Atharva Veda· Atharvaveda Saṁhitā
15
अध्याय 15 / 20

Kanda 15

काण्ड 15

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पूर्ण अध्याय पाठ91 श्लोक

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अध्याय १५

श्लोक 11.1

१-११ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ दैवी पङ्क्तिः, २ द्विपदा पूर्वात्रिष्टुबतिशक्वरी, ३-६, ८, १० निचृदाऽर्ची बृहती (१० भुरिक्), ७,९ द्विपदा प्राजापत्या बृहती, ११ द्विपदाऽर्च्यनुष्टुप्।तद् यस्यै॒वं वि॒द्वान् व्रात्योऽति॑थिर्गृ॒हाना॒गछे॑त्

1-11 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 daivī paṅktiḥ, 2 dvipadā pūrvātriṣṭubatiśakvarī, 3-6, 8, 10 nicṛdā'rcī bṛhatī (10 bhurik), 7,9 dvipadā prājāpatyā bṛhatī, 11 dvipadā'rcyanuṣṭup| tad yasyaivaṃ vidvān vrātyo'tithirgṛhānāgachet

हिन्दी अर्थ

सुवणम् =्रकृति-ततत्व उत्तम-वणो वाला है । इवेता० उपनिषद् मेँ दन तीन वर्णो का परस्पर मेल सुवणं रूप है, उत्तमव्णो वाला है। - वान् था, उस कलमं वायु भ्रादिकी सत्तानथी। । १४६ अ्रथवेवेद-माष्य का०. १५ । भ्रनु०° १। सू० १ प्रजायेय (छीन्दो० भ्र० ६, खं०२) मे भी इसी तथ्य का कथन किया है) का० १५। श्रनु° १। सू० १ भरथर्गवेद-भाष्य १४७ ==्कालन्तर मे नाना विषमपरिणामों मे.से गुजरता हुश्रा मत्तत्व,

English

Now this Earth is Brihaspati, and Heaven is Indra.

अध्याय १५

श्लोक 11.2

स्व॒यमे॑नमभ्यु॒देत्य॑ ब्रूया॒द् व्रात्य॒ क्वाऽवात्सी॒र्व्रात्यो॑द॒कं व्रात्य॑ त॒र्पय॑न्तु॒ व्रात्य॒ यथा॑ ते प्रि॒यं तथा॑स्तु॒ व्रात्य॒ यथा॑ ते॒ वश॒स्तथा॑स्तु॒ व्रात्य॒ यथा॑ ते निका॒मस्तथा॒स्त्विति॑

svayamenamabhyudetya brūyād vrātya kvā'vātsīrvrātyodakaṃ vrātya tarpayantu vrātya yathā te priyaṃ tathāstu vrātya yathā te vaśastathāstu vrātya yathā te nikāmastathāstviti

हिन्दी अर्थ

कादहै। शत्रू सेना पर विजय प्राप्त करने के लिये इन किररों के. प्रयोग का विघान, भ्रथं ववेद के निम्नलिखित मन्त में भीहुभ्राहै। यथा, “इतो से जीत, इधर से विजयी बन, सम्यक्-विजय प्राप्तं कैर, विजयी बन सैनिक (जयन्तु ) विजयी हँ, (भ्रमी) वे परराष्टर के संनिक (पराजयन्तामु) जनो के लिये (दुराहा) युद्धयज्ञ. मेँ उन की ्राहुतियां दुःखदायक हो । भ्राच्छादित करता हूं, भ्रथवा .उन घनुर्षो की डोरियों को तनावसे १५१ भ्रथर्ववेद-भाष्य का १५। भ्रनु° १।सू० १ का वध, तथा उन पर विजय कंसे प्राप्त की जा सकेतो है,- यह् विचार- 00 दूष्टिगोचर होता है । जल के कणो के कारण सूर्यं की किरणो फट

English

Who knows that Earth is Brihaspati and Agni Priesthood.

अध्याय १५

श्लोक 11.3

यदे॑न॒माह॒ व्रात्य॒ क्वाऽवात्सी॒रिति॑ प॒थ ए॒व तेन॑ देव॒याना॒नव॑ रुन्द्धे

yadenamāha vrātya kvā'vātsīriti patha eva tena devayānānava runddhe

हिन्दी अर्थ

निम्नलिखित क्रम मे होती है, लाल.(7२6५), पीत - न0फ), नारंगी (01808), हरी (श्ट), आकारोय या भ्रासमानी (1), नीलपौदे के नीली भौर लाल पटिर्ट्यों का निदशकरतेहै। इनदोप्रकारकीया इन दो के.मध्यगत भी पटटियों क सदुश किरणसमूरहो का युद्ध भे प्रयोग किस सप्तरंगी रदिमयो मँ लालरदिमयों के पत्रवर्तो रदिमयों को ए0.४- परवर्ती रर्मियोँ को 112-1016 कहते ह । इन दो प्रकार की रदिमियों का प्रयोग द्वितीय-महायुद्धमें हुभ्राथा। यथा १. “नीललोहितेन" पद मे समाहार दनद, प्रौर चरुकि मन्व ६ प्रौरं७में “नील भ्रौर लोहित" किरए-समुहं ही सम्मव है" न कि सूत ।

English

Great power comes to him and he becomes endowed with great power.

अध्याय १५

श्लोक 11.4

यदे॑न॒माह॒ व्रात्यो॑द॒कमित्य॒प ए॒व तेनाव॑ रुन्द्धे

yadenamāha vrātyodakamityapa eva tenāva runddhe

हिन्दी अर्थ

का०.१५। श्रनु० १ सू०२ भ्रथर्गवेद-माष्य ५१ दवारा, द्वितीय महायुद्ध में, फोटोले कर भरन्धकारमें भीशषतरुभ्रोंकी खोज की गई थी । तथा कामज पर पड़ीं भ्रङ्गुली-छापों पर एक प्रकार का चम- कौला-चरुणं डालकर, ए10्2-शंगल रादिमियो मेडन की परौ की गर युद्ध मे. कयि जाने का निर्दे हमरा है । के. (श्नु) साथ-साथ (व्यचलतु) विदोषतया चला या विचरा । मन्व मे किसी ेतिहासिकं वृत्त का वंन नहीं । प्ररोचनां ठेति- वस्तु का कथारूप में वरन किया जाता है । सर्वत्र जा कर सदूपदेद किया करे । १५५ भ्रथववेद-भाष्य काण १५। भ्रनु० १। सु०र२

English

Who knows that Āditya is Royalty and that Heaven is Indra.

अध्याय १५

श्लोक 11.5

यदे॑न॒माह॒ व्रात्य॑ त॒र्पय॒न्त्विति॑ प्रा॒णमे॒व तेन॒ वर्षी॑यांसं कुरुते

yadenamāha vrātya tarpayantviti prāṇameva tena varṣīyāṃsaṃ kurute

हिन्दी अर्थ

१।३।१४) मे उठने का भ्रभिप्राय है--यटन करना । अनु=1०ण्ट, १४६. ते बृहच्च रथन्त॒रं चादित्यश्च पिश च. देवा भी वर्णन होता है ' अनुयायी लोगो को गान, ग्राह्वादप्रद होने के साय (वै) निदचय से (सः) वह् व्यक्ति, (बृहते च) बृहत सामगानों (रथ- , वुष्चते) श्रये भ्रापको पूणंतया वञ्चित कर लेता है, (यः) जोकि (एवमु .संगेति मेँ रह कर, (वदति) उस के साथ वाद-विवाद करता है । , महात्मार्भो के संदुपदे्ो मँ श्रद्धा करनी चाहिए, वोदविवाद नहीं ।

English

Rise up of his own accord to meet him, and say, Vrātya, where didst thou pass the night?

अध्याय १५

श्लोक 11.6

यदे॑न॒माह॒ व्रात्य॒ यथा॑ ते प्रि॒यं तथा॒स्त्विति॑ प्रि॒यमे॒व तेनाव॑ रुन्द्धे

yadenamāha vrātya yathā te priyaṃ tathāstviti priyameva tenāva runddhe

हिन्दी अर्थ

का० १५ ।्वनु° १1 सू०.२ भ्रथवंवेद-भाष्य १५३ (सः) वह श्रद्धालु व्यित, (वे) निदचय से, (बृहतः च) बृहत् सामगानोँ संन्यासी की (प्राच्याम् दिशि) पूवं दिला मः-- केशा हरितो भवर्तौ कल्मलिर्मणिः ॥१५॥ होती है (मित्रः) मेत्रीभावना वाला व्यक्ति (मागृधः) साभगायक होता है, पगड़ी, भ्रौर (रात्री) रात्री (केशाः) सिर के केश, (हरितौ) मनोहारी सूयं- भर्थात् फलों की कलियां (मरि) मणियां होती है। भ्रौर उसकी रक्षिकाहोती है, भ्रौर उसे विपथगमन से बचाती रहती है । यथा ““धद्धा जननीव कल्या सौ योणिनं पाति । तथा “षदावीयं- .

English

Vratya, here is water, Let them refresh thee. Vrātya, let it be as thou pleasest. Vrātya, as thy

अध्याय १५

श्लोक 11.7

ऐनं॑ प्रि॒यं ग॑च्छति प्रि॒यः प्रि॒यस्य॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑

ainaṃ priyaṃ gacchati priyaḥ priyasya bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

होने का मुख्य साधन दर्चाया है - वासः == वस्त्र होता है शरीर की रक्षा तथा लाज रखनेवाला। रखते हैँ । विज्ञानी महषि दयानन्द, लंगोट-धारी वस्वरहीन संन्यासी बन संन्यासी भी करतें । नांगे साधु इस प्रथा के श्रष्टरूप के उदाहरण है । १५४ - भ्रथर्वेवेद-भाष्य काऽ १५ । श्रनु° १।सूु०२ उष्णीषम् पगड़ी । रुन्पासी की पगड़ी नहीं होती । उसके ्युप्त- केदा-सिर पर चमकते दिन को उस की पगड़ी कहा है । शुक्लवणा की पगड़ी श्रेष्ठ होती है । दिन शुक्लवर्णं वाला होता है। भरतः वह पगडीखूप , है । व्युप्तकेसी संन्यासी के केश नहीं होते । केगों के इष्णवरा के कारण भविष्य मेँ होनेवाला व्रतमय भौर परोपकारी जीवन (परिष्कन्दौ) इस के चारोंश्रोर से रक्षक होते है, (मनः) मन (विपथम्) विविघ पथगामीरथ होता है, विविव प्रकार के कठिनि-मार्गोँमे भी ले चलनेवाला. रथ.होता संन्यासी के त्रतमय तथा परहितकारी जीवन ही इस के लिथे दो रक्षकुरखष है । इस का मनोबल इस की कठिन से कठिन जोवन यात्रा भ रथ होता है, जो क्लिष्ट पथो पर भी चल सकता है ।

English

wish is so let it be. Vrātya, as thy desire is so be it.

अध्याय १५

श्लोक 11.8

यदे॑न॒माह॒ व्रात्य॒ यथा॑ ते॒ वश॒स्तथा॒स्त्विति॒ वश॑मे॒व तेनाव॑ रुन्द्धे

yadenamāha vrātya yathā te vaśastathāstviti vaśameva tenāva runddhe

हिन्दी अर्थ

प्रहर किया जा सकता है । थथा “यदहरेव विरजेतु तदहरेव ्रत्रजेतु शाद्व वनाद्रा का० १५ । अ्रनु° १। सु०२ -. भथववेद-भाष्य १५५ करीरनिष्ठ प्राणवायु . (विपथवाहौ) मनरूपी-विपथरथ के वहन करनेवाले दो श्रव होते ह, (वातः) वातनामक या वाताधिपति परमेर्वर (सारथी) इन दो श्रर्वो को प्रेरित करता है, (रेऽ्मा) श्रवो के नथनों के इवास- प्रर्वास की भरावाज कै समान संन्यासो के दो नासारन्धों मेँ होनेवाले (नि० ७1७1२९६) । श्वसिति -= गच्छति । भ्रनिति गतिकर्मा (निषं० दारा शरीर को पवित्र करती रहती है । मात्तरिद्वा श्रौरपवभान, मन के वाहक दो ररव ह । इन दोनों के होते मन काय॑कारी होता है) इवास- प्रवा को समाप्तिमें मन निष्क्रियिसाहो जाता है। - प१रमेदवर को वायु कहा है । वायु = रात ।यइ परमेइव रही -मातरिदवा तथा- पवभान को प्रेरित कर रहा -है।श्रौर यह् ही परमेश्वर शरीर के इ्वास- हिनरहिनाहटं । श्रव के नथनों मेँ हिनहिनाहटं होती रहती है । इवास- चाबुक समान है इस श्रावाज के रहते ही श्वासप्रश्वास की गति रहती

English

When he says to his guest, Where didst thou pass the night? he reserves for himself thereby

अध्याय १५

श्लोक 11.9

ऐनं॒ वशो॑ ग॑च्छति व॒शी व॒शिनां॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑

ainaṃ vaśo gacchati vaśī vaśināṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

बाहिर निकाल; शरीर को पवित्र करती रहती है । भ्न्तरिक्षकीवायुही शरीर में भ्रवेश पाकर पवमान संज्ञक हो जाती है । इवास भौर प्रदवासं इनकी गतिरूप है । १५६ श्रथरवंवेद-माष्य का० १५॥ भ्रनु० १ । सु° २ की शरुरघुराहट के लिये प्रयुक्त होता है । (कीत्तिः चं) व्रतो तया परोपकारी संन्यासी के सुगो भ्रौर (एवम्) इस प्रकार के तथ्य को (वेद) जानता, तथाः तदनुसार कम या कीति यशोगानः; - “कीत्येते संशब्दधते सा कीत्तिः (उणा० ४१२०, म० दया०) । वेद जानता है । वेदिक दृष्टि मेँ वेदन-भर्थात् ( सः) वह व्रती तथा परहितकारी संन्यासी (उदतिष्ठतु)उढा, प्रयतन-

English

the paths that lead to the Gods.

अध्याय १५

श्लोक 11.10

यदे॑न॒माह॒ व्रात्य॒ यथा॑ ते निका॒मस्तथा॒स्त्विति॑ निका॒ममे॒व तेनाव॑ रुन्द्धे

yadenamāha vrātya yathā te nikāmastathāstviti nikāmameva tenāva runddhe

हिन्दी अर्थ

मायावादियों की दृष्टिसे मायारूप या भिथ्या तथा भ्नमरूप नहीं है। परमेरवर के सम्बन्ध में जब..“जन् धातु काप्रयोगहोतौ उस से परमे- दवर का शारीरिक्र-जन्म न समभना चाहिए, जैसे कि भ्रवतारवादी नस-नाडियो से रहित कहा है । तथा "स वां ऋरभ्योजायत” (भ्रथवं ° -१३। हु्रा कहा है । ऋचाभ्रो द्वारा परमेदवर के गुणधमं प्रकट होते है, इन दारा परमेहवर का शरीरिकं जन्म नहीं हो सक्ता । १४३. सवधेत्र॒ स महान॑मवत् स महादेवो मवत् ॥४॥ गुणकूमौ की दुष्टिसे बढ़ा, निज महिमा में बढ़ा, (सः) -वंह (महान्) महामहिमख्प (अभवत्) हृभ्रा (सः) वह् (महादेवः) देवाधिदेवू्प मे (भवं ° २०।१०८।२)मन्तर मेँ परमेश्वर के पिता तथा मता स्वरूपो का वर्णन हुभराः १४८ भ्रथर्वविद-माष्य का० १५। भरनु० १। सू०१

English

Now this Agni is Priesthood, and yonder Sun is Royalty.

अध्याय १५

श्लोक 11.11

ऐनं॑ निका॒मो ग॑च्छति निका॒मे नि॑का॒मस्य॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑

ainaṃ nikāmo gacchati nikāme nikāmasya bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

१४४. स देवानामीज्ां पर्यैत् स ईशांनोमवत्॥५। (सः) वह परमेरवर देवानाम्) प्रकाम सूयं ्रादि का (ईलाम् ईशान का भ्रथं है शासक । वहु सब देवो का लासक हुश्रा, इसलिये वह महादेव तथा ईशान कइलाया । अन्नाद्रेतः, रेतसः, पुदषः,स वा एष पुरुषोऽन्नरसमय" (तत्ति° भार० ८।२), संस्करण,राम लाल. कपुर टृस्ट, बहालगठ़ृ । ऋग्वेद (१।१९०।१) मेँ “ततः का०.१५ । भ्नु० १। सू ग्रथर्ववेद-भाष्य १४९ यह (ब्रह्मवादिनः) वेदवेत्ता (वदन्ति) कहते है ।

English

Priesthood comes to him, and he becomes endowed with priestly lustre.

अध्याय १५

श्लोक 12.1

१-११ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ त्रिपदा गायत्री, २ प्राजापत्याबृहती, ३-४ भुरिक्प्राजापत्याऽनुष्टुप् (४ साम्नी), ५-६, ९-१० आसुरी गायत्री, ८ विराड् गायत्री, ७,११ त्रिपदा प्राजापत्या त्रिष्टुप्।तद् यस्यै॒वं वि॒द्वान् व्रात्य॒ उद्धृ॑तेष्व॒ग्निष्वधि॑श्रितेऽग्निहो॒त्रेऽति॑थिर्गृ॒हाना॒गच्छे॑त्

1-11 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 tripadā gāyatrī, 2 prājāpatyābṛhatī, 3-4 bhurikprājāpatyā'nuṣṭup (4 sāmnī), 5-6, 9-10 āsurī gāyatrī, 8 virāḍ gāyatrī, 7,11 tripadā prājāpatyā triṣṭup| tad yasyaivaṃ vidvān vrātya uddhṛteṣvagniṣvadhiśrite'gnihotre'tithirgṛhānāgacchet

हिन्दी अर्थ

१५७. तं य॑जाय्गियं च वामदेव्यं चं यज्ञश्च यज॑मान परव॑थानु- (तम, भनु) उस के साथ-साथ या पी्े-पीे (यज्ञायज्ञियम् च) ि १. कीर्तन = संकीतंन == यञ्योषान ।॥ . ९. संन्यासी की कीति-प्रौर यच, संन्यासी के परभिपरेत स्थान भे पहुंचने से का० १५ । भ्रनु° १। सू०२ श्रधववेद-भाष्य १५७ यज्ञायज्ञिय तथा वामदेन्य सामगान, दक्षिण दिशा के जल-वायु तथा ऋतु क भ्रनुङरुल प्रतीत होते है यज्ञ के लिये घृतादि चाहिए, इस- है । भरतः वहां की वायु भ्रधिक जलवाली होने के कारण, तथा वहां की संलग्न भ्रूमि मे जलाधिक्य के कारण, मलेरिया श्रादि रोगो, तथा कफ- यजमानो कौ भी । यज्ञो द्वारा रो्गोकान्वारणहोताहै। १५८, य्नायत्नियाय च वे स वामदेव्याय च यन्नायं च यजमानाय

English

When he says to him, Here is water, he secures thereby water for himself.

अध्याय १५

श्लोक 12.2

स्व॒यमे॑नमभ्यु॒देत्य॑ ब्रूया॒द् व्रात्याति॑ सृज हो॒ष्यामीति॑

svayamenamabhyudetya brūyād vrātyāti sṛja hoṣyāmīti

हिन्दी अर्थ

: वरूप भ्रौर वैराज सामगान पर्चिमदिश्षा की जलवायु तथा ऋतु के है, जिस का निदेश “श्रापः" द्वारा कियाहै। पूरव॑दिक्ला में पेसिफिक महा- . सागर है । “वरुणः अपामधिपतिः'' (ग्रथवं० ५।२४।४) कै अनुसार भापः जगत् का राजा परमेदवर है। वरुणः वृणोति त्रियते वाऽसौ वरुगाः। दिशा से चला, रौर दक्षिणदिशा से होता हृश्मा परचिमदिशा में ्राया। निज राजा के संरक्षण में श्रपने श्राप को सममने लगा । यह् “धरपनाना?" रोगो का न होना । योगि-संन्यासी योगाग्नि हारा रोगों को भस्मीभ्रत कर (व) निर्चय से (सः) वह व्यक्ति, (वेखपाय च) वैरूप सामगानोँ से, (वे राजाय च) श्रौर वैराज सामगानों से, (श्रदुम्यः च) सामुद्रिक जलीय

English

When he says to him, Vrātya, let it be as thou pleasest, he secures to himself thereby what is

अध्याय १५

श्लोक 12.3

स चा॑तिसृ॒जेज्जु॑हु॒यान्न चा॑तिसृ॒जेन्न जु॑हुयात्

sa cātisṛjejjuhuyānna cātisṛjenna juhuyāt

हिन्दी अर्थ

इरयो से, (करणाय च राज्ञः) भ्रौर वरुण राजा की कृपा से, (आ वृ्चते) भ्रपने-प्राप को पूणंतया वञ्चित कर लेता है - (यः) जो कि (एवम्) इस १६० अथरवषेदः भाष्य का० १५। भ्नु० १। सू०२। (उप) समीप भ्र्थात् संगति मेँ रहकर ( वदति ) उस कै साथ वाद-विवाद गानो का, (वं राजस्य, च) श्रौर वे राजसामगानोँ का, (भपाम्, च) सामूर्रिक जाता है वंह उसके साथ रह कर सत्संगौं का लाभ उठाता है, तथा संन्यासी के सत्संग के कारण वह परमेश्वर का भी प्यारा बनजाताहै। १६६. रा परी हसो मागघो विन्नानं बवासोऽदरुष्णीषं राजी केशा हरितो भवतौ करम लिमेणिः ॥१६॥ (इरा) वेदवाणी (पु र्वली) त्रात्यपुरुष-की-सहचा रिणी, धरम॑पत्नी वेदवाणी । हसः “हस का भं है,हंसना, प्रसन्नमुखतां । प्रसन्न-

English

pleasant.

अध्याय १५

श्लोक 12.4

स य ए॒वं वि॒दुषा॒ व्रात्ये॒नाति॑सृष्टो जु॒होति॑

sa ya evaṃ viduṣā vrātyenātisṛṣṭo juhoti

हिन्दी अर्थ

को गायके कहा है. क्योंकि चित्त की प्रसन्नताहोतेही गाना गाथा जा वाणीरूप है । मन्वसूपी वेदवाणी के सततजप के कारण उसे सहवारिणी भ्र्थात् साथ-साथ विचरनेवाली कहा है । पव॑मानश्च विपथवाशौ वात॒ः सास्थी रेष्मा भरतोदः ॥ कीर्तिं जिसने प्ररमेशवरक्रो वरःलिप्राग्रौर जिस को परमेदवरने वर रक्षा की भरावरयकता नहीं रहती । (सः) वहु व्रती तथा परहितकारी संन्यासी (उदतिष्ठत्) उशा, साथ साथ, या उसे लक्ष्य करके (व्यचलत्) विशेषतया चला या

English

That which is pleasant comes to him, and he is the beloved of the beloved, who is possessed

अध्याय १५

श्लोक 12.5

प्र पि॑तृ॒याणं॒ पन्थां॑ जानाति॒ प्र दे॑व॒यान॑म्

pra pitṛyāṇaṃ panthāṃ jānāti pra devayānam

हिन्दी अर्थ

व्ीकार कै कारण वह् परमेदवरकी षप का पात्र बन गया । । ५५९ भ्रथववेद-भाष्य -का० १५ 1 श्रनु० १। सू०२ यैत नौर नौषस सामगान उत्तरदिशा को जलवायु तथा ऋतु कै उच्वाः” . (ऋ० १।२४५१०) का प्रमाण प्रायः दिया जाता है । इन्दं "माऽ 7 07" कहते ई । इस का श्रथं है “ा€व। ए6्धा' रथात् बडा री (ऋक्ष) । परोपकारी महात्मा की सुरक्षा जगदुत्पादक परमेरेवर तथा उसकी कृतियां करती है । (व) निश्चय से (सः) वह् व्यक्ति, (इयैताय च) दयेतनामक सामगान वशषीकार से, (सोमाय. च) भ्रौर जगदुत्पादक परमेद्वर की कृपा से (भ्रा- वृदचते) श्रपने-भ्राप को वञ्चित कर लेता है, (यः) जो कि (एवम्, समौप श्र्थात् सत्संगति मेँ रहकर (वदति) उस के साथ वाद-विवाद करता है, तकं-बाजी करता है। .. - न । लोक संग्रह की इष्टि से वार-बार सदुपदेशो को देत टश्रा पूरवेसमुद्रसे.

English

of this knowledge.

अध्याय १५

श्लोक 12.6

न दे॒वेष्वा वृ॑श्चते हु॒तम॑स्य भवति

na deveṣvā vṛścate hutamasya bhavati

हिन्दी अर्थ

हंसि = हन् गतौ । ां0९४. लिता है किं “४९ € ऽप्ण56त ६० त (नामकीलच१ छत्व भृणप्छ 00 270 इलः 0९दा 8 का० १४५। भनु १। सू०२ भ्रथनविद-भाष्य १६३ यात्रा करना. गौरव समभा जाता है। वाद-विवाद करनेवालों को इस गौरव से वञ्चित कर दिया जाता है । सामानो का, (नौवसस्य, च) प्रौर नौघसनामक सामगानों का, (सप्त- रषीणाम, च) सप्तषि स्थान तथा इच्दियवरीकार का, (सोमस्य, च) तथा जगदुत्पादकं परमेदवर का (प्रियसू्धाम) प्रेमपात्र (भवति) हो जाता है। रात्री केशा हारो पवर्तो क॑समलिपेणिः ॥२१॥ , (विधत) विजुलो को चमक (पुश्चली). ब्रात्य-संन्यासी की सह- बैदयुत-प्रकार भी दष्टिगोचर होता है, जिसे कि “नपिणपाल 115 या "4 प्रा 00८्व52 मी कहते है । इस का वर्णन निम्नलिखित -है, ०५/

English

When he says to him, Vrātya, as thy will is so let it be, he secures to himself thereby the

अध्याय १५

श्लोक 12.7

पर्य॑स्या॒स्मिंल्लो॒क आ॒यत॑नं शिष्यते॒ य ए॒वं वि॒दुषा॒ व्रात्ये॒नाति॑सृष्टो जु॒होति॑

paryasyāsmiṃlloka āyatanaṃ śiṣyate ya evaṃ viduṣā vrātyenātisṛṣṭo juhoti

हिन्दी अर्थ

१५५ प्रथववेद भाष्य का० ११५ । भ्रनु° १। सुऽ २। भारिणी धर्मपत्नी होती है, (स्तनयित्नुः) मेष की गजंनां (मागधः) गायक बढ़ हृए योगाभ्यास में योगी को ध्यान में मानाविध ज्योतियां दृष्टिगोचर होती है! । ये ज्योति्याभ्रांखों के विषयरूप नहीं होती भपितु मानसिक होती हैँ! नीहार प्र्थात् कोहरे की प्रतीति, धूम, सुय, ईश्वरीयदश्लंन से पूवं होती ह॥ टन प्रतीति के होते, समय पर, यौगी को ईद्वरदहंन हो जाता है। इन प्रतीतियों मँ “विद्युत की चमक भी है, जिसका कि वरन. मन्त्र. २५ भें हभ्रादहै । यथा मेष में विद्युत् की चमक भ्रौर मेव की गजना होती है, इसी प्रकार योगी ५ “नाद” कहते ह । ये नाद भी करई तरहके हं घण्टा बजने.का नाद, साथही उसमें कम्पनशील गति होती है, भ्रौरखउस्मेसे प्रकचचकी धाराया

English

fulfilment of his will.

अध्याय १५

श्लोक 12.8

अथ॒ य ए॒वं वि॒दुषा॒ व्रात्ये॒नान॑तिसृष्टो जु॒होति॑

atha ya evaṃ viduṣā vrātyenānatisṛṣṭo juhoti

हिन्दी अर्थ

सोदस्य सर्वथा विवेकल्यातेः धर्ममेधः समाधिः” (योग ४।२९) । इस समाधि मे का० १५। श्रनु० १ सु° भ्रथरनविद-भाष्य , १६५ हृष्ट योगी के लिये ये नाददही गायन रूप होते दहै भ्रौर योगी का चित्त इन गायनों का गायक होता है । है । (मनः) मन इत्यादि पूववत् (१५।२।६) । वेदश्रुति के संग मेँ हम रह, वेदश्रुति से विमुख रै न होऊ" । २. तंथा "तत॑ः प्रतिमधावणवेदनाद्शस्वादवा्तां जायन्ते (योग ३।३६) मेँ भ दिव्यकर्ब्यो के अवसप की योग्यता का वंन हमा है ।

English

Authority comes to him who possesses this knowledge, and he becomes the controller of the

अध्याय १५

श्लोक 12.9

न पि॑तृ॒याणं॒ पन्थां॑ जानाति॒ न दे॑व॒यान॑म्

na pitṛyāṇaṃ panthāṃ jānāti na devayānam

हिन्दी अर्थ

१५६ भरथतरवेद-भाष्य का० १५। रनु १।सु०३ लगातार सदपदेश. प्राप कर चुके हैः श्रव मीभ्नाप, पुनः यात्रा के लिये, तिष्ठसि = उत्थानं करोषि । देवाः = ““ विद्वांसो वै. देवाः । यथा “विश्वे च कसी को (समभरन्) तस्यार किया । का० १५ भ्रनु° , सु०३. भ्रथवव॑वेद भाष्य १६७ श्रासन्दीं के चार पाद होते है। वसन्त से शरद् तक चार' कऋतुए उसके.चार पाद हुए । इस से ही प्रतीत. होता है कि यह श्रासन्दी शरीर (तिरश्च्ये) चौड़ाई की पटिटयां हुई ।

English

powerful.

अध्याय १५

श्लोक 12.10

आ दे॒वेषु॑ वृश्चते अहु॒तम॑स्य भवति

ā deveṣu vṛścate ahutamasya bhavati

हिन्दी अर्थ

सामगान से भ्रौर (वामदेव्याय च वामदेव्य सामगानों से, (यज्ञाय च) यज्ञो से (यजमानाय च तथा यजमानो कौ स्त्संगतिसे (पशुभ्यः च) गौ विवाद करता है । “श्व का वार-वारभ्रयोग समुच्चय कै लिये होता है । च) यज्ञ का ( यजमानस्य च ) तथा यजमान का, ( पदूनाम्, च ) तथा १६०, उषाः पुँ्ली मन्थं .मारघो विद्गानं वासोऽहैरष्णीषं रात्री केशा हरतो वतौ कंस्मलिमेणिः ।१३॥ १५०८ भयर्ववेद-माष्य का० १४५। ्नु° १। सु०२. मानो सामगायक्र होता है । शेषपू ववत् (मन्त्र ४) ।

English

When he says to him, Let them refresh thee, he thereby wins vital breath to exceeding old

अध्याय १५

श्लोक 12.11

नास्या॒स्मिंल्लो॒क आ॒यत॑नं शिष्यते॒ य ए॒वं वि॒दुषा॒ व्रात्ये॒नान॑तिसृष्टो जु॒होति॑

nāsyāsmiṃlloka āyatanaṃ śiṣyate ya evaṃ viduṣā vrātyenānatisṛṣṭo juhoti

हिन्दी अर्थ

मततोदः ॥ कौततिश यश॑ पुरः सरवन कीसिरगैच्छत्या यशो गच्छति य णवं वेद् ॥१४॥ पयगामी रथ होता है.--शेष पूववत् (मन्त्र ७,८) । साथ दर्शाया है । ये दोनों दक्षिण दिला में इकट्ढे नहीं हो सकते । यदि यदि दक्षिण दिदामें पौणेमासो होगौ तो उत्तर दिचा मेँ भरमावास्या मै, यज्ञ रौर यजमान का वणनदहै, जो किं भ्रमावास्येष्टि तथा पौरँमा- स्येष्टि के साथ सुसङ्गन प्रतत हौतादहै। साथ, या उपे लक्षय कर के(्यचलत्) विशेषतया चला या विचरा। भनु = श्रनुलंमण ” (भरष्टा. १।४।८४) के भ्रतुसार "अनु" लक्षणाथंक भी है। का० १५१ भ्नुऽ , सुगर भथवेवेद भाष्य १५९ (तम्,. श्रनु)उस के श्रनूकरल होकर, (वंरूपम् चवेरूप नामक सामगान,

English

age.

अध्याय १५

श्लोक 13.1

१-१४ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ साम्नी उष्णिक्, २ ६ प्राजापत्याऽनुष्टुप्, ३, ५, ७ आसुरी गायत्री, ४, ८ साम्नी बृहती, ९ द्विपदा निचृद्गायत्री, १० द्विपदा विरीड् गायत्री, ११ प्राजापत्या पङ्क्तिः, १२ आसुरी जगती, १३ सतः पङ्क्तिः, १४ अक्षरपङ्क्तिः।तद् यस्यै॒वं वि॒द्वान् व्रात्य॒ एकां॒ रात्रि॒मति॑थिर्गृ॒हे वस॑ति

1-14 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 sāmnī uṣṇik, 2 6 prājāpatyā'nuṣṭup, 3, 5, 7 āsurī gāyatrī, 4, 8 sāmnī bṛhatī, 9 dvipadā nicṛdgāyatrī, 10 dvipadā virīḍ gāyatrī, 11 prājāpatyā paṅktiḥ, 12 āsurī jagatī, 13 sataḥ paṅktiḥ, 14 akṣarapaṅktiḥ| tad yasyaivaṃ vidvān vrātya ekāṃ rātrimatithirgṛhe vasati

हिन्दी अर्थ

(ऋचः) ऋग्वेद कौ ऋचाए' (पराञ्चः) सीघे प्र्थातु ताने कै अर्थात् बाने के । : १८२. वेदं आस्तरणं र पौ पबरणम् ॥७॥ वेदः परिशिष्ट होने के कारणं "वेदसे श्रभिप्राय सामवेद, प्रतीत विश्वाम मेँ वेदस्वाध्याय की सूषना सूक्त वारा वगर है । १. “सामवेद चू"किं उपासनाप्रषान वेदं है, इसलिये इसे भ्रास्तरण” भरात्. . बिचौना या गही केषा है, इस परः उपासना भे व्रात्य ने स्थिररूप भें बैठना है ! ९ भरथवेवेद-माष्य का० १५। श्रनु° १। सु० ३ (भरासादः) वेदमयी ्रासन्दी पर बैठना (साम) शान्तिरूप हृभ्रा

English

When he says to him, Vrātya, as thy desire is so be it, he secures to himself thereby the

अध्याय १५

श्लोक 13.2

ये पृ॑थि॒व्यां पुन्या॑ लो॒कास्ताने॒व तेनाव॑ रुन्द्धे

ye pṛthivyāṃ punyā lokāstāneva tenāva runddhe

हिन्दी अर्थ

साभगान (्रनुतिष्ठतः) इस कै श्रनुष्टानों मे सहायक होते हैँ (यः) जो २००, हैमनो मासौ गोप्तारावडुविन् भूमि चाग्नि चाुष्ठातारौं ।१५। (हैमनौ) हेमन्त ऋतुसम्बन्धी (मासौ) दो मासो को वैदिक विधि- भ्रनुष्ठानों को सिद्ध करने वाला निष्ट कियाहै। . की (ध्र वायाः दिशः) भरमि की दिक्षा से (गोपायतः) रक्षा करते है (भूमिः जानता भ्रौर तदनुसार जीवनचर्या करता है । । यज्ञो को करता हुभ्रा निज भ्रनुष्ठान करता रहे १७४ . भ्रयर्गवेद-माष्यः का० १५। भ्रनु० १। सु०४

English

Vrātya possessing this knowledge comes as a guest.

अध्याय १५

श्लोक 13.3

तद् यस्यै॒वं वि॒द्वान् व्रात्यो॑ द्वि॒तीयां॑ रात्रि॒मतिथि॑र्गृ॒हे वस॑ति

tad yasyaivaṃ vidvān vrātyo dvitīyāṃ rātrimatithirgṛhe vasati

हिन्दी अर्थ

तिष्ठतो य एषं वेदं ॥१८॥ =, (चैरिरौ) शिशिर ऋतुसम्बन्वो (मासौ) दो मास (दनम्) इस धद्धालु की (ऊर्ध्वाया दिशः) ऊपर की दिशा से (गोपायतः) रक्षा तिष्ठतः) इस के अनुष्ठान मँ सहायक होते हँ (यः). जो. व्यक्ति किं काल मँ नक्षत्रताराजटित दचुलोक की परमेदवरीय विभूतियों का, तथा अनुष्ठान मे सहायक होते है । शिशिर ऋतु मे चन्द्रमा श्रौर दुलोक तथा ऋतु वषंकाल की भ्रन्तिमि ऋतु है।. इस ऋतु में संन्यासी परमेदवर की भरन्तिम वाषिक विभुतियो का दशन करता है । वाला (भ्रकुतरेन्) निदिष्ट कियाहै। हृभरा"उस साथ निरन्तर स्थित रहताहै २०६. भव एनमिष्वासः . भाच्यां दिको अनरदशादुष्ठातादंवु

English

Should of his own accord rise to meet him and say, Vrātya, give me permission. I will

अध्याय १५

श्लोक 13.4

ये॒३न्तरि॑क्षे॒ पुण्या॑ लो॒कास्ताने॒व तेनाव॑ रुन्द्धे

ye3ntarikṣe puṇyā lokāstāneva tenāva runddhe

हिन्दी अर्थ

२०७, नास्य॑ पृशुन् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद॑ ॥३॥ १७९६ । म्रथर्ववेद-माष्य का० १५। भ्रनु० १। सू०५ स्थित रहता है । (एनम्) इसे (न) न (शर्वः) दुःखनाशक परमेदवर, (हिनस्ति) हिसित करता या हिसित होने देता है ।1२॥. न समान भ्रादि प्राणा वाधुग्रों को (हिनस्ति) हिसा करता हिसा. होने देता हृभा, मानो इषु्रहारी या धनूर्धारी हो कर, ब्रात्य की सदा रक्षाकरता का १५। अ्नु° १। ०४. भ्रथववेद-भाष्य . १७७. निम्नलिखित इलोक प्राण भ्रादि के स्वरूपो का परिचय देते ह ।

English

He does not act in opposition to the Gods. It becomes his sacrifice.

अध्याय १५

श्लोक 13.5

तद् यस्यै॒वं वि॒द्वान् व्रात्य॑स्तृ॒तीयां॒ रात्रि॒मति॑थिर्गृ॒हे वस॑ति

tad yasyaivaṃ vidvān vrātyastṛtīyāṃ rātrimatithirgṛhe vasati

हिन्दी अर्थ

निः उवासोचकवासकासाश्च ्राणकमेति कौततिताः । हानोपादान चेष्टादि व्यानकर्भेति चेष्यते । पोषरणादि समानस्य शरीरे कमं कोतितम् । उद्गारादि गुणो -यस्तु नोगकर्मे ति चोच्यते . ॥ श्वासं को भौतर लेना, इवास को बाहर फंकना, . लांसना, नये प्राणा के कमंरहु। मल सूत्र प्रादि कः त्याग पानके कष ह । देना, लेना, वेष्टा . भ्रादि व्यान के कमं हैँ । देह का उन्नयन, उद्ललना, दना, भादि उदान केकमंहै।शरीरकी पुष्टि प्रौरश्शरोर में रस-रक्त का संचार समान के कमं! उकार भ्रादि-नाग के कमं) भ्नांख को बन्द कंरनाश्रादि कम, तथा सोजश भआदि' धनंजय के कर्म ह शक परमेदवर, (इष्वासः) मानो इषुप्रहारी या धनुर्धरी हो कर, (दक्षि- (न ईशानः) न सर्वाधीश्वर परमेदवःर (हिनस्ति) हिसा करतौ या हिसा होने देता है.। च , 4

English

sacrifice.

अध्याय १५

श्लोक 13.6

ये दि॒वि पुण्या॑ लो॒कास्ताने॒व तेनाव॑ रुन्द्धे

ye divi puṇyā lokāstāneva tenāva runddhe

हिन्दी अर्थ

समान प्रारा वायुर्न की (हिनस्ति) हिसा करता या हिसा.होने देता दहै तदनुसार जोवनचर्या करता है ।५॥ व्याख्या मन्न २, ३ पशुपतिम् पशु ५ प्रकार के हैँ । यथा “तवेमे पञ्च परावो दिभवता गावो -अदवाः पुंखषा अजावयः (अथर्व ० ५।२।६), भर्थात् है परमेश्वर । तेरे प्चु्रौं के ५ विभाग है, गौए, भ्रद्व, पुरुष, बकरियां तथा मेड । इन समस्त प्राणिवगे का पति परमेदवर समानान् हिनस्ति य एवं वेदं ॥७॥. । (्रवष्ठाता) निरन्तर साय रहने वाला (प्चुपंतिः) पदु का पति दुःखेनारक , परमेदवर, (न भवः) न सुखोत्पादक परमेश्वर, (न ईशानः) न सवधिीदवर परमेश्वर (हिनस्ति, मन्त्र ३) हिसि करता.या हिसित

English

And if he gives permission he should sacrifice, if he does not permit him he should not

अध्याय १५

श्लोक 13.7

तद् यस्यै॒वं वि॒द्वान् व्रात्य॑श्चतु॒र्थीं रात्रि॒मति॑थिर्गृ॒हे वस॑ति

tad yasyaivaṃ vidvān vrātyaścaturthīṃ rātrimatithirgṛhe vasati

हिन्दी अर्थ

(न) श्रौर न (भरस्य) इम के (पदयुन्). पदो को, (न समानान्) न समान भादि प्राण वायुर्रों की ( हिनस्ति) हिसा होने देता है। (यः) स्थित रहनेवाला (भरकुव॑न् ) निदिष्ट किया है । . .उ्रम्, देवमूः==परमेरवर निज नियमों म उग्ररूप है, परन्तु है, इस लिये इस उग्रता मँ भी परमेदर का दिव्य स्वरूप प्रकट हो १८० प्रथवंवेद-माष्य का० १५। ्रनु० १। सू०५ समानान् हिनस्ति य एवं वेदं ।९॥ संमान श्रादि प्राण वायुग्रं की (हिनस्ति) हिसा करता या हिसा होने देता है (यः) जोकि (एवम्) इस प्रकार के तथ्य को (वेद) जानता तथा तद-

English

sacrifice.

अध्याय १५

श्लोक 13.8

ये पुण्या॑नां॒ पुण्या॑ लो॒कास्ताने॒व तेनाव॑ रुन्द्धे

ye puṇyānāṃ puṇyā lokāstāneva tenāva runddhe

हिन्दी अर्थ

देवः द्वारा शवं स्वरूप परमेदवर का वशँन हृश्रा है (भ्रकु्वन्) निदिष्ट किया है। क रिक के साथ दर्चाया है । “अथातो मघ्यमस्थाना देवताः'' (निर० १०।१।५) - का० १५ 1 प्रनु° १। सू०५. ग्रथववेद-माष्य . ११ समानान् दिनस्तियण्वंवेद॥११॥ .. (अनुष्ठाता) निरन्तर साथ रहने वाला (खदरः). पापियोँ को रलने. न दुःखनादश्क परमेश्वर, (न भवः) न सुखोत्पादक परमेद्वर, (न ईशानः) भ्रौर न सर्वाधीरवर पंरभेदवर (हिनस्ति) हिसित करता या हिसित होते देता है। (न) श्रौर न (शस्य) दस के (परन्) पचुरो की, (न समानान्) न समान भ्रादि प्राण वायुप्रों की (हिनस्ति) हिसा करता या हिसा होने

English

He who sacrifices when permitted by the Vrātya who possesses this knowledge.

अध्याय १५

श्लोक 13.9

तद् यस्यै॒वं वि॒द्वान् व्रात्योऽप॑रिमिता॒ रात्री॒रति॑थिर्गृ॒हे वस॑ति

tad yasyaivaṃ vidvān vrātyo'parimitā rātrīratithirgṛhe vasati

हिन्दी अर्थ

म खर द्वारा रौद्रस्वरूप परमेश्वर का वणेन हरा है । . ूतलखूपी-घ् वा दिक्च की दृष्टि से ऊर््वादिशा दलोक है, जिस में है, जिसमें कि वागु, मैव भ्रौर विचुत् का निवास है नि १८२ अयर्ववेद-माष्य काऽ १५ । अरनु° १। । स्०५ महादेवम् =परमेदवर फो महादेव ऊहा है । यह् महादेव, परमेहवर भो परे "महूर्गोक” है । यथाः- " पत्य लोक है, इंस से नीचे “स्वः नामका माहेन्द्रलोक है, इस से नीचे शदय.-लोक' है जिसमें कि तारागण है, तथा इस से नीचे पृथिवीलोक है भ्रधीरवर को “महादेव'' कहा गया प्रतोत होता है । वैदिक दृष्टि मे ७

English

Well knows the path that leads to the Fathers and the way that. leads to the Gods.

अध्याय १५

श्लोक 13.10

य ए॒वाप॑रिमिताः॒ पुण्या॑ लो॒कास्ताने॒व तेनाव॑ रुन्द्धे

ya evāparimitāḥ puṇyā lokāstāneva tenāva runddhe

हिन्दी अर्थ

किये जाय, तो मन्त्र तमे साम. का श्रथं गीतिमयी रचना होगा। इस (ग) ऋक्, यजुः, साम श्रौर श्रथवं-ये चार वेदः; (घ) वैदिकनज्ञान भौर चार ऋतु विश्राम करके, भौर इन ऋतु्रों मँ ब्रहत् भ्रादि सामगानों को तब भी प्रकरण .को दृष्टिः सै “वैदिक ज्ञानं" रूपी धन रथं ही समुचित होगा । ३. ऋतुमयी-तथा-वेदमयी भ्रासन्दी पर शारीरिक भारोहण सम्भव नही, भरतः यह् भ्रारोहण मानसिक भारोहण दही है। इससे प्रतीत्होताहै कि १४बे का० १५ । भनु० १।स्०३ प्रथगवेद-भाष्य १६९ किसी एतिहासिक त्रात्य का वणन नहीं है। रेतिहासिक व्यक्ति एेसी काल्पनिक भरासन्दी पर नहीं बैठ सकता । भ्रप्रणी (उपसदः) उस के समीप उपस्थित हए ।

English

attainment of his desire.

अध्याय १५

श्लोक 13.11

अथ॒ यस्याव्रा॑त्यो व्रात्यब्रु॒वो ना॑मबिभ्र॒त्यति॑थिर्गृ॒हाना॒गच्छे॑त्

atha yasyāvrātyo vrātyabruvo nāmabibhratyatithirgṛhānāgacchet

हिन्दी अर्थ

प्रणी-तथा-प्रप्राणी “भुतः उपस्थित हो जाते हैँ । यथाः-- “यं यमन्तमभिकामो भवति, यं कामं कामयते, सोऽस्य संकल्पादेव “योगी जिस-जिस वस्तु की समीपता चाहता है, जिस-जिस की कामना हरो दारा जिस-जिस को भ्रपनी इच्छा का सन्देदा पहुंचाता है, वह-वह उसके सतरीप उपस्थित हो जाता है। इस प्रकार सभी भूत उस के पास उपस्थित हो सकते है । १५० भरयवेवेद-भाष्य का० १५. भअरनु० १.। सू० ४ (वासन्तौ) वसन्तऋछतु सम्बन्धी (मासौ) दो मासो को वैदिक मृत्यु या मोक्षमें केवल कालक ही प्रतीक्षा रहती है ' इस के लिये किसी

English

His desire comes to him who possesses this knowledge and he gains the complete satisfaction

अध्याय १५

श्लोक 13.12

कर्षे॑देनं॒ न चै॑नं कर्षे॑त्

karṣedenaṃ na cainaṃ karṣet

हिन्दी अर्थ

के जीवन को बनाए रखने मेः केवल काल ही कारण होता है ! जन्म, जीवन में सहायक होते ह । इसलिये ये सामगान तब तकं चलते रहते है, जब तक क व्रात्य जीवित रहता है । एेसौ ही भावना भगे मर्न््रौमें भी जाननी वैशाख मासो के सामगान हैँ जोकि वसन्त ऋतु के भ्रनुक्कल हैँ । इसी प्रकार पुव दिशा से (एनम) इस श्रद्धालु को (गोपायतं) रक्षा करते ई, (बृहत् च) इस के भ्रनुष्ठानों मेँ सहायकं होते हैं (यः) जो कि (एवम्) इस प्रकार के तथ्य को (वेद) जान लेता श्रौर तदनुसार जीवन बनाता है । । (रष्मौ) ग्रीष्म ऋतु के (मासौ) दो मासौ को वेदिक विधियते को सिद्ध करने वाला निदिष्टकिथादहै1

English

of his wish.

अध्याय १५

श्लोक 13.13

अ॒स्यै दे॒वता॑या उद॒कं या॑चामी॒मां दे॒वतां॑ वासय इ॒मामि॒मां दे॒वतां॒ परि॑ वेवे॒ष्मीत्ये॑नं॒ परि॑ वेविष्यात्

asyai devatāyā udakaṃ yācāmīmāṃ devatāṃ vāsaya imāmimāṃ devatāṃ pari veveṣmītyenaṃ pari veviṣyāt

हिन्दी अर्थ

वामदेव्यं चातु तिष्ठतो य एषं वेदं ।६॥ वाला सामगान (भरनुतिष्ठतः) इस . कै श्रनुष्ठानों मे सहायक होते है । (थः) जोकि (एवम्) हस प्रकार के तथ्य को (वेद) जान लेता प्रौर तदनुसार १७२ भ्रथववेद-माष्य का० १५। भ्रनु० १।सु०४ १९४. वाविंको मासौ गोप्तारावङैन् वैरूपं च॑ वैराजं च।रष्ठा. (वार्षिकौ) वर्षा ऋतु सम्बन्धी (मासौ). दो मासो को वैदिक रौर वंरूपनामकं सामगान को (वैराजम् च) तथा वैराजनामक सामगान १8९. वार्षिकावेनं मासौ भतीच्यां दिशो गोपायतो वैरूपं ब वैराजं

English

The man, to whose house, when the fires have been taken up from the hearth and the oblation

अध्याय १५

श्लोक 13.14

तस्या॑मे॒वास्य॒ तद् दे॒वता॑यां हु॒तं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑

tasyāmevāsya tad devatāyāṃ hutaṃ bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

की (प्रतीच्याः दिः) परिवम दिला से (गोपायतः) रक्षा करते है, (वेरूपम् .. गान (अनुतिष्ठतः) इस के अनुष्ठान मेँ सहायक होते § । (यः ) जो व्यक्ति कि (एवम्) इस प्रकार के तथ्य को. (वेद) जानता भ्रौर तदनुसार जीवन- (शारदौ ). शरदृचऋछतुसम्बन्धी (सौ) दो मासो को वैदिक विधियो स्यंतनामक सामगान को (नौधसम् च) तथा नौधसनामक सामगान को 19 १५ । श्रतु० १ । सू० ४ । श्रथववेद-भाष्य । १७३ चांतुतिष्ठतो य णवं वेदं ॥ १२॥ की (उदीच्यः दिशः) उत्तर की दिशा. से (गोपायतः) रक्षाकरतेरहै

English

to Agni placed therein, the

अध्याय १५

श्लोक 14.1

१-२४ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ त्रिपदा अनुष्टुप्, २, ४, ६, ८, १०, १२, १४, १६, १८, २०, २२, २४ द्विपदा आसुरी गायत्री (१२, १४, १६, १८ भुरिक् प्राजापत्या अनुष्टुप्), ३, ९ पुर उष्णिक्, ५ अनुष्टुप्, ७ प्रस्तारपङ्क्तिः, ११ स्वराड् गायत्री, १३ ,१५ आर्ची पङ्क्तिः १९ भुरिङ्नागी गायत्री, २१ प्राजापत्या त्रिष्टुप्।स यत् प्राचीं॒ दिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒न्मारु॑तं॒ शर्धो॑ भू॒त्वानु॒व्यचल॒न्मनो॑ऽन्ना॒दं कृ॒त्वा

1-24 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 tripadā anuṣṭup, 2, 4, 6, 8, 10, 12, 14, 16, 18, 20, 22, 24 dvipadā āsurī gāyatrī (12, 14, 16, 18 bhurik prājāpatyā anuṣṭup), 3, 9 pura uṣṇik, 5 anuṣṭup, 7 prastārapaṅktiḥ, 11 svarāḍ gāyatrī, 13 ,15 ārcī paṅktiḥ 19 bhuriṅnāgī gāyatrī, 21 prājāpatyā triṣṭup| sa yat prācīṃ diśamanu vyacalanmārutaṃ śardho bhūtvānuvyacalanmano'nnādaṃ kṛtvā

हिन्दी अर्थ

नोक है, मुः, भूवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् । इन मेँ से “महः तक के प्रशासक होने के कारणा परमेदपर को महादेव कहा है समानान् हिनस्ति य एषं वेद ॥१३॥ . अनृष्णता). निरन्तर साय रहने वाला (महादेवः) महादेव षर (एनम) इस: व्रात्य को (न श्वः) न दुःखंनादक परमेदवर, (न भवः) न हिसित करता, या हिसित होने देता है। (न भ्रस्य) भ्रौरन इसके दुनु) पशु को, (न सभानानू) त समान भ्रादि प्राण .वायुभ्ो की (हिः

English

He does not act in opposition to the Gods. It becomes his sacrifice.

अध्याय १५

श्लोक 14.2

मन॑सान्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑

manasānnādenānnamatti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

का० १५। भ्रनु० १। सू० ६ भथवरवेद-भाष्य १९३ यञमानस्य च पनां च म्रियं धामं भवति य पएवं वेदं ॥१५॥ जानता तथा तदनुसार श्रात्ररण करता है, (सः) वंह (वे) निश्चय से लिए ही अन्न म्रहण करता, तथा जीवन-यज्ञ को रचाए रहता, भौर पाप- २३७, तयृतव॑शचारतवाश्च छोकाश्च छौक्याश्च मासांथाषेमासाशांहो (तम, भनु) उस संन्यासी के भ्रनुङकुल या साथ साथ (ऋतवः, च्) काल श्रौर् वषे, (लोकाः, च) लोक, (लौक्याः, च) मरौर लोकवासी च) भ्रौर दिन-रात (व्यचलन्) चले, उस की ्नुकरुलता मेँ हो गये 4

English

A third night . . . the holy realms that are in heaven.

अध्याय १५

श्लोक 14.3

स यद् दक्षि॑णां॒ दिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒दिन्द्रो भू॒त्वानु॒व्यऽचल॒द् बल॑मन्ना॒दं कृ॒त्वा

sa yad dakṣiṇāṃ diśamanu vyacaladindro bhūtvānuvya'calad balamannādaṃ kṛtvā

हिन्दी अर्थ

२४१. रेने अद्धा गंच्छत्येनं यहो ग॑चछसयेनं लोको गचतयेनमन् (एनम) इस योगी शंन्यासी. को भीः (शरदा) भदा (भागच्छति) प्राप्त होती है, (एनम्) इसे (यज्ञः) परमेदवर.देव की पूजा, संगति, तथा है । प्रजा्नों के पालन मेँ उसे ग्रनुराग युक्त होना चाहिए, इस निमित्त जानकर उस का. पालन-पोषण तथा संरक्षण करेगा । एेसा त्रत भ्रहण करना वेदने स॒म्राट् याराजाके लिये भ्रावंदयक माना है. (यजु° २०।- का 1 । भ्रनु० २। सु०८ भ्रथवेवेद-माष्य २०१ यहं ब्युत्ति वेदानुमत प्रतत नहीं होती । कवि ने ““राजनु'" चान्द मेँ

English

He should serve him with food saying to himself, To this Deity

अध्याय १५

श्लोक 14.4

बले॑नान्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑

balenānnādenānnamatti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

किया । ईन को समुन्नति के लिर् यत्न किया । जानता श्रौर तदनुसार भ्राचरण करता है (सः) वहु (वै) निस्वयसे साथ, निज बन्धु-बान्धवों को. भौ उन्नति करे, भौर राज्य मेँ खान-पान की साञ्नगी के लिये भी प्रयनन करे। . २५२ भ्रथववेद-माष्य का० १५। श्रनु० २। सु०श २५६. तं समा च समितिश्च सेनां च सुरां चालयं चरन् ।२॥ । (तम्) उस ब्रात्य-राजन्य की (भनु) भनुकरुलता मे, (सभा च ) राज- सभा, धमेसभा, विद्यासभा, (समितिः च) युद्धसभा, (सेना च) सेनां मन्व १कै भ्रनुसार राजा प्रजा के भ्रनुकरुल चला, ्रतः परिणाम रूप में प्रजाए राजा. के अनुकल चलीं । सुरा=षुर सुर (रश्वयं) । सुरा उदकनाम (निघं० १५१२) । राज्य मे कृषिभादिके लिये जलका २५७, सभायांश्च बै स समितेश्च सेनांयाइ्च सुरायाश्च रियं धायं

English

I offer water: I lodge this Deity; I wait upon this, this

अध्याय १५

श्लोक 14.5

स यत् प्र॒तीचीं॒ दिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒द् वरु॑णो॒ राजा॑ भू॒त्वानु॒व्यऽचलद॒पोऽन्ना॒दीः कृ॒त्वा

sa yat pratīcīṃ diśamanu vyacalad varuṇo rājā bhūtvānuvya'caladapo'nnādīḥ kṛtvā

हिन्दी अर्थ

जानता श्रौर तदनुसार भ्राचरण करता है, (सः) वह (वै) निदचय से का तथां जल विभाग का (प्रियम्, धाम) प्रेमस्थान (भवति) हो जाता है. भर्थात् रएेसे राजा के सुद्ासन में सभाभ्रादि सहयोग देने. का० १५॥ ्रनु० २। सु° १० प्रथं बेद-भाष्य २०३ तथा प्रजाजन हितकारी (भ्रतिधिः) विना तिथि नियत किये अतिथि. कर॒ (मानयेत्) ईदसका मानः करे। (तथा) इस प्रकार राजा (क्षत्राय) २०४ : ‰ भरथवंवेद-माष्य का० १५ भ्रनु० २। सू० १० -किस मेँ (प्रविशाव) हम.प्रवेच करे ?

English

Deity.

अध्याय १५

श्लोक 14.6

अ॒द्भिर॑न्ना॒दिभि॒रन्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑

adbhirannādibhirannamatti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

बोल सके भौर पू सके! ये दोनों भावद्योतक शब्द ह । कविता को क्षात्रधर्मं का उपदेश दे सके . त (अतः). इसलिये (वे) निर्चय से, (बृहस्पतिम्, एव) बृहस्पतिम ही (भ्रतः) इस लिये (वे) निचय से (बृहस्पतिम्, एव) बृहस्पति मँ ही (वे,.उ) निश्चय से ही, (इयम्) यह (पृथिवी) पृथिवीं (बृहस्पति) बृहस्पति है, मौर (चौः एव) बुलोक ही (द्रः) इनद्रहै। यीः । पृथिवौ देद्वयं का खजाना है । पृथिवी सूयं से पेदा हुई है, भतः सुं

English

To that Deity the sacrifice of him who has this knowledge is acceptable.

अध्याय १५

श्लोक 14.7

स यदुदी॑चीं॒ दिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒द् सोमो॒ राजा॑ भू॒त्वानु॒व्यऽचलत् सप्त॒र्षिभि॑र्हु॒त आहु॑तिमन्ना॒दीं कृ॒त्वा

sa yadudīcīṃ diśamanu vyacalad somo rājā bhūtvānuvya'calat saptarṣibhirhuta āhutimannādīṃ kṛtvā

हिन्दी अर्थ

बड़ा खजाना हैः-एेर्वयं का! भौर सूयं बुलोक का एकं भङ्ख है, भतः चूलो. सूयं से भौ बडा खजाना है, एेरक्यं का । भरतं: इनदर भर्थात् पदव्यो का० १५। भ्रनु° २। सु० १० भ्रयवेवेद-माष्य .. २०४. २९६. यः पृथिवीं बहस्पतिमग्नि शह वेद॑ ।९।; वच॑सी) वह ब्राह्यतेज से सम्पन्न भवति) हो जाता है ।५॥ (यः) जो कि २६८. य आंदित्यं शत्रं दिवमिन्द्र वेद॑ ॥११॥ . वहू (इन्द्रियवानू) राजलक्ष्मी वाला (भवति) हो जाता है ।१०॥ (यः) २०६ भ्रथवेवेद-माष्य का०.१५ । भनु० २1 सु ११९ वरती तथा प्रजाजन' हितकारी (भ्रतिथिः) विना तिथि नियत कयि भ्रतिथि (यस्यं गृहान) जिस के गहवासियों या गृहौ मेँ (भ्रा गच्छेत्) भा जाय--

English

He when he went away to the eastern region, went away having become the Marut host, and

अध्याय १५

श्लोक 14.8

आहु॑त्यान्ना॒द्यान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑

āhutyānnādyānnamatti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

राप को (वंशः). इच्छा हो (तथा, भ्रस्तु) वसा हो, या किया जाय, राव्य) हे वात्य ! (यथा) जिस प्रकार (ते) भाप की. (निकामः) विदोष कामना . विज्ञानी भ्रतिथि का ग्रहण है का० १५ । भरनु० २। सू०.११ भ्रथवेवेद-भाष्य २०७ २७१. यदे नमाह वात्य क्थ ऽवात्सीरिति पथ एवं तेन॑ देवयानानव॑- (यद्) जो (एनम्) इस श्रतिथि को (राह) गरहस्थी करता हैकि २७२. यहैनमाई वात्य तरषयन्तिति भागमेव तेन वधीयांसं रते ।५॥

English

having made Mind an eater of food. He who hath this knowledge eats food with Mind as

अध्याय १५

श्लोक 14.9

स यद् ध्रु॒वां दिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒द् विष्णु॑र्भू॒त्वानु॒व्यऽचलद् वि॒राज॑मन्ना॒दीं कृ॒त्वा

sa yad dhruvāṃ diśamanu vyacalad viṣṇurbhūtvānuvya'calad virājamannādīṃ kṛtvā

हिन्दी अर्थ

(यद्) जो (एनम्) इस भ्रतियि को (राह) गरहस्थी कहता है कि . . खलानपान.से जोवन ब्रठृता है, श्रौर भरनशन से जीवन घटता है । (यद्) जो (एनम्) , इस श्रतिथि को (राह) गृहस्थी -कहता है २०द म्रथवववेद-माष्य. का० १५। भ्रनु° २।सू° ११ को हौ (अ्रवरुन्द्व ) गरहस्थी उपस्थित (प्रियम्, एव).प्रतिथि कर प्रिय २७५, पे धियं ग॑च्छति प्रिपः भियस्यं मवति य णव वेद्! ॥७॥ इस प्रकार (वेद॑) जानता तथा तदनुककुल व्यवहार करता है। ।

English

food-eater.

अध्याय १५

श्लोक 14.10

वि॒राजा॑न्ना॒द्यान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑

virājānnādyānnamatti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

- कार १५ । रनु" ११ सु०५ नस्ति) हिसा करता या हिसा होने देता है (यः) जो किं (एवम्) इस प्रकार के तथ्य को (वेद)जानतं तथा तदनुसार जीवनचर्याः करता है ॥ व्याष्या, सत्यसु,--ये तीनलोक, तथा भः, मुव,, स्वः भ्रौर महः+-ये ४ लोक, तथा ब्रह्माण्ड का एक ही सर्वाधीश है, जिसे कि “ईशान” कहा है परमेश्वर, (न भवः) न सुखोत्पादक परमेषवर, (न ईशानः) न सर्वाषीद् परमेदवर (हिनस्ति, मन्त्र १६) हसित करता, हिसित होने देता है ! (न) भौर न (भरस्य) इस के (परन्) पशुभों की, (न समानानु) न समान भरादि प्राणवायुं की (हिनस्ति) हिसा करता या हिसा होने देता है (यः) जो कि (एवम्) इस प्रकार के तथ्य को (वेद) जानता तथा तद- तथा महादेव नामों दवारा परमभेदवर का वर्णन हुभा है । मवनामक प्र- शठ भ्रथववेद-माष्य . का० १५। ग्रनु० १। सु० ६

English

The abode of the man who sacrifices when permitted by the

अध्याय १५

श्लोक 14.11

स यत् प॒शूननु॒ व्यच॑लद् रु॒द्रो भू॒त्वानु॒व्यऽचल॒दोष॑धीरन्ना॒दीः कृ॒त्वा

sa yat paśūnanu vyacalad rudro bhūtvānuvya'caladoṣadhīrannādīḥ kṛtvā

हिन्दी अर्थ

के अन्तरायो रौर विर््नो का विनाल करता है। पशुपति श्रौर ईशान शब्द . कषेत्रम विस्तार का वणन ररतांहै, वोगो भोकारगमन कर सकता है । यथा-"“कायाकादायोः सम्बन्ध संय- स्थाप्रोमेमी योगी को रक्षा परमेश्वर करतां है का प्रयोग केवल भाकतिक़ - दिनों के लिए ददी नहीं होता! दिश् शब्द “निर्देश के लिए भी प्रयुक्त होता है, भौर उदहेष्य के लिए भी । यथां “इतिदिद . भर्थातु 4यह् नि्देशमतर हैः । तथा दिष् ( एग का० १५। श्रनु० १। सू०६ म्रथवंवेद-भाष्य १८१ साधनो का वणन मन्त्र २ मँ किया गया है । यथाः--

English

Vrātya who possesses this knowledge is long left remaining in this world.

अध्याय १५

श्लोक 14.12

ओष॑धीभिरन्ना॒दीभि॒रन्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑

oṣadhībhirannādībhirannamatti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

ल॒नू"" का प्रयोग काव्यदृष्टि से है। वेद महाकवि परमेदवर की काव्यमय च वीरधौ च प्रियं धामं मवति य एवं वेद॑ ॥३॥ (यः) जो राज-प्रजावगं (एव्र) इसं प्रकार के तथ्य को (वेद) जानता श्रौर तदनुङ्कल ्राचरण करता है, (वे, सौः) निदचय से वह्, वगं के राष्टरमे भूमि की उपजाऊ शक्ति बढती तथाये पदाथं, प्रभूतमात्रा्नौं मे उत्पन्न हुने लगते हैँ । । ह मानसिक, नतिक तथा श्राष्यात्मिक ऊंचाई के लिए.भी दस शव्द दा ३१।४) मेँ महि दयानन्द ने “ऊष्वः” का भ्रथं किया है “सन ने उत्तम महि ने भराध्यात्मिक ऊचाईकेलिएुभी किया है। भी (अनु व्यचलन् मानो भ्नुचर बन कर चले । ध

English

But he who sacrifices without the permission of the Vrātya who- possesses this knowledge.

अध्याय १५

श्लोक 14.13

स यत् पि॒तॄननु॒ व्यच॑लद् य॒मो राजा॑ भू॒त्वानु॒व्यऽचलत् स्वधाका॒रम॑न्ना॒दं कृ॒त्वा

sa yat pitṝnanu vyacalad yamo rājā bhūtvānuvya'calat svadhākāramannādaṃ kṛtvā

हिन्दी अर्थ

भो जतादहै, नियम ठ्यवस्था भ्रौरः सच्चाई मः मानो उसके साथ साथ चलती है, तथा प्राङ़तिक शक्तियां भी मानो अनुचरी बन कर उप्की का० -१५। भरनु० ११ सू०६ भ्रथव्विद-माष्य १८७ पशष (जीवात्मा) का भेद जानने वाले को, सब भावपदार्थो पर, स्वामित्व संन्यासी ने. राजप्रजावगे को शरुमिज सम्पत्तियां के उपाजन का सदुपदेश राजप्रजावगे का घ्यान भ्राङृष्ट किया च प्रियं धाम॑ मवति य एवं वेद॑ ॥६॥

English

Knows not the path that leads to the Fathers nor the way that leads to the Gods.

अध्याय १५

श्लोक 14.14

स्व॒धा॒का॒रेणा॑न्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑

svadhākāreṇānnādenānnamatti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(वैद) जानता भौर तदनुसार . भ्राचरण करता है (सः) वह (रव) निश्चयं का ्रियमु,. .धाम प्रिय स्थान (भवति) हो जाता है, अर्थात् वह नियम शत्य भ्रथवंवेद-भाष्य का० १५। भ्रनु° १1 सूु०९ कानिदहा हूभ्रा है। ये दोनों कायं उत्तम है, उत्ृष्ट ह । तभी महि दयानन्द नै नियम बनाया कि “वेदं का परदृना-पढ़ाना भ्रौर सुनना- नियम, संख्या ३) । तथा , वेद सब सत्य विदयार्जो का पुस्तक है” (नियम, (वेद) जानता तथा तदनुसार भ्राचरण करता है (सः) वह (ऋचाम्, सूष्टिरचनाःकाल मे, जगदाधारने सृष्टिकासजंन करते हुए, “पुराण मँ विवततं भ्र्थात् विविध परिवतंन किया, वह जगदाधार का एक भरङ्ख का० १५। श्रनु० १। सू० ६ श्रथववेद-माष्य १८६

English

He is at variance with the Gods. He hath offered no accepted. sacrifice.

अध्याय १५

श्लोक 14.15

स यन्म॑नु॒ष्या॒३ननु॒ व्यच॑लद॒ग्निर्भू॒त्वानु॒व्यऽचलत् स्वाहाका॒रम॑न्ना॒दं कृ॒त्वा

sa yanmanuṣyā3nanu vyacaladagnirbhūtvānuvya'calat svāhākāramannādaṃ kṛtvā

हिन्दी अर्थ

जगत् का उपादान कारण प्रकृति भ्रभिप्रत है । , ही जानते) जो कोई उसे श्रौर उरक परिणा्मोंके विविधप्रकारीं को जानता है, वह् भ्रपने-ग्राप को पुराणवेत्ता माने । नामथा-=नाम मै जानताहैकि भूमि का पूर्वरूप क्या था, ग्रौर वह् किन परिणामो मेँ से गुजरती हई इस दटावस्था में श्राई है । “येन द्यौरग्रा पृथिवी च दृहा" '“इतिहास'' पद की मानो ग्यास्यारूप दह 1 इतिहास इति ह+ प्रास परिणामों के यथार्थं स्वरूपो के जानने को "इतिहास" या "दतः श्रासीत् पूर्वा कहा है, मानुष इतिवुर्तो को वेद की परिभाषामे इतिहास नीं

English

The abode of the man who sacrifices without the permission of the Vrātya who possesses this

अध्याय १५

श्लोक 14.16

स्वा॒हा॒का॒रेणा॑न्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑

svāhākāreṇānnādenānnamatti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

कहा इसीलिये सृष्टि के पुरावृत्तौ के जानने वेको ही इतिहासविद् या है । प्रकृति श्रौर प्रकृति के परिणामों को जानने वालेकोहीवेदमं इतिहासविद् या पुराणविद् जानना चादिए । इसलिये वेद में जहां, इतिहास पद मिले वहां नित्य इतिहास ही जानना न किं श्रनित्य चाहिए । तया “इन्दमिदृगा धिनो बृहदिन्द्रमकेभिरफिणः । “इनद्र बाणी- साम” का स्तवन करते हँ । इस द्वारा यह स्पष्ट.होता है कि गाथासे महि दयानन्द लिखते है कि "गीयते या सा गाथा” (उणा० २।४) । दस से भी ज्ञात होतताहं कि गाधा का सम्बन्ध गान से होताहै।.

English

knowledge is not left remaining in this world.

अध्याय १५

श्लोक 14.17

स यदू॒र्ध्वां दिश॒मनु॒ व्यच॑ल॒द् बृह॒स्पति॑र्भू॒त्वानु॒व्यऽचलद् वषट्का॒रम॑न्ना॒दं कृ॒त्वा

sa yadūrdhvāṃ diśamanu vyacalad bṛhaspatirbhūtvānuvya'calad vaṣaṭkāramannādaṃ kṛtvā

हिन्दी अर्थ

नाराशंसी: = निरुक्त क भ्रनुसार ““नाराश्ंस” पद “"मन््र"” वाचक है । (९।१।१०) । तथा भ्रनादिष्ट दवरता का मन्ता: “नाराशंसा इति नैरुक्ताः” इस लिये. "नरनारी सम्बन्धी ऋचा।ए” एेसा भ्रथं हस पद काकरना १४।१।७) मे स्योचनो का. भ्रथं है “साथ साथ रहने वाली", नि (नितराम्) +-भ्रोचनी उच समवाये) । नर नारियों के विवाह सम्बन्धी ऋचाग्रों का इतिहास प्राण भ्रादि. उदेश्य को इसलिये “बृहती-दिच्"" कहा ह परमेश्वर का समावेश हृभ्रा है, भौर ये उदेश्य ही चारों वेदो के सारभूत च भियं धाम॑ मवति यं एवं वेदं ॥ १२॥ .

English

He in whose house the Vrātya who possesses this knowledge abides one night secures for

अध्याय १५

श्लोक 14.18

व॒ष॒ट्का॒रेणा॑न्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑

vaṣaṭkāreṇānnādenānnamatti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

का० १५। प्रनु० १ सुऽ ६ . भ्रथवेवेद-माष्य १९१ (इतिहासस्य, च) इतिहास का (वे) नि्चय से (पुराणस्य, च) भ्रौर पुराणा का, (गाथानाम्, च) श्रौर सामगानों का, (नाराशंसीनाम्, (मवति) हौ जादाहै, (यः) जो संन्यासी कि (एवम्) इस प्रकार के तथ्य कमे. (वेद) जानता श्रौर तदनुसार भ्रा्नरण करता है । का मनन कर, उन्हँं निज जीवन का भ्रङ्खं बनालेताहै वरैरिक इष्टिं ज्ञान का भ्यंवसान भश्यि या भ्राचरण में होता है। यथा आरनायरय विद्धान् गृहाम से संन्यास लेवे" (संस्कार विधि, म० दया०) ! तदनुसार भ्राहवनीय है--मुख “यरंमखे तदाहदनीयः” (तंत्ति° प्रपा० १०. भ्रनु ६४; १९९ भथववेद-भाष्य का० १५1 श्रनुऽ १। सु० ६ संस्कार विधि, तथा "योऽतिधीना. स आहवनीयः" (श्रथवं ° ९।२।६।१३),

English

himself thereby the holy realms that are on earth.

अध्याय १५

श्लोक 14.19

स यद् दे॒वाननु॒ व्यच॑ल॒दीशा॑नो भू॒त्वानु॒व्यऽचलन्म॒न्युम॑न्ना॒दं कृ॒त्वा

sa yad devānanu vyacaladīśāno bhūtvānuvya'calanmanyumannādaṃ kṛtvā

हिन्दी अर्थ

के लिए आहवनीय भ्रग्नि है” (सं विधि) । तथा “अतिथिरात्मन् जुहोति! . विधि) । "यडृश्नाति तंदविः' (तंत्ति० १०।६४), जो सन्यासी खाता है वहु घृतादि साकल्य के समान है (सं° विधि । सम्बन्धौ प्रग्नि है (सं° विधि) परावः "सन्युः प्युः (तेति १०।६४), पापों के निराकरण भ्रौर पापियों के सुधार के -लिए, सन्यासी में जौ विचार भौर मननपूरवेक किया श्र्थात ये भरावनाए तथा विचार संन्यासी के सांथ सदा रहते है, ताकि वह भ्रधिकाचिक भ्रात्मविंकास कर सके है । इसी प्रकार संम्यासी का मन्यु मी पारो के निराकरण प्रौर पापि्यो. क भुषारः के लिए संन्यासी का सहायक होता है ।

English

A second night . . . . the holy realms that are in the firma- ment (the rest as in verse 1).

अध्याय १५

श्लोक 14.20

म॒न्युना॑न्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑

manyunānnādenānnamatti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

होजाने का निर्देश है। संन्यासो काल को वशीभूत कर मृत्युञ्जय हो १९ भथववेद-भाष्य -का० १५। भनु° १। सु° ६ प्राकाशगमन की विभूति (योग ३।४२), तथा स्वं ावाषिष्ठातृत्व की २३८. ऋतूनां च वै स अआंतिवानौ च रोकांनां च छौक्यानौ च जानता भ्रौर तदनुसार भ्राचरण करतादहै (सः) वह (वे). निदवय से काल, दक्षिणायन काल भ्ौर वषं का, (लोकानाम्, च) लोकों का, (लौक्या- नाम्, च) लोक्वासियों का, (मासानाम्, च) महीनों का, (भरधंमासानाम्,

English

A fourth night . . . . the holy realms of the Holy.

अध्याय १५

श्लोक 14.21

स यत् प्र॒जा अनु॒ व्यच॑लत् प्र॒जाप॑तिर्भू॒त्वानु॒व्यऽचलत् प्रा॒णम॑न्ना॒दं कृत्वा॑

sa yat prajā anu vyacalat prajāpatirbhūtvānuvya'calat prāṇamannādaṃ kṛtvā

हिन्दी अर्थ

का (प्रियस्, धाम) प्रिय स्थान भवति हौ जाताहै। व करके (व्यचलत्) विशेषतया चला; (ततः) उख दिशा या उदश्यस्च कै मुक्तात्मा चिरकाल तक मोक्ष सुख भोगते रहते है, पौर चिरकाल तक .. संसारी जीवात्माग्रों की तरह पुनः पुनः जन्ममृत्यु के शिकार नहीं होते । “अनावृत्तादिश्' का वशेन “न च पुनरावर्तते, न च पुनरावतंते'" (छा बह कहा है कि “उस ने माना कि बह भरावतंन भर्थात् लौटेगा नहीं । क्या इस इरा नहीं है, मर्थात् नियत काल के मोक्ष के परनात् तौ भौटना होता ही है । रर) दारा भीहृश्रा है । इन प्रमाणो में भी किसी नियत काल तक्ष सीमित-मक्ति से पूरवे, पुनराव्तंन का निषेध है, प्रूनरावतेन का सव॑दा

English

Unlimited nights . . . . unlimited holy realms.

अध्याय १५

श्लोक 14.22

प्रा॒णेना॑न्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑

prāṇenānnādenānnamatti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

तथा सद्गुणो के भावाप या निर्माण में समथं होता है । सव॑भावाषिष्ठा- सत्यसिद्ध होती है । भवभूति कत्रि ने का है कि “ऋषीं पुनराद्यानां - वाक्रक्ति के भ्रनुसार वस्तुसिदधि हो जाया करती थी । १६६ भ्रथववेद-माष्य . का० १५। अनु० १। ०६ जानता रौर तदनुसार आचरण करता है (सः) वह (वै) निदचय से (दितेः, च). विनाश शक्ति का (श्रदितेः, च) भौर निमण शक्तिका, (इडायाः, २४२. स दिशोनुभ्य चखव् तं िराडनुच्य। लत सर्वँ च देवाः चला, (सके च देवाः) सब देव, (सर्वाः च देवताः). भ्रौ र सब दिव्यशचव्तियां

English

Now he to whose house a non-Vrātya, calling himself a Vrātya, and one in name only, comes

अध्याय १५

श्लोक 14.23

स यत् सर्वा॑नन्तर्दे॒शाननु॒ व्यच॑लत् परमे॒ष्ठी भू॒त्वानु॒व्यऽचल॒द् ब्रह्मा॑न्ना॒दं कृ॒त्वा

sa yat sarvānantardeśānanu vyacalat parameṣṭhī bhūtvānuvya'calad brahmānnādaṃ kṛtvā

हिन्दी अर्थ

२४३. विराजश्च वै स सर्वेषां च देवानां सवौसां च देवतानां भियं धाम॑ भवति य एर्व वेदं ॥२२॥ लानता भ्रौर तदनुसार भ्राचरण करता है (सः) वह (वै) निदचय से, को जी (अनु) लक्ष्य कर के (व्यचलत् )) विदोषतया चला । का० १५। अनु १। सु०९ भ्रथववेद-भाष्य - १९७ के साथ साथ गौण निदो का भी पालन करता रहता है (राजसभा)या युद्धसमिति, एकमत होकर, मेरी रक्षा कर भौर मेरी कामना को पणँ करे, या मेरी दो पुत्रिय के सबल मेरी रक्षा करे । दुहितरो =दुह जानता तथा तदनुसार भ्रचरण. करता है (सः) वह (वं) निश्चय से, (प्रजापतेः, च) प्रजापति का, (परमेष्ठिनः, च) भौर परमेष्टी का, (पितुः च) पिता कां (पितामहस्य, च) श्रौर पितामह का प्रजाव्गं के बुजुगो का

English

as a guest.

अध्याय १५

श्लोक 14.24

ब्रह्म॑णान्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑

brahmaṇānnādenānnamatti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(प्रियम्, धाम) प्रेमपात्र (भवति) हो जाता है) महिमा =व्रात्य की इतनी महिमा बढ़ी करि वहं शरीरधारी-महिमा- रूपहो हौ गया, भ्र्यात् वह महामहिमहोगया। - । होतां है। क्योंकि शरीर रूपान्तर है, पृथिवीका। जैसेकिकहाहैकि ध्यरानावस्थित-हो.कर, योगो. परमगति को प्राप्त हो जाता दहै . - चेद) जानता श्रौर तदनुसार भ्राचरण करता है, (एनम्) इस कोभी श्रापः=परभेदवरार्थ. की चष्ट से “भा गच्छति" मे एकवचन । (यज्ञः, च) परशेदवर देव की पूजा, संगति तथा भ्रात्मसमर्पंण की सावना,

English

Should punish him and not punish him.

अध्याय १५

श्लोक 15.1

११-९ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ दैवी पङ्क्तिः, २ आसुरी बृहती, ३, ४, ७-८ प्राजापत्याऽनुष्टुप् (४,७-८ भुरिक्), ५-६ द्विपदा साम्नी बृहती, ९ विराड् गायत्री।तस्य॒ व्रात्य॑स्य

11-9 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 daivī paṅktiḥ, 2 āsurī bṛhatī, 3, 4, 7-8 prājāpatyā'nuṣṭup (4,7-8 bhurik), 5-6 dvipadā sāmnī bṛhatī, 9 virāḍ gāyatrī| tasya vrātyasya

हिन्दी अर्थ

वसा (रस्तु इति) किया जाय, (तेन) उस द्वारा (वशम्, एव) -्रतिथि की २७७, एेने वशो गच्छति वु्ची वशिना मवति य पवं वेद॑ः ॥९॥ वशम करने वालाहो जाताहै, (यः) जो गरहस्थी किं (एनम्) इस प्रकार, जानता श्रौर तदनुसार यत्न करता है। (यद्) जो (एनम्) इस श्रतिधि को (राह) गृहस्थी कहता है किं का० १५1 भनु २।. सू9. १२ श्रय्ववेद-माष्य । . २०९ २७९. एन निकामो ग॑च्छति निकामे भिकामस्य॑ भ्रति य णवं वेद् १०

English

He, when he went away to the southern region, went away having become Indra, and having

अध्याय १५

श्लोक 15.2

स॒प्त प्रा॒णाः स॒प्तापा॒नाः स॒प्त व्या॒नाः

sapta prāṇāḥ saptāpānāḥ sapta vyānāḥ

हिन्दी अर्थ

। (यः) जो शरहस्थौ (एवम्) इस प्रकार (वेद) जानता है, वह् (निका- वेदी पर रख देने पर, (एवम्). इस प्रकार का (विदान्, तिथि) (भ्रति सृज) श्राज्ञा दीजिये (होष्यामि) धै हवन करू गा । २१० भ्रथरवेवेद भाष्य का० १५। भनु २। सु° १२ २८४. भ पितृयाणं पन्था जानाति मर देवयानम् ॥५॥। २८५, न देवेष्वा थते हुतम॑स्य मवति ॥६॥ रौर देवयानम्) विदानो ढारा चले भाए मागं कोभी (भ्र) ठीक प्रकार पितृयाणम् माता-पिता की परम्परा . वारा चलाई गई भ्रतिथियज्ञ

English

made Strength an eater of food. He who hath this knowledge eats food with strength as food eater.

अध्याय १५

श्लोक 15.3

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य प्रथ॒मः प्रा॒ण ऊ॒र्ध्वो नामा॒यं सो अ॒ग्निः

tasya vrātyasya | yo'sya prathamaḥ prāṇa ūrdhvo nāmāyaṃ so agniḥ

हिन्दी अर्थ

हवन (भवति) सम्पन्न हौ नाता है, (द)ः- श्रभिप्राय यह कि भग्निहोत्र के नियत काल को जानने वाला - (यः) जो गृहस्थी (एवम्) इस प्रकार (विदुषा) जानने वाले भ्रतिधि का० १५। भनु०.२। सू० १२ भरथववेद-भाष्य २११ (परि शिष्यते) भ्रादर पूर्वक बना रहता है, () । । नि २८८० ने पितृयाणुं पन्थं जानाति न देवयानम् ॥९। २८९. आ देवेषु थते अहुतस्य भवति ॥१०॥

English

He, when he went away to the western region, went away having become King Varuna, and

अध्याय १५

श्लोक 15.4

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य द्वि॒तीयः॑ प्रा॒णः प्रौढो॒ नामा॒सौ स आ॑दि॒त्यः

tasya vrātyasya |yo'sya dvitīyaḥ prāṇaḥ prauḍho nāmāsau sa ādityaḥ

हिन्दी अर्थ

भरगिनहोतर करता है, ( ५४ सृष्टः) त पया श्रा (बृहति) वहू (न) न (पितुयाणमू) पितुयाण भ्रौर (न) न (देवयानम् ) देवयान (पन्ाम्) पद्धति को (जानाति) जानता है, (€): - न . वहं (हैवेषु) विद्रत्समाज में उन कै .सत्संग ते (रा वृरचते) पणंतया (ब्रहतम्, भवति) न किया हो जाता है, (१०):- भ्रग्िहोत्र करत है ११ । स हि ४ उपस्थिति मे किसे प्रथम करना चाहिए, इस का निशंय क्रिया है.वह यह् भीएक यज्ञ है, भौर रेते भ्रम्यागत म्रतिंथि कोमांगको पुरा करना भीः २१२ अथववेद-भाष्य का० १५ भनु २1 सू०.१३. समय मेँ किये जाने वले भग्निहोत्र के कालातिपात मे कारण बनेगा

English

having made the Waters eaters of food. He who hath this knowledge eats food with the

अध्याय १५

श्लोक 15.5

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य तृ॒तीयः॑ प्रा॒णो॒३ऽभ्यूऽढो॒ नामा॒सौ स च॒न्द्रमाः॑

tasya vrātyasya |yo'sya tṛtīyaḥ prāṇo3'bhyū'ḍho nāmāsau sa candramāḥ

हिन्दी अर्थ

ही बनेगा । भ्रव्रात्य का भो सत्कार इसलिये करने का विधान है ताकि ग्रतिथि सेवा कौ भावना का विलोपं न हो जाय, यह भावना गृहस्थियों मे . सदा बनी रहे, ताकि सुयोग्य प्रतिथि भी कहीं इस सत्कार से कभी वल्वित प्रजाजन हितकारी (श्रतिथिः) जिसके भ्राने की तिथि निदिचित नहींएेसा (तेन) भ्रतिथि के उस एक रात के निवास के. कारण, (पृथिव्याम्) पृथिवी मँ (ये) जो (पुण्याः लोकाः) पुण्य लोकं ह (तानु, एव) उ हीं श्रतिधि प्रथम रात्रिँ गृहस्थी को, शारीरिक तथा .पाथिव भोगों सम्बन्धो सदपदेश देकर, गृहस्थी के पाथिव-जीवन को पुण्यमय करता हैः का० १५। भ्नु० २। सुर १३ भ्रयर्नविद-भाष्य २१३

English

Waters as food-eaters.

अध्याय १५

श्लोक 15.6

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य चतु॒र्थः प्रा॒णो वि॒भूर्नामा॒यं स पव॑मानः

tasya vrātyasya |yo'sya caturthaḥ prāṇo vibhūrnāmāyaṃ sa pavamānaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रती तथा प्रजाजन हितकारी (श्रतिथिः) जिसके भ्राने की तिथि निरिचत दूसरी रात (वसति) निवास करता है- २९४. येरन्तरिंषे पुण्यां लोकास्तानेव तेनाव॑ रुने ।॥४॥ (तेन).भरतिथिके उस दूसरी रात के निवास के कारण, (भ्रन्तरिक्ष) तथा प्रजाजन हितकारो (श्रतिथिः) ग्रनिरिचितः तिथि वाला श्रतिधथिः . (तेन) भतिथि के उस तोसरी रात के निवासके कारण, (दिवि) दयुलोक मे (ये) जो (पुण्याः लोकाः) पुण्यलोक ह (ता, एव) उन्ही २६८. ये पुण्याना, पुण्यां लोकास्तानेव तेनाव॑ रुन्धे ॥८॥ (तेन) भ्रतिथिके उस ज्रौथी रातं कै निवास केकारण, (ये) जो २१४ भ्रथर्वेवेद-माष्य का० १५। श्ननु° २। सू° १३. (लोकाः) लोक है (तानु, एव) उह ही गृहस्थी (व रन्ढ ) भ्रषनाता है, प्राप्त करता है! ई ¢

English

He, when he went away to the northern region, went away having become King Soma and

अध्याय १५

श्लोक 15.7

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य पञ्च॒मः प्रा॒णो योनि॒र्नाम॒ ता इ॒मा आपः॑

tasya vrātyasya |yo'sya pañcamaḥ prāṇo yonirnāma tā imā āpaḥ

हिन्दी अर्थ

३००, य एप्रप॑रिमिताः पुण्यां लोकास्ताने तेनावं र्दे ॥१०१। के कारण, (ये, एव) जोही (भ्रपरिमिताः) अ्रनि्िचित परिणाम वाने भ्रपनाता है, प्राप्त .करता है ।' रेसा विद्वान् गृहस्थी के घर मेँ जितनी भी राते वास करेगा, गृहस्थो को होना चाहिए , इन मनर द्वारां पुनजंन्म भी सूचित किया हि, तथा यह मी दर्शाया . है करि पृथिवी के भरतिरिक्त -श्रौरभी नाना लोकँ जिनमें प्रधिकाधिक सुर्लो के घाम है । वैदिक साहित्य कै भ्रनुसार उपरि उपरि ७ प्रधिकाधिक सुलोःकेधामहै। वे हैमः, मुवः, स्वः, महः, जनः, तपः

English

having made the Seven Rishis’ oblation an eater of food. He who hath this knowledge eats

अध्याय १५

श्लोक 15.8

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य ष॒ष्ठः प्रा॒णः प्रि॒यो नाम॒ त इ॒मे प॒शवः॑

tasya vrātyasya | yo'sya ṣaṣṭhaḥ prāṇaḥ priyo nāma ta ime paśavaḥ

हिन्दी अर्थ

"वसु" नाम इस लिये है कि इन्हीं मे सब पदाथं तथा प्रजा वसती रहै, भ्रौरये ही सबको बसति हैं । जसे परमेदवर का यह छोटासालोक मनुष्यादि सृष्टि से भरा हृभरा हतो क्याये सब लोकं शून्य होगि ? पर- का० १५१ श्रनु० २। सु० १३ भ्रथववेद-माष्य २१५ लोकों मे मनुष्यादि सुष्टि न हो तो सफल कभी हो सकता है ? भ्न्य लोकों मँ मनुष्यादि सुष्टि कीक कु भ्राकृति मँ भेद होने का सम्भव है” 1. (सत्याथं प्रकाश, समुल्लास ) के (गृहान्) घरों में (प्रा गच्छेत) भ्रा जायः-- (न, च, एनम् कषेत्) इसे न कष्ट पहुचाए श्रपितु:- ३०३, भस्यै देवताया उदकं याचामीमां देवत वासय इमामिमां

English

food with oblation as food-eater.

अध्याय १५

श्लोक 15.9

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य सप्त॒मः प्रा॒णोऽप॑रिमितो॒ नाम॒ ता इ॒माः प्र॒जाः

tasya vrātyasya |yo'sya saptamaḥ prāṇo'parimito nāma tā imāḥ prajāḥ

हिन्दी अर्थ

देवतां परिं वेवेष्मीत्यैनं पारं वेविष्यात् ॥१३॥ रूप-देवतापन है उस के लिगे, (उदकम्). जल या जलपान कौ (याचामि) भ चाहना करता हूं, (इमाम्) प्रतः इस (देवताम्) देवता को (वासय) निवास दो, (इमामु, इमामू) इस इस प्रतथैक (देवताम्) देवता को (परि वेवेष्मि) मै परसवाता हं (इति) यह् कह कर, (एनम्) इसके लिये ३०४, तस्यांमेवास्य तद् देवतायां हृतं भ॑वति य एवं वेदं ॥१५॥ । चः) जो गृहस्थी (एवम्) इस प्रकार जानता तथा तदनुसार व्यवहार तापनमें ही (हृतम्) भ्रतिथि यज्ञ मेँ भ्राहुति रूप (भवति) होता है। अतिथि को देवता कहते है । यथा ““भतिथि देवो भव (तंत्तिरीय उप० वत्ली० १ । अनुवाक ११) । भरतिथि देव कौ सेवा, भ्रतिथि यज्ञदहै। २१९ श्रथधैद-माष्य काण १५॥। प्रनु° २। सू° १४

English

He, when he went away to the stedfast region, went away having become Vishnu and having

अध्याय १५

श्लोक 16.1

१-७ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१,३ साम्नी उष्णिक्, २,४-५ प्राजापत्या उष्णिक्, ६ याजुषी त्रिष्टुप्, ७ आसुरी गायत्री।तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य प्रथ॒मोऽपा॒नः सा पौ॑र्णमा॒सी

1-7 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1,3 sāmnī uṣṇik, 2,4-5 prājāpatyā uṣṇik, 6 yājuṣī triṣṭup, 7 āsurī gāyatrī| tasya vrātyasya |yo'sya prathamo'pānaḥ sā paurṇamāsī

हिन्दी अर्थ

श्रतियि यज्ञम भ्रतिथि, देवता है -. विक्ेषतया चला, (मार्तम्) मानो -मानसून वायु को (शः) बल वाला. करना । इस से भोक्ता भोगवादीः न बन कर भ्रात्मवादी बन जातादहै। तथा निरन्तर । मारुतम् = मरतः का भ्रथं मानसून वायु भी वेवानुभोदित प्रयातु जोजल कोसमृद्रसे दयूलोकको श्रौर उठा लिये जतेहैः तथा द्युलोके से पुथिवी की श्रोर उसे प्रेषित करते हँ, तथा जो “मरुतः जलो द्वारा लासन.करते ई, वे ह्मे कष्टो से बचाए । शं. बलनाम (निषंर खाना चाहिए । यहु समना चाहिए कि मानो मने भरन्त खा रहा है, स्रपने राजसिक तथा भ्रपुषष्टि कर भन्न का भोजन नहीं करता । ३०६. मन॑ान्नादेनान्न॑मत्ति य णवं वेदं ॥२॥

English

made Virāj an eater of food. He who hath this knowledge eats food with Virāj as food-eater. He, when he went away to animals, went away having become

अध्याय १५

श्लोक 16.2

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य द्वि॒तीयो॑ऽपा॒नः साष्ट॑का

tasya vrātyasya |yo'sya dvitīyo'pānaḥ sāṣṭakā

हिन्दी अर्थ

१. मन्त म, मानिकं बल की भावना है । इयन्िये बल प्रद्ंनाथं मरतः का २१८ अथरवंवेद-मांष्य का० १५।नु० २। सू° १४ ३०८. बनान्तादेनान्न॑मत्ति य एवं वेदं ॥४॥ भ्र्थातु मानो लारीरिक बल द्वारा निज वृद्धि के लिये, बलदायक करने कौला, (राजा) तथा इन्द्रियों का राजा, वश्यता (भूत्वा) होकर (श्नु) तदनुसार (व्यचलत्) विशेषतया च ता, (श्रपः) शारीरिक रसो को भ्रपः=शारोरिकि रस-रक्तके लिते भी “मरापः” शब्दकां प्रयोग शिराग्रों (४७०४8) मा नीला रक्त), तथा तिन्धु पद द्वारा हदय का निदंश

English

Rudra and having made herbs eaters of food. He who hath this knowledge eats food with

अध्याय १५

श्लोक 16.3

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य तृ॒तीयो॑ऽपा॒नः सामा॑वा॒स्या

tasya vrātyasya |yo'sya tṛtīyo'pānaḥ sāmāvāsyā

हिन्दी अर्थ

किया है । वरुणः “वृणोतीति सतः” (निर० १०।१।३) । मन्त्र ५ मे श्रप ३१०- अद्धिरंन्नादीभिरन्न॑मसि य णवं वेदं ॥६॥ इष्टि से, निज मृखागिनि मँ, भ्॑न्नाहूतियां देताहै सप्तुषिभिंहैत आर्हुतिमन्नादीं कृता ॥७॥ । की शरोर ले जाने वालो (दिश्चम्) दिशा भर्थातु निदे या उदेश्य को (भनु) या शचासकं (्रुत्वा) हो कर (भ्रनु) तदनुसार (व्यचलत्) विषेषतया चला । . (नि० १२।४।३८) । ये सात शक्तिथां सत्त्वमय हो कर॒ जब षिरूप.हो जाती है, तब इन वारां ज्ञान ूरवंक दी गई प्रन्नाहुति, वस्तुतः आरहुतिरूप (यः) जो व्यक्ति (एवमु) स प्रकार के तथ्य को (वेद) जानता है,

English

herbs as food-eaters. He, when he went away to the Fathers, went away having be- come King Yama and having

अध्याय १५

श्लोक 16.4

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य चतु॒र्थोऽपा॒नः सा श्र॒द्धा

tasya vrātyasya | yo'sya caturtho'pānaḥ sā śraddhā

हिन्दी अर्थ

अर्थात् वह उसभ्रनन को.खाताहैजो क्रि भराहुतिरूपदहै, भौर २९५ भ्रथर्ववेद-भाष्य -का० १५ । भ्रनुं० २.। सुऽ १४ (सः) वह 1 ्ात्य (घ्.वामू) स्थिरता की (दिकम्) तया चला, वह (विषुः) किरणो से व्याप्त सूयंखूप (भूत्वा) हो कर (भनु) भन्न. का भोजनं .करने वाली (कृत्वा) कर करे । खान-पान को भ्रग्निहोत्र जान कर, निज.जीवन को यज्ञमय बनाने भँ जब स्थिरतां प्राप्त कंरं लेता है, इढ़ निश्चय वाला हो जाता है, तव नियम से

English

made the exclamation Svadhā an eater of food. He who hath this knowledge eats food with

अध्याय १५

श्लोक 16.5

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य पञ्च॒मोऽपा॒नः सा दी॒क्षा

tasya vrātyasya | yo'sya pañcamo'pānaḥ sā dīkṣā

हिन्दी अर्थ

३१४, विराजान्नायान्न॑मत्ति य एवं वेदं ॥१०॥ .- त (यः) जो व्यक्ति (एवमु) .इस प्रकार के तथ्य कौ (वेद) जानता है, भ्रौर तदनुसार भराचरण करता है, वह (भ्रनाद्या)- भन्न का भोजम करने जाता हं, श्रौर सदा “विराट्” की स्थिरता बनाए रखने वाले भ्न का अत्न खाने वाली (कृत्वा) करके । का० १५। भ्ननु° २॥ सू० १४ भ्रथर्वेवेद-माष्य १२१ शरीरस्थ भ्रोषधियां है, जिनके परिपोषणाथं तदनुकल भन्न का भोजन करना चाहिए । भ्राथववेणोः श्रोषधियां हँ मनोबल, या दृढ़ रिवसंकत्प, जोकि चिकित्सा या रोगोपचार किथा जाता है। इसे (11.20 0२ कहते वा अङ्कानां रसः'' (बृहदा० उपऽ त्रा० ३ खं० १६) । शुद्ध वायु के सेवन रोग चिकित्सा होती है । इसी लिये एवास-प्रदवास को भ्ररिवनौ भी कहते

English

the exclamation Svadhā as food-eater. 220

अध्याय १५

श्लोक 16.6

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य ष॒ष्ठोऽपा॒नः स य॒ज्ञः

tasya vrātyasya | yo'sya ṣaṣṭho'pānaḥ sa yajñaḥ

हिन्दी अर्थ

२२२ भरथरवेवेद-माष्य - का० १५। श्रनु २।सु० १४ है, जोकि. शरीर मेँ भिषक् भ्र्थातु वंच का काम करते रहते है, अद्विनौ देवाना" भिषजौ ' (शा० ब्रा० ११।३३।७) । अरिविनौ का नाम नासत्यौ भीदहै, जिनकी कि नासिका सतत गति रहती है । नासत्यौ = नासा (नासिका) + भ्रत्यौ (अरत सातत्यगमने) । नासत्यौ के सम्बन्ध मे कहा है कि.ये “भृरण्यथः" हरीर का भरण-पोषण करते है, तथा "भिषज्यथः" शरीर के. रोगोकी चिक्रित्साभीकरतेरहै (श्रथव॑० २०१४०११) । नासत्यौ = नासिका प्रमवौ बभूवतुरिति वा वहु (यमः) यम नियर्मौ का पालन करने वाला तथा संयमी, (राजा) श्रौर २. भुरण्थथः का परथ ““शीघ्र गति करने वाले“ भी होता है । इवास .प्रघवासं शीघ्रता से नासिका मेँ मरति करते रहते है । मुरण्यति अतिकर्मा (निषं० २।१४), का १५ । श्रनु० २) सुर १४ पर्चेद-भाष्य २२३ भ्र्थात् वृद पिता रादि यभनियर्मो का पालन करते हुए संयम- . पूर्वक तया. निज शरीर के केवलः धारणं-पौषरा के निमित्त भोजन करते

English

He, when he went away to men, went away having become Agni and having made the

अध्याय १५

श्लोक 16.7

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य सप्त॒मोऽपा॒नस्ता इ॒मा दक्षि॑णाः

tasya vrātyasya | yo'sya saptamo'pānastā imā dakṣiṇāḥ

हिन्दी अर्थ

कारम स्व+-धा (धारण, पौषर)+-कार (कम) भ्रौर तदनु्ार भराचरण करता है वह् (अन्नेन) अनन भोगी (स्वधा-. यज्ञकमं दर्शाकर, इस कमं की पवित्रता को सुचित किया है ३२०. स्वाहाकारेणान्नावेनान्न॑मति य पवं वेद॑ ॥१६॥ ९२४ भ्रथरववेद-माष्य का १५। भ्रनु० २। सु° १४ देशिक-ऊचारईके लिये ही नहीं होताः है। अपितु श्राध्यात्मिक ऊचाईके विदान् --यह रथं यहां संगत प्रतोत होना है । ऋग्वेद १०।७१।१-११ मरन. उन के संस्कारों के विनाल के लिये, वैदिक सदुपदेशो को. निज जीवन मः

English

exclamation Svāhā an eater of food. He who hath this knowledge eats food with the exclamation

अध्याय १५

श्लोक 17.1

१-१० अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१, ५ प्राजापत्या उष्णिक्, २, ७ आसुरी अनुष्टुप्, ३ याजुषी पङ्क्तिः, ४ साम्नी उष्णिक्, ६ याजुषी त्रिष्टुप्, ८ त्रिपदा प्रतिष्ठाऽर्ची पङ्क्तिः, ९ द्विपदा साम्नी त्रिष्टुप्, १० साम्नी अनुष्टुप्।तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य प्रथ॒मो व्या॒नः सेयं भूमिः॑

1-10 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1, 5 prājāpatyā uṣṇik, 2, 7 āsurī anuṣṭup, 3 yājuṣī paṅktiḥ, 4 sāmnī uṣṇik, 6 yājuṣī triṣṭup, 8 tripadā pratiṣṭhā'rcī paṅktiḥ, 9 dvipadā sāmnī triṣṭup, 10 sāmnī anuṣṭup| tasya vrātyasya | yo'sya prathamo vyānaḥ seyaṃ bhūmiḥ

हिन्दी अर्थ

. “वहं खं वसु (षन). के प्रवान में वसुदाता (वनिः -वन संभक्तौ) है, भौर नमस्का- भिक प्रतीत नहीं होता, भमितु श्पापकमं विनारक" प्रथं ही सम्भावित है । का० १५। भ्रनु० २॥ सू० १४ भथर्ववेद-माष्य , २२५ वषट् कारेण =पापकमों भ्रौर उन के संस्कारों को विनष्ट करने , (न्नादम्, कृत्वा) अन्नभोगी करके ईशानः = इस का भर्थे है, शासक । गच्छे शासककेदो क्त्य होते का. भश्रय तेता है, भदिग्यंकमौ को मन्युपरवक निवारित करने के लिए।

English

Svahā as food-eater.

अध्याय १५

श्लोक 17.2

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य द्वि॒तीयो॑ व्या॒नस्तद॒न्तरि॑क्षम्

tasya vrātyasya | yo'sya dvitīyo vyānastadantarikṣam

हिन्दी अर्थ

तथा भोगमावना का स्रा परित्याग करे । जसे कि जिस-जिस शारीरिक रङ्गं के रोग के -निवारणाथं उस-उस भ्रङ्गंके रोगके भनुकुल भरौषधका परमेदवर की सूष्टिर्मे, (यः) जो (भरस्य) इस परमेरवर का (प्रथम - यह् (सः) वह (सः) वह (भ्रन्निः) भ्रगनिहै। मेषवर की सृष्टिमेंृ, (यः) जो (भस्य) इस परमेश्वर का (द्वितीय भ्राणः) दुसरा प्राण है (प्रौढ़ः नाम) वंह “प्रौढ नाम वाला है, (भसौ) बह है (सः भ्रादित्यः) वह सुयं । का० १५। भ्रनु० २। सू० १५ भ्रथवंवेद-माष्य २२९ मेदवर की सृष्टि में, (यः) जो भरस्य) इस परमेश्वर का (तृतीयः प्राणः) (सः, चन्द्रमाः) वह चन्द्रमा । .

English

the exclamation Vashat as food-eater.

अध्याय १५

श्लोक 17.3

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य तृ॒तीयो॑ व्या॒नः सा द्यौः

tasya vrātyasya | yo'sya tṛtīyo vyānaḥ sā dyauḥ

हिन्दी अर्थ

मेचवर की (सृष्टि मे¶ (यः) जो (भस्य) इस परमेदवर का (चतुथं प्राणः) चौथाः प्रारा है, वह (विभूः नाम) “विभ नाम वाला है, (भयम्) मह् है (सः) वह (पवमानः) वायु । । पवमानः गतिमान् तथा पवित्र करने वाला वायु । यह भ्राकाश मदवरकी सृष्टि (यः) जो (भरस्य) इस परमेदवर का (पन्वम प्राणः) पांचवां प्राण है, वह (योनिः) नाम “योनि नाम वाला है, (ताः भर्थातु पृथक् करता है । “यौ ति संयोजयति पृथक् करोति वास योनिः जलम दोनों शण है वस्तुर्भोको मिला देना, तथा पृथक् पृथक् ५११ भ्रथववेद-भाष्य काऽ १५ । भ्रनु० २) सू० १५ है । रतः भ्रापः के लिए योनि शब्द म्रौपचारिक है, गौण है । योनि श्रौर की गई है । यथा “योषा वा गौतमाग्निः तस्या उपस्थ एव समित्“ “““

English

He, when he went away to the Gods, went away having become Isana and having made Passion an eater of food. He who hath this knowledge eats food with

अध्याय १५

श्लोक 17.4

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य चतु॒र्थो व्या॒नस्तानि॒ नक्ष॑त्राणि

tasya vrātyasya |yo'sya caturtho vyānastāni nakṣatrāṇi

हिन्दी अर्थ

छठा प्राणा है, कह (प्रियः नाम “प्रिय नाम.वाला है, (ते), वे (इमे) ये वेद में ५ प्रो कौ भ्रधिक महिमा है। वे हैं गावः, भवाः, पुरुषाः अजावयः (अ्रथवं० ११।२।९) । इन में से गौए", भ्रजा प्रर श्रविः (भेड़) मेदवर कौ सृष्टि म, (यःोजो (प्रस्य) इस परमेबवर का(सप्तमः ्रारः) व्व करा प्रदान करते ई, भतःप्राण है। । का० १५। भ्रनु° २। पु० १६ श्रथवरयेद-भाष्य २३१ सातवां प्राण है, वह् (श्र रिमित) “श्रपरिमित” (नाम) नाम वाला (ताः) वे है (इमाः) ये (प्रजाः) प्रजाएं । ख,

English

Passion as food-eater.

अध्याय १५

श्लोक 17.5

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य पञ्च॒मो व्या॒नस्त ऋ॒तवः॑

tasya vrātyasya | yo'sya pañcamo vyānasta ṛtavaḥ

हिन्दी अर्थ

मत्री की भावना ब्रोत्त प्रोत है । यथा-- मेदवर को सृष्टि मेँ, (यः). जो (भस्य) इस. परमेदवर. का (प्रथम) प्रथम (ग्रपानः) अपान है (सा) बह ( पौरोमासी) पौरंभासौ है । वणन समुचित होता है । (काण्ड . १५। भरनु° १। सूक्त २। मत १४) इस. ३३९. तसय वरत्॑स्य । यो ऽस्य दवितीयोऽपादचः साष्टका ॥२॥. ५१५ भयर्ववेद-माष्य का० १५। अनु २। सु° १६ मेकवर की सृष्टि मँ (यः) जो (ग्रस्य ) इस परमेदवर का (द्वितीयः) दुसरा (्रपानः) भ्रपान है (सा) वह (ब्रष्टका) भष्टमीहै। तैमौ ईपकौ द्वितोय प्रपान कहा जा सकता है। प्रथम अपान है, पौण-

English

He, when he went away to creatures, went away having become Prajāpati and having made vital breath an eater of food. He who hath this knowledge eats

अध्याय १५

श्लोक 17.6

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य ष॒ष्ठो व्या॒नस्त आ॑र्त॒वाः

tasya vrātyasya | yo'sya ṣaṣṭho vyānasta ārtavāḥ

हिन्दी अर्थ

नँ एकाष्टका" का वंस है, जो रिं नबसंवत्पर की योतिकादहै। यह “एकाष्टका मन्त्र २ य वाशात प्रतीत नहीं होत मेश्वर कौ सृष्टि मे, (या) जो (भस्य) दस परमेदवर का (तृतीयः) मेदवर की सृष्टि मे, (यः) जो (रस्य) इस परमेश्वर का (चतुर्थं) चौथा है। श्रद्धाह्वारा कमं मेँ रुचिं होती है। का०१५। भनुऽ २१ सुण १७ भ्रथरववेद-माष्य २३३ मेदवर की सृष्टि मे, (यः) जो (भरस्य) इस परमेश्वर का (षष्ठः) छटा परमेश्वर की सृष्टि में, (यः) जो (भस्य) इस परमेदवर का (सप्तम) सातवां (अ्रपानः) भ्रपान दहै, (ताः) वे (इमाः) येह (दक्षिणाः) दक्षि-

English

food with vital breath as foodeater.

अध्याय १५

श्लोक 17.7

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।योऽस्य सप्त॒मो व्या॒नः स सं॑वत्स॒रः

tasya vrātyasya | yo'sya saptamo vyānaḥ sa saṃvatsaraḥ

हिन्दी अर्थ

३ उपकारी या साधन होने से भरपान है" मेदवर की सृष्टि मं, (यः) जो (भ्रस्य) इस परमेदवर का (प्रथमः) १. भ्रपानं वायु गुदाद्वारये निःसरणं कर मल को निकाल कर, युख देती है 1 इसी प्रकार ईष्टियां भौर यज्ञ रोगनिवारण हारा सुखकारी होते है । भपानः == ९५११४ प्रथवंवेदनभाष्य का० १५। अनु० २ 1 भुर १७ मेदवर को सृष्टि मँ, (यः) जो अरस्य इस परमेदवर का (तृतीयः) तीसरा (व्यानः) व्यान है, (सा) वह् (चौः) चुलोक है । मेदवर की सृष्टि मे, (यः) जो (भस्य) इस परमेदवर का (चतुर्थः) । मेदवर को सृष्टि, (यः) नो (भस्य) इस परमेद्वर का (पञ्चमः) पचिवा (व्यानः) व्यानं है । (ते) वे (ऋतवः) ऋतुए है । मे्वर क सृष्टि त्र, (यः) जो (भरस्य) इस परमेदवर का (षष्ठः) + ज व्यान है, (ते) वे (भ्रातंवाः) ऋतुभ्रों के भ्रवयव या

English

He, when he went away to all the intermediate spaces, went away having become Parameshthin and having made Devotion an eater of food. He who hath this knowledge eats

अध्याय १५

श्लोक 17.8

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।स॒मा॒नमर्थं॒ परि॑ यन्ति दे॒वाः सं॑वत्स॒रं वा ए॒तदृ॒तवो॑ऽनु॒परि॑यन्ति॒ व्रात्यं॑ च

tasya vrātyasya | samānamarthaṃ pari yanti devāḥ saṃvatsaraṃ vā etadṛtavo'nupariyanti vrātyaṃ ca

हिन्दी अर्थ

भरातवा-=ऋतुभ्रों के भ्वयव मास । समूह उत्तरायण, दक्षि- का० १५। भ्रनु० २। सू० १७ भ्रथवेवेद-भाष्य २३५ परमेश्वर को सृष्टि मँ, (यः) जो (भरस्य) इस परमेश्वर का फफडो मे रक्त मे मिलकर शरीरावयव को पुष्टि देतां है। प्रपानकां -कायंदहैशरीरके मल कोशरीर से बाहिर फकना। फफडो की मलिन , फंकना, तथा मलमूत्र भौर प्रसीने भादि को शरीर से पृथक् कदना,- श्रपान का कायं है । भ्रपान, शाब्द मँ “रप का भरं है पृथक् करना।

English

food with

अध्याय १५

श्लोक 17.9

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।यदा॑दि॒त्यम॑भिसंवि॒शन्त्य॑मावा॒स्यां चै॒व तत् पौ॑र्णमा॒सीं च॑

tasya vrātyasya | yadādityamabhisaṃviśantyamāvāsyāṃ caiva tat paurṇamāsīṃ ca

हिन्दी अर्थ

गई है । इसी गदा के स्थानसे इस के वामभागसे इडा भ्रौर दक्षिणभाग से पिङ्गला नासिकामूलं पर्यन्त चली गई है । सुषुम्णा नाडी, शाखा- सक्रिय बना रही है । यह नाडी-संस्थान, च्यान कास्थानहै। इसी लिंषै सब प्राणरूप हैँ । पाथिव, भ्रग्नि पाकक्रिया में सहायक होने के कारण .. तरथा भौदयं भ्रग्नि भ्रन्न पचा कर शरीर के तापमान को बनाए रखनतैके कारण प्राण है । भरादित्य वर्षा के कारण, तथा ताप-प्रकाशदेनेके कारण प्राण है । चन्द्रमा हारा भरोषधियों में रस संचार हीवादहैजिनकाकिहम सेवन कर जीवित रहते है, इसलिये चश्मा भी प्राण है । + चरमां मोषभी- ढोने, कृषिकमं में सहायक होने, तथा दूध भादि देने से प्राण्य ह। वेयक्तिक, सामाजिक भ्रादि कायो में परस्पर सहायक होने से प्रजाजन १. लो भ्रथर्वं ° १५।१।१।३ को व्याख्या । भ्रौर रोगकीटारषु नष्ट होते, वायु जल स्थल की शुद्धि होती,--इस के भविनाभावरूप म साधक नही, इस लिये प्राणख्प भी नहीं ।

English

Devotion as food-eater. With one and the same object the Gods go round the Year and the Seasons follow round the

अध्याय १५

श्लोक 17.10

तस्य॒ व्रात्य॑स्य ।एकं॒ तदे॑षाममृत॒त्वमित्याहु॑तिरे॒व

tasya vrātyasya | ekaṃ tadeṣāmamṛtatvamityāhutireva

हिन्दी अर्थ

जानकर जहां क्रोध की भ्रावर्यकता हो. वहीं क्रोध करना चाहिय, (यः) जो व्यक्तिं (एवम्) इस भकार के तथ्य कोः (वेद) जानता रौर तदनुसार भ्राचरण. करता हैः वह॒ (भ्रन्नादेन ) भन्न॒मौगी (मधुना). ५२६ भ्रयववेद-माष्य का १५। भनु २। सू० १४ समाधि भ्रलापूर्वंक इतरेषाम्” (योग १।२०) मेँ वीये को योग संवर्धन में सहायक माना है 1 वीयं हारा प्राणदाक्ति बढतीदहै, जो कि प्राणायाम तथा से तदुपयोगी भ्रनन खाता है ३२६, श्राणेनान्नादेना्॑मत्ति य एवं वेद॑ ॥२२॥ परिषुष्टि की दृष्टिसेभ्रनन खाता है, भोगदृष्टि से नहीं । कोऽ १५॥ प्रनु० २) सु° १४ भरथर्वविद-भाष्य २२७ मे बी रहे, एेसे सात्विक, लघु तथा सुपाच्य भ्नन्न का वह सेवन करता

English

He, when he went away to the upper region, went away having become Brihaspati and having made the exclamation Vashat an eater of food. He who hath this knowledge eats food with

अध्याय १५

श्लोक 18.1

अध्यात्म-प्रकरणम्।१-५ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ दैवी पङ्क्तिः, २-३ आर्ची बृहती, ४ आर्ची अनुष्टुप्, ५ साम्नी उष्णिक्।तस्य॒ व्रात्य॑स्य

adhyātma-prakaraṇam| 1-5 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 daivī paṅktiḥ, 2-3 ārcī bṛhatī, 4 ārcī anuṣṭup, 5 sāmnī uṣṇik| tasya vrātyasya

हिन्दी अर्थ

मण मिलकर, यौः है । ऋतु, भरातंव पभ्रौर संवत्सरं कालखूप है । रेष समग्र प्रणि- शरीर मे व्यापी होने के कार, व्यानर्प है.। का० १५। अ्रनु० २। सुऽ १७ भ्रथवं वेद-माष्य २३७ है, (एतत्) इस प्रकार परिक्रमा कर रहे ह, (वं) निर्चय से जसे किं मानो संवत्सर की परिक्रमा कर रहीरै। ऊ्व॑-ज्वाला वाली हो कर प्रदोप्त होती है, कहां जने कौ इच्छा वाला वायु सतत गति कर रहा है। जहां जनि की इच्छा याते वायु-मंवर गति ५३४ भ्रथटविद-माष्य का० १५ । प्रनु० २। सुऽ १८

English

Vrātya.

अध्याय १५

श्लोक 18.2

यद॑स्य॒ दक्षि॑ण॒मक्ष्य॒सौ स आ॑दि॒त्यो यद॑स्य स॒व्यमक्ष्य॒सौ स च॒न्द्रमाः॑

yadasya dakṣiṇamakṣyasau sa ādityo yadasya savyamakṣyasau sa candramāḥ

हिन्दी अर्थ

प्राप्त होते है। पितूृयाणमार्गीं भीयातो सीधे या परम्परया सवसार रहस्थी.भी तैर जतेर्है,जो कि विधिपूर्वेक पितु-ऋण चुका देते ह। भ्रादित्य पद परमेदवरवाचक भी है (यजु ३२।१) । परमात्मा में प्रवेद पाता है च मेखवर का ष्टि रचना भें (एकम) एक प्रयोजन समानथंसू, मन्त्र ८ (इति) यह मोक्ष जो करि (श्राहुति, एव) भ्राहुतिरूप है, भादित्यनामक का० १४। भ्रनु° २। सु० १८ श्रथवेवेद-भाष्य २३९ परमेरवर की (यद्) जो (सन्य) बायीं (भरक्षि) भांख है (सः) कह (चच्रमाः) चांद है। र भ्रादिशरीरयोकोसक्रिय कर रहे." वैसे समष्टि जगत् मेँ भी एक महतो -

English

When they surround the Sun on the day of New Moon, and that time of Full Moon. That one immortality of theirs is just an oblation.

अध्याय १५

श्लोक 18.3

योऽस्य॒ दक्षि॑णः॒ कर्णो॒ऽयं सो अ॒ग्निर्योऽस्य स॒व्यः कर्णो॒ऽयं स पव॑मानः

yo'sya dakṣiṇaḥ karṇo'yaṃ so agniryo'sya savyaḥ karṇo'yaṃ sa pavamānaḥ

हिन्दी अर्थ

दाहिने कान को अधिक शक्ति शाली. माना प्रतीत होता है, इस लिये दमे भ्रग्निकहादहै, भौर बाए कान को कम रक्ति वाला मानाहै, इसलिये इसे पवमान कहा है ।" जातकर्मसंस्कार" ममी दाहिने कानमे “वेदोऽसि, है शिशु ! तु वेद है, एेसे कथन का विधान है (संस्कार विधि, २४५ भथववेद-माष्य का० १५। भ्रनु० २। सू० १८ के योग्यदहै। इतनातो समफमेंभ्रा सकता हैकिवायु जो वायुरूपं (नासिके) नासिकाके दो छिद्र (म्रहोरत्रै) दिनश्मौरः-रतरिदहै (शोषंकपले) सिर के दो कृपान (दितिः च, भ्रदितिः' च) दितिभश्रौर रादित्य के अ्रधिऽठता परमेश्वर का ग्रहण होता है। दिनके समय,

English

When they surround the Sun on the day of New Moon, and that time of Full Moon.

अध्याय १५

श्लोक 18.4

अ॒हो॒रा॒त्रे नासि॑के॒ दिति॒श्चादि॑तिश्च शीर्षकपा॒ले सं॑वत्स॒रः शिरः॑

ahorātre nāsike ditiścāditiśca śīrṣakapāle saṃvatsaraḥ śiraḥ

हिन्दी अर्थ

है । वासं -प्रश्वास की हस से विपरोत गति रोग का चिह्लदहै। इसप्रकार .२।१०।१६) हारा सूरं भी व्रतेपति होते से व्रात्य है । का० १५। भ्रनु० २।सू० १८ भयववेद-माष्य २४१ मे कई बार वारीवारी से बदलते रहते ह । “हठयोग प्रदीपिका” प्रादिर्मे कहा है । भ्रादित्य का संचालन कालाघीन दहै । यथा “कालेनोदेति सूर्य॑ः काले निंविदाते पूनः" (रथव १९१५४५१) । काल की इकाई संवत्सर है । है, वसे संवत्सर के प्राश्य दिन-रात, मास तथा चऋतुए' भरवलम्बित है । इस संवत्सर केदो विभाय, उत्तरायण तथा दक्षिणायन । यदो मानो संवत्सर कूपी शिरः (सिर) के दों -कपाल ह, खोपड़ी के भदो खण्ड ह। इनमे से उत्तरांयंण-भाग या खण्ड कों भ्रदिति कटाहे, मौर कोहरलेता है। दक्षिण भाग को भ्रसुर-भागःभी कहते है, तथा उत्तर-

English

Day and Night are his nostrils. Diti and Aditi are his head and skull. By day the Vrātya is turned westward, by night he is turned eastward. Worship to the Vrātya!

अध्याय १५

श्लोक 18.5

अह्ना॑ प्र॒त्यङ् व्रात्यो॒ रात्र्या॒ प्राङ् नमो॒ व्रात्या॑य

ahnā pratyaṅ vrātyo rātryā prāṅ namo vrātyāya

हिन्दी अर्थ

गतिं करतादहै, भ्रौर रात्रि के समय पर्चिमसे धूवंकीभोरं गति करता भ्रादित्य-पुरुष की “नमः दारा नमस्कार किया है । योऽसाबादिष्ये पुरुषः. . ९४२ श्रथव्विद-माष्यः का० १५। घ्नु० २। सु० १८ शरी भरोफेसर विष्वनाय विद्यालंकार विदयामातंण्ड कृत ' “प्रथववेद १५ वें काण्ड का "“आप्नुबन्ति शरीरमिति आपः (उणा०२ (६ १ इस से ज्ञात होताहै क्रि महषि को भ्रापः द्वारा “रक्त. भरं भी भरमिप्रेत है भरथवं० १०।२।१२ में भी भ्रापः का श्रथं रक्त प्रतीत होता है। यथा- मन्व मेँ “सिन्धु” पद द्वारा हृदय कंहा है, भ्रौर “पुरषे भापः' हारा धूम्रव्णीः भरादिजो किं रक्त के बोधकं

English

By day the Vrātya is turned westward, by night he is turned eastward. Worship to the Vrātya!

स्रोत: bhavykhatri/DharmicData · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता · Identifier:

Atharva Veda — Chapter 15

अथर्ववेद

संस्कृत संस्करण · Sanskrit Edition:

Imported text; printed edition not recorded

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