अध्याय १५
श्लोक 1.1
अध्यात्म-प्रकरणम्।१-८ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ साम्नी पङ्क्तिः; २ द्विपदा साम्नी बृहती; ३ एकपदा यजुर्ब्राह्म्यनुष्टुप्; ४ एकपदा विराड् गायत्री; ५ साम्नी अनुष्टुप्; ६ त्रिपदा प्राजापत्या बृहती, ७ आसुरी पङ्क्तिः; ८ त्रिपदा अनुष्टुप्।व्रात्य॑ आसी॒दीय॑मान ए॒व स प्र॒जाप॑तिं॒ समैरयत्
adhyātma-prakaraṇam| 1-8 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 sāmnī paṅktiḥ; 2 dvipadā sāmnī bṛhatī; 3 ekapadā yajurbrāhmyanuṣṭup; 4 ekapadā virāḍ gāyatrī; 5 sāmnī anuṣṭup; 6 tripadā prājāpatyā bṛhatī, 7 āsurī paṅktiḥ; 8 tripadā anuṣṭup| vrātya āsīdīyamāna eva sa prajāpatiṃ samairayat
हिन्दी अर्थ
मीद्व == मिहु सेचने, वौयंसेचन.मे समथं है किरम पितृग्रह के साथ जडे हए कन्यां के प्रमबन्धनो को ढीला करता हं ताकि कन्या पतिगृह मे स्थिर हो सके। वर को “पुषा” "कहा हैँ । यदि पति वीयंवान् न हो तो गरहस्थधमं सफल नहीं हो सकता, तथा पारस्परिक पतिपत्नोसम्वद् ढीला. पड़ सकता हैः श्रौर पत्नी सुपुत्रा नहीं हो सकती । सुभगा का श्रं है उत्तमं भगो बाली । भग के ६ भ्रं होते ह, एेदवयं, चाहिए कि वह् इन ६ भगो का यथादाक्ति उपाजंन करती रहे,ताकि सन्तानं सुंसन्तानें हौ सकें । वर द्वारा वध्र को भ्रारवासन शतस्य योनौ सुकतस्य॑ छोके स्योनं तै अस्तु सषस॑मलायै ।१९। के (योनौ). मेरे गृह मँ, तथा (सुकृतस्य) सुकर्मियों के (लोके) "समाज में
English
The hyperbolical glorification of the Vrātya or Aryan Non-conformist