अध्याय २२
श्लोक 2.9.1
॥ अथ खल्वमुमादित्यँसप्तविधँ सामोपासीत सर्वदा समस्तेन साम मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम
|| atha khalvamumAditya{\m+}saptavidha{\m+} sAmopAsIta sarvadA samastena sAma mAM prati mAM pratIti sarveNa samastena sAma
हिन्दी अर्थ
तथा आदि्यका जो रूप मध्याहके पश्चात् ओौर॒ अपराहके पूवं होता है बह प्रतिहार है । उसके उस्र खूपके धनुगामी गभ॑ है । इसीपे चे प्रतिहृत ८ ऊपरकी ओर जाङ्ृष्ट ) किये जनेषर नीचे नही गिरते, अथ यदृष्वं मच्यन्दिनात्राग- तथा जादित्यका जो रूप मध्याह- पराह्ायद्रूपं सवितुः स प्रति- के पृशवात् भौर अपराडसे पूरव हारस्तदस्य गमां अन्वायत्ताः । होता है बह प्रतिहार है । उसके त्था आदियका जो रूप अपराहके पवात् ओर सूरयसतते पूवं होता वह उपद्रव है । उसके उख रूपके अनुगामी वन्य पञ्च है । इसीसे वे पुरूषको देखकर भयवरा अरण्य अथवा गुहाम भाग जाते है,
English
Let a man meditate on the sevenfold Sâman as the sun. The sun is Sâman, because he is always the same (sama); he is Sâman because he is the same, everybody thinking he looks towards me, he looks towards me .