Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
20
अध्याय 20 / 154

Adhyāya 20

2 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय २०

श्लोक 2.7.1

॥ प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयाँसि वा एतानि

|| prANeShu pa~nchavidhaM parovarIyaH sAmopAsIta prANo hiMkAro vAkprastAvashchakShurudgIthaH shrotraM pratihAro mano nidhanaM parovarIyA{\m+}si vA etAni

हिन्दी अर्थ

दुग्येऽस्मा इ्याचयुक्ता्थम्‌ ।।२॥ ्ुगेऽस्मे' इयादि श्रुतिका ज पहले ( १।३।७में) कहा जदित्यविषयिणी सात अ्रकारक्ी सामोपात्तना अब उस आदिव्थके रूपमे सप्षविध सामकी उपासना करनी चाहिए । आदित्य सर्वदा सम है, इसख्यि वहः साम है । मेरे प्रति, मेरे प्रति एेसा शनुमूत होनेके कारण वह सबके प्रति सम है, इसलिये साम है

English

Let a man meditate on the fivefold Sâman, which is greater than great, as the prânas (senses). The hiṅkâra is smell (nose), the prastâva speech (tongue), the udgîtha sight (eye), the pratihâra hearing (ear), the nidhana mind. These are one greater than the other.

अध्याय २०

श्लोक 2.7.2

परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान्प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य

parovarIyo hAsya bhavati parovarIyaso ha lokA~njayati ya etadevaM vidvAnprANeShu pa~nchavidhaM parovarIyaH sAmopAsta iti tu pa~nchavidhasya

हिन्दी अर्थ

पश्चविध सामोपासनाओंँके प्रसङ्खमे तथा प्रथम अध्यायमें केवर ङायी गयी है । उसके बाद अब यह्‌ त्स्य यत्पुरोदयात्स हिंकारस्तदस्य पडावोऽन्वायत्तास्त- स्मात्ते हिं कुवन्ति हिंकारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः आदियके उद्यसे पूवं है वह हकार है । उत सूर्यका जो हिकारख्प है आदित्यावयवोके सम्बन्धे ९ होनेमे जो-जो कारण है, वेदी दित्वं गम्य इति हिंकारादित्वे

English

What is greater than great belongs to him, nay, he conquers the worlds which are greater than great, who knowing this meditates on the fivefold Sâman, which is greater than great, as the prânas (senses).

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 20
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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