃ sukalpitamahāyudham

अध्याय ४३

श्लोक 3

किङ्किणीजालनिर्घोषं द्वीपिचर्मपरिष्कृतम् ।खचितं रत्नजालैश्च हेमजालैश्च भूषितम्

kiṅkiṇījālanirghoṣaṃ dvīpicarmapariṣkṛtam | khacitaṃ ratnajālaiśca hemajālaiśca bhūṣitam

अध्याय ४३

श्लोक 4

स्वक्षं रथवरोदग्रं सूपस्थानमगोपमम् ।ईहामृगगणाकीर्णं पक्षिभिश्च विराजितम् ।दिव्यास्त्रतूणीरधरं पयोधरनिनादितम्

svakṣaṃ rathavarodagraṃ sūpasthānamagopamam | īhāmṛgagaṇākīrṇaṃ pakṣibhiśca virājitam | divyāstratūṇīradharaṃ payodharanināditam

हिन्दी अर्थ

तस्मात् स्थानान्न व्यचलत् कृष्णो गिरिरिवाचल: कृष्णस्थ निधनाकाडक्षी तूर्णमभ्युत्पपात ह उसका कटिभाग विशाल था और मुख स्थूल था, दोनों घुटने सुदृढ़ थे और पेट बहुत बड़ा था। उसके गलेका कंबल लटक रहा था और वह सींग नीचे किये उछलता-कूदता आगे बढ़ रहा था॥५॥ वह गौओंके पिछले भागपर चढ़नेके लिये चञ्लल हो रहा था। वृजक्षोंसे टक्कर लेनेके कारण उसके मस्तकमें कई जगह घडट्टे पड़ गये थे। वह अपने सींगोंके अग्रभागको सदा जूझनेके लिये उद्यत रखता था तथा विपक्षी बैलोंको मार डालता था

English

Vaishampāyana continued:—Hearing from Nārada, the account of his death, Kansa, out of fear, began to hold counsels as to how he should destroy Devaki's embryo (8). On the other hand, being informed of the portendous and dreadful efforts of Kansa while out of sight, the powerful Vishnu began to think (9) "Bhoja's descendant Kansa will destroy the first seven children of Devaki. In her eighth conception I shall have to live in her womb" (10). While thus meditating his mind flew where the Saragarbha Danavas, by name, Hansa, Suvikrātha, Damana, Ripunardana, and Krodhahartā were living in the water (11). These immortal-like Saragarbhas, the sons of Kālanemi, were powerful like the celestials, were of effulgent persons and experts in battle (12). Leaving their own grand-father Hiranyakasipu and wearing mantted locks those Saragarbha Daityas worshipped the Grand-father of all, Brahmā, with hard penances who, being pleased, conferred on them the following boon (13-14).

अध्याय ४३

श्लोक 5

गदापरिघसम्पूर्णं मूर्तिमन्तमिवार्णवम् ।हेमकेयूरवलयं स्वर्णमण्डलकूबरम्

gadāparighasampūrṇaṃ mūrtimantamivārṇavam | hemakeyūravalayaṃ svarṇamaṇḍalakūbaram

अध्याय ४३

श्लोक 6

सपताकध्वजोदग्रं सादित्यमिव मन्दरम् ।गजेन्द्राम्भोदसदृशं लम्बकेसरवर्चसम्

sapatākadhvajodagraṃ sādityamiva mandaram | gajendrāmbhodasadṛśaṃ lambakesaravarcasam

अध्याय ४३

श्लोक 7

युक्तमृक्षसहस्रेण सहस्राम्बुदनादितम् ।दीप्तमाकाशगं दिव्यं रथं पररथारुजम्

yuktamṛkṣasahasreṇa sahasrāmbudanāditam | dīptamākāśagaṃ divyaṃ rathaṃ pararathārujam

अध्याय ४३

श्लोक 8

अध्यतिष्ठद्रणाकाङ्क्षी मेरुं दीप्तमिवांशुमान् ।तारस्तु क्रोशविस्तारमायसं वायसध्वजम्

adhyatiṣṭhadraṇākāṅkṣī meruṃ dīptamivāṃśumān | tārastu krośavistāramāyasaṃ vāyasadhvajam

अध्याय ४३

श्लोक 9

शैलोत्करसमाकीर्णं नीलाञ्जनचयोपमम् ।काललोहाष्टचरणं लोहेषायुगकूबरम् ।तिमिराङ्गारकिरणं गर्जन्तमिव तोयदम्

śailotkarasamākīrṇaṃ nīlāñjanacayopamam | kālalohāṣṭacaraṇaṃ loheṣāyugakūbaram | timirāṅgārakiraṇaṃ garjantamiva toyadam

अध्याय ४३

श्लोक 10

लोहजालेन महता सगवाक्षेण दंशितम् ।आयसैः परिघैः कीर्णं क्षेपणीयैस्तथाश्मभिः

lohajālena mahatā sagavākṣeṇa daṃśitam | āyasaiḥ parighaiḥ kīrṇaṃ kṣepaṇīyaistathāśmabhiḥ

अध्याय ४३

श्लोक 11

प्रासैः पाशैश्च विततैरवसक्तैश्च मुद्गरैः ।शोभितं त्रासनीयैश्च तोमरैः सपरश्वधैः

prāsaiḥ pāśaiśca vitatairavasaktaiśca mudgaraiḥ | śobhitaṃ trāsanīyaiśca tomaraiḥ saparaśvadhaiḥ

हिन्दी अर्थ

पूतनायां हतायां च कालिये च पराजिते। धेनुके प्रलयं नीते प्रलम्बे च निपातिते॥ गोषु त्रातासु च तथा स्पृहणीयेन कर्मणा कर्षणे वृक्षयोश्रेव शकटस्थ तथेव च। अच्ित्त्य॑ कर्म तच्छुत्वा वर्धमानेषु शत्रुषु निशि स्तिमितमूकायां मथुरायां जनाधिप:

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ४३

श्लोक 12

उद्यन्तं द्विषतां हेतोर्द्वितीयमिव मन्दरम् ।युक्तं खरसहस्रेण सोऽध्यारोहद्रथोत्तमम्

udyantaṃ dviṣatāṃ hetordvitīyamiva mandaram | yuktaṃ kharasahasreṇa so'dhyārohadrathottamam

अध्याय ४३

श्लोक 13

विरोचनस्तु सङ्क्रुद्धो गदापाणिरवस्थितः ।प्रमुखे तस्य सैन्यस्य दीप्तशृङ्ग इवाचलः

virocanastu saṅkruddho gadāpāṇiravasthitaḥ | pramukhe tasya sainyasya dīptaśṛṅga ivācalaḥ

अध्याय ४३

श्लोक 14

युक्तं हयसहस्रेण हयग्रीवस्तु दानवः ।स्यन्दनं वाहयामास सपत्नानीकमर्दनः

yuktaṃ hayasahasreṇa hayagrīvastu dānavaḥ | syandanaṃ vāhayāmāsa sapatnānīkamardanaḥ

हिन्दी अर्थ

अब मेरे ऊपर अरिष्ट आया ही चाहता है। इससे उसकी इन्द्रियाँ, शरीर और मन-बुद्धि सब-के-सब अचेत हो गये तथा वह प्राणहीन-सा प्रतीत होने लगा॥ २--६ ॥ तदनन्तर भयंकर शासनवाले राजा कंसने रात्रिके नीरव एवं निस्तब्धकालमें मथुरापुरीके भीतर रहनेवाले समस्त बन्धु- बान्धवों तथा अपने पिता उग्रसेनको भी बुलाया दारुक, कड्डके छोटे भाई, भोज, वैतरण, महाबली विकद्रु, धर्मज्ञ भयशह्'ु, पृथुल राजलक्ष्मीसे सम्पन्न विपृथु, दानपति इन सब यादवोंको बुलाकर सबको सम्बोधित करके मथुराके स्वामी उग्रसेनकुमार राजा कंसने कहा--' बन्धुओ आपलोग सुनें ॥ ८--११ ॥ आप समस्त कर्तव्य-कर्मोके ज्ञाता, वेदोंके परिनिष्ठित विद्वान, न्‍्यायोचित बर्तावमें कुशल, धर्म, अर्थ

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ४३

श्लोक 15

व्यायतं बहुसाहस्रं धनुर्विस्फारयन्महत् ।वराहः प्रमुखे तस्थौ सावरोह इवाचलः

vyāyataṃ bahusāhasraṃ dhanurvisphārayanmahat | varāhaḥ pramukhe tasthau sāvaroha ivācalaḥ

हिन्दी अर्थ

कर्तव्यानां च कर्तारो लोकस्य विबुधोपमा: । तस्थिवांसो महावृत्ते निष्कम्पा इव पर्वता: यशःप्रदीपा लोकानां वेदार्थानां विवक्षव: । आश्रमाणां निसर्गज्ञा वर्णानां क्रमपारगा: व्यावर्तमानं सुमहद् भवद्धिः ख्यातकीर्तिभि:। धृतं यदुकुल॑ वीरैर्भूतलं॑ पर्वतैिरिव एष कृष्ण इति ख्यातो नन्दगोपसुतो ब्रजे। वर्धमान इवाम्भोधिमूल नः परिकृन्तति

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ४३

श्लोक 16

खरस्तु विक्षरन् दर्पान्नेत्राभ्यां रोषजं जलम् ।स्फुरद्दन्तौष्ठवदनः सङ्ग्रामं सोऽभ्यकाङ्क्षत

kharastu vikṣaran darpānnetrābhyāṃ roṣajaṃ jalam | sphuraddantauṣṭhavadanaḥ saṅgrāmaṃ so'bhyakāṅkṣata

अध्याय ४३

श्लोक 17

त्वष्टा त्वष्टादशहयं यानमास्थाय दानवः ।व्यूहितो दानवैर्व्यूहैः परिचक्राम वीर्यवान्

tvaṣṭā tvaṣṭādaśahayaṃ yānamāsthāya dānavaḥ | vyūhito dānavairvyūhaiḥ paricakrāma vīryavān

अध्याय ४३

श्लोक 18

विप्रचित्तिसुतः श्वेतः श्वेतकुण्डलभूषणः ।श्वेतशैलप्रतीकाशो युद्धायाभिमुखः स्थितः

vipracittisutaḥ śvetaḥ śvetakuṇḍalabhūṣaṇaḥ | śvetaśailapratīkāśo yuddhāyābhimukhaḥ sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

तरह जैसे पर्वतोंने इस भूतलको दृढ़तापूर्वक धारण कर रखा है॥ १९॥ आपलोग ऐसे सुयोग्य हैं और सदा मेरे अनुकूल चलते हैं, परंतु इस समय आपलोगोंके होते हुए भी मेरे अनर्थ (संकट)-की वृद्धि हो रही है, पता नहीं आपने उसकी उपेक्षा कैसे कर दी है॥ २० ॥ ब्रजमें कृष्ण नामसे विख्यात जो यह नन्द-गोपका बेटा है, वह (मर्यादाको लाँधघकर) बढ़नेवाले समुद्रकी भाँति बढ़कर हमारी जड़ काट रहा है॥ २१॥ मेरे पास कोई सुयोग्य गुप्तचररूपी नेत्रसे हीन होनेके कारण अंधा हो गया हूँ। मेरे इसी दोषके कारण नन्द-गोपका वह पुत्र अपने घरमें सुरक्षित रह सका है॥२२॥ वह दुरात्मा उपेक्षित रोग तथा वर्षा-ऋतुमें निरन्तर जलसे भरनेवाले गरजते हुए मेघकी भाँति बढ़ता जा रहा है'

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ४३

श्लोक 19

अरिष्टो बलिपुत्रस्तु वरिष्ठोऽद्रिशिलायुधैः ।युद्धायातिष्ठदायस्तो धराधर इवापरः

ariṣṭo baliputrastu variṣṭho'driśilāyudhaiḥ | yuddhāyātiṣṭhadāyasto dharādhara ivāparaḥ

अध्याय ४३

श्लोक 20

किशोरस्त्वतिसंहर्षात् किशोर इव चोदितः ।अभवद् दैत्यसैन्यस्य मध्ये रविरिवोदितः

kiśorastvatisaṃharṣāt kiśora iva coditaḥ | abhavad daityasainyasya madhye ravirivoditaḥ

अध्याय ४३

श्लोक 21

लम्बस्तु लम्बमेघाभः प्रलम्बाम्बरभूषणः ।दैत्यव्यूहगतो भाति सनीहार इवांशुमान्

lambastu lambameghābhaḥ pralambāmbarabhūṣaṇaḥ | daityavyūhagato bhāti sanīhāra ivāṃśumān

हिन्दी अर्थ

पता नहीं कौन-सा भूत उसके रूपमें उत्पन्न हुआ है। वह किसी देवताकी संतान है, यह बात भी मेरी समझमें नहीं आती। उसके जो कर्म हैं, वे देवताओं और मनुष्योंके लिये असाध्य हैं। उन कर्मोंस ही यह अनुमान होता है कि वह देवताओंसे भी अधिक शक्तिशाली है पूतना नामवाली पक्षिणी एक दुर्जय राक्षती थी।वह जब इसे बाल्यावस्थामें दूध पिलाने गयी, उस समय यह खाटपर उत्तान सोनेवाला शिशुमात्र था, परंतु उसका स्तनपान करनेकी इच्छासे जब इसने मुँह लगाया, तब उसके प्राणोंक साथ यह उसे ही पी गया॥ २६ ॥ यमुनाके कुण्डमें जो कालिय नाग रहता था, उसका भी इसने दमन कर दिया और क्षणभरमें उस कुण्डसे उसको अदृश्य करके रसातलचारी बना दिया॥ २७॥ उस नागके हट

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ४३

श्लोक 22

स्वर्भानुर्वक्रयोधी तु दशनौष्ठेक्षणायुधः ।हसंस्तिष्ठति दैत्यानां प्रमुखे स महाग्रहः

svarbhānurvakrayodhī tu daśanauṣṭhekṣaṇāyudhaḥ | hasaṃstiṣṭhati daityānāṃ pramukhe sa mahāgrahaḥ

अध्याय ४३

श्लोक 23

अन्ये हयगता भान्ति नागस्कन्धगताः परे ।सिंहव्याघ्रगताश्चान्ये वराहर्क्षगताः परे

anye hayagatā bhānti nāgaskandhagatāḥ pare | siṃhavyāghragatāścānye varāharkṣagatāḥ pare

हिन्दी अर्थ

है और वह भय दूर नहीं अत्यन्त निकट है पूर्वजन्ममें इस शरीरके लिये जो भूतपूर्व मृत्यु था, वही इस समय भी युद्धकी अभिलाषा रखकर सदा मेरे सामने खड़ा रहता है॥३३॥ कहाँ तो अशुभ गोपत्व और मौतकी दुर्बलता धारण करनेवाला मानव-शरीर तथा कहाँ उसका मेरे ब्रजमें रहकर देवतुल्य प्रभावसे अद्भुत क्रीड़ा करना को5प्येष रमते देव: एमशानस्थ इवानल:

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ४३

श्लोक 24

केचित् खरोष्ट्रयातारः केचित् तोयदवाहनाः ।नानापक्षिगताश्चान्ये केचित् पवनवाहनाः

kecit kharoṣṭrayātāraḥ kecit toyadavāhanāḥ | nānāpakṣigatāścānye kecit pavanavāhanāḥ

अध्याय ४३

श्लोक 25

पत्तयश्चापरे दैत्या भीषणा विकृताननाः ।एकपादा द्विपादाश्च नर्दन्तो युद्धकाङ्क्षिणः

pattayaścāpare daityā bhīṣaṇā vikṛtānanāḥ | ekapādā dvipādāśca nardanto yuddhakāṅkṣiṇaḥ

अध्याय ४३

श्लोक 26

प्रक्ष्वेडमाना बहवः स्फोटयन्तश्च ते भुजान् ।दृप्तशार्दूलनिर्घोषा नेदुर्दानवपुङ्गवाः

prakṣveḍamānā bahavaḥ sphoṭayantaśca te bhujān | dṛptaśārdūlanirghoṣā nedurdānavapuṅgavāḥ

अध्याय ४३

श्लोक 27

ते गदापरिघैरुग्रैर्धनुर्व्यायामशालिनः ।बाहुभिः परिघाकारैस्तर्जयन्ति स्म देवताः

te gadāparighairugrairdhanurvyāyāmaśālinaḥ | bāhubhiḥ parighākāraistarjayanti sma devatāḥ

अध्याय ४३

श्लोक 28

प्रासैः पाशैश्च खड्गैश्च तोमराङ्कुशपट्टिशैः ।चिक्रीडुस्ते शतघ्नीभिः शतधारैश्च मुद्गरैः

prāsaiḥ pāśaiśca khaḍgaiśca tomarāṅkuśapaṭṭiśaiḥ | cikrīḍuste śataghnībhiḥ śatadhāraiśca mudgaraiḥ

अध्याय ४३

श्लोक 29

गण्डशैलैश्च शैलैश्च परिघैश्चोत्तमायुधैः ।चक्रैश्च दैत्यप्रवराश्चक्रुरानन्दितं बलम्

gaṇḍaśailaiśca śailaiśca parighaiścottamāyudhaiḥ | cakraiśca daityapravarāścakrurānanditaṃ balam

हिन्दी अर्थ

दिया। हैत्योंने जो ब्रह्महत्या की, उसी पापसे उनके राज्यमें वर्षा बंद हो गयी। तदेष नून॑ विष्णुर्वा शक्रो वा मरुतां पति: । मत्साधनेच्छया प्राप्तो नारदो मां यदुक्तवान् अन्न मे शद्भते बुद्धिर्वसुदेवं॑ प्रति ध्रुवा। अस्य बुद्धिविशेषेण वयं कातरतां गता: वबसुदेवेन ते रात्रौ तत्कर्म विफलीकृतम्

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ४३

श्लोक 30

एवं तद् दानवं सैन्यं सर्वे युद्धबलोत्कटम् ।देवताभिमुखं तस्थौ मेघानीकमिवोत्थितम्

evaṃ tad dānavaṃ sainyaṃ sarve yuddhabalotkaṭam | devatābhimukhaṃ tasthau meghānīkamivotthitam

अध्याय ४३

श्लोक 31

तदद्भुतं दैत्यसहस्रगाढं वाय्वग्नितोयाम्बुदशैलकल्पम् ।बलं रणौघाभ्युदयावकीर्णं युयुत्सयोन्मत्तमिवावभासे

tadadbhutaṃ daityasahasragāḍhaṃ vāyvagnitoyāmbudaśailakalpam | balaṃ raṇaughābhyudayāvakīrṇaṃ yuyutsayonmattamivāvabhāse

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

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