Atharva Veda· Atharvaveda Saṁhitā
15
अध्याय 15 / 20

Kanda 15

काण्ड 15

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पूर्ण अध्याय पाठ139 श्लोक

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अध्याय १५

श्लोक 1.1

अध्यात्म-प्रकरणम्।१-८ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ साम्नी पङ्क्तिः; २ द्विपदा साम्नी बृहती; ३ एकपदा यजुर्ब्राह्म्यनुष्टुप्; ४ एकपदा विराड् गायत्री; ५ साम्नी अनुष्टुप्; ६ त्रिपदा प्राजापत्या बृहती, ७ आसुरी पङ्क्तिः; ८ त्रिपदा अनुष्टुप्।व्रात्य॑ आसी॒दीय॑मान ए॒व स प्र॒जाप॑तिं॒ समैरयत्

adhyātma-prakaraṇam| 1-8 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 sāmnī paṅktiḥ; 2 dvipadā sāmnī bṛhatī; 3 ekapadā yajurbrāhmyanuṣṭup; 4 ekapadā virāḍ gāyatrī; 5 sāmnī anuṣṭup; 6 tripadā prājāpatyā bṛhatī, 7 āsurī paṅktiḥ; 8 tripadā anuṣṭup| vrātya āsīdīyamāna eva sa prajāpatiṃ samairayat

हिन्दी अर्थ

मीद्व == मिहु सेचने, वौयंसेचन.मे समथं है किरम पितृग्रह के साथ जडे हए कन्यां के प्रमबन्धनो को ढीला करता हं ताकि कन्या पतिगृह मे स्थिर हो सके। वर को “पुषा” "कहा हैँ । यदि पति वीयंवान् न हो तो गरहस्थधमं सफल नहीं हो सकता, तथा पारस्परिक पतिपत्नोसम्वद् ढीला. पड़ सकता हैः श्रौर पत्नी सुपुत्रा नहीं हो सकती । सुभगा का श्रं है उत्तमं भगो बाली । भग के ६ भ्रं होते ह, एेदवयं, चाहिए कि वह् इन ६ भगो का यथादाक्ति उपाजंन करती रहे,ताकि सन्तानं सुंसन्तानें हौ सकें । वर द्वारा वध्र को भ्रारवासन शतस्य योनौ सुकतस्य॑ छोके स्योनं तै अस्तु सषस॑मलायै ।१९। के (योनौ). मेरे गृह मँ, तथा (सुकृतस्य) सुकर्मियों के (लोके) "समाज में

English

The hyperbolical glorification of the Vrātya or Aryan Non-conformist

अध्याय १५

श्लोक 1.2

स प्र॒जाप॑तिः सु॒वर्ण॑मा॒त्मन्न॑पश्य॒त् तत् प्राज॑नयत्

sa prajāpatiḥ suvarṇamātmannapaśyat tat prājanayat

हिन्दी अर्थ

सेवाः = सु + शेदम् सुरूनाम (निष ० २।६) । योनिः गृहनाम (निचं° का० १४ अनु १। सुण ग्रथववेद-माष्य २७ को बि हए हैँ । माता-पिता रौर सन्तानौं का, पति श्रौर पत्नी का पार- मे भो दुष्टिगोचरहो रहीदहै, जिससे प्रारिसृष्टि का सजनहोरहाह। वर कहृतादहैकिहे वधु ! ग्रभो तकं तो इस प्रेमपाचा द्वारा तेरे चुखेद द्वारा बांधता हूं + इमं प्रकार वर श्रपने हादिकंप्रेम का विरवास ववृ को साथही वरः कहता. है कि इस नएघर मे सत्यका राज्यदहै। इस घरमे तू सदा सुखपूवेक रहेगी, श्रौर मै सदा सम्यग्भाषी हो कर तुभे १० मगंस्तवेतो न॑यतु दस्तगृहयाशििनां त्वा प्रवहतां रथन ।

English

There was a roaming Vrātya. He roused Prajāpati to action.

अध्याय १५

श्लोक 1.3

त देक॑मभव॒त् तल्ल॒लाम॑मभव॒त् तन्म॒हद॑भव॒त् तज्ज्ये॒ष्ठम॑भव॒त् तद् ब्रह्मा॑भव॒त् तत् तपो॑ऽभव॒त् तत् स॒त्यम॑भव॒त् तेन॒ प्राजा॑यत

ta dekamabhavat tallalāmamabhavat tanmahadabhavat tajjyeṣṭhamabhavat tad brahmābhavat tat tapo'bhavat tat satyamabhavat tena prājāyata

हिन्दी अर्थ

तेरा हाथ पकड़ कर (नयतु) ले चले, श्रदिवना) वर के माता-पिता (त्वा) (ग्रहान्) पति के. गरहवासियो की प्रोर (गच्छ) तुजा, (यथा) ताकि (गृहपत्नी) पतिगरह की स्वामिनी (श्रः) तुरो सके, (वदिनी) पूत्रो रण ्रथववेद-माष्य . का०.१४। अनु० १। सु° १ है । इस कथन द्वारा पुत्री को पिता पतिक सद्गुणो का परिज्ञान देता है, ताकि पति पर कन्या भरोसा, विदवास, तथा श्रद्धा कर सके । पत्नी को पति, पितृगरृह से,हाथ पकड़ कर रथ तक ले चले, तत्पद्चात् पति के माता-पिता की सुरक्षा में पत्नी, पतिग्रह को रथ द्वारा जाए। कन्या का पिता पूत्रीको यहु भी उपदेदादेतादहैकितूु पति के धर जा कर भ्रपने सद्गुणो के कारण पतिगृह की स्वामिनी बन । पत्नीगरह की तथा गरहवासियो.की सच्ची स्वामिनी तभी बन. सकती है जब कि वह् भ्रयने सेवोभाव तथा कर्तंव्यभावना से सब गरहवा सियो के म्नो को मोह ले । गई ह । मानौ यह् पत्नी का कानुनन हक उदघोषित किया गया है 1

English

Prajāpati beheld gold in himself and engendered it.

अध्याय १५

श्लोक 1.4

सोऽवर्धत॒ स म॒हान॑भव॒त् स म॑हादे॒वोऽभवत्

so'vardhata sa mahānabhavat sa mahādevo'bhavat

हिन्दी अर्थ

. (इह) इस पतिगृह मँ (ते) तेरे लिये (प्रजाये) तथा तेरी सन्तानो के कार्यो के सम्पादन के लिये (जागृहि) है वधु ! तू.ज्ञागरूक रह । (एना, ज्ञानविज्ञान का (भ्रा वदासि) सरवंत्र उपः करते रहना । जिवि; = यो जीवंति । इसी प्रकार पुरुष के सम्बन्धे कहा है कि (उणा० ५।४६) तथा जीविः (४।५५) महषि दयानन्द । “जिवि: का ही रूपान्तर लौकिक संस्कृत मेँ “जितब्रिः"" तथा जीविः प्रतीत होताहै1॥ विदथम्-= विदथा वेदनेन (निर० ३।२।१२); विद्ये वेदने (नि० १।३।७); विदथानि वेदनाति "ज्ञानानि" (नि° ६।२।७)

English

That became unique, that became distinguished, that became great, that became excellent,

अध्याय १५

श्लोक 1.5

स दे॒वाना॑मी॒शां पर्यै॒त् स ईशा॑नोऽभवत्

sa devānāmīśāṃ paryait sa īśāno'bhavat

हिन्दी अर्थ

कि तेरे तथा तेरी सन्तान के लिये पतिगरह मे सदा सुरों की वुद्धिदहो, का० १४। श्रनु° १। सु° १ अथरवेवेद-माष्य २९ भौर तदनन्तर उपदेश देता है कि पतिगृह मेँ गृहस्थ धमं के पालन तथा पति के कार्यो के सम्पादन मे सदा सावधान रहना । तथा यह मी कि मेँ ही निज जीवन यात्राकी समाप्ति न समे । कन्या के पिताका वर-वधू को भ्राशीर्वाद कीडन्तौ पुतरनेष्ठमिमांदंमानौ स्वस्तकौ ॥२२॥ - (इह) इस गरहस्थजीवन मे (एव) ही (स्तम्) रहो, (मा) न (वियौ-

English

that became Devotion, that be- came holy Fervour, that became Truth: through that he was

अध्याय १५

श्लोक 1.6

स ए॑कव्रा॒त्योऽभव॒त् स धनु॒राद॑त्त॒ तदे॒वेन्द्र॑ ध॒नुः

sa ekavrātyo'bhavat sa dhanurādatta tadevendra dhanuḥ

हिन्दी अर्थ

कहता है किं (१) तुम दोन गृहस्थ जीवन भें पति-पत्नीभाव से बने रहो । दो, श्रौर नएक दूसरे से चिरकाल तक श्रलग रहो। (३) गृहस्थ में. जीवनो को नियमपूर्वकं रखो ताकि तुम ॒श्रपनी १०० वर्षो की पं भ्रायु तेथा उसे साफ-सुथरा श्रौर रम्य बनाघ्रो । - ३० अथवेवेद-माष्यं, का० १४। भननु° १ । सु° १ देल-माल करता है, भौर (भ्रन्यः) दूसरी - तु है पत्नि ! (ऋतून्) ऋतुघभों को (विदधत्) प्रकट करती हुई (नवः) नवीन नवीन खूप में (जायसे) प्रकट होती रहती है । ॥ि । न है, इनकी नियमबद्ध गंतियो से. इन के एक बुद्धिमानु नियन्ता का भ्नूमान की भ्रोर नियमित गतियां कर रहेदहैः। - ये दोनों मानों परमेदवरीय माता के शि है, जोकि भन्तरिक्ष की क्रीडाभूमि मेल रहे-ह। इन में एक भ्र्थात् सूयं मानो चलता हभ निज सौर मण्डलके भुवनो का निरीक्षण करता हृभ्रा उर नियमोंमें

English

born.

अध्याय १५

श्लोक 1.7

नील॑मस्यो॒दरं॒ लोहि॑तं पृ॒ष्ठम्

nīlamasyodaraṃ lohitaṃ pṛṣṭham

हिन्दी अर्थ

मा कलाग्रों कीः क्षय तथा वृद्धि दवारा नंवौन नवीन रूप धारण करता हृभ्रा मानो प्रतिमास पुनः पुनः पैदा होता है। का० १४. भ्रनु० १। सु° १ भथंववेद-माष्य ३१ पड़ता है । हंसी-खेल की तबियत वाले पति-पत्नी ही इन कष्टों तथा भ्राप- त्िरयो का मुकाबिला बहादुरी के साथ कर पाते है। तथा पृत्रियो के रूप मे नवीन नवीन -रूपों भे प्रकट होती रहती है । सन्तानौं , का निर्माण माता ही करती. है । १० मास माता के पेट में रह् कर बनवा माताके संस्कारो सेही प्रभावित होता रहता है। जन्म के पंदचात् मी

English

He grew, he became great, he became Mahādeva.

अध्याय १५

श्लोक 1.8

नीले॑नै॒वाप्रि॑यं॒ भ्रातृ॑व्यं॒ प्रोर्णो॑ति॒ लोहि॑तेन द्वि॒षन्तं॑ विध्य॒तीति॑ ब्रह्मवा॒दिनो॑ वदन्ति

nīlenaivāpriyaṃ bhrātṛvyaṃ prorṇoti lohitena dviṣantaṃ vidhyatīti brahmavādino vadanti

हिन्दी अर्थ

-माताही प्रों तथापुच्रि्योँ के रूप में समय पर प्रकट होती रहती है। चन्दर नाम से पतनी का वशंन २४. नवोनवो मवसि नाय॑पानोऽडा" केतुऽर्षसामिष्यग्र॑म् । : नवीन नवीन रूपों भं (जायमानः) प्रकट (भवसि) होती रहती है, (म्रह्ञाम्) ३२ भथववेद-माष्य का० १४। भ्रनु° १। सु० १ (देवेभ्यः) देवो.के लिए (मागम) माग का (विदधासि) विधान करती है, तिरसे) बढ़ती हैः याकरतीदहै। । तए नए रूपों मे प्रकट होता रहता है । वह दिनों - भर्थात् तिथिय का केतु

English

He gained the lordship of the Gods. He became Lord.

अध्याय १५

श्लोक 2.1

१-३२ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१, ६, ९, १७, २५, ३० साम्न्यनुष्टुप्; २, १८, २६ साम्नी त्रिष्टुप्; ३ द्विपदाऽर्षी पङ्क्तिः ४, २०, २८ द्विपदा ब्राह्मी गायत्री; ५, १३ २१, २९, द्विपदाऽर्ची गायत्री; १४ साम्नी पङ्क्तिः २२ आसुरी गायत्री; ७, १५, २३, ३१ पदपङ्क्तिः; ८, १६, २४, ३२ त्रिपदा प्राजापत्या त्रिष्टुप्; १० एकपदा उष्णिक्; ११ द्विपदाऽर्षी भुरिक् त्रिष्टुप् १२ आर्षी पराऽनुष्टुप्; १९ द्विपदा विराडार्षी पङ्क्तिः; २७ निचृदार्षी पङ्क्तिः।स उद॑तिष्ठ॒त् स प्राचीं॒ दिश॒मनु॒ व्यऽचलत्

1-32 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1, 6, 9, 17, 25, 30 sāmnyanuṣṭup; 2, 18, 26 sāmnī triṣṭup; 3 dvipadā'rṣī paṅktiḥ 4, 20, 28 dvipadā brāhmī gāyatrī; 5, 13 21, 29, dvipadā'rcī gāyatrī; 14 sāmnī paṅktiḥ 22 āsurī gāyatrī; 7, 15, 23, 31 padapaṅktiḥ; 8, 16, 24, 32 tripadā prājāpatyā triṣṭup; 10 ekapadā uṣṇik; 11 dvipadā'rṣī bhurik triṣṭup 12 ārṣī parā'nuṣṭup; 19 dvipadā virāḍārṣī paṅktiḥ; 27 nicṛdārṣī paṅktiḥ| sa udatiṣṭhat sa prācīṃ diśamanu vya'calat

हिन्दी अर्थ

. (निर० १२१1७) , कृष्णपक्ष के श्रन्तिम दिनों से 6 पूवं मे उषाके देवो को मानों यज्ञका भाग प्रदान करता है श्रौरभ्रायु . बढाता है। होता, तथा प्राणिशरीरों भें रक्त संचार बढ़ता है, इस कारण चन्द्रमा होती रहती है । भिन्न॒ भिन्न गुणौ, ्राकृतियों वाली सन्तानं माताकेही रही होती दहै । यथा “आत्मा वे पूश्च नामासि सं जोव धारवः इतम्" (दात० बरा० १४।९।८।२६) । (२) पत्नी दिन का मानो भण्डा है । राजा के महल. पर फण्डा यदि लगा है तो ज्ञात होता है कि महल मे राजा की उपस्थिति

English

He became Chief Vrātya. He held a bow, even that Bow of

अध्याय १५

श्लोक 2.2

तं बृ॒हच्च॑ रथंत॒रं चा॑दि॒त्याश्च॒ विश्वे॑ च दे॒वा अ॑नु॒व्य॒ऽ चलन्

taṃ bṛhacca rathaṃtaraṃ cādityāśca viśve ca devā anuvya' calan

हिन्दी अर्थ

ग्वाला, तथाः (सविता) गृहपत्नी का या पति का-टत्पादक पिता (वः) - दहै गौभ्रो ! तुमह (भ्रस्मे) इस घर के लिए (सुवाति) प्रेरित करे । .. वे धाता (ते० ब्रा० ३।८।२३।३) । सविता=पत्नी कां पिता (मन्त्र €, १९) , व्यश्या-गौए णेसी खरीदनी चाहिए जिन के साथ बद्छडेन्नछडियां हों, ताफि वे दूष दे सकं । भतः प्रजां समेत गौरो का गृहपति के घर प्रवेद गौए घरमे होने पर उन के दूष, घृत द्वारा देवयज्ञ करने चाहिए ताकि देवो को छनं का भाग मिलता रहे । भ्रग्निहोत्र, दशंपौरंमास भ्रादिं देव, पितृदेव, भावाय .देव श्रादि का सत्कार करना भी देवयज्ञ है । पुष्टि को बनाए रखने कै लिए उसे चाहिए कि वह घर में गौए सदा रखे । सविता पिता दहै -वधू-का। वैदिक विवाहं विधिम सविता, वर वो गोदान

English

the Gods. In the eastern region Faith is his leman, the hymn his panegyrist, knowledge his

अध्याय १५

श्लोक 2.3

बृ॒ह॒ते च॒ वै स र॑थंत॒राय॑ चादि॒त्येभ्य॑श्च॒ विश्वे॑भ्यश्च दे॒वेभ्य॒ आ वृ॑श्चते॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॒ व्रात्य॑मुप॒वद॑ति

bṛhate ca vai sa rathaṃtarāya cādityebhyaśca viśvebhyaśca devebhya ā vṛścate ya evaṃ vidvāṃsaṃ vrātyamupavadati

हिन्दी अर्थ

का० १४। श्रनु° १। सू° १ भ्रथवेवेद-भाष्यं ४९ तथा मानसिक कष्ट देने हिसारूप है, कटुभाषण भी वाचिकं हिसा है,- . की मावनार्भोकाभी परित्याग कर देना चाहिए पत्नी की पवित्रता के तीन प्रकार ४१. से रथ॑स्य खेऽन॑सुः खे युगस्यं शतक्रतो । .: (शतक्रतो). है सौवषोँं की भ्रायु मे कमकरील, यज्ञगील' तथा उत्तम सदुश चमंका दिया है, पवित्र कर दिया है रथस्य =“भ्रात्मानं रथिनं ५९ भ्रयर्ववेद-साष्य का० १४। भअनु० १। सु० १

English

becomes the beloved home of

अध्याय १५

श्लोक 2.4

बृ॒ह॒तश्च॒ वै स र॑थंत॒रस्य॑ चादि॒त्यानां॑ च॒ विश्वे॑षां च दे॒वानां॑ प्रियं धाम॑ भवति॒ तस्य॒ प्राच्यां॑ दि॒शि

bṛhataśca vai sa rathaṃtarasya cādityānāṃ ca viśveṣāṃ ca devānāṃ priyaṃ dhāma bhavati tasya prācyāṃ diśi

हिन्दी अर्थ

का० १४॥ भ्रनु० १। सु० १. भरथवेवेद-माष्य , ५३ के पिता, चचा, ताऊभ्रादि का सुचक है । वतेमान में विवाह के भ्रनन्तर कारण यह हकि पति के सम्बन्धी, नववधू को वह भ्रधिकार नहीं देना चाहते, भ्रादि नववधू को भ्रपनी इष्टि से चलाना चाहती हँ जिससे क्रि वधू उनके (याः) जिन देवीः) देवियों ने (अ्रङ़ृन्तन् ) सूत काता है, (भ्रवयन्) मरौर उसे बुनाहै, (याः च) भरौर जिन देविर्योने (भ्र्भितः) वस्के तुमे, है वधु ! (जरसे) जरावस्था तक के लिये (संव्ययन्तु) हाथ से कते-

English

Night and Full Moon Night are his running attendants, Mind, etc. as in stanza 1.

अध्याय १५

श्लोक 2.5

श्र॒द्धा पुं॑श्च॒ली मि॒त्रो मा॑ग॒धो वि॒ज्ञानं॒ वासोऽह॑रु॒ष्णीषं॒ रात्री॒ केशा॒ हरि॑तौ प्रव॒र्तौ क॑ल्म॒लिर्म॒णिः

śraddhā puṃścalī mitro māgadho vijñānaṃ vāso'haruṣṇīṣaṃ rātrī keśā haritau pravartau kalmalirmaṇiḥ

हिन्दी अर्थ

(वासः) वस्रं को (परिधत्स्व) पदहिना कर । बनाना,-देविधों का गहं कौशल दर्शाया है । नववधू को यह् उपदे मीदियाहै कितु हाथ सेकतेबुने वरस््रो को धारण कियाकर,भ्रौर मरायु भर रेस वस्त्र ही धारण किया कर। गरृह-उद्योग कायहएक , 1 परथर्दवेद-माष्थ का०.१४ 1 भ्रनु° १। सू १ के लिए हैउन की श्रवस्था निम्नलिखित हो जाती हैः-- परन्तु १२िणाम में जीवन भर रोते रहते हँ । वे गहस्थघरमं के यज्ञियां को हटा कर गृहरथ को ध्म॑विरुद दिदा भले जते, भ्रौर उसे प्रयज्ञमय बनादेतेरहै। साहस के श्रभाव के. कारण सफलता उन्हे प्राप्त नहीं होती ।

English

He arose and went away to the western region. Vairūpa and

अध्याय १५

श्लोक 2.6

भू॒तं च॑ भवि॒ष्यच्च॑ परिष्क॒न्दौ मनो॑ विप॒थम्

bhūtaṃ ca bhaviṣyacca pariṣkandau mano vipatham

हिन्दी अर्थ

जो कि शिष्टाचार के विरु होते हैं । हे वधु ! (ते) तेरी (प्रजायं ) भावी सन्तान के लिए भाद्चरूप मे, का० १४। भ्रनु° १ । सु० भरथतेदशषमाष्य ५५ तू बड़ी तेजस्विनो है । (सविता ) जगदुत्पादक परमेश्वर (ते) तेरी (ब्रायुः) भ्रायु (दीघम्) लम्बी (कृणोतु) करे । विवाह हौ जाने पर पत्नी को. सदा प्रसन्न रखना,-यह् विवाहधमं है । व्याख्या--विवाहपदढति के भ्रनुसार वध् को रिलारोहण कराया जाता है! शिलारोहण के लिए वर इस मन्व द्वारा वध् को प्रेरित करता है, ताकि वह परख सङके कि शिला कितनी दुद् तथा मजब्रूत है। वर वधू को भ्रनुभव करातादहै कि जसे पृथिवी-माताकी गोद र्म यह् शिला दृढ तथा मजबूत है इसी प्रकार तेरी गोद मेँ भी दृढ तथा मजत्रूत सन्तान व्र वधू को "देव्याः द्वारा देवी कता है। देवी का. प्रथं दिव्यगुौं वाली । माता के.देवी होते सन्ताने भी देव रौर देवरी बन

English

Vairāja, the Waters, and King Varuna followed him. He who reviles the Vrātya possessing

अध्याय १५

श्लोक 2.7

मा॒त॒रिश्वा॑ च॒ पव॑मानश्च विपथवा॒हौ वातः॒ सार॑थी रे॒ष्मा प्र॑तो॒दः

mātariśvā ca pavamānaśca vipathavāhau vātaḥ sārathī reṣmā pratodaḥ

हिन्दी अर्थ

(भ्रथवे० २।१३।४) । भर्थात् तु दारीर को पत्थर बना, तथा तेरा शरीर शरीर का मजबूत तथा- कठोर होना स्वास्थ्य की निदानी है । एरी सन्तानं ही सुंख पा सकतीं (स्योनम्) तथा माता-पिता को सुखी कर भौर विवास के भ्रनूफरुल, जीवनचंर्या हो जाने पर सन्ताने तदनुरूप हो ५६ भ्रथववेद-भाखष्य का० १४ । श्रनु० १ । सू° १ “सुवर्चाः? रा वधू को यह् निदेश दिया है कि गृहुस्थधमं का इस तरह तू पालन कर जिससेतेरा शारीरिक तेजकमन होने पाये, ताकि तू दीर्घायु हो सके । ग्रहृण किया ह, (तेन) उस उदेश्य से है वधु ! ति हस्तं गृह्णाभि) तेस पाणिग्रहण मै करता हूं । (मया सहः) मेरे साथ वतमान तू (प्रजया उत्तम सन्ताने, तथा उन के पालन पोषणार्थं घन 1 वर कहता है वधू को

English

this knowledge is alienated from

अध्याय १५

श्लोक 2.8

की॒र्तिश्च॒ यश॑श्च पुरःस॒रावैनं॑ की॒र्तिर्ग॑च्छ॒त्या यशो॑ गच्छति॒ य ए॒वं वेद॑

kīrtiśca yaśaśca puraḥsarāvainaṃ kīrtirgacchatyā yaśo gacchati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

किमेरे कूल के भरग्रणी पुरुष जिस उदेश्य से पाणिग्रहण करते रहे हैँ उसी उदेश्य से वै तेरा पाणिग्रहण करता हं ताकि प्रजा श्रौर धन के रभाव दवारा तू व्यथा को प्रप्त नहो। पाशिग्रहण तथा पतिके गण .. ४8; देवस्तं खविता हस्तं गृह्णातु सोमो राला खु भजसं इृणोतु । बर (ते) तेरा (दृस्तं गृह्णातु) पाणिग्रहण करे, (सोमः) वीयंवान् (राजा) का० १४। प्ननुऽ १। सुऽ १ . भथववेद-माष्य ७ भगौ अथेमा सविता पुरन्धिभे्ं त्वादुरगापत्याय देवाः.॥५०॥ हे वधु ! (सौभगत्वाय) अपने सौभाग्य के लिए (ते) तेरा (हस्तम्, गृह्णामि) पाणिग्रहण म करता हू, (मया, पत्या) मुक पति के साथ. (यथा) मान करने वाला, श्रेष्ठ मन वाला तथा न्याय्रकारी हु, (सविता) तेरा लिये (त्वा) तुमे (दरुः) दिया है । 4

English

Vairūpa and Vairāja, the Waters and Varuna the King. He who possesses this knowledge

अध्याय १५

श्लोक 2.9

स उद॑तिष्ठ॒त् स दक्षि॑णां॒ दिश॒मनु॒ व्यऽचलत्

sa udatiṣṭhat sa dakṣiṇāṃ diśamanu vya'calat

हिन्दी अर्थ

भग ९ है (्रथवं ° १४।१।४२) । पुरं चिः = बहुघीः (निर० ६।३।१३) । भग, श्र्यमा, सविता, अर पुरधि के श्रथं पतिपरकृ कयि ह । देवाः= देवाइच देव्यश्च, एक हेष “पुमान स्तिया (अष्टा० १।२।६७) व्याख्या--वर वधू कों कहता है कि भै भ्रपने सौभाग्य के लिएतेरा पारिग्रहण करता है। विना पत्नी के पुरुष का सौभाग्य नहीं बनता वतमान रीतिरिवाज मँ पति के कारण पत्नी को सौभाग्यवती कहा जाता उत्तम अगो का निवास नहीं बनता ।-“"गाहंपत्याय' हारा सूचित किया भ्ठ भरथर्ठेविद-माष्य का० १४ । भ्रनुऽ १। सू०.१ सहयोग द्वारा ही होते है भरन्त मे पति कहता है कि इन देवँ भ्रौर देविर्यो ने जोकिं हमारे विवाह के साक्षी ह मेरे प्रति तुमे दिया है 1 . सविता=सु, सुग्रसवे, भरौ च । वर भ्रपने-भाप को गृहपति कता हुप्रा वधू को विवास पिलाता है किम तेरे नवगृहमे तेरा रक्षक हंगा । तु भौर तेरी सन्ताने मेरे रहते भ्ररक्षित ्रनुभव न करेगी ।

English

becomes the dear home of

अध्याय १५

श्लोक 2.10

तं य॑ज्ञाय॒ज्ञियं॑ च वामदे॒व्यं च॑ य॒ज्ञश्च॒ यज॑मानश्च प॒शव॑श्चानु॒व्यऽचलन्

taṃ yajñāyajñiyaṃ ca vāmadevyaṃ ca yajñaśca yajamānaśca paśavaścānuvya'calan

हिन्दी अर्थ

है । दिन के चदृते नई राशां भौर उमरङ्खो काउदयहोतादहैजिनकी सफलता रभे पत्नी सहायक होती है । इस अण्डे के श्रभाव मेँ गृहजनीवन . सूना है । (३) पत्नी को उषा काल से पूवं ही जाग कर गृहकारयो मे व्यापृत हो ४ ५ ५4 ॥ (४) पत्नी के होते ही . देवों भ्र्थात् मातृदेव, पितृदेव, तथा भ्रतिथि देव को उन उन का नियत खाद्य भ्रादि का भाग मिल सकता. काऽ १४।-अनु० १ ४सृ० १ ग्रथर्ववेद-भाष्य ३३ (५) गृहस्थ में पत्नीं यदि प्रेममयी हो तो वह पतिकी भ्रायु के बठृने मे (एषा) यह् (जाया) पत्नी जब मानो (पद्रती) पैरों वाली (कृत्या) कृतिशक्ति (सूत्वा) .हो कर (पतिम) पति के घरमेया हृदय में के प्रति (वसु) धनका (विभजा) विभाग किया कर।

English

Indra.

अध्याय १५

श्लोक 2.11

य॒ज्ञा॒य॒ज्ञिया॑य च॒ वै स वा॑मदे॒व्याय॑ च य॒ज्ञाय॑ च॒ यज॑मानाय च प॒शुभ्य॒श्चा वृ॑श्चते॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॒ व्रात्य॑मुप॒वद॑ति

yajñāyajñiyāya ca vai sa vāmadevyāya ca yajñāya ca yajamānāya ca paśubhyaścā vṛścate ya evaṃ vidvāṃsaṃ vrātyamupavadati

हिन्दी अर्थ

कायं में सुस्ती भौर हाल यन होने चाहे । तभी वह् पति के हृदय मे प्वेशपा सक्ती है। पतिगृह मेंपत्नीके भ्राजने पर पति को चाहिए प्रम बढता जाए । कदुभाषर, भ्रस हिष्युतापूरं व्यवहार, तथा कठोर व्यवहारो की अधिकतर सम्भावना पतिकीश्रोरस हृभ्रा करती है। इस लिये मन्त्र मँ यह् उपदेश पति को दिया है । दारा किया करे । दस निमित्त पति, निज भ्राय का यथोचित भाग, सत्पात्रं की सेवा के निमित्त विभक्त कर दिया करे । यह सामालिक धमं है । है । पञ्चमहायज्ञा का विधान, जिन द्वारा कि भतिथि भ्रादि देवोँ.का किया जाता है, पत्नीरहित पुरुष के लिए सम्भव नहीं । इसलिये, गो -- त श न भ क ¬ थासा दान वणे += न नवादा» कम ष्य भ्न यकव के 2 क विोने्णदगवेने . च ३३४ अथृववेद-भाष्य का० १४। भ्रनु० १।्०१

English

His belly is dark-blue, his back is red.

अध्याय १५

श्लोक 2.12

य॒ज्ञा॒य॒ज्ञिय॑स्य च॒ वै स वा॑मदे॒व्यस्य॑ च य॒ज्ञस्य॑ च॒ यज॑मानस्य च पशू॒नां च॑ प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ तस्य॒ दक्षि॑णायां दि॒शि

yajñāyajñiyasya ca vai sa vāmadevyasya ca yajñasya ca yajamānasya ca paśūnāṃ ca priyaṃ dhāma bhavati tasya dakṣiṇāyāṃ diśi

हिन्दी अर्थ

लाल (भवति) हो जाता है । तब (भस्याः) इस पत्नी के (ज्ञातयः) पित्र- भी निज व्यवहारो दवारा भ्रभिव्यक्त करनी चाहिए । इससे पति सदां प्रसन्न रह कर निर्बल भी परिपुष्ट हो जातादहै। कमजोरीकेकारण ररीर का लालरक्त नीला पड जाता है। मुख का लाल हौना स्वास्थ्य का चिह् है । मूख पर नीलापन कमजोरी तथा रोग का सुचक है। पत्नी के पितृगृह के सम्बन्धी इस खुशी से बदृते हँ कि हमारी कन्या पतिगृह मेँ बस गरईदहै, रौर उसने पति को निज-प्रेम-वश कर लिया है । . (रुशती) पति की चमकती हुई (तनुः) देह, (भ्रमुया) उस (पापया) हो जाती है, (यद्) जब कि (पतिः) पति (वध्वः) वधू के (वाससः भङ्गो को (भ्यते) भाच्छादितकरताहै। - भ्रनुराग के लाभ दर्शए ह। परन्तु पत्नी यदि परपुरुष के साथ सहवास दारा पापकम करती है, तो वहं पतिधमं से च्युत हुई समी जानी चाहिए, प्रौर उस के साथ गृहस्थधमं का पालन.न करना चाहिए ।.

English

With dark-blue he envelops a detested rival, with red he pierces the man who hates him: so

अध्याय १५

श्लोक 2.13

उ॒षाः पुं॑श्च॒ली मन्त्रो॑ माग॒धो वि॒ज्ञानं॒ वासोऽह॑रु॒ष्णीषं॒ रात्री॒ केशा॒ हरि॑तौ प्रव॒र्तौ क॑ल्म॒लिर्म॒णिः

uṣāḥ puṃścalī mantro māgadho vijñānaṃ vāso'haruṣṇīṣaṃ rātrī keśā haritau pravartau kalmalirmaṇiḥ

हिन्दी अर्थ

, तथा पत्नी जब ऋतुमती हो तब भी पत्नी सहवास. केलिए वजित है । एेसी भ्रवस्था मेँ किया गया सहवास, पति के नीरोग शरीर को दुषित् का० १४ । भ्रनु० १1 सु०१ श्रथर्वेवेद-भाष्य ३५ तथा रूण कर देता है । ऋतुमती को भी पापा काद । इस श्रथ मे पापा का श्रमिभ्रोय पापिन नहीं । भपितु ्पाश्रप द्वारा ऋतुमती के साथ सहवाससे पा (रक्षा) +ग्रप (श्रपगत) हो जाती है) इसलिये ऋतुमती “पापाः है । सी श्रवस्था में सहवाग द्वारा शरीर रक्षारहित हो जाता भभिप्रा्य जी सम्भव है, “उस पापमयी रीति द्वारा पति की सुन्दर तथा चमकती देहं भो श्रीरहित हो जातीहै जबकि पति स्त्रियौँके से वस्वो दारा निज देह को ढापता है, उन वस्त्रों को पहनता है । पुरुष की पौरुष- पणो देह मानो एक सुन्दर तथा चमकती हई देह है । पौरुषशक्ति सम्पन्न पुरुष यदि स्त्रयो कै से कपड़े पहने तो यह रीति पापमयी है, दूषित है । २८. आक्षसंनं विश्रसं नपरथों अभिविकरतनम् । (उत) तथा (ग्रधिविकतंनम्) भ्रधिकार पूरवंक कयडेको विविध प्रकार के (रूपाणि) इन रूपौ को (पय) तु देख । (तानि) उन रूपों को (ब्रह्मा)

English

the theologians say.

अध्याय १५

श्लोक 2.14

अ॒मा॒वा॒स्याऽ च पौर्णमा॒सी च॑ परिष्क॒न्दौ मनो॑ विप॒थम्

amāvāsyā' ca paurṇamāsī ca pariṣkandau mano vipatham

हिन्दी अर्थ

हैः भतः एेसी भवस्था मे सहवास वजि है । ३६ भ्रथवंवेद-भाष्य का० १४ । भ्रनु० १। सू० १ गुखो का वशंन हूभ्रा है । पत्नी को सदा श्राशामय जीवन व्यतीत करना भ्रादामय जीवन के साथ साथ पत्नी को श्रपना जीवन .विहेषतया रिणी ने ब्रह्मचर्य॑काल मेँ वैदिक शिक्षा पाई है रौर तदनुसार निज जीवन को ढाला है, इसलिये इस के योग्य पति भी वेदज्ञ विद्वान् ही होना चाहिए । वह ही विदुषी सूर्या के सद्गुणो मँ शोभारूप बन सकता है, भ्रौर सूर्या के सदुगुरो की शोभा बढ़ा सकता है। ब्रह्मा-कोटि के वर, त॑था सूर्यकोटि सम्बन्ध मेँ मनुस्मृति का लोकं निम्न लिखित है

English

The same, continued

अध्याय १५

श्लोक 2.15

मा॒त॒रिश्वा॑ च॒ पव॑मानश्च विपथवा॒हौ वा॒तः सार॑थी रे॒ष्मा प्र॑तो॒दः

mātariśvā ca pavamānaśca vipathavāhau vātaḥ sārathī reṣmā pratodaḥ

हिन्दी अर्थ

भ्यौ यो ब्रह्मा वेद॒ स द् वारपूयमहति. ॥२९॥ ५ लगमिःवालां तथा. दाहलनकं, है (कटुकम्) यह श्नन्न परिणामे कदटुदहैः. (सः, इत्) वह ही (वाघूयमू) सूर्या के साथ वधूकर्म या विवाह के (ब्रहुंति) कटुकम् यो जिह्वाग्र बाधते, उदधेगं जनयति, शिरो गृह णीते, नासिका लाव- मे से स्रारःनिकल गथा.हो एसा प्रन्न काज्ञान, तंथा उने की पाकविद्या की रिक्षामो देनी चाहिए! वतंमानमें इसे गृह विज्ञान (1101718-80161109) कहते हैँ । जो ब्रह्मा सूर्या के इन गुणौ

English

He arose and went his way to the eastern region. The Brihat, the Rathantara, the Ādityas and

अध्याय १५

श्लोक 2.16

की॒र्तिश्च॒ यश॑श्च पुरःस॒रावैनं॑ की॒र्तिर्ग॑च्छ॒त्या यशो॑ गच्छति॒ य ए॒वं वेद॑

kīrtiśca yaśaśca puraḥsarāvainaṃ kīrtirgacchatyā yaśo gacchati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

दित वधू को, (हरति) निज गृह मेले जाताहै, (यः) जोकि (प्राय को प्राप्त नहीं होती । . = श अ भरध्यथनं करोति . । भरथवा . “वासः” == वस्त्र 4 "विवाहानन्तर वधू के वस्त्रो कौले जाने कैःसाथ . सौध वधूं को भी ब्रह्माले जाताहैः इसलिये वासः.श्ं कँ दवारा वधू-भी भर्ितरेत है, इसीलियें सन्तर मँ जाया शन्द का प्रयोगहृश्रा है।. -.. क उपायो को जानता श्रौर-उन क. श्रध्मरयनः, कररता रहता है, वहं स्वयं भी तथां उख की पत्नी मी सुली रहती है. . । ... कमाई, तथां सत्य-मीटी वाणी । . "(ऋतो्येषु) संत्य. ही जिनं ॐ .बोलना चाहिए उन व्यवहारो में रुचि-कर बना, ताकि-यह (सं लः) सम्यग्माषी . हौ कर (चार) सुचाररूप , अँ पत्नी के प्रति (एता, वाचम्). दसः व्राणी को बोला करे 1. - ...

English

all the Gods followed him.

अध्याय १५

श्लोक 2.17

स उद॑तिष्ठ॒त् स प्र॒तीचीं॒ दिश॒मनु॒ व्यऽचलत्

sa udatiṣṭhat sa pratīcīṃ diśamanu vya'calat

हिन्दी अर्थ

है कि वह : समय-समयं. पर नैव छवा हितों को उपदेश देता रेः जिस से. (1. कि पति-पत्नी मेँ पारस्परिक बढती रदे, जिस से कि यःदोनों परस्पर : नं रचिकर बने रद, भरर संदा पररस्थरं में मधुर तथां प्रिय वाणीः बोला . ( करं । मत्य मेः पति को “संभवे कहा भर्थात् सम्यरभाषी ।कदु- भाषण कौ सम्भावना परायः पतिर्य कीः शरस हती है पलि कौ . पत्ती को समी. व्यवहा 1 सदा सत्य ही काऽ १४ । भनुर १। सू9 १ प्रथववेद-भाष्य .8 ३९ हि . यमं यतीरसियाः सोम॑रचसो विश्वे देवाः न्निह वो मनासि। २। , , (गावः) है गौम्रौ ! (इह) इस घर भें (साथ, इत्) सदा रहो, (परः) इस गृहपति को (वेया) बदढ़ाती रहौ. 1 (शुभम) : शोभायुक्त गोाला मे (यतीः) है गौभ्रो ! तुम जाग्रो,(उल्ियाः) सूयं की किरणो के सदश शुद्ध,

English

That man is alienated from the Brihat, the Rathantara, the

अध्याय १५

श्लोक 2.18

तं वै॑रू॒पं च॑ वैरा॒जं चाप॑श्च॒ वरु॑णश्च॒ राजा॑नु॒व्यऽचलन्

taṃ vairūpaṃ ca vairājaṃ cāpaśca varuṇaśca rājānuvya'calan

हिन्दी अर्थ

. तथा .(सोमवर्च॑सः) दुग्धरूपी तेज वालो तुम होभ्रो । (विवे देवाः) घर के ४।२३।१९)न=उत्+्. गतौ, जस से किं दुष स्रवित होता है । सोम 36.78 दोही गई गौरो पे सोम भर्थातु दध क्षरित होता है, एेसा व्यास्यां--गु स्थो. को घर भे गौषए रखनी नाय द्व से चुटी गौरो को पराये हाथ ब्ेचना नः चाहिए । गौएं निज संन्तानों भर्थात् बदडे- बचदिर्यो. द्वारा गृहषति को भौर गृहपति. की सन्तानो को दूध, चृत् देकर बढ़ती है। गौरो : की गोशाल सुन्दर भौर शोभायुक्त होनी चाहिए ।

English

Ādityas, and all Gods who reviles the Vrātya who possesses this knowledge. He who hath

अध्याय १५

श्लोक 2.19

वै॒रू॒पाय॑ च॒ वै स वै॑रा॒जाय॑ चा॒द्भ्यश्च॒ वरु॑णाय च॒ राज्ञ॒ आ वृ॑श्चते॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॒ व्रात्य॑मुप॒वद॑ति

vairūpāya ca vai sa vairājāya cādbhyaśca varuṇāya ca rājña ā vṛścate ya evaṃ vidvāṃsaṃ vrātyamupavadati

हिन्दी अर्थ

श्रौर सौफ. रसना चोष्य . जेषे कि सूयं की किरणे शुद्ध ग्रौर साफ होती है चरके बग को चाहिए द . सेवा दारा गौं के मनो को संदा २२. इं गावः मरजया सं विंशाायं देवानां न मिनाति भागम् । . १ (गावः) है गौभ्रो ! (दमु) इस षरं (अजया) -बखड़ा.या बडी. ४० श्रथरव॑वेद-भाष्य. - काऽ ९४ भनुः ११ सू०.१ समेत (सं विशशाथ) मिलकर प्रवे करो, ताकि. (श्रयम्). यह्.गृहपति -(देवानाम्, भागम) देवो के भागः को (न.मिनाति) -नष्ट या विलुप्तन करे ।, गरहवासी, (धाता) पृथिवी या धारणपोषण त्ररने वाला गोपाल अर्थात्

English

this knowledge becomes the beloved home of the Brihat, the Rathantara the Ādityas, and all

अध्याय १५

श्लोक 2.20

वै॒रू॒पस्य॑ च॒ वै स वै॑रा॒जस्य॑ चा॒पां च॒ वरु॑णस्य च॒ राज्ञः॑ प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ तस्य॑ प्र॒तीच्यां॑ दि॒शी

vairūpasya ca vai sa vairājasya cāpāṃ ca varuṇasya ca rājñaḥ priyaṃ dhāma bhavati tasya pratīcyāṃ diśī

हिन्दी अर्थ

चुसारं पतिगरह मेँ सविता है, पति का पिता। १. मानसून वायु जल के भ्रभाव को दरुर करती, तथा छेती के.लिएु उखधकारी बद्डे-गल कृषि कमं के लिए प्राप्त हो सके । ,. २. शौभ्रो के चारे के लिए पृथिवी दी भी भावदयकता है, ताकि गौभोंके चारे की कमी भ्रनुभव न हो ।-गावः में बहुवचन् है, ताकि दुरध-वूतं प्ररत मात्रा मे, तथा का० १५४१ ननु १। सू० १ भयवंवेद-भाष्य ि ५१ गौग्रोःको.चराने के लिए ग्वाले की भी भ्रावदयकता होती है ! तथा गौरो के.चौरेके लिए कृषियोभ्य मूमि भी चाहिए । इन दोनों के लिए धाता- शब्द का प्रयोग मन्व में हु्रा है । इसी प्रकार मानसून वायु कृषिः

English

vesture, day his turban, night his hair, Indra’s two Bays his circular ornaments, the splendour

अध्याय १५

श्लोक 2.21

इ॒रा पुं॑श्च॒ली हसो॑ माग॒धो वि॒ज्ञानं॒ वासोऽह॑रु॒ष्णीषं॒ रात्री॒ केशा॒ हरि॑तौ प्रव॒र्तौ क॑ल्म॒लिर्म॒णिः

irā puṃścalī haso māgadho vijñānaṃ vāso'haruṣṇīṣaṃ rātrī keśā haritau pravartau kalmalirmaṇiḥ

हिन्दी अर्थ

कमं मे सहायक दहै, जिससेकिगौगभ्रों को चारा मिल सके । गौरो के मन्व द्रष्टव्य है, यथा- ... - - हे परभे््वर 1 कपण लोगो मे स्थित तेरी गौए किस प्रयोजन को भ्राते-जाति हैँ । (वाता) विधाता परमेदवर (नः) हमारा (भगेन) रष्वं, धमे, - यषा, श्री, ज्ञान भौर वैराग्य के साथ (सं सृजतु) संसं करे ४, . ् भ्थर्वबेद-भाष्य काठ १५ भनु° १। सू०१ के साय (सं्) हमारा, संसग करे, (वच॑सो) तेन के साथ (सम्) हमारा (अक्षेषु) र्थो की धुरा म (यत्) जो (वचः) तेज (आहितम्) निहित है, (च) श्रौ (सुरायाम्). जल मेँ (यद्)जो तेज निषित है, (च)श्नौर

English

of the stars his jewel. Present and Future are his running footmen, mind is his war-chariot,

अध्याय १५

श्लोक 2.22

अह॑श्च॒ रात्री॑ च परिष्क॒न्दौ मनो॑ विप॒थम्

ahaśca rātrī ca pariṣkandau mano vipatham

हिन्दी अर्थ

(यत्) जो (व्रः तेज, (श्रष्विना) है वर के माता-पिता ! (गोषु) गौरो मे निहितं है, (तेन) उस उस (वचसा) तेज . ढारा (इमाम्). इस वधू को . व्याहया-“भ्रदिवना" दवारा वर के माता-पिता का निदेश हुभा है । (मन्त्र घ, १४, २०). । वर के माता-पिता वच् में ३ तेज स्थापित करं । (१) रथ की धुरा का तेज । (२) जल का तेज.। (३) गौरो का तेज । रथके दो चक्रों या पियो मेँ लगे दण्ड को भक्ष मन्व १२ रथात् धुरा कहते है. ! इस धुराः पर सम्परं रथ भवलम्बित रहता, है, घुरा सम्पूणं रथ का भ्राधार होती है। भ्रतः धुरा भे तेज है “भ्राधारः रूपी गुण" । नववधू को शिक्षा देनी चाधमं कितु ही इस गृहस्थ-रथु जल का.स्वभाव है शीतलता । शीतलता जल का तेज है । नववधू को के प्रभिप्रायं को समफ नहीं सका ।

English

Mātarisvan and

अध्याय १५

श्लोक 2.23

मा॒त॒रिश्वा॑ च॒ पव॑मानश्च विपथवा॒हौ वातः॒ सार॑थी रे॒ष्मा प्र॑तो॒दः

mātariśvā ca pavamānaśca vipathavāhau vātaḥ sārathī reṣmā pratodaḥ

हिन्दी अर्थ

का० १४। प्रनु° १।सू२१ । भयवेवेद-मोष्य. , (म ५३ गौ .सास्विक दष हारा मातेवत् भालन-पौषणे करतौ है । ्रतः गभर मे तेज है “्मतृवत् . पालकताल्पी गुण पतनी. भी पालन-पौषरा की इष्टि से गोरूप वाती - होनी चाये ... -, न (जवनम्) ऊधस् सींचा-गया है, (वा) तथां यिनं) जिस तेज द्वारा (सुरा) जल सचा गया है,.(येन) जिस तेज दवारा (अक्षाः) रथों की घुराए (भम्यषिच्यन्त) सची गई है,(भ्रदिवना) है वर के माता-पिता ! (तेन) उख तेज दारा (दमाम्) इस वधू को तुम (श्रवतम्). कान्तिमती करो या सींचो । को वैश्या बनने काः उपदेश वर केः माता-पिता. देगे ? जघनम् द्वारा यदि गौ की उत्पादक इन्द्रिय-भी भरभिप्रेत होतो. इस दवारा केवल यह भअरभि- तरह । मत्र. ३५ की इष्टि से भमहानघ्नी! द्वारा गौः का है “न हंनन करने योगय । इस सेस्पष्टहै कि वेदोँमगौ की हत्या कृ निषेष है । इसी प्रकार बैल के लिए “परघ्न्यः” शब्द वेदों भे पठित है । यथा ५ यः पतिरघ्न्यः"' (भ्रथवं० ९।४।१७) । इस द्वारा बैल की

English

Pavamāna are they who draw it, Vita is his charioteer, Storm his goad, Fame and Glory are

अध्याय १५

श्लोक 2.24

की॒र्तिश्च॒ यश॑श्च पुरःस॒रावैनं॑ की॒र्तिर्ग॑च्छ॒त्या यशो॑ गच्छति॒ य ए॒वं वेद॑

kīrtiśca yaśaśca puraḥsarāvainaṃ kīrtirgacchatyā yaśo gacchati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

का प्रयोग हृभ्रा है, इस से गौ को "महा-मवघ्या कहा है, क्योंकि गौ दूष श्रादि द्वाराः महोपकारिणी है । च गौ के ऊधः स्थल भं दुधरूपी तेजं होता है, जिस द्वारा गौ श्रपने बच्चे. ४४८. , “र पथर्ववैद-मोष्य " काऽ १४१ अनुः -१.1 ०.१ को तेजस्वी बनाती है । नववधू पातां. ननं करं शपे उत्तम भौर सोत्विक . . सुरा भर्थात् भल,. भौर; भकं भर्थातु शरा, कर तेज से.जौ उपदेश नववधू को लेना चाहिए उस का वणन मन्त्र रेवं भं क्रिया गा हँ 1. तथा वीयरूपी जलं के भोतर (दीदयत्) प्रदीप्त होता ह, (यम्) -जिस कौ उपासना करते ह । (भरपां नपात्). है वीय॑रूपी जलो का न पतन होने देने

English

his harbingers. Fame and

अध्याय १५

श्लोक 2.25

स उद॑तिष्ठ॒त् स उदी॑चीं॒ दिश॒मनु॒ व्यऽ चलत्

sa udatiṣṭhat sa udīcīṃ diśamanu vya' calat

हिन्दी अर्थ

वी्ेवाला हो कर (वावृधे) बढता हं । "4, (अथवं० १०।२।११) । भरथवं० १६।१।१-१३ तवोप कामी वणन भ्रापः शब्द द्वारा हृभरा है । दीदयत् दीदयति ज्वलतिकमा (निधं ११६) ॥ , ौ भरपांनपात्=श्नपां +-न+-पात् (पत्) -बीयंरूपी जलो का न पतन होतते कऽ १४ । भमनु० १। सु १ (०१ भथवेद-भाष्य ४५ परमाहमाग्नि जलो प्रकट होता है । उपनिषदो मे.हृदगर को परमा- द्धौ षंरमात्माका साक्षाद्. कर सकता द । योगद मै वीयं को योग- . -मेषुवीःजनः ही परमात्मा की. स्तुति उपासंना त्था पूजा करते है। , " परमात्मा की कृपां - वीरय॑हूपी जलः का -पतन नहीं होने देती ¶

English

Glory come to him who hath this knowledge.

अध्याय १५

श्लोक 2.26

तं श्यै॒तं च॑ नौध॒सं च॑ सप्त॒र्षय॑श्च॒ सोम॑श्च॒ राजा॑नु॒व्यऽचलन्

taṃ śyaitaṃ ca naudhasaṃ ca saptarṣayaśca somaśca rājānuvya'calan

हिन्दी अर्थ

विधिसे रहता है। उस का वीर्यं कामवासना सेप्रेरित हो कर पतित होती है + -इसलिये मन्त्रम उत्तम .व "यं की पटिचान, उस की रक्षा, उस का पतनः न हने देना, भरौर.उस के लाभो का व्णंन हरा है । विशेषः--श्राधि- प्रकरणा भेँःविचु (सम्बन्धी वणन अनुपम्रोगी है ।.‡ : ˆ + कामग्रह श्रोर भद्रकाम भ्रौर शरीर को दूषित करने वाने (ग्राभम्) कुकामरूपी ग्राह को (भपो- हामि) त्याग देता हूं, (यः) भौर जो (मद्रः) सुखकारी भ्रौर कल्याणकारी ४६ . - , श्रधुववेद-भाष्य ˆ काण १४। प्रनु° १। सु०.१ ॥ ॥ जाता है । श्रतः गृहस्थघमं के पालन -लिंएन तो कामं उग्ररूप में.होना चाहिए, भ्रौरन इसका सवथा त्याग ही । ४ = मन्व मे उग्र-कामः को ग्राह कहाहै। ्राहदहै नक्र यानाका। जसे नाकरां प्राणी को पकड करउसका व्रिनाश करदेता है, वैसे उग्रकाम भी विनादक हैः हिस्र है,. हिसाकरारी है। तथा शरीर को दूषित कर देता

English

He arose and went away to the southern region. Yajnāyajniya and Vāmadevya and Sacrifice

अध्याय १५

श्लोक 2.27

श्यै॒ताय॑ च॒ वै स नौ॑ध॒साय॑ च सप्त॒र्षिभ्य॑श्च॒ सोमा॑य च॒ राज्ञ॒ आ वृ॑श्चते॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ व्रात्य॑मुप॒वद॑ति

śyaitāya ca vai sa naudhasāya ca saptarṣibhyaśca somāya ca rājña ā vṛścate ya evaṃ vidvāṃsaṃ vrātyamupavadati

हिन्दी अर्थ

रोचन कहा है । सदुगृहस्थी इस श्रेयरूप वले काम..को- स्वीकारं करे । भीश्लारीरिक श्नौर मानसिक शक्तियों.के हास मं कारण होतादहे। परन्तु श्रेयरूप काम का स्वीकार करना भी तबं तक सम्भव नहीं जब १. काम भ्रादि भग्वियों के लिए देखो, भ्रयवं० (१६।१।१-१६) । हीं हो सकेता । परन्तु.काम. के उग्ररूपः मे गृहस्थधमं भ्रषमं मेँ परिणत हौ. . । का० १४। श्रनु० १।सु०६ . अर्थवंवेदमाष्य , , ... ४७ 6 चिकित्सा के लिए प्रयुक्त करता है।. तौ हमः रोगी. को कष्टौ से.पार करः. , ,

English

and Sacrificer and sacrificial victims followed him. The man who reviles the Vrātya

अध्याय १५

श्लोक 2.28

श्यै॒तस्य॑ च॒ वै स नौ॑ध॒सस्य॑ च सप्तर्षी॒णां च॒ सोम॑स्य च॒ राज्ञः॑ प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ तस्योदी॑च्यां दि॒शि

śyaitasya ca vai sa naudhasasya ca saptarṣīṇāṃ ca somasya ca rājñaḥ priyaṃ dhāma bhavati tasyodīcyāṃ diśi

हिन्दी अर्थ

रेष रहे घृत को वच् लेके, स्नान केषर मजा करःउसधी कापगके “ होने के चौथे दिनः वधू के लिए स्नानयोग्य जल को लाए । यह्.-जल नानाः दवारा स्नान करती रहे । इस से गर्भं स्थापन हो जाता दहै । तथा गभस्थ. संसार मेँ भ्राते है। चरक में 'गभंस्थापनीय प्रकरण में लिखाहैकि हरड, नीम, खरेटा, शतमूली इन सब श्रोषधियों के साथ सिद्ध कयि हृए दुग भ्रौर घृत का पान करे । तथा इन श्रोषधिर्यो के साथ सिद्ध किये गए जल यै स्नान करे” (चरक, शरीर स्थान, भ्र ° ८) संमय पति परमेषवर का ध्यान करता हुभ्रा साप्विक भावना से गर्भाघान द , भरथववेदभाष्य काऽ १४।.भनु०.१ । सुर

English

possessing this knowledge is alienated from Yajnāyajniya and

अध्याय १५

श्लोक 2.29

वि॒द्युत् पुं॑श्च॒ली स्त॑नयि॒त्नुर्मा॑ग॒धो वि॒ज्ञानं॒ वासोऽह॑रु॒ष्णीषं॒ रात्री॒ केशा॒ हरि॑तौ प्रव॒र्तौ क॑ल्म॒लिर्म॒णिः

vidyut puṃścalī stanayitnurmāgadho vijñānaṃ vāso'haruṣṇīṣaṃ rātrī keśā haritau pravartau kalmalirmaṇiḥ

हिन्दी अर्थ

करे, वषयिकेः मावना-से. नहीं । गर्भाधान के समय विचारों का प्रभाव : . -चादहियेः कि प्रमेदवर.जिसं प्रकार प्रकृति मेँ निज कामना रूपी गमका . . . धारणंःकरतां है इसी प्रकारे जै भी पत्नी में गृभषिान करू । (“'अयंस्णो अगिन - पयतु" को यह भभिप्रायर मी सम्भव है किं गर्भा १. गर्भाधान के समय शान्त भावना लिए (लतपवित्रा भ्रापः) सकडों एकार की भरोषकधियो द्वारा पवित्र कथि - र वीच मीके है । यथां "स्याकरीयं यदि म न तेजः” (रघुवंश १४५६५) “ भ सीतांनेकतिकीःउक्ि द्वारा राम के वीयं को तेजः कहा है । तथातेजः . क १५ प्रदीप्तकी गई भगिनि की परिक्रमा, पत्नी करे ।

English

Vāmadevya, Sacrifice, Sacrificer and sacrificial victims. He who hath this knowledge

अध्याय १५

श्लोक 2.30

श्रु॒तं च॒ विश्रु॑तं च परिष्क॒न्दौ मनो॑ विप॒थम्

śrutaṃ ca viśrutaṃ ca pariṣkandau mano vipatham

हिन्दी अर्थ

तथा स्थलों को भी पवित्र करदेती ह। पत्नी. .भी पवित्रतामेंसूयंकी किरणों के सदुदा स्वयं पवित्र होनी चाहिपरे । उस के स्वयं पवित्र होने पर, होना चाहिए । इस लिये पति को रातक्रतु भौर इन्द्र महा है । जो उत्तम वह् भ्रपवित्र हो ही नहीं सकता । सन्तानो की देखभाल तथा सुषशिक्षा ज पति रौर पत्नी दोनों ही नौकरी में पत्नी की विभरूतियां तथा मोक्षकामना . उत्तम भंग की -सत्ता (रयिम्) तथा धन को (भ्रालासाना) चाहती. हुई है : का० १४ । भ्नु०° १। सु० १ भरथवेवेद-भाष्य ४५१.

English

Yajnāyajniya,Vāmadevya, Sacrifice, Sacrificer, and sacrificial victims. In the southern region

अध्याय १५

श्लोक 2.31

मा॒त॒रिश्वा॑ च॒ पव॑मानश्च विपथवा॒हौ वातः॒ सार॑थी रे॒ष्मा प्र॑तो॒दः

mātariśvā ca pavamānaśca vipathavāhau vātaḥ sārathī reṣmā pratodaḥ

हिन्दी अर्थ

हो हो ततन भौ माताके मन मेँ यह भावना सदा जागरित रहे। तथा बच्चा व पाले तबश्रौर.मी माता के-मन में यह् भावना जागरित रहनी गहजी वन“ अधिकं . सुखी . हौ जाताः है । इस, लिये मन्त्र में ““पत्युरनुब्रता पत्नी शहस्थजीवन मे, रहस्य के ठेहलौकरिक कृत्यो के साथ साथ (यथा). जसे (वषा) वर्षा करने वाले. सिनबुः) समुद्र ने (नदीनाम्) ध्र . - भय्ेवेद-माष्य . का० १४ नु १ । सूं९.१ ॥ द. (परेत्य) जाकर, (सम्राज्ञो) राण (एधि) बन ।. . इसी प्रकार गृहवासियो को चाहिए कि वे श्रपनी समग्र कमाई इस नववधू . के प्रति भेँट कर दिया करे । क्योंकि नववधू पतिगृह की सन्नाजञीहैः,. +.

English

Dawn is his leman, Mitra his panegyrist, knowledge his vesture, day his turban, night his hair,

अध्याय १५

श्लोक 2.32

की॒र्तिश्च॒ यश॑श्च पुरःस॒रावैनं की॒र्तिर्ग॑च्छ॒त्या यशो॑ गच्छति॒ य ए॒वं वेद॑

kīrtiśca yaśaśca puraḥsarāvainaṃ kīrtirgacchatyā yaśo gacchati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

परन्तु समुद्र नदियों दवारा -दी गरर्भेदको नि स्वां के विएुं . नहीं रख लेता । वह वृषा .है, वर्ष का कारण है ।- नद्यो द्वारा भेट. ले कर समुद्र, वर्षारूप में उस भेंट. को पुनः नदिय. तथा पृथिवी कै द्मन्थ. , गुहवासि्यौ की समृन्नति म .व्यय कंरे. 1 तथा .समुद्र जल की वर्षां करता हश्रा मौ सदा मरां सा रहता है, इसी रकार पत्नी भी धन क्रा व्यय हसं . विक्तिसे.करे कि वह व्यय करती हृई भी धन-सम्यत्ति, से सदा षरिपं . नाहिये कि गृह-साभ्राज्य मे. पनी सजनो है, तो गृह-साङनज्य मँ पति . . सम्राट् है। शेष गृहवासी इन दोनों दवारा पालनोय . तथा ' रक्षणीय है1: . के लिए करै, केवल स्वां सिद्धि. के लिए नहीं। र „ पलनी.का साम्राज्य (तं (एषि) हो, (उत) भौर (देवृषु) देवर म (सम्राज्ञी) राजेर्वरी हो ॥: : ¦ । : (उत) भरौर ((इवंभूवाः) सास के सम्बन् मे (भ्राज) राजेश्वरी हो ।

English

Indra’s two Bays are his circular ornaments, New Moon

अध्याय १५

श्लोक 3.1

१-११ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ पिपीलिकमध्या गायत्री; २ साम्नी उष्णिक्; ३ याजुषी जगती; ४ द्विपदाऽर्च्युष्णिक्; ५ आर्ची बृहती; ६ आसुर्यनुष्टुप्; ७ साम्नी गायत्री; ८ आसुरी पङ्क्तिः; ९ आसुरी जगती; १० प्राजापत्या त्रिष्टुप्; ११ विराड् गायत्री।स सं॑वत्स॒रमू॒र्ध्वोऽतिष्ठ॒त् तं दे॒वा अ॑ब्रुव॒न् व्रात्य॒ किं नु ति॑ष्ठ॒सीति॑

1-11 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 pipīlikamadhyā gāyatrī; 2 sāmnī uṣṇik; 3 yājuṣī jagatī; 4 dvipadā'rcyuṣṇik; 5 ārcī bṛhatī; 6 āsuryanuṣṭup; 7 sāmnī gāyatrī; 8 āsurī paṅktiḥ; 9 āsurī jagatī; 10 prājāpatyā triṣṭup; 11 virāḍ gāyatrī| sa saṃvatsaramūrdhvo'tiṣṭhat taṃ devā abruvan vrātya kiṃ nu tiṣṭhasīti

हिन्दी अर्थ

(इयम्) यह वधू (मम) मेरी (पोष्या) पोषणोया (रस्तु) हो, हे वाली ! त्रु (सम्) मेरे साथ (शतमु, शरदः) सौ. वषो की भायु पर्यन्त बहस्पतिः = बरृहस्यति वे देवानां. पुरोहितः (एेत० त्रा० ८।२६) जनता के प्रति .कहता है कि यह वधू मुर द्वारा पोष्या होगी.। चै सदा इस का भरण-पोषण करता रंगा । तथा उत्तराघं द्वारा . वधू को कहता है किं मुभ से भिन्न क्रिस परपुरुष हारा तूने प्रजावतो नहीं होना ।, (बृहस्पतेः) वेदो के विद्वा पुरोहित के तथा (कवीनाम्) विदानो इव) सूर्या को जेते, वसे (दमाम्, नारीसु) इस विवाहित नारी को(प्रजया) सन्तानो समेत (परि . घत्तामू) ढांपा करर नुसार वधूके वस्त्रक निर्माण करने.को ज्ञा कारीगरों को देनी

English

Vairūpa and Vairāja, the Waters and King Varuna. In the western region Irā is his leman,

अध्याय १५

श्लोक 3.2

सो॑ऽब्रवीदास॒न्दीं मे॒ सं भ॑र॒न्त्विति॑

so'bravīdāsandīṃ me saṃ bharantviti

हिन्दी अर्थ

कम करती,-कृषिकमं को बढ़ाकर, भन्न श्रौैर श्रोषधियो को पैदा.करती जिनके मेवन से स्वास्थ्य बढता है । महती वेदवाणी के पति परमेदवर ने, (सूर्यायाः) इस सूर्या ब्रह्मनारिणी के (भ्रषिविना) है वर के याः वधू के माता-पिता ! (तेन) उस कैशकलाप द्वारा (इमाम, नारीम्) इस नारी को, (पत्ये) पति के लिये, (संमू, शोभयामसि) हम सम्यक् परकारसे शोभायमान करतेदहै। बहस्पतिः = परमेश्वर बृहती वेदवाणी का पति है यथा “बृहस्पते पति कोः प्रनुराग उसपर हो सके 1 वधू की रूपसम्पत् तथाः मननरशक्ति

English

Mind, etc., as above.

अध्याय १५

श्लोक 3.3

तस्मै॒ व्रात्या॑यास॒न्दीं सम॑भरन्

tasmai vrātyāyāsandīṃ samabharan

हिन्दी अर्थ

६२ भरथरगविद-माष्य का १४। भनु १। सु १ (इमान्) इन (पाशान्) प्रेमपारशो को (विं चचतं) विशेषतया ग्रथित किया. स्तुतौ) + गु (गति) ।-कः = को वं नास प्रजापतिः (एे० ब्रा० ३।२९) । वि नारी कै रूपसौन्दयं का. श्याल कर वर कहता है कि यह सम्पत् भी एक नहीं बन सकता! इस के लिए यह श्रावद्यक . है कि पत्नी में मानसिक विचार शक्ति भी हो, वह मननकरीलाः रौर विचारश्ीला भी हो, ताकि गृह्य तथा सामाजिक कत्तव्यो को. वंह विचाय्पुवेक निभा सके । वेद के अनुसार वरेशी ही वधू का जिज्ञासु है। वर कहता है कि एसी ववू कातो मै भ्नुवतीं हौ जाऊंगा । क्यों किं विचारशीला वधू भ्रषने पत्नी को सामाजिक लीयन से वञ्चित नहीं करना चाहिए । पति के भिक्रोंकं साथ भीपत्नीका परिचय करा देना चाहिए ।

English

He arose and went away to the northern region. Syaita and

अध्याय १५

श्लोक 3.4

तस्या॑ ग्री॒ष्मश्च॑ वस॒न्तश्च॒ द्वौ पादा॒वास्तां॑ श॒रच्च॑ व॒र्षाश्च॒ द्वौ

tasyā grīṣmaśca vasantaśca dvau pādāvāstāṃ śaracca varṣāśca dvau

हिन्दी अर्थ

पति के मित्ररेसे होने चाहिए जोकि स्तुत्य भ्राचार-विचार वाल भर्थातु सदाचारी हौं.। दुराचारी मित्रौ के सङ्क से दुराचार के पंक मेँ फंसने का.भयं होता है । भरौरन दुराचारी परिचितो के साथ परिचय ही पत्नी कोऽ १४ श्नु १। सु -१ भरय्विद-भाष्य ६३ नहीं बांधा । इन प्रेमबन्धनों के विना गृहस्थ जीवन तथा सामाजिकं जीवन निःसारो जाते हैः सूखेसूखे हो जाते हँ । व्यास्था- पति कहता है रि नै पत्नी के दोनो स्वरूपो को,- शारी- रिकि तथा मानसिक स्वरूपो. को, निज हृदयं मेँ बाध लेता हूं । श्रभिभ्राय. विचलित न ह्ंगा । पति यह् भी कहता है कि नँ प्रपने मनरूपी पक्षीका घोसला इस पत्नो को जान रहा ह श्रौर साक्षात् देख रहा हं । घोसले में

English

Naudhasa, the Seven Rishis, and King Soma followed him.

अध्याय १५

श्लोक 3.5

बृ॒हच्च॑ रथंत॒रं चा॑नू॒च्ये॒३ आस्तां॑ यज्ञाय॒ज्ञियं॑ च वामदे॒व्यं च॑ तिर॒श्च्ये

bṛhacca rathaṃtaraṃ cānūcye3 āstāṃ yajñāyajñiyaṃ ca vāmadevyaṃ ca tiraścye

हिन्दी अर्थ

१. भाष्यकारो ने शध्नानः का भयं किया है, रिथिल करता हमरा, ठीला विचार भी न कश्ना.- इस ते प्रेमपाश दृढ़ होते है, न कि शिथिल । कहता है कि. विचारशीला भ्रौर सुौन्दयं कौ प्रतिमारूप पत्नीकोपाकर मेरा मन भस्केगा नहीं 1 । पति यह भी प्रण करता है कि वहु पत्नीसे छिप कर कोई श्रननभोग . न करेगा, श्रपितु हम लोनों का खान-पान इकट्ठा हृश्रा.करेगा । चिप कर खान-पान के मानसिकं .विचारको भी त्यागः देने का प्रण पति करता है। गरन्त मेँ पति कहता है कि इस प्रकार स्वयं जै गृहस्थ लीनः मेँ पर- मेरव रीय प्रेभपालो को दृढ बद्ध करता रहूगा, ताकि" हम मँ पारस्परिक स्परोपेक्षा का लेरामान्र मी न रहे ।

English

He who reviles the Vrātya possessing this knowledge is alienated from Syaita, etc. He who

अध्याय १५

श्लोक 3.6

ऋचः॒ प्राञ्च॒स्तन्त॑वो॒ यजूं॑षि ति॒र्यञ्चः॑

ṛcaḥ prāñcastantavo yajūṃṣi tiryañcaḥ

हिन्दी अर्थ

व्याख्या- सन्तान के साथ माता-पिता का परेम स्वाभाविकं होता है । माता-पिता स्वभावतः श्रपनी सन्तानो के साथ प्रम करते ह । यही कारण हैकरि सन्तानं भी माता-पिता के प्रेमपाश्च मेँ बंधी रहती है । विवाह कं बाद कन्या जब पतिगृह मेँ जाती है तन उसे भ्रपने भाता-पिता का स्वा- भाविक प्रेमबन्वन ढीला करना पड़ता है । इस क्षति की पूति, पति द्वारा डाले नए प्रेमपाशसेही हो सकती है। पति इसलिये श्रपनी पत्नी से साथबांधाहुभ्राथा उससे मै तुभे द्डाता हू, भौर भ्रपने प्रेमपाशे तुभे धाता विप्चित् पतिमस्ये विवेद भगो राजां पुर एतु भजानन्॥५९॥

English

hath this knowledge be- comes the dear home of Syaita, etc. In the northern region

अध्याय १५

श्लोक 3.7

वेद॑ आ॒स्तर॑णं॒ ब्रह्मो॑प॒बर्ह॑णम्

veda āstaraṇaṃ brahmopabarhaṇam

हिन्दी अर्थ

भपगत करो, दुर करो, याउस का हनन करो, (दमाभर) इस (नारीम्) तारी को .(सूकृते) सुकर्मो भे (दधात) लगाभ्रो । (विपदिचित्) मेधावी षाता) विधोता ने (श्रस्ये) इस नारी के लिए (पतिम्) पति (विवेद) हनाथः = हनु गतौ । निषण्टु भें हनु धातु का प्रयोग “गति” के लिए हृभा भ्रथं हिसा भी होता है । -विपरिचत् मेधाविनाम (निषं० ३।१५)¶ चाहिए, तमी उन की सन्तानं भी उद्यमी होगी । शृहस्यधमं पालन करते हृए भी कामग्राहं को नियन्त्रण में .रखना चाहिए + भनिग्रन्तरित कामग्राह राकस है । प भावो भौर राक्षसी कमो का नाच्च करने वाली बनाएं ६६ भ्रथर्वैवेद-भाष्य का० १४। भरनु° १। सु°. १ पति गृहस्थ के कर्तंव्यपथ को जाने । उस पर पति स्वयं पिले चले ।

English

Lightning is his leman, thunder his panegyrist, etc. as above.

अध्याय १५

श्लोक 3.8

सामा॑सा॒द उ॑द्गी॒थोऽपश्र॒यः

sāmāsāda udgītho'paśrayaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभाव पत्नी के जीवन पर पडता है। है । वदिक विवाहपद्धति में पति भ्रौर पत्नी के हृदयो मे यह मावना सदा जागरूक रहनी चाहिए कि पति का पत्नी को मिलना, तथा पत्नी का पति को मिलना, इस मेँ परमेश्वरीय च्छा काम करती है; भरतः पति-पत्नी परस्पर परेम को बढ़ते हए गरहस्थधमं का पालन करते रहः , परमेदवर ने (चतुरः) पुरुषां के चार (पादान्) पादो को (ततक्ष) निमित किया है,. (भगः) उसी परमेश्वर ने (चत्वारि, उष््लानि) जीवन के च्रार , पलो को (ततक्ष) निमित किया है॥ (त्वष्टा) ूपं भरने वाले कारीगर (सा). वह पत्नी (नः) हनारे लिये (सु मङ्गली) उत्तमं मङ्गलमयी

English

Revelation and Tradition are his running attendants, Mind, etc., as above.

अध्याय १५

श्लोक 3.9

तामा॑स॒न्दीं व्रात्य॒ आरो॑हत्

tāmāsandīṃ vrātya ārohat

हिन्दी अर्थ

ग्रौर संन्यास ये चार भाश्रमहै। इसी रचयिताकारीगरने जीवनयात्रा कव भ्रा चेरे । तभी कहा है कि "गृहीत इव केषु भूत्युना धर्ममाचरेत्" । वस्तुतः जीवन को पल सदृशं क्षणिक जानकर निज वतं व्यो कौ नियतकासं क भ्रनुसार करते रहना चाहिए । वि वधु कां रथारोहण, तथा पिता कौ उपदेश सुवणं की नक्कारी वाले, . (सुवृतं) सुघड़ं ग्रा उत्तम॒रीति से चलने वाले . ६ भरथर्ववेद-माष्य . का० ९४ । श्ननु? १ । सु° १ सुमज्जित । ढाक के फूलों को किंशुक कहते है । भ्राकृति भँ ये फूल “शुक " भर्थात् तोतो जैसे होते है, इन्द देखते एेसा प्रतीत होता है कि मानो छोटे-.

English

For a whole year he stood erect. The Gods said unto him, Why standest thou, O Vrātya? He

अध्याय १५

श्लोक 3.10

तस्य॑ देवज॒नाः प॑रिष्क॒न्दा आस॑न्त्संक॒ल्पाः प्र॑हा॒य्या॒३ विश्वा॑नि भू॒तान्यु॑प॒सदः॑

tasya devajanāḥ pariṣkandā āsantsaṃkalpāḥ prahāyyā3 viśvāni bhūtānyupasadaḥ

हिन्दी अर्थ

ववू का पिता, तथा वधू का वर, दनं उन वस्त्रौ को वधू श्रौर उस की भावी सन्तानो को पहनने के लिए दिम्रा करं । वि वस्त्र शोभाजनक होने चाहिए, तथा सुखदायक भी । केवल शोभा- रिणी के विवाह का वंन मुख्यरूप गे हुश्रा है । यह् भ्रादशँ विवाह है । चन्द्रमा, (बृहस्पतिः) वेदो का विद्वानु पुरोहित, (मरूतः) मानसून वायु, . सेवन, (इमायु, नारीषु) इस नारी को (प्रजया) प्रजासमेत (व्यन्तु) शहोरात्रौ (तां०. २५।१०।१०) । भगः-एेडवय, धर्म, ज्ञान, वराग्य । की किरणों का प्रवेदा। चौथा साधन है पृथिवी । स्वास्थ्यवर्घेन के लिए मकान की भूमि

English

Laughter his panegyrist, knowledge, etc., as above. Day and Night are his running attendants,

अध्याय १५

श्लोक 3.11

विश्वा॑न्ये॒वास्य॑ भू॒तान्यु॑प॒सदो॑ भवन्ति॒ य ए॒वं वेद॑

viśvānyevāsya bhūtānyupasado bhavanti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

विस्तृत होनी चाहिए, तथा घर स्वास्थ्यकारी पृथिवी पर बनाना चाये । पाचवा साधन है मातरिश्वा भ्र्थातुः वायु । मकानों का इस विधि से निर्माण करना जिस सेकमर्रो मेवायु कासंचार हौ सकै। छटा साधन है दिन प्रौर रात का नियमपूवंक होना । लम्बे दिनों उत्तरध व, दक्षिरध्रव तथा इन के संमीप के प्रदेश । सातवां साधन है भग भर्थात् एेष्वयं का होरा, धर्मानुसार जीवन, का० १४ भ्रनु०° १। सू भ्रथवंधेद-माष्यै ६१ धार्मिक कृत्यो, यज्ञो तथा संस्कारो को कराते रहना ।

English

Mind, etc., as above.

अध्याय १५

श्लोक 4.1

१-१८ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१, १३, १६ दैवी जगती; ४, ७, १० प्राजापत्या गायत्री; २, ८ आर्ची अनुष्टुप्; ३, १२ द्विपदा प्राजापत्या जगती; ५ प्राजापत्या पङ्क्तिः, ६ आर्ची गायत्री, ९ भौमार्ची त्रिष्टुप्, ११ साम्नी त्रिष्टुप्, १४ प्राजापत्या बृहती; १५, १८ द्विपदाऽर्ची पङ्क्तिः १७ आर्ची उष्णिक्।तस्मै॒ प्राच्या॑ दि॒शः

1-18 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1, 13, 16 daivī jagatī; 4, 7, 10 prājāpatyā gāyatrī; 2, 8 ārcī anuṣṭup; 3, 12 dvipadā prājāpatyā jagatī; 5 prājāpatyā paṅktiḥ, 6 ārcī gāyatrī, 9 bhaumārcī triṣṭup, 11 sāmnī triṣṭup, 14 prājāpatyā bṛhatī; 15, 18 dvipadā'rcī paṅktiḥ 17 ārcī uṣṇik| tasmai prācyā diśaḥ

हिन्दी अर्थ

छोटे तोते डालियोँ पर बैठे ह । ये फूल वसन्त काल भँ लिलते है । ऋ० १०।८५।२० में सुक्रियुकम् के साथ शल्मलिमू पाठ भी है । चत्मलि का के लिए श्राददं काल फाल्गुन-मास मानां है, जो कि वसन्तकाल है । इसी (निर० १२१८) भे सुकिशुकं भ्रौर शल्मलि के अर्थं निम्नलिखित दिये हँ हामलिभिति” को उपमाथंक कहते हुए “किशुक” का वृक्षरूप तथा पुष्मूप होना भी स्वीकृत किया है 1 इसी प्रकार “शल्मलिः घुशरो भवति, हरवान् व्याख्या- पत्नी जब पितृगरह से पतिगृह की भोर जाने लगे तब - चाहिए, तथा विविध रूपो से रूपित, सुघड़, तथा सुन्दर म्रौर साफ पियो । रथ पर श्रारोहण करे तब उसे कहना चाहिधे कि भ्रव तु इस रथपर

English

answered and said, Let them bring my couch.

अध्याय १५

श्लोक 4.2

वा॒स॒न्तौ मासौ॑ गो॒प्तारा॒वकु॑र्वन् बृ॒हच्च॑ रथंत॒रं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑

vāsantau māsau goptārāvakurvan bṛhacca rathaṃtaraṃ cānuṣṭhātārau

हिन्दी अर्थ

“अश्विना शभस्यती"" श्रथवं० ६।३।३ मे भष्वियो को रोभा या शुभकमोँ कं पति श्र्थात्ु रक्षक कंहाहै। । ७६ भ्रथवंवेद-भाष्यं का० १४ भनु० २। सू०२. को; (च) भौर (पुत्रान् च) पुत्र को, (रथो) तथा (इमाम्) इस जायां को (अदात्) दिया है । सोम की थी, सोम ने इसे गन्धव को दिया, गन्धवं ने इसे भ्रग्ति को दिया, - मन्वे १ से मे, कन्या को चार अ्रवस्था््रौ का वणन, उस के पतियौं भर्थात् रक्षणक सूपमेंदहुप्राहै। । कन्या जब छोटी है तब वह सौम्यगुणा प्रधान होती है । इसीलिये .

English

All creatures become the worshippers of him who possesses this knowledge.

अध्याय १५

श्लोक 4.3

वा॒स॒न्तावे॑नं॒ मासौ॒ प्राच्या॑ दि॒शो गो॑पायतो बृ॒हच्च॑ रथंत॒रं चानु॑ तिष्ठतो॒ य ए॒वं वेद॑

vāsantāvenaṃ māsau prācyā diśo gopāyato bṛhacca rathaṃtaraṃ cānu tiṣṭhato ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

होता है तो उसे “समाय राजं . शब्द द्वारा स्मरण किया हं (भथवं० दृष्टिगोचर होने लगे । सौम्यजीवन कौ पिछली .श्रवस्था में मानसिक- . विकार दानैः शनं: जड पकड़ने लगे । प्रेम -भ्रौर श्रलरुराग के हाव-भाव प्रकट होने लगे । गन्ध, मोद, प्रमोद, रूपसम्पत् शोभा की भावनाए' जागरित - “ग्नि” पति होता हे" रक्ष होता है । रजस्वला मेँ “रजस्” की अरभि- का० १४1 श्रनु९२।सू०२ भ्रथववेद-माष्य ७७ मे स्वाभाविकंरूप से भावों तथा व्यवहारो की शुचिता होतो है, उसमे गानविद्या द्वारा वाणी शिक्षित होती है, जिस सें गनेके भारोह-

English

For him they made the two Spring months protectors from the eastern region, and Brihat and

अध्याय १५

श्लोक 4.4

तस्मै॒ दक्षि॑णाया दि॒शः

tasmai dakṣiṇāyā diśaḥ

हिन्दी अर्थ

रजोददौन नहोनेसे स्त्रियांरूग्ण हो जाती ह। रजोदशेन के ठीके होते साथ न कर.देना. चाहिए, रजोदंन की भ्रवस्था का पूणं परिपाकं कन्या के समय गोदान तथा कन्या की त्रिदाई के समय पिता से मिली वस्त्रादि की भंट को मन्त्रम "“रयि कटा है, जोकि मनुष्यज . पति को मिलती ह । अथो दमाम्”; इन शब्दों की दृष्टि से इन मन्तो के अथं नियोगपरफ भी होते है । इस प्रकार ये चार मन्त्र दरचथंक हँ, विवाहपरक भी रौर नियोग- . “रब पतिर्यो को. संज्ञा कहते ह -(सोमः प्रथमो विविदे) उनमेँसे जो विवाहित पति होता है, उस की सोम संज्ञा है ' क्योंकि वह सुकुमार होने से मृदु, ्रादि गुरणयुक्त होता हैः । (गन्धर्वो विविद उत्तरः) दूसरा पति (तृतीयो अग्निष्टे पतिः) तीसरा पति जो नियोग से होता है, वह श्रग्नि- ६९, आ वामग्स्सुमतिवौजिनीवसू न्यदिवना दत्सु कामां अरंसत ।

English

Rathantara superintendents.

अध्याय १५

श्लोक 4.5

ग्रैष्मौ॒ मासौ॑ गो॒प्तारा॒वकु॑र्वन् यज्ञाय॒ज्ञियं॑ च वामदेव्यं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑

graiṣmau māsau goptārāvakurvan yajñāyajñiyaṃ ca vāmadevyaṃ cānuṣṭhātārau

हिन्दी अर्थ

(वाजिनीवसू) उषा-भौ रमूं के सदृश वतं मान (श्ररिवना) है शुभ -कर्मो मे व्याप्त माता-पिता ! (हृतु) हमारे हदर्यो मेँ (कामाः) कामनाए (नि भ्ररंसत) निरतां- रमण कर. रही है (१). (वाम्) तुम दोनो की (सुमतिः) सुमति (शरा भ्रगनू) हमे प्राप्त हो; (२) (शुभस्पती) है शुभकरो कै रक्षको ! या स्वाभियो ! (मिथुना) तुम दोनों एक-दूसरे के भाश्रयर्मे पिता (श्रथवं १४।१।१४) । मिथुना = “मिथुनौ कस्मान्मिनोतिः भयतिकर्मा, थु, इति नामकरणः ( निर०. -५।७।२९) । भयम्एः = भयंभा “योर्ध्यान् के फलो का यथावत् सत्य-सत्य नियमकर्ता है, इसी से उस परमेदवर का

English

The two Spring months protect from the eastern region, and

अध्याय १५

श्लोक 4.6

ग्रैष्मा॑वेनं॒ मासौ॒ दक्षि॑णाया दि॒शो गो॑पायतो यज्ञाय॒ज्ञियं॑ च वामदे॒व्यं चानु॑ तिष्ठतो॒ य ए॒वं वेद॑

graiṣmāvenaṃ māsau dakṣiṇāyā diśo gopāyato yajñāyajñiyaṃ ca vāmadevyaṃ cānu tiṣṭhato ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

व्याश्या-मन्वर मेँ वृद्ध माता-पिता को “वाजिरीवसू" शौर “परदिवना. कहा है ! वाजिनी का श्रं है उषा.श्रौर वसु का भ्रथं है सूयं । माता उषा है पत्नी श्रौर पतिका होना चाहिए । एक-दूसरे से पृथक् रहना पतनी भ्रौर पति के लिए उचित नहीं 1 उषां का स्वरूप सुन्दर तथा. कोमल है, प्रौर सूयं का प्रखर । इस लिये पत्नी मेँ रमणीयता तथा कोमलता का निवास होना चाहिए, रौर पति मे पौरषशक्ति का.। माता-पिता कां पारस्परिकं माता-पिता, वर-वचू के लिए, सच्चे मागं दक होने चाहिए । इसी भ्रा्ला से वर-वधू माता-पिता से कहते ह किह ग्रदिवर्यो ! सद्गुणो से व्याप्त है माता-पिता ! हमारे हृदयो मेँ निम्नलिखित कामनाएः है, भाप इन की पूति में हमारे सहायक बने । यथाः- , (३) श्राप हरमे भास्तिक बनाडये । ताकि न्यायकारीः परमेश्वर प्रदर्शित नियमों के अनुसार जीवनं को ढाल.कर, हम उस के प्रेमपात्र बन (४) तथा है माता-पिता ! श्राप स्वयं हमे दायविभागानुसार गृह्य के उत्तराधिकार भी प्रदान कीजिये।' ।

English

Brihat and Rathantara superintend, the man who possesses this knowledge. For him they

अध्याय १५

श्लोक 4.7

तस्मै॑ प्र॒तीच्या॑ दि॒शः

tasmai pratīcyā diśaḥ

हिन्दी अर्थ

८ भ्रथवेवेद-भाष्य का० १४ । भ्रनु० २। सू०.२ : है पत्नी ! (सा) वहतू ( मन्दसाना). मुदित-प्रमुदित होती हुई, (वहि) श्रमने मे. धारण कर ग्रौर उस का परिपोषण कर । (स्ुमस्पती) (दुमंतिमु) दुमंति. को (भ्रपहतम) दरं कर दो । । २।८७ बाहुलकात्) । रयि = वीयं. । “वीयं वे रयि ” (० ब्रा ° १३।४।२।१३) धेहि इस का प्रयोग गर्भाधान कै लिए भी हृश्रा है। यथा “गर्म ब्द “वर घातुसेबना हैजिस का भ्रथं है तेरना” । तरन्ति येन कितु सदा श्रौर विशेषरूप से गभंकाल मे मुदित-परमुदित रहा कर, तथा मन को रिवेसंकल्पी किया कर। इस विधिसे तु प्रदंसनीय तथा वीर

English

made the two Summer months pro- tectors from the southern region, and Yajnāyajniya and

अध्याय १५

श्लोक 4.8

वार्षि॑कौ॒ मासौ॑ गो॒प्तारा॒वकु॑र्वन् वैरू॒पं च॑ वैरा॒जं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑

vārṣikau māsau goptārāvakurvan vairūpaṃ ca vairājaṃ cānuṣṭhātārau

हिन्दी अर्थ

सन्तति को उत्तम तथा वीर बना सक्ते । है किं -भ्राप दोनों हमारे ग्रहस्य को तीथं बनाइये, ताकि गृहस्थः के नियमो. हम दुःखसागरको तैर जाय। साथही यह्भी प्रार्थना करताहै कि भापके निदंशामुसार हमारा ग्रहं खान-पान की सामग्री से भरा रहे, तथा भ्राषं दोनों सदुपदेदों द्वारा. हमारी दुमंति को दूर कीजिये । दुम॑ति- मागं का० १४। ञमनु० २१ सू०र भ्रथववेद-माष्य ८१ मे स्थित ठ् ठ के सचछ-गरृहस्थजोवन को सुगमता से चलाने मेँ बाघक होती (याः) जो (ओरोषधयः) श्रोषधियां है, (याः) जो (नदः ) नदियां ह उपवन तथा वगीचे है, (ताः) वे प्रोषधियां भ्रादि (रक्षसः) रक्षक हो कर

English

Vāmadevya superintendents. The two Summer months, etc. as in Verse 1,

अध्याय १५

श्लोक 4.9

वार्षि॑कावेनं॒ मासौ॑ प्र॒तीच्या॑ दि॒शो गो॑पायतो वैरू॒पं च॑ वैरा॒जं चानु॑ तिष्ठतो॒ य ए॒वं वेद॑

vārṣikāvenaṃ māsau pratīcyā diśo gopāyato vairūpaṃ ca vairājaṃ cānu tiṣṭhato ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(वधु) है वधु ! (रक्षन्तु) सुरक्षित कर । गर्भवती की भ्रोषधिरयो का सेवन करते रहना चाहिए, ताकि गर्भस्थ भराम) हम श्रारूढ हए है" (सुगम्) जो कि सुगम मा्गं॒है, (स्वस्ति- हा (वोरः) धर्म॑वोर पुरुष (रिष्यति, न) विनाश को प्राप्त नहीं होता, ८ भरथव्विद-माष्य का० १४ । भ्रनु० २। सुर वा" (उरा० ४।१८२) । वाहनम् = वह् परापरे जब कि गृहंस्थ-पथ पर सुमतिपूरवैक श्रौर धर्म॑पूवंक चला जाय । धमेपूरवेक चलने गहस्थी दीधंजीवी हो कर विनाश. कोप्राप्त नहीं होते, रौरवे

English

They made the two Rain months, his protectors from the western region, and Vairūpa and

अध्याय १५

श्लोक 4.10

तस्मा॒ उदी॑च्या दि॒शः

tasmā udīcyā diśaḥ

हिन्दी अर्थ

प्ररूढ होती हृई मानो गृहस्थ रथ षर भ्रारूढ़ हुई है । यह मृहैस्थरथ भमत, का स्थान है (श्रथवं० १४।१।४२), इसे नरक धाम न बनाना । तथा गृहस्थ भें ठेसा व्यवहार करना जिस सेकितेरा पति दस गृहस्थ को सुखधाम ्रनुमव कर सके । तथा पतिगृह म रहने बलि जौ तेरे भ्न्य रक्षक है - यथा सास, दवशुर, देवर भ्रादि उन के साथः भी सदव्यवहार द्वारा उरः भी सुखी रलना । वेदँ के भ्रनुसार यतः पत्नी गृह की सम्नज्ञी है" भौर गृह का १४। भ्रमु १ । सु १ भ्रथववेद-भाष्य ६९ का प्रबन्ध दसी के हाथमे है, इस लिगे सम्भावित हो सकता है किं बुजुर्गों भरदि के साथ व्यवहार म कहीं यह उच्छु्खल न हो जाए, इस लिये पिता का सदुपदेदा समयोचित प्रतीत होता है । . र पति श्नौर पत्नी के चार चार गण. (वरुण) हे. श्वष्ठ तथा पत्नी का वरण करने वाले ! (बृहस्पते)

English

They brought the couch for that Vrātya.

अध्याय १५

श्लोक 4.11

शा॒र॒दौ मासौ॑ गो॒प्तारा॒वकु॑र्वंछ्यै॒तं च॑ नौध॒सं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑

śāradau māsau goptārāvakurvaṃchyaitaṃ ca naudhasaṃ cānuṣṭhātārau

हिन्दी अर्थ

का हनन न करने वाली, (भ्रपशुध्नीम्) पञ्चमो का हनन न करने वालौ, व्याख्या-वरण.करने वाले वर को उस के सम्बन्धी कहते हँ किं तु (१) घरमे भ्रकर भाई बहिन भ्रादि को कष्ट न पहृतराए (्रभातु- (२) जौ पद्युहत्या कर के मांस भक्षिकानहो, तथागौभ्रादिकी पालना करे (्रपलुष्नीम) ।. ‡ "च त (३) जो पतिधातिनी न हो, पति को कष्ट न पहूंाए ( भरपति- . चार गुण पत्नी के है। प्रतिक वारःगु निम्नलिखितर्हैः-..

English

Two of its feet were Summer and Spring, and two were Autumn and the Rains.

अध्याय १५

श्लोक 4.12

शा॒र॒दावे॑नं॒ मासा॒वुदी॑च्या दि॒शो गो॑पायतः श्यै॒तं च॑ नौध॒सं चानु॑ तिष्ठतो॒ य ए॒वं वेद॑

śāradāvenaṃ māsāvudīcyā diśo gopāyataḥ śyaitaṃ ca naudhasaṃ cānu tiṣṭhato ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(२) पति बुहस्पति हो, वेदोका विद्वाच् है (बृहस्पते) । यथा- । “वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम् । (सवितः), ताकि वंश परम्परा चलसके। - . . हैवपथगामिनी पत्नी का भ्रषिकार देवों द्वारा निदिचतत किये हुए (पथि) गृहस्थमागं पर या सुपथ पर वतंभान (कुमायय॑म्) कुमारी नववघू को (मा हिसिष्टम्) तुम दोनों कष्ट न पहू- १ (वधूपथस्) वधु के भ्राने-जाने का मागें (कृण्मः) हम भ्रबांधितत

English

Brihat and Rathantara were the two long boards, Yajnāyajniya and Vāmadevya the two cross boards.

अध्याय १५

श्लोक 4.13

तस्मै॑ ध्रु॒वाया॑ दि॒शः

tasmai dhruvāyā diśaḥ

हिन्दी अर्थ

क्लालायाः- शाला का भ्रभिप्राय है विशाल कोठी । देलौ वेदिक शालाः (अथव ० ९।३।१-२३१) । इसमे एक कमरा चाहिए हविः रखने के लिये कमरा (देवानां . सदः) (्रथवं° ९।३।७); गौरो तथा. भंदवो के लिए गो- मघ्यमाग मेँ शेवधि . भर्थात् 89/08 की निधिरूप, दुढ्निभित कमरां विमानम् उदरं शेवधिभ्यः . (९।३।१५); रसद रखने का कमरा (विद्वान्न बिभ्रती ९।३।१६)। रसोई तथा जल के कमरे(६।३।२२) । इस सूक्तं मे साला व्याख्या-- वर श्रपने माता-पिता से प्राथेना करता है कि राप दोनों इस घर के स्तम्भ हो, ्राघार हो 1 माता-पिता कै भ्राहीर्वाद तथा उन की देखभाल भँ नवयूवक पति-पत्नी गृहस्थजीवन को श्रानन्दमय तथा समुन्नत कर सकते द । इग लिगरे पति-पत्नी को चाहिए किवे माता-पिता को श्रपने गृहजीवन के श्राधार-स्तम्भ समा करे । वर. माता-पिता से यह भीप्राथंना करता है कि दिव्यगणी लोगों

English

Holy verses were the strings lengthwise, and Yajus formulas the cross-tapes.

अध्याय १५

श्लोक 4.14

है॒म॒नौ मासौ॑ गो॒प्तारा॒वकु॑र्व॒न् भूमिं॑ चा॒ग्निं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑

haimanau māsau goptārāvakurvan bhūmiṃ cāgniṃ cānuṣṭhātārau

हिन्दी अर्थ

से श्रष्टहयो कर यदि श्रासुरपथया राक्षसपथ परं चलने लगे तो इसे वे समा कर, सान्त्वना दे कर, साभविधि तथा दण्ड विधि द्वारा इसे देव- मागं पर लने कासदा यत्न करते रर्है। . ॥ पति श्रषने गह को देवी-शाला भ्र्थातु देवगृहं क्रहता है । पति इस . चलने वाली इस पत्नी को स्वयं भी देता है, ्रौर श्रपने माता-पितासेभी इस प्रधिकारको देने की प्रार्थना. करताहै। देवपुरी भें वेदध्वनियां अनाव्याधां देवपुरां भष् शि गा स्योना प॑तिठोके. वि राज. ॥६४॥ होकर, (शिवो) हे. वघु ! कल्याण रूपा तथा (स्योना) सुख दायिनो, तु (पतिलोके) पति के गृह में (विराज) विराजमान हो, या राज्यकर।

English

Sacred lore was the blanket, Devotion the coverlet.

अध्याय १५

श्लोक 4.15

है॒म॒नावे॑नं॒ मासौ॑ ध्रु॒वाया॑ दि॒शो गो॑पायतो॒ भूमि॑श्चा॒ग्निश्चानु॑ तिष्ठतो॒ य ए॒वं वेद॑

haimanāvenaṃ māsau dhruvāyā diśo gopāyato bhūmiścāgniścānu tiṣṭhato ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

नगरी मेँ प्रवेश करके पतिगृह मै.विराजमान्टो । ७२ । भ्रथववेद-माष्यः काऽ १४ । श्रचु° १। सू० १ . व्याख्या-घर के बुजुगं नववचू के प्रति कहते ह . कि-हे देवी ! तेरी सत्ता से इस देवपुरी या देवगृह के पूवं के, परिचम के, भ्रन्त के, मध्यं जीवन का यह् सर्वोत्तिम श्रादशं है । वैदिक धनियां तथा वैदिकं सामगान नाभ्रों कांसंचार कर, उनके जनीवनोँंको वेदिक मर्यादाभ्रों मे डालते रहते है । वतमान के रेडियो तथा1. /. कं भह, प्ररलील तथा गंवार गीत गह के वातावरण को दूषित कर रहे । बुजुगं वधू को यह भ्राश्वासन भी देते ह कि यह शाला प्राधि-व्याधिं . से शचुन्य है। तथा यह शाला देवपुरी है। इस कै वासी देवकोटि के है।

English

The Sāman was the Cushion, and chanting the bolster.

अध्याय १५

श्लोक 4.16

तस्मा॑ ऊ॒र्ध्वाया॑ दि॒शः

tasmā ūrdhvāyā diśaḥ

हिन्दी अर्थ

तूने भी इस देवपुरी मेँ भ्रा कर सच्ची देवी बनना । भ्रौर सब का कल्याण करने वाली उथा सुखो की वर्षा करनेवाली बनना । का० १४।. भनु० २। सु० २: भ्रथविद-मष्य ७३ सूर्या का क्रमिकं विकास ६४. तुस्यमगरे पयैवहन्त्सूयौ वंहतुनां सह ।. समथं सूर्या को, (वहतुना सह) विवाहविधि कं साथ या वहन करने वाले रथ कं साथ (दाः) प्रदान कर । वहतुना == वहतुः == विवाह (्रथवं० १४५।१।१३-१४); वहतुः ।५शा¡9- ७४ भ्रथवंवेद-माष्य का० १४1 रनु २।सु०२

English

The Vrātya ascended that couch.

अध्याय १५

श्लोक 4.17

शै॒शि॒रौ मासौ॑ गो॒प्तारा॒वकु॑र्व॒न् दिवं॑ चादि॒त्यं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑

śaiśirau māsau goptārāvakurvan divaṃ cādityaṃ cānuṣṭhātārau

हिन्दी अर्थ

कहा है । रजस् की परांपरिपक्वावस्था लगभग रे वषं मेँ होती है । यही सूर्या के विवाहं का सर्वोत्तम क्राल होता है। वचन द्वार सूचित किया हैक सूर्याका मनुष्यज पति एकदहीहै। इस लिये “पतिभ्यः” मेँ बहुवचन यौगिक विधया नाना-रक्चकों का द्योतक है। जसे राष्टरूपति, सभापति, सेनापति भ्रादि शब्दों मेँ पति काग्रथं है नाना हौगिः--यह भावं पतिभ्यः द्वारा प्रकट किया है। सास्र, इवसुर, विशेष व्यारूया १४।२।२।२-४ मत्र मे की गर्द है । पति है वह (दीर्घायुः) दीं भ्रायु वाला है, (रतम्) सौ (शरदः) वर्षो तक .. पति से पूवं मानो-विवाह किया था, -एेसा वणंन मन्व शमे हृभ्राहै। तेजः सम्मन्न कर के दीर्घायु वाले मनुष्यज-पति को दिया । इस कथन से:

English

The hosts of Gods were his attendants, solemn vows his messengers, and all creatures his

अध्याय १५

श्लोक 4.18

शै॒शि॒रावे॑नं॒ मासा॑वू॒र्ध्वाया॑ दि॒शो गो॑पायतो॒ द्यौश्चा॑दि॒त्यश्चानु॑ तिष्ठतो॒ य ए॒वं वेद॑

śaiśirāvenaṃ māsāvūrdhvāyā diśo gopāyato dyauścādityaścānu tiṣṭhato ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

का पति श्रगनि रै, जोकि रजसू-रूप है । इस अग्नि-पति के साथ रह कर का० १४। श्रमु०२।सूु०२ भ्रथर्ववेद-माष्य ७५ दीर्घायु मेँ विवाह करने का परिणाम यह होतादहैकि सूर्याका पति १०० वर्षो तकं जोवित रहने की क्षमता रखता है । छोरी श्रवस्या मे विवाह होतो है, (ते) तेरा (श्रपरः) दुप्ररा (पतिः) पति (गन्धवंः) .गन्धवं होता है । (ते) तेरा (तृतीयः) तोसरा (पतिः) पतिं (श्रग्निः) . प्रग्नि होता है, (ते). तेरा (तुरीयः) चौथा पति (मनुष्यजाः) मनुष्य से जन्मा हृभ्रा पुरुष व्याख्या--मन्व के चतुथं पाद मेँ चतुथं पति को. मनुष्यजाः कहा है । पटनी के चार-मनुष्यज-पतियों की भराशंका दन मर्न््रोमेन करनी चाहिए। साथही यह भो जानना चाहिए कि वेद में पठित पतिराब्द यौ गिकार्थक है । पति का श्रथ है रक्षक । पति का प्रथं केवल वह रक्षक हौ नहीं किं जिस के साथ विवाह हुभ्रा है, भपितु जाया की "रक्षा करने वाले पति के समीप

English

worshippers.

अध्याय १५

श्लोक 5.1

१-२१ अथर्वा।रुद्रः।१ त्रिपदा समविषमा गायत्री; २ त्रिपदा भुरिगार्ची त्रिष्टुप्; ३,६, ९,१२,१५,१८,२१ द्विपदा प्राजापत्याऽनुष्टुप्; ४ त्रिपदा स्वराट् प्राजापत्या पङ्क्तिः; ५,८,११,१७ त्रिपदा ब्राह्मी गायत्री; ७, १०, १६ त्रिपदा ककुप्; १३, १९ भुरिग् विषमा गायत्री; १४ निचृद्ब्राह्मी गायत्री; २० विराट्।तस्मै॒ प्राच्या॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद् भ॒वमि॑ष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन्

1-21 atharvā| rudraḥ| 1 tripadā samaviṣamā gāyatrī; 2 tripadā bhurigārcī triṣṭup; 3,6, 9,12,15,18,21 dvipadā prājāpatyā'nuṣṭup; 4 tripadā svarāṭ prājāpatyā paṅktiḥ; 5,8,11,17 tripadā brāhmī gāyatrī; 7, 10, 16 tripadā kakup; 13, 19 bhurig viṣamā gāyatrī; 14 nicṛdbrāhmī gāyatrī; 20 virāṭ| tasmai prācyā diśo antardeśād bhavamiṣvāsamanuṣṭhātāramakurvan

हिन्दी अर्थ

(नरः) ह नर-नारियो ! भि) मेरे (इदम्) इस कथन को (सुशुणुत) से निमित गदियो पर (भधितस्थुः) भ्रधिष्ठितह, (ते) वे सब (्रस्यै, वध्वै) इस वधू के लिए (स्योनाः) सुखदायक (भवन्तु) हो, भर्थातु सुखी रहने रथस्थ-वंधू को (हिसिषुः, मा हिसित न करे, भ्रवाञ्छनीय भ्रालोचना भथ हो “रह के दो पति". । दस द्वारां गह .पर -पति-पत्नोः कां समान. । भ्रषिकार सूचित होता है ।. व्याकरण के भ्रनुखार जाया को “दम्” भादेद का० १४। श्रनु० २॥ सू०२ भ्थ्ववेद-माष्य , ८३ भी सम्भव है किं वनस्यतियों तथा बडे बडे वृक्षोके वनोँमेंजो निवास करते हैँ ठेसे वानप्रस्थी भी, जोकि विवाह मेँ उपध्थित हृ९ है; निज भ्राही- वदो द्वारा वधू के लिए सुखदायक होँ।

English

Vairaja superintendents. The two

अध्याय १५

श्लोक 5.2

भ॒व ए॑नमिष्वा॒सः प्राच्या॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः

bhava enamiṣvāsaḥ prācyā diśo antardeśādanuṣṭhātānu tiṣṭhati nainaṃ śarvo na bhavo neśānaḥ

हिन्दी अर्थ

यति । सुशेवा = सु शेव (सेवने) । देवृक्रामा = “तु देवर की कमना करती , ह वधु ! (इह) इस पतिगृह में तू (्रदेवृष्नी) देवरो को कष्टन पहुचाने वाली; (श्रपतिष्नी) पति को कष्ट न पहुचाने वाली, (पशुभ्यः) पदयो के लिये (शिवा) उन की सेवा करनेवाली या कल्याण करनेवाली (सुयमा) यम-निय्मो का उत्तम विधि भे पालन करनेवाली या गुह का उत्तम नियमन-परबन्ध करनेवाली, (सुवर्चाः) उत्तमतेज तथाःशारीरिक कान्ति से वाली, (देवृकामा) देवरो की शुभकामना करनेवाली, या नियोगार्थं देवर की कामना करनेवाली, (स्योना) तथा सब को सुख देनेवाली एषि - स्थापना घर मेँ करता है । यह अग्नि गह र्भ सदा वतमान रहना चाद्ये । स्थान में देवकामा (ऋ० १०।८४४४) व्याख्या- वधू को उपदेश-ूने देवरौ रौर पति को मानसिक तथा ' करना, गृहवासियों पर प्र मपूवंक शासन तथा यम-नियर्मो का पालन करना, गृहस्थधमं का पालन करते हए श्रपने शरीर की कान्ति श्रौर तेजं को बनाए रखना, उत्तम श्रौर दीर सन्तानं वासी दोना, सब को सुख देने

English

region. Bhava the Archer, a deliverer, delivers him from the intermediate space of the eastern

अध्याय १५

श्लोक 5.3

नास्य॑ प॒शून् न स॑मा॒नान् हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑

nāsya paśūn na samānān hinasti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

भगो से सम्पन्न तेरे पति की (सुमतौ) सुमति में (श्रसत्) रहे । उपस्तरे == िस्तेरे के समीप यथा “उपद्चवि"" (६।४९।३), भर्थावु व्याख्या- प्रसूतिकाल मेँ गभंवती एेसे कमरे मेँ रहै जिसर्भ कि प्रसूतिकर्मःके हेतु, क्या करना चारिथे । पर बिदधते हो, (चमं च) भ्रौर मृगादि के चमं को. (उस्तृणीथन) उस । १. शमे ःभौर वमं नयु सक लिङ्गी है, इस इष्टि से “एतु” शब्द नपुसकलिङ्खी पठित है । भर्थात् “ ततु श्म, वर्म“ । । ९६ अरथर्ववेद-माष्य का० १४। श्रनु० २।सू०२ (पतिम्) पति को (विन्दते) प्राप्त करती है ।

English

They made Sarva the Archer his deliverer from the intermediate space of the southern region,

अध्याय १५

श्लोक 5.4

तस्मै॒ दक्षि॑णाया दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाच्छ॒र्वमि॑ष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन्

tasmai dakṣiṇāyā diśo antardeśāccharvamiṣvāsamanuṣṭhātāramakurvan

हिन्दी अर्थ

बल्बजम् =€ /95/06 70/98. । चरक में प्रसूतिगरहं मे बल्बज के बिछाने का विधान है (चरक, शरीरस्थ।न, म्ध्याय ठ । प्रसवपीडा के समय, चरक मेँ, भूमि पर शरन का विघान दहै। थथा ' आवी प्रादुभवि चरफ मेँ भसूतिगह का निम्नरूप मेँ वणन हूश्रा है । ' प्राक् चवा.या वारणानां रां वा यानि चान्यान्यपि ब्राहया शाः शसेधुरथव्रवेर विदः । फूलों के गन्धो सं सुगन्धित भूमि मे, सूतिकागृह बनवाना चाहिए । इस का गोदी, भिलावा, वरणा या खेर की समिघाये होनी चाहिय, तथा इसं मँ वह सब साभानं भी होना चाये जसि क्रि अथववेद के विद्वान् करे; थी उस म प्रसूतिकाले दी जाने वाली भ्राहूत्तियां दे।'

English

etc, as in verse 1.

अध्याय १५

श्लोक 5.5

श॒र्व ए॑नमिश्वा॒सो दक्षि॑णाया दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः

śarva enamiśvāso dakṣiṇāyā diśo antardeśādanuṣṭhātānu tiṣṭhati nainaṃ śarvo na bhavo neśānaḥ

हिन्दी अर्थ

का० १४। भ्रनु० २। सू०२ ्रथवंवेद-माष्य ९७ कई मन्व .का प्रथं करते हँ कि “लाल चमं पर बल्वज-घास को बिदा कर, के विपरीत है, तथा मन्त्र रमे भी चमं प्र ही श्रारोहण का विधान है, बल्वज पर नहीं । चरक मँ भी चमंपरहीबेठकर इष्टिका विधान किया है । यथा “ताँ पश्चिमे, अनाहतवस्वरसंचये दवेदषंभो वाप्यजिन उप- बिद्या कर, उस पर सुफेदबेल या मृग का चमं बिला कर बेठे । यह विधि वेदय के घर में रर-मृग या बकरे का चमं बिच्ठाए । वहां बेठ कर ढाक, सम्पादन करे! इस उद्धरण मेँभी चर्म॑ पर बैठने का विधान दहै, ्रावतं चम, पर नहीं । उपस्तुणीहि तथा उपस्तरे (१४।२।२१) समानाभिप्राय है भ्रसूतिकालं में प्रग्निहोत्र से लाभं ८८, आरोह चमोपं सीदाभिभेष देवो हन्ति रक्षांसि सवौ ।

English

They made Pasupati the Archer his deliverer from the inter- mediate space of the western

अध्याय १५

श्लोक 5.6

नास्य॑ प॒शून् न स॑मा॒नान् हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑

nāsya paśūn na samānān hinasti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

हनन करती है । (इह) यहां पर (भस्मे, पत्ये) इस पतिः के लिथे (प्रजाम्) “बल्वज धास को भरमि पर निचा, (तत्र) उस पर बरि्ाए रोहिते चर्मणि प्रधि लाल, था रोहित नाम वाले मूग पर (उपविश्य) बैठ कर, शेष देवः = द्योतनाद् वा दीपनाद् वा (निर० अ४।१५) ) मन्त पे निरावृत्त चमं पर बैठने का विधान है, रावत चमं पर नहीं । सन्तानं जन्म से पशुवत् होती हैँ (भस्याः) इस (मातुः) माता के (उपस्थात्) गभं से (जायमानाः) जन्म धार -करते हुए (नानारूपाः) ननागणों भौर श्राकृतियों वाले -यज्ञाग्नि के (उप सीद) समीप तु बैठा कर, भ्रौर (सं पत्नी) पति के साथ के प्रकट होने पर श्रौर मननरील होने पर वे वस्तुतः मनुष्य होती है । तभी कहा है कि “जन्मना जायते श्रः" । ्रथवं ° ११।२।९ भी इस सम्बन्ध में

English

They made the Awful God, the Archer, his deliverer from the intermediate space of the

अध्याय १५

श्लोक 5.7

तस्मै॑ प्र॒तीच्या॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शात् प॑शु॒पति॑मिष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन्

tasmai pratīcyā diśo antardeśāt paśupatimiṣvāsamanuṣṭhātāramakurvan

हिन्दी अर्थ

इसे पुरुषो को पशु कहा है । सद्गुणो से रहित, केवल श्राहार, निद्रा. भय श्रौर भेथून वाले पुरुष पशु सदश ही हैँ । जन्मना पुरुष सन्तानो को पशु कर । स से सन्तार्नो पर पिता का ही भ्रधिकार प्रतीत होता है! जो माता लगभग १० महीनों तक गर्भं धारण करने, उस के जनने, तथा पालन-पोषण मेँ कष्ट सहती का० १४। भ्रनु० २। सू०२ भ्रथर्रवेद-भाष्य ९ पतनी निन व्यवहारो तथा कतं दवारं अपने आप को मङ्कलमंयी भमङ्गेल काम करे। जिस गृण की सन्तान चाहे उसी सद्गुण का वह चिन्तन रौर मनन करती रहे । । (सुशेवा) उत्तम सेवा करने वाली तथा उत्तम-सुख देने वाली, इवदुराय) सवशर के लिए (शम्भः) शान्ति पदा करने वाली, (श्वशूवं) सास के लिए (सुशेवा = सु शेव (सेवने), तथा शेवम् सुखनाम (निषं० ३।६) । स्योना सुखनाम (निषं० ३/६) । प्रतरणी =प्र+-तरणी (नौका) ; 08 (भष्टे) गरहस्थ-सागर से सुख पूर्वक पार उतरने के लिए -सुशीला पत्नी नौका रूप है । उत्तम नौका द्वारा समुद्र या नदी-नद पार किया जा सकता है, इसो प्रकार गुणवती पत्नी के सहारे गृहस्य-जीवन को सुख से निभाया दे वधु 1 (श्वशुरम्यः) ववशुरो के लिए (स्योना) सुखस्वसूपा (व)

English

region, etc.

अध्याय १५

श्लोक 5.8

प॒शु॒पति॑रेनमिष्वा॒सः प्र॒तीच्या॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः

paśupatirenamiṣvāsaḥ pratīcyā diśo antardeśādanuṣṭhātānu tiṣṭhati nainaṃ śarvo na bhavo neśānaḥ

हिन्दी अर्थ

(स्योना) त सुलस्वरूपा हो 1 (भस्य) इस (सवस्य) सव (विधे) भरता के १०० भ्रथवंवेद-भाष्य का० १४ । भ्रनु० २।सु०२ को (पुष्टाय) पुष्टि के लिए (भव) हो । श्वदुरेम्यः पति का पिता, चाचा, ताज धै सब वधू के सवशर है तथा पुष्टि को चिन्ता पत्नी को सदा करनी चाहिए । मनुष्य समाज तथा. समग्र प्रजा के लिए पत्नी को सुखमयी होना चाहिए ॥ पत्नी के उदार तथा गृहस्थ की प्रत्येक गरहिणो के हृदय मेँ होनी चाहिए ।

English

They made the Awful God, the Archer, his deliverer from the intermediate space of the

अध्याय १५

श्लोक 5.9

नास्य॑ प॒शून् न स॑मा॒नान् हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑

nāsya paśūn na samānān hinasti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(सुमङ्गलः) उत्तम-मङ्गल वाली (इयम्) यह. (वधूः) वधू है । . होने के आदीर्वाद, क्रमं से, देकर निज स्थानों पर जाद्ये 1 ् (च) भ्रौर (याः) जो (जरतीः) बढी स्वरियां (रपि) भी (इह) यहां (भरस्तम्) ्रपने भ्रपने धरों को (वि परेतन) लौटो । भावार्थं विवाह मे उपस्थित सज्जनो के प्रति कहा है कि भाप इस का9 १४ . भ्रनु° २। सूऽ२ भ्थवंवेद-भाष्य ॥ ि १०१ यवतयःयुवति्यो मेँ ईर्ष्याकी सम्भावना एसे शुभ भ्रवसरों पर

English

northern region, etc, as above.

अध्याय १५

श्लोक 5.10

तस्मा॒ उदी॑च्या दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॒ग्रं दे॒वमि॑ष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन्

tasmā udīcyā diśo antardeśādagraṃ devamiṣvāsamanuṣṭhātāramakurvan

हिन्दी अर्थ

पुनस्तान् य्गियां देवा नयन्तु यत॒ आग॑ताः ॥१०॥ ग्रनु) रथ के साय साथ या पीछे पीछे (यन्ति) चलते है, तथा (जनान् श्नु) वरपक्ष के जनों के साथ-साथ या. पीपी (यन्ति) चलते हँ (तान्) उन्हे, के लोग, (पुनः) फिर (नयन्तु) पहुंचा दे, (यतः) जहां जहांसेकिवे भर्थात् विवाहु-यज् मेँ संगत हुए पूजनीय लोगं यर श्रथव्विद-माष्य का० १४। भ्नु० २। घु०र व्याख्या-- वधू जिस रथ पर चद कर पतिगरह की प्रोर जाने लगे चाहिए मन्त १४।१,६१। पतिगृह की भ्रोर कन्या के जाते हए, रथ के

English

Rain months, etc. as above.

अध्याय १५

श्लोक 5.11

उ॒ग्र ए॑नं दे॒व इ॑ष्वा॒स उदी॑च्या दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑न

ugra enaṃ deva iṣvāsa udīcyā diśo antardeśādanuṣṭhātānu tiṣṭhati nainaṃ śarvo na bhavo neśāna

हिन्दी अर्थ

यह पद्धति वरपक् सत्कारं है। तथा जो पूजनीय लोग विवाह मेँ .. भी कन्यापक्ष के नगो क करना चाहिए । हे जाया भ्रौर पति (परिपन्थिन ) गह्स्थ-पथ के विरोषी,- (ये) का विना ६ देते है" वे (मा विदन्) तुम प्राप्त न हो, तुम्है जाने तक नहीं । तुम दोनों (दुम्) दुर्गम पथ को, (सुगेन) सुगम पथ द्वारा (भ्रती- परिपन्थिनः गृहस्थ-पथ के विरोघी ईहै,--काम, क्रो, लोभ, मोह, परस्पर के कलह भ्रादि । पथ का भ्रभिप्राय सडको या १०४८७ से नहीं । पथ के सम्बन्ध मेँ देलो (मन्व १४।१।६३; १४।२।६.) । ये परिपन्थी जब पति-पत्नी पर सवार हो जाते ह, उन पर कावर पालेते ह तब पति- पत्ती विनाराकी भोर पग बढ़ते हँ । सुमति का मागे “सुग” मागं है मन्व .१५२ ।६८, सुगम मागं ह, रौर दुर्मति का मागं दुगं है, दुर्गम है । सुंमति द्वारा दुमंति के विना होजाने पर भ्रराति भ्र्थातु कुजूसी भौर

English

They made the two Autumn months his protectors from the northern region, and Syaita and

अध्याय १५

श्लोक 5.12

नास्य॑ प॒शून् न स॑मा॒नान् हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑

nāsya paśūn na samānān hinasti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

वेषं के भ्राभूषणों .का प्रदगंन. 9५ ७६, सं कायाम वहतुं बरह्मणा गृहैरवौरेण चक्वा मिश्रेण । का० १४। भअनु० २। सू०२ भ्रथविद-माष्य ८५ रक्षको के (कृणोतु) सुपुदं करदे। इ्वशुर श्रादि के सुपुर्द कर दे, ताकि मागं म उन श्राभरुषरों भ्रादिके गुम घर (भ्रा भ्ग्) भराई है! (घाता) जगत् के धारण करने वाले परभेदवर ने (भस्य) इस नारी के लिए (इमम, लोकम्) यह पतिग्रह (दिदेश) (¬ भ्रथवेवेद-भाष्य का० १४। भ्रनु० २। सू०२

English

Naudhasa superintendents.

अध्याय १५

श्लोक 5.13

तस्मै॑ ध्रु॒वाया॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद् रु॒द्रमि॑ष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन्

tasmai dhruvāyā diśo antardeśād rudramiṣvāsamanuṣṭhātāramakurvan

हिन्दी अर्थ

वाली सन्तानो कौ पालना श्रौर रक्षा करने मे समथं पति, तथा (भरिवना उभा) पति के दोनों माता-पिता (ताम्) उस नारी को प्रजया) सन्तानं व्याख्या - वधू जब पतिगृह में प्रवेश करे तब गृहपुरोहित कटे कि यह नारी शिवरूपा है, कल्यांणस्वरूपा है जो कि इस घर में आई है । तथा के कि पति-पत्नी के इस र्म्बन्ध को विधाता ने निरिचत किया है इस जितना किं पति काहै। पतिम तीन गुण होने चाहिए । वहु परमेद्वर को मानने वाला नारी, (नरः) है पौरुषदाक्ति वालो ! (बीजम्) बीज (वपत) बोभ्ो, वीर्याधान करो । (सा) वह नारी (ऋषभस्य) श्रेष्टपति के (रेतः) वीयं को (बिभ्रती) चारणं तथा पोषित. करती हुई. (वः) तुम्हरे लिये १४।१।१ मे मातृशक्तिं को भूमि कहा है । भूमि का श्रथं है, उत्पादनशक्ति बीजात्रप न करना. चाहिए । नन्ध्या में बोजावाप में केवल मोगेच्छा (मूनुस्मृति) । श्रथवा उवैरा = उश+-वरा = महाश्रेष्ठा नारी. । यह नारी

English

The two Autumn months. etc. as above.

अध्याय १५

श्लोक 5.14

रु॒द्र ए॑नमिष्वा॒सो ध्रु॒वाया॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शादनु॑ष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः

rudra enamiṣvāso dhruvāyā diśo antardeśādanuṣṭhātānu tiṣṭhati nainaṃ śarvo na bhavo neśānaḥ

हिन्दी अर्थ

नरः यह शब्द “नु” से उत्पन्न बहुवचन मेँ है, भौर “तर र्द से दाब्दः मानने पर “वपत” मेँ वचनव्यत्यय कर “नरः वपतु का भ्रथं जानना कै श्रनुसार, शरीर भ रस-रक्त-दूघ को प्रवाहित करने वाली नाडियां वाली नारी, वैराग्यप्रवणा होने के कारण, गृहस्थजीवन के लिए सुखकर नहीं हो सकती । तथा केवल उत्पादनक्क्ति वाली नारी, भोगमय जीवन के कारण, गृहस्थ को अधिकं भोगमय बना सकती है । इस लिये नारी मे दोनों शक्तियो का समन्वय होना चाहिए, तभी वह किवास्वरूप हो १. एक काल मँ एक पति की वृष्टि से “ऋछषमस्य रेतः बिश्नती” मेँ ऋष- भस्य मँ एकवचन षयुक्त हृभादहै। बीज भीः निष्फल रहता है । कोई . किसान प्रनुपजाऊ भूमि मेँ बीजावाप नहीं करता । इस भाव को हृदयङ्गत कराने के लिए मन्त्र मेँ उवंरा शाब्द कां प्रयोग हूश्रा है ।

English

They made the two Winter months his protectors from the region of the nadir, and earth and

अध्याय १५

श्लोक 5.15

नास्य॑ प॒शून् न स॑मा॒नान् हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑

nāsya paśūn na samānān hinasti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

“दुग्धं जनयत् द्वारा यह प्रकट किया है कि चिशयुके लिए निज निकट काल मेँ .दुग्धोत्पादक भ्रोषधियों का सेवन भी माताःको करते रहना विज्ञान वाली देवी - ! (इह) ईस गृह म तू (विष्णुः इव) सूयं के सद्द . वाली (प्रजायताम्) तु से सन्तान पदा हो, जोकिं (भगस्य) भगोंसे सम्पन्न पिता की (सुमतौ) सुमति में (असत्) रहे । का० १४ । भ्रनु० २ सू०.२ ग्रथर्ववेद-भाष्य ठर पुरः” ॥ (यजुः ३१।५). मे विराट्" को प्रकृतिरूप तथा परमपुरुष परमेदवर मे भी, वधू को विराट् कहते हुए, पति को गृहस्थ मे म्रधीदवर सूचित किया

English

Agni superintendents. The two Winter months, etc.

अध्याय १५

श्लोक 5.16

तस्मा॑ ऊ॒र्ध्वाया॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शान्म॑हादे॒वमि॑ष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन्

tasmā ūrdhvāyā diśo antardeśānmahādevamiṣvāsamanuṣṭhātāramakurvan

हिन्दी अर्थ

पत्नी श्रौर पति.का होना चाहिए यह भावना “विराट् पद द्वाराः सर" वतीकारूपहै। माताके सुशिक्षिता होने परर बह बच्चों की सच्ची जगत् की परमदेवता रूपटै। विष्ुका भर्थंसू्यंभीदटै जोकि निज धारित कर रहाहै। इसी प्रकारपत्नीकोभी चाहिए कि वह निज वधू “सिनीवाली है । वह सिनी है, घर के खाद्य-पेय सामभ्री की वंह बने, तथा “वाली” भर्थात् केश प्रादि को संवार कर निनी शोभा बनाए रखे । सिनीवाली को निरक्तकार ने "देवपत्नी" कहा है “सिनीवाली

English

They made the two Dewy months his protectors from the region of the zenith, and Heaven

अध्याय १५

श्लोक 5.17

म॒हा॒दे॒व ए॑नमिष्वा॒स ऊ॒र्ध्वाया॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः

mahādeva enamiṣvāsa ūrdhvāyā diśo antardeśādanuṣṭhātānu tiṣṭhati nainaṃ śarvo na bhavo neśānaḥ

हिन्दी अर्थ

लेकर पञ्धतन्मातराभों तक प्रकृति-विृति रूप तथा “विराद् केवल विङंतिरूप है । ९० अथरववेद-माष्य का० १४ भनु २ । सू० ६ रूप प्रति की पत्नी है, श्रासुर तथा तामसः प्रकृति वाले पुरुष की नहीं । इस को इस प्रकार सुशिक्षित करे किवे श्रपने पिता की सुमतिम सदा रहै ताकिंवेदुमंति-मा्गं पर नं चलें । ष नारियों के हृदयो मे शान्ति की लहे (श्रापः) जलवत् शीतल हेनारियों (वः) तुम में से प्रत्येकके 0९ 70ृ€ एङ कालो का - वणा 15 तत्व ४ चह कृणगल् म ॐ १. योक्त ४०७ == रथ का बुध्रा । पति-पत्नी को शदस्य-रथ-के चष मेँ

English

and the Ādityas superintendents.

अध्याय १५

श्लोक 5.18

नास्य॑ प॒शून् न स॑मा॒नान् हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑

nāsya paśūn na samānān hinasti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

का० १४. श्रनु० २1 सू०२ भ्रथर्ववेद-भाष्य ९१ य़ा समुद्र की लहरो का. तथा “उदुहन्तु" द्वारा उन लहर के उठने का निदेश मिलता है । वेद मेँ हृदय को भी “समुद्र'कहा है, यथा-हद्यात्समुदरात् (यजुः १७१९२) तथाः “सिन्धु सिन्धुसृत्याय (अथं २०१११) । इसतिये दायक होना चाहिए,यह भाव द्योतित किया है । मन्त क पूर्वाधं द्वारा नारियों को, तथा उत्तरां द्वारा वर-वघू. या पति-पत्नी को उपदेशा दिया है । हृदय से यदि पति भ्रादिकेप्रति प्रेममयी लहरं उठती ररह तोये प्रेममयी लहर पति श्रादिके लिये बन्धन रूपहो जाती है। यथा “पतिर्बन्धेषु भ्रति, सेवा श्रादि प्रेम-बन्धन.ह। होना । भ्रगुन = म +-शुनम् (सुखनाम, निषं० ३।६) । इन में परस्पर काय-

English

The two Dewy months, etc.

अध्याय १५

श्लोक 5.19

तस्मै॒ सर्वे॑भ्यो अन्तर्दे॒शेभ्य॒ ईशा॑नमिष्वा॒सम॑नुष्ठा॒तार॑मकुर्वन्

tasmai sarvebhyo antardeśebhya īśānamiṣvāsamanuṣṭhātāramakurvan

हिन्दी अर्थ

है। एक “सुख का न होना" श्रौर दसरा दुःख का होना । “सुख कान होना भौर “दुःख का होना-ये दोनों भ्रवस्थाएुं उपादेय नहीं । मनुष्य दुःख .. से तौ सदा रहित होना चाहता है, परन्तु सुखाभाव को भी वह नहीं वाहता । वीरस्देढकामा सं त्वथैषिषीमहि छमनस्यमंना ॥१७॥ श्र भ्रयवेद-भाष्य का० १४। भ्रनु २। सु०२. न पहटंचाने वाली, (गृहेभ्यः) ग्रहवासि्योँ के निये (स्योना) सुखदाय, - (शग्मा) शान्ति देनेवाली, (सुशेवा) उत्तम सेवा करनेवाली, (सुयमा) यम-निय्मौ का उत्तमविधि से पालन करनेवाली, (वीरसरः) वीर सन्तानं . पदा करनेवाली, (देवृकामा) देवरो की शुम कामना करनेवाली, श्रौर संग द्वारा (समू, एधिषीमहि) हम सब वृद्धि प्राप्त करर, बदु ।

English

For him they made the Archer Bhava a deliverer from the inter- mediate space of the eastern

अध्याय १५

श्लोक 5.20

ईशा॑न एनमिष्वा॒सः सर्वे॑भ्यो अन्तर्दे॒शेभ्यो॑ऽनुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑ श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः

īśāna enamiṣvāsaḥ sarvebhyo antardeśebhyo'nuṣṭhātānu tiṣṭhati nainaṃ śarvo na bhavo neśānaḥ

हिन्दी अर्थ

तेरी (ईडे) स्तुति करता हं, तेरे सदगु्णो का कथन करता हं । है पत्नी ! . ह, (शून्येषो) तु घर कै .जीवन को शून्य बना देने की एषणा वाली है, (्रराति) है शतररूप श्रापत्ति ! (प्र पत) सीघ्र चली जा, (इह) इस धर मे (मा) न (रंस्थाः) रमण कर । प्रदान सामाजिक जीवन का रातु है लीदन को ढाल सके जो पनी भ्रपने गृहस्थ जीवने के उदेश्य को सम कर, तदनुसार व्यवहार करे, उस गुणवती देती के सद्गु की प्रशंसा पति किया करे । पतनी गृह्यकष्टो तथा भ्रापत्तियों के निरसन के लिये"

English

region. Neither Sarva nor Bhava nor Isāna slays him who possesses this knowledge, or his

अध्याय १५

श्लोक 5.21

नास्य॑ प॒शून् न स॑मा॒नान् हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑

nāsya paśūn na samānān hinasti ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

निज उग्रभावनाभों को जागरित रखे । मववा--(निक ते) है मूत्तिमयी भ्रापत्ति ! (इतः) इस घर से गृहात्) भ्रपने घर से (त्वा) तुमे (इडे) निकाल देती हं. (शः ये्री) शून्यता दौड़ जा, भाग जा, (दहं) इस घर में (मा) न (रस्थाः) तू रमण कर । कर ले, (भ्रधा) . तदनन्तर (नारि) .हे नारि! है वषु !. तू (सरस्वत्यं) का० १४। श्रनु० २। सू०र -अथर्गविद-भाष्य ९५ नमस्कार वधू करेःपभ्रौरघरके बुजुगों को भी नमस्कार किया करै । प्रसूतिगरृह में हैनिक भ्रग्निहोत्र

English

cattle, or his kinsmen.

अध्याय १५

श्लोक 6.1

१-२७ अथर्वा।अध्यातमं, व्रात्यः।१,४ आसुरी पङ्क्तिः; ७, १०, १३, १६, २५ आसुरी बृहती; २२-३३ परोष्णिक्; २,१७ आर्ची पङ्क्तिः; १९ आर्च्युष्णिक्; ५, ११ साम्नी त्रिष्टुप्; ८ साम्नी पङ्क्तिः; १४,२४ आर्ची त्रिष्टुप्; २० साम्नयनुष्टुप्; २६ आर्च्यनुष्टुप्; ३ आर्षी पङ्क्तिः; ६, १२ निचृद्बहती; ९ प्राजापत्या त्रिष्टुप्; १५, १८ विराट् जगती; २१ आर्ची बृहती; २७ विराड् बृहती।स ध्रु॒वां दिश॒मनु॒ व्यऽचलत्

1-27 atharvā| adhyātamaṃ, vrātyaḥ| 1,4 āsurī paṅktiḥ; 7, 10, 13, 16, 25 āsurī bṛhatī; 22-33 paroṣṇik; 2,17 ārcī paṅktiḥ; 19 ārcyuṣṇik; 5, 11 sāmnī triṣṭup; 8 sāmnī paṅktiḥ; 14,24 ārcī triṣṭup; 20 sāmnayanuṣṭup; 26 ārcyanuṣṭup; 3 ārṣī paṅktiḥ; 6, 12 nicṛdbahatī; 9 prājāpatyā triṣṭup; 15, 18 virāṭ jagatī; 21 ārcī bṛhatī; 27 virāḍ bṛhatī| sa dhruvāṃ diśamanu vya'calat

हिन्दी अर्थ

हो सकती है। उ्ह भी भ्रारीर्वाद ही देने के लिए-प्रेरणा दी गर्द है सूर्याका पालकी में भारोहण तथा विविध (रूपाणि) सूपो को (बिभ्रतम्) धारण की हुई (वह्यम्) पालकी पर, (सावित्री) जीवित पिता वाली (सूर्या) सूर्या-्रह्मचारिणी, (बृहते, सौभगापर) बड़े सौभाग्य के लिए. (कम्) सानन्द (भारोहत्) , भ ज्योति वाली (उषसः प्रति) उषां के कालों मे (जागरासि) तु भ्रषने १०२ . श्रथवंवेइ-भाष्य का० १४। भ्रनुऽ २। सुर (१) दं निक कृत्यो से निवृत्त हो कर, रात्रिके समय तु जब सयनके लिप् चारपाई पर जाया करे तब प्रसन्नचित्त हौ कर चारपाई पर प्रारोहण रहना । तथा ब्राह्म पहृतं में ही जाग कर गृहस्थ के कर्मो के करने मे साव- (देवाः). देव लोग (अग्रे) पूर्वकाल से (पत्नीः) . पत्नियों को (नि,

English

They made Rudra the Archer his deliverer from the intermediate space of the region of the

अध्याय १५

श्लोक 6.2

तं भूमि॑श्चा॒ग्निश्चौष॑धयश्च॒ वन॒स्पत॑यश्च वानस्प॒त्याश्च॑ वी॒रुध॑श्चानु॒व्यऽचलन्

taṃ bhūmiścāgniścauṣadhayaśca vanaspatayaśca vānaspatyāśca vīrudhaścānuvya'calan

हिन्दी अर्थ

वयास्या- कामशास्त्रं मे मेथुन की नानाविधियों श्रौर अआ्आसनोंका वणन मिलता है । वेदने केवल सुगम श्रौर उचित प्रासन का वंन श्रिया पारस्परिक भ्रनुचित-कामुकता के प्रदक्षंक हैँ । विचार रखते हुए गृहस्थधमं का पालन करना चाहिए । सविता; प्रकृति- । पत्नी से, जगदुत्पादन कर रहा है, जिस्म कि कामुकताकालेश मात्रभी नहीं । इस कामुकता के परित्याग ते, गृहस्थघमं पालन करते हए भी, आयु का० १४। अनु २।-सू० २ . अथर्वविद-भाष्य १११ रहित तू (इमम्) टस (पतिलोकम्) पतिकुल मेँ (श्रा विदा) प्रवेश कर या

English

He went his way to the region of the zenith. Right and Truth and Sun and Moon and Stars

अध्याय १५

श्लोक 6.3

भूमे॑श्च॒ वै सो॒३ग्नेश्चौष॑धीनां च॒ वन॒स्पती॑नां च वानस्प॒त्यानां॑ ।च वी॒रुधां॑ च प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑

bhūmeśca vai so3gneścauṣadhīnāṃ ca vanaspatīnāṃ ca vānaspatyānāṃ | ca vīrudhāṃ ca priyaṃ dhāma bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

1९0" । इसलिए पिशङ्ख कमं है “लोहितमिशित तमः” रूपी. कमं । भ्र्थातु मे यथा सम्भव चुक्ल कर्मो को ही करना चाहिए । है, दसका अभिप्राय यह है कि प्रकृति पट या चादर के सवर, श्रपने रजस्? मे से प्रत्येक-खछोटे छोटे वर्णो के समूहरूप ह, बिन्दुखूप है, परम-भरगुरूप है । (२) पृषातकीकोबाणा या तीर रूपभी कहाहै।बाणयातीर शरीर मँ प्रविष्ट हुए दुःखभरद होते है, इरी(प्रकार पृषातकी- कृति भी विवेकी के लिए सदा दुःलमयी प्रकट होती है । यथा “दुःखमेव सवं विवेकिनः (योग २।१५) । इस भाव को दशानि के लिए मन्त्र मेँ पृषातकीका करने, या सौपने का अभिप्राय केवल यही है कि प्रकृति के पदार्थो मे मोह- ममता को त्याग कर प्रकृति को निः्ेयस मँ साघनं नाम कर, निष्काम भाव से उस का उपयोग करना । गृहरथी के गृहस्थजीवन का यह सर्वोच्च कर उस का उपार्जन करना चाहिए ॥.

English

He went away to the unindicated region. The Seasons, groups of seasons, the worlds and their

अध्याय १५

श्लोक 6.4

स ऊ॒र्ध्वां दिश॒मनु॒ व्यऽचलत्

sa ūrdhvāṃ diśamanu vya'calat

हिन्दी अर्थ

(उपवासने ) उपवास-श्रत मँ (यावतीः) जितने (इत्याः) मेरी कर्तव्य १२० भरथवेवेद-माष्य का १४. अनु० २। सू० २ इन के करते हुए भात्माभिभान तथा भरात्मोत्कषं कौ भावना के जागरित हो जाने की सम्भावना बनी रहती दहै। परमेदवर ने-जो किं संसार का राजा तथा शरेष्ठ नियामक है जोवनों के लिएः नानाविषव नित्य-नैमित्तिक कमो का निवह किया है, के घरपर, ये नानाप्रकार के पाशै जिनमें व्यक्ति बंधाहुभ्राहै। इनः गृहस्थ -इन सुखो तथा दुः को धयं पूवक सहता हुञ्ा, निष्काम माव से , निज कत्तव्य कररता रहता है। + लौट जाय, इस से वह सुखों मेँ प्रसन्न तथा दुःखो मेँ व्यथित नहीं.

English

inhabitants, the months and half-months, and Day and Night followed him. He who, etc.

अध्याय १५

श्लोक 6.5

तमृ॒तं च॑ स॒त्यं च॒ सूर्य॑श्च च॒न्द्रश्च॒ नक्ष॑त्राणि चानु॒व्यचलन्

tamṛtaṃ ca satyaṃ ca sūryaśca candraśca nakṣatrāṇi cānuvyacalan

हिन्दी अर्थ

होता । उस के जीवन में चाहे कमो भौ ऋद्धियौं का द्शंन न हृभ्रा हो वंह तब भी दुःखो नहीं होतां । उस की यह समावस्था उस कै निष्कामः जीवन श्रादि, भौर कर्मके फलों को, परमरंदवर के प्रतिः समर्पित कर दिया होतां है 1.यह परम निष्काम मावना.है। का० १४। भ्रनु० २। सु०२ भ्रथवेवेद-माष्य . १२१ है, (सा) बह (भि) मेरी देह (विमाय) सरदी तथा गरमी से भय करती वलफल-कपास श्रादि को (कुशुषव ) एकत्रित कर, ताकि (वयम्) हम (मा) 78) 81०५८ (भ्रष्टे) । वनस्पते==वन की पत्ती । उपवनरूप मेँ चेतो की ८।२।३); भर्थात् वनो का रक्षक या पालक

English

He went away to the unfrequented region. Thence he thought that he should not return. Diti

अध्याय १५

श्लोक 6.6

ऋ॒तस्य॑ च॒ वै स स॒त्यस्य॑ च॒ सूर्य॑स्य च च॒न्द्रस्य॑ च॒ नक्ष॑त्राणां च ।प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑

ṛtasya ca vai sa satyasya ca sūryasya ca candrasya ca nakṣatrāṇāṃ ca | priyaṃ dhāma bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

श्रौर जितनी (सिचः) कोर है, (ये) जो (श्रोतवः) बने (च) भ्रौर य). दायी हो, (उप स्पृशात्) भौर हमारे शरीरो का स्परं करे । रसा होना चाहिए जो कि गरमी-सरदी की ईष्ट से सुखदायक हो । गृह्यथ- ११६. उशतीः कन्यला इमाः पिवृलोकाव परति यतीः । १२२ -. भथरविद-माष्य का० १४॥। अनु» २।सु०२ (उचतोः) कामनत्राली (दमाः) यें (कन्यलाः कन्याए , (पितृलोकात्) पौराणिक पितृलोक का प्रायः भ्रथं करते है“मृतपितरोँ का लोक

English

and Aditi and Idā and Indrāni followed him. He who, etc.

अध्याय १५

श्लोक 6.7

स उत्त॒मां दिश॒मनु॒ व्यऽचलत्

sa uttamāṃ diśamanu vya'calat

हिन्दी अर्थ

“छोडना यां त्याग करना” होता है, परन्तु अ्रथं प्रतीत. नहीं होता । चाहिए, जोकि गरहस्थघमं को सफलता पूर्वक निमाने मे सहायक हो । यह् , वक्र कीः वर्चदीक्षा ११७. बृस्पतिनावशष्टां विँ देवा अधारयन् । वचां -गोषु भविष्टं यत तेनेमां से सूंजामसि ॥५३॥ (१४।२।५२) ( विवे) सब (देवाः) देवो भौर देवि्यो ने. (श्रारयनु) अ्रपने- भ्रपने विवाह. के समय धारण किया था, इस लिये (तेन) उस वचस के साथ (इमाम्) इस कन्या का (सं सृजामसि) हम संसगं करते है द्वारा हम वधू को वचंस्विनी कहते ह । पुरोहित मनचत्र द्वारा कहता है कि समय गोवर्चस् को धारण क्ियाथा,) देवियोंकोतो गोवर्च॑सु धारण करनाही चाहिए । परन्तु साथ हीदेवों को भी गोवचंस् केधारण की. भ्रावरयकता 'है, ताकि गृहस्थ जोवन शान्तिपूर्वक चल सके । यह वघ की कोभीगौ या गावः कहा है। यथा “सथाप्यस्यको रदिमदचत्रमसं प्रति ररिमयो का, घवं र्यात् धारण करने वाला . ॥

English

He went away to the regions. Virāj and all the Gods and all the

अध्याय १५

श्लोक 6.8

तमृच॑श्च॒ सामा॑नि च॒ यजूं॑षि च॒ ब्रह्म॑ चानु॒व्यऽचलन्

tamṛcaśca sāmāni ca yajūṃṣi ca brahma cānuvya'calan

हिन्दी अर्थ

(५ =हिस-पद्यु वारा भ्राक्रमण होने पर गौए भी मिल कर उस का मुः करती हैँ । त गौप्रों का तेजस् प्रकट होता है । इसी प्रकार , विवाहित वधू भमी-यदि कोई दृष्ट उस पर बलात्कार करने की चेष्टा करे,-तब निज उग्रता से उसका मुकाबिला करे । यह वधू को ६।५६।२);. (निर° ५ । इस लिये सूयं को गन्धर्वं कहते ह, गौ भर्थात् ११९. बूहस्पतिनावशष्टा विश्वं देवा अधारयन् । के साथ दस कन्या काहम संसगं करते हैँ (पूर्ववत्) ! की इन्द्रिय । गौ निज योनी से बच्डा-बचछदी को जन्म देती है. जिससे. गोवंश की वृद्धि होती है । वू को भी निज भग राक्ति से उत्तमोत्तम सन्तानो को जन्म देना-चाहिए । यहे वधू की भग दीक्षा है साथ इस कन्या का हम संसर्ग करते है (पूरवंवत्)। गौ स्तोतृनाम का० १४। भ्रनु०२।सूु२ भ्रथवेवेद-माष्य १२५ (निष ३।१६) । इन रद्वयं भ्रादि के कारण वर कौ मी मग कहा है ।

English

Deities followed him. He who, etc.

अध्याय १५

श्लोक 6.9

ऋ॒चां च॒ वै स साम्नां॑ च॒ यजु॑षां च॒ ब्रह्म॑णश्च प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑

ṛcāṃ ca vai sa sāmnāṃ ca yajuṣāṃ ca brahmaṇaśca priyaṃ dhāma bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार भग के ६ ्रथं हँ जिन के साथ कन्या के संसग का वणन . वघ्रू की योदीक्षा १२०. बरहुस्पठिनावंष्टां विश्वे देवा भधारयन् । मन्त ५५ में उत्तम बदडा-बछडी पैदा करने के कारण गो-नरल का यच्च होता है, शसो प्रकार उत्तम सन्तानो के कारण माता पिता का यच है रौर मन्त्र भदर्मेउन द्वारा हृएयशकावणेनहै। कन्या का हम संसग करते है, (पुंवत्) । मिन्न-भिन्न ह । इसी पकार एेदवयं भादि का यथोचित उपाजन कर विवा- हित कन्या भी यशोभांगिनी बने । गौः का भ्रथं स्तोता भी होता हैँ यह मन्व ५५ में र्चा दिया है यह वघ की .यदोदीक्षा है । १२१. बृहस्पतिनावेष्टां विश्वं देवा अधारयन् । १२६ ग्रथववेद-भाष्य . का० १४1 भ्रनु० २।स्०२

English

He went away to all the intermediate spaces. Prajāpati and

अध्याय १५

श्लोक 6.10

स बृ॑ह॒तीं दिश॒मनु॒ व्यऽचलत्

sa bṛhatīṃ diśamanu vya'calat

हिन्दी अर्थ

नारि ! (महित्वा) भ्रपनी महिमा के कारण (सूर्या इव) ्रादशं सुर्या- साथ (संभव) भिल, या सम्पक््-भूति को प्राप्त कर, इस सिद्धान्त करो हृदयङ्गत. कराने के लिये, पुरावादके रूप मंकहा है कि. कार १४। भनु" २० सु०२ . भ्रथववेद-भाष्य . १०३ सद्गुणो से सम्पना वधू को भी ज्ञानं प्रकाश फलाने वाली बनना चाहिए । पति का कर्मिष्ठ होना भ्रौर पति-पत्नी “एक शरीर” ९७; उचिष्ठेतो विश्वावस्। नम॑सेडामहे त्वा । र

English

nadir etc.

अध्याय १५

श्लोक 6.11

तमि॑तिहा॒सश्च॑ पुरा॒णं च॒ गाथा॑श्च नाराशं॒सीश्चा॑नु॒व्यऽचलन्

tamitihāsaśca purāṇaṃ ca gāthāśca nārāśaṃsīścānuvya'calan

हिन्दी अर्थ

नमस्कारादि द्वारा मानपूव॑क (त्वा) तेरी (ईडामहे) रतुति, प्रशंसा हम विश्वाथुसो = विदव (सब प्रकार' की) + वसो (सम्पत्ति वलि !) । जनुषा श्रौर जामिम्--इस दोनों के सह प्रयोग से भ्रनुमान होता है किं गतौ) = नितरां क्रियाशीलाम् = करमशीलाम् ए के भ्रधोःवर ! (नमसा) नमस्कारपु्वकं, विनयपूरवंक (त्वा) तुक से (ईंडामहे) १७४ । भ्यववेद-माष्य का० १४॥ भरनु9 २१ सू० २ हम याचना भर्थात् प्राना करते हैँ कि (इतः) इन हमारे हृदयस्थलों से

English

They made Mahādeva his deliverer from the intermediate space of the region of the zenith,

अध्याय १५

श्लोक 6.12

इ॒ति॒हा॒सस्य॑ च॒ वै स पु॑रा॒णस्य॑ च॒ गाथा॑नां च नाराशं॒सीनां॑ च प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑

itihāsasya ca vai sa purāṇasya ca gāthānāṃ ca nārāśaṃsīnāṃ ca priyaṃ dhāma bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

स्थित हुई, नितरां कमंशोला कुलवध की समुन्नति की (इच्छ) इच्छा . कर । (जनुषा)जब से प्राणि सृष्टि हुई है तब से (सः) वह भर्थातु. समुन्नति . को््वाहना ति) है जगदीश्वर ! तेरा (भागः) स्वाभाविक धर्मं रहा है,(तस्य) उसे (विद्धि) तू जान ! - (परे दहि) त जा। (गन्धवं) है गोरूप-जगत् का धारण करने वाले ! (ऋतुना) ऋतु २ के -्नु्ार (नमः) तुके नमस्कार (कृणोमि) चै . ॥ भरन्तरिक्षमे भ्रौरजलमें सरणा करने वाली, विचरे वाली; तथा रूपवती नाम" (निघं० १३) । तथा जल मँ विचरने वाली वर्षा काल की शोभा, मेघीय, भ्रकृतियो तथा रूप-रंगो, नदियों, करना, जलप्रेपातों तथा समुद्र काऽ १४ ॥. भ्रनु० २। सूु०२ भ्रथर्ववेद-भाष्य - १ ०१

English

nor Isana slays him who possesses this knowledge, or his cattle, or his kinsmen.

अध्याय १५

श्लोक 6.13

स प॑र॒मां दिश॒मनु॒ व्यऽचलत्

sa paramāṃ diśamanu vya'calat

हिन्दी अर्थ

सङ्खनी हुई २ शोभा को प्राप है, मानो परमेश्वर के संगर रहती हृ परानन्द सा भ्रनुभव कर रही । - ९।७।२५; १९।४९।८) + धूञ् (धारणे) । अर्थात् . गतियक्त-तथा-गोरूपी विव -. ते लक्ष्मीदच पलन्यौ" (यजु० ३१।२२) मे, जगत् की दोभा जाया है .उस जाया ने इस श्रस्मदादि जगत् या पुरुष मँ नानावरं भरे है। (गन्धवंस्य) जगद्धारक परमेश्वर के (नमसे) नत होने, भूकने के लिए (नमः) नमस्कार (कृण्मः) हमं करते ह, (भामाय) उस की ज्योति के लिए लिए (नमः) नमस्कार, करते ह। (विरवावसो) हि विर्व भे वसे हृए ! .

English

They made Isana the Archer his deliverer from all the inter- mediate regions. Isāna the

अध्याय १५

श्लोक 6.14

तमा॑हव॒नीय॑श्च॒ गार्ह॑पत्यश्च दक्षिणा॒ग्निश्च॑ य॒ज्ञश्च॒ यज॑मानश्च प॒शव॑श्चानु॒व्यऽचलन्

tamāhavanīyaśca gārhapatyaśca dakṣiṇāgniśca yajñaśca yajamānaśca paśavaścānuvya'calan

हिन्दी अर्थ

१०६ भरथव्विद-भाष्य - का० १४। भ्रवु० २।सु° कूलता । “जायाः परेहि वारा सृष्टयारम्भ मेँ जाया के प्रति परमेश्वर के गमन का कथन सुचित किंया है! जायाः से भ्रभिप्राय प्रकृति की उत्पादन भामाय भाम प्रभा = ज्योतिः 4 सष्टि की विराट-अ्वस्था मेँ चक्षुषे =परमेदवर को “सहस्नाक्ष'” कहौ है (यजु० ३१।१), क्योंकि भौर सब जीवो को कर्मानुसार फल देकर, उन के -सुधार के लिए, उन पर वि प्यति” (अथव० ३१।१४।२।१९) द्वारा प्रकट किया है । -

English

Archer, a deliverer, delivers him from all the intermediate regions. Neither Sarva nor Bhava,

अध्याय १५

श्लोक 6.15

आ॒ह॒व॒नीय॑स्य च॒ वै स गार्ह॑पत्यस्य च दक्षिणा॒ग्नेश्च॑ य॒ज्ञस्य॑ च॒ यज॑मानस्य च प॒शूनां च॑ प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑

āhavanīyasya ca vai sa gārhapatyasya ca dakṣiṇāgneśca yajñasya ca yajamānasya ca paśūnāṃ ca priyaṃ dhāma bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

गर्भाधान के समय पति-पत्नी, सारिविक. भावनाभ्ों के जागरण के स्मरण क॑रते हैँ । इसीलिये मन्त्र मँ “जाया परेहि" का वंन हृभराहै। करं, (गन्धवम्) जगद्धारक परमेदवर को (आ्आावीवृतामः) भपनी भ्रोर हम ने भ्रावतित किया है, भ्राकृष्ट किया है । (सः) वह (देवः) दाता (परमम) १. ““वह परमेश्वर प्रनाभ्रो की रक्षा के लिये देखता है, तथा “वह का० १४। भ्ननु०२। ०२ परथवचेद-मास्य १०७ राया र+ तृतोया विभक्ति का एकवचन । ररा (दाने) । घन का नाम “र है, चूंकि धन का सदुपयोगहैदा करना, नकि केवल स्वा्थ- साधन । दान हारा संब के मनो को सुखी तथा प्रसन्न करने का उपदेह जगद्धारक परमेदवर, दाता के एति श्राकृष्ट हो जातादहै। दानदेनेसे

English

nor Isana slays him who possesses this knowledge, or his cattle, or his kinsmen.

अध्याय १५

श्लोक 6.16

सोऽना॑दिष्टां॒ दिश॒मनु॒ व्यऽचलत्

so'nādiṣṭāṃ diśamanu vya'calat

हिन्दी अर्थ

परमेदवर देव है, दानी है “देवो राना" (नि० ७४।१५) उसका दिया संसार महादानंरूप है । परमेश्वर महागहस्थी है (मन्त्र १४।२.२५) । के महादान कर रहा है । परमेचवर के उदाहरण को संमुख रंख कर, हम दानी-गुहुस्थी बन कर, निज रायु को बढ़ाएं । सारिवक तथा सुखी गृहस्थ- जिस मेँ किं गृहवासी साथ-साथ मिलकर रहते है । परमदवर का “सस्घथ' हे होते वाली सन्तानं के (पितरौ) माता-पिता ! तुम दोनों (ऋत्विये) ऋतु-कमं के निमित्त (सं सृजेथाम्) संसगं करो, भ्रौर (रेतसः) रेतस् से. १. तेरे भ्रपर भी बयूलोकमे भी षर है" मरौर यष्टा भूमिपरभी। उत्पन्न होने वाली सन्तान के (माता, पिता, च) माता श्रौौर पिता (भवाथः) हो । (मयं हव) जंसे सवसाधारण पति (योषाम्) निज पत्नी को, वैसे

English

He went his way to the region of the nadir. Earth and Agni and herbs and trees and shrubs

अध्याय १५

श्लोक 6.17

तमृ॒तव॑श्चार्त॒वाश्च॒ लोका॑श्च लौ॒क्याश्च॒ मासा॑श्चार्धमा॒साश्चा॑होरा॒त्रे चा॑नु॒व्यऽचलन्

tamṛtavaścārtavāśca lokāśca laukyāśca māsāścārdhamāsāścāhorātre cānuvya'calan

हिन्दी अर्थ

व्यारगा -पत्नी ऋतुदरन पर, ऋतुकमं के निमित्त, पति-पत्नी को परस्पर संसग करना चाहिए, भ्रन्यथा नहीं । न पति-पत्नी को चाहिए कि वे माता-पिता बनने के लिथे परस्पर संसर्गं कर, केवल भोगेच्छा के लिये नहीं । सन्तानोत्पादन के लिये ही रेतस का उपयोग होना चाहिए । उत्पाद- नेच्छा न हति रेतस् की परिपुष्टि करने रलम चाह्गि, इसका दुरुपयोग न करना चाहिए । इस से शारीरिक पुष्टि भी होती है। ट जिस भे कि (मनुष्याः) पुरुष (बीजम्) बीजं (वपन्ति) नोते है (या) जो. (उराती) कामना वाली (नः) हमारे सिये(ऊरू) जाधों को (विश्रयाति) खोल देती है (उशन्तः) रौर कामना वाले हम पुरुष (यस्याम्) जिस मँ. (शेपः) पुरुषेन्रिय का (प्रहरेम). प्रहार करे । चाहिय । निबेल की सन्ताने निबेल होती ह ।. वीयं ग्रहण के लिये पत्नी को क्षिवस्वरूपा होना चाहिए, . उसे, शिवसंकल्पो .तथा शिवकमो की काण १४ । ्रनु° २। सू०२ मूति होना चाहिए । इस से सन्ताने मो िवसं क्यों तथा शिवकर्मौ वाली

English

and plants followed him. He who possesses this knowledge becomes the dear home of Earth

अध्याय १५

श्लोक 6.18

ऋ॒तू॒नां च॒ वै स आ॑र्त॒वानां॑ च॒ लोका॑नां च लौ॒क्यानां॑ च॒ मासा॑नां चार्धमा॒सानां॑ चाहोरा॒त्रयो॑श्च प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑

ṛtūnāṃ ca vai sa ārtavānāṃ ca lokānāṃ ca laukyānāṃ ca māsānāṃ cārdhamāsānāṃ cāhorātrayośca priyaṃ dhāma bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

जबदंस्तो नहीं चाहिए । सम्भोगं एक ही की कामना का परिणाम न होना चाहिए । दूसरे साथी की कामनाके बिना किया भोग बलात्कार है। पृथिवी तथां पौरुषशक्ति को बीज कहा है । पृथिवी मेँ बीजाधान, कोई भी. किसान, बिना प्रयोजन के नहीं करता । श्रपितु बीज को उत्तमता, भ्रौर पथिवी कौ उपजाऊ शक्ति, तथा ऋतु को इष्टिगत कर केही किसान बीजावाप करता है । गरहस्थधमं मे भी इन परिस्थितियों का विचार भ्रवर्य है".1 बीज बोनेकेत्र्णान से यह भ्रमिप्रायहै कि जिस पृथिवीं में किसान लोग बीजं बोते है । परन्तु विवाह प्रकरण में यह श्रभिप्रायदहै कि जिस बहुपति होने की भराशंका हो सके 1 मन्त्र १४।२।१४ मे नारो कौ “उवंरा' कहा है । उवंरा का भ्र्थं हौता है “उपजाऊभूमि'' इस से नारी-शक्तिया शाव्ति को भूमि तथा पृथिवी कहा गया है) इस से बीजावापकी दुष्टिसे पृथिवी कं गुण-षमौ का भ्रारोप नारी-शवित या जनित्री-शक्ति पर किया गयादहै। जैसे पृथिवी एक एकाद है वसे नारी-शक्तिया

English

mutandis.

अध्याय १५

श्लोक 6.19

सोऽना॑वृत्तां॒ दिश॒मनु॒ व्यचल॒त् ततो॒ नाव॒र्त्स्यन्न॑मन्यत

so'nāvṛttāṃ diśamanu vyacalat tato nāvartsyannamanyata

हिन्दी अर्थ

जनित्री-शक्तिभी एक पएकार्द-रूप है । पृथिवीरूप से पृथिवी एक एकाई भ्रपना बीजावाप कर दे। पृथिवी के एक सीमित निज रूक्ष में ही बीजा- धिकार प्राप्त नहीं कि वह जिस किसी नारी में पना बीजावाप भर्थात् वीर्यधिान कर सके । इसे भी एक सीमित या नियत नारी-क्षेत्र मेही बीजावाप करने का भ्रधिकार, विवाहं विधि द्वारा, प्राप्त है । इस टियिं "नारीः" मेँ एकः वचन तथा “मनुष्याः, वपन्ति, उशन्तः" ११० श्रथव्रवेद-माष्य का० १४। भ्नुर २ । सू०२ मे बहुवचनं के होते मौ मन्तं द्वारा एक पत्नी के बहुपति होने की आचङ्का न करनी चाहिए । रःय ही यह् भी जानना चाहिए कि दम्पती के सम्बन्ध चक्रवाकेन दम्पती ) । यह कविप्रसिद्ध बात है कि चकवा-चकवी म, एक तुम दोनों की (प्रायः) श्राय को (दीषंम्) दीं (कृणोतु) करे । उपधान =

English

Agni and herbs and trees and shrubs and plants.

अध्याय १५

श्लोक 6.20

तं दिति॒श्चादि॑ति॒श्चेडा॑ चेन्द्रा॒णी चानु॒व्यऽचलन्

taṃ ditiścāditiśceḍā cendrāṇī cānuvya'calan

हिन्दी अर्थ

(द्विपदे) दुपाए रथात् मनुष्य जाति के लिए, (चतुष्पदे) चौपाए परयो के ब्राह्मविवाह चारपाई के राक्षस (देवः) कन्यापक्च के व्यवहार कुशल पुरषो ने, (मनुना) कन्या के (वाधूयम्, वासः). वधू कौ इच्छा वले वर का वस्र या वधू के सहवास करता है । देवैः दिव् क्रीडा विजिगीषा व्यवहार “““¶ । क्री अनुमति से हौना चाहिए । - ११२ मरथववेद-भाष्य का० १४ । भ्रनु०२।सू०२ कन्यका पिता मृनु भ्र्थात् मननलील होना चाहिए. ताकि वह सब . बातो का विचार कर भ्रपनी योग्य कन्या का विवाह योग्य वर के साथ भादरं विवाहं ब्रह्मा-पदवी के ज्ञानी वर, तथा सुयोग्य विदुषी. का होतादहै। ब्रह्मा पदवी उसे मिलती है जोकि चारो वेदों का विदान् हो । एसे विद्वानु तथा विदुपी का जब परस्पर विवाह होता है तब उनके गहस्थ-जोवन मे राश्चशों का प्रवेश नहीं होने पाता । भ्रनुचित.कामुकता से

English

followed him. He who possesses this knowledge becomes, etc., as in verse 1. mutatis

अध्याय १५

श्लोक 6.21

दिते॑श्च॒ वै सोऽदि॑ते॒श्चेडा॑याश्चेन्द्रा॒ण्याश्च॑ प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑

diteśca vai so'diteśceḍāyāścendrāṇyāśca priyaṃ dhāma bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

ज। सकती है । एेसे व्यक्ति गृहम्थ-धमं के पालन फे लिए चारपाई पर हौ कर नहीं । कन्या का पिता, जब योग्य ग्रौर संयमी वर के साथ श्रपनी कन्या का विवाह करता है, तब् वह् ही मानों चारपाई के राक्षसीं के हननं भँ सहायता है रहा होता है । चिकितुषे भ्रथवा चारपाई के राक्षसो के मनु; मन्त्र १४२।४१ दिया करते ह, उसे (बृहस्पति) बृहती वेदवाणी क ब्रह्यापदवी वाले के लिए (दत्त). प्रदान करो । (बृहस्पति वे देवानां पुरोहितः (एे० ब्रा ८।२६) । भर्थात् दोनों का व्याख्या-वेदिक विवाह मेँ पुरोहित है विवाह कराने वाला, तथा

English

mutandis.

अध्याय १५

श्लोक 6.22

स दिशोऽनु॒ व्यऽचलत्

sa diśo'nu vya'calat

हिन्दी अर्थ

सम्राट् । विवाह राजकीय-नियभों के भ्रनुसार होना चाहिए, पुरोहित उन निम्रमों कं भ्रनुसार विवाह कराए वर भ्रौर वघू में विवाह के लिए परस्पर सशो क विवाह, राजकीय व्यवस्था द्वारा नियन्वित होने चाहिय ॥ , धर से वृधघ्यमानौ) जागकर(हसामुदौ)हंसते-मौ र-प्रमुदित होते हुए, (महसा) (विभातीः) विविष रगौ से चमक्ीली (उषसः) उषाभ्रो के (तराथः)पार होया करो, (जवौ) इस प्रकार दींजीवी होभ्रौ । 1 ् व्याद्या--गह जवन को सुखी बनने के लिए घर मेः उत्तम गौरं उषाका्लों मेँ प्रतिदिन,--उषाकाल के प्रारम्म से उषाकाल की समाप्ति परयन्त-श्रमण कंरना चाहिए । इस से पति-पत्नी दीषंजीवी होते ह । ११४ भ्रथरवंवेद-भाष्य.. का० १४। भनु० २। सु०२ लगा.करःया यज्ञ के कारण प्रिय, (सुवासाः) वस्त्रो वारा सुशोभित

English

He went away to the last region. Richas, Sāmans Yajus formulas and Devotion followed him.

अध्याय १५

श्लोक 6.23

तं वि॒राडनु॒ व्यऽचल॒त् सर्वे॑ च दे॒वाः सर्वा॑श्च दे॒वताः॑

taṃ virāḍanu vya'calat sarve ca devāḥ sarvāśca devatāḥ

हिन्दी अर्थ

(विभातीः) विविध वणौँ मँ चमकती हुई (उषसः) उषा्रो को लक्षय कर के (भगामु) ्रमणाथं गया हू, रौर विरवस्मात्) सब (एनसः) दुःखप्रद- व्याख्या- गहस्थी को, उषा के काल मेँ रमण के लाभ पर विवास दिलाने के लिए, भ॑नुभरूत घटना के.रूप मेँ वंन मन्व मे हुभरा है । उषा कं चाहिए, जो कि सुगन्ध द्वारां सुवासित होने चाहिए । इस भ्रमण वारा शुद्ध वायु के सेवन; तथा उषा की नानावर्णी शोभा. से, प्राण वायु तथा (च्ावापुथिवी) द्युलोक भ्रौर पृथिवीलोक (शुम्भनी) शोभायमान है . ये महाव्रती है, (सप्त) सात (भरः) जल या प्राण देवीः) दिव्यगुणो से सम्पन्न हृए (सुस्.वुः) प्रवाहित! हए है, (ताः) वे (नः) हमें (भअ हसः) प्रद रोगो से (मृन्चन्तु) छंडा दे । । १, इन्द्रियो कोभ ललोत कहा है। यथां ““ज्लोतांसिं सर्वाणि भयावहानि"

English

He who, etc., as above.

अध्याय १५

श्लोक 6.24

वि॒राज॑श्च॒ वै स सर्वे॑षां च दे॒वानां॒ सर्वा॑सां च दे॒वतानां प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑

virājaśca vai sa sarveṣāṃ ca devānāṃ sarvāsāṃ ca devatānāṃ priyaṃ dhāma bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

का० १४। अनु०२। सुर भ्रथवंवेद-भाष्य ११५ का रस. जोकि पाचन मेँ सहायकं होता है। 2107028 =ट्खोमग्रन्थि । को व्याप्त कयि हुए है, इस लिये भ्रापः ह भ्रमण में प्रकृति से.शिक्षाग्रहण भी करनी चाहिए । रमण मं यह भी भ्रनुभव करना चाहिए किं चुलोक तथा पुथिवी लोक श्रपने व्रतो के पालन मेँ किंतने इद् ह, जिससे कि दिन-रात, तथा. उषाकाल भ्रादि निथम- पूवक होते रहते हैँ । इन महात्रतियौ वारा हमे अपने व्रतो के पालने उषा कालम भ्रमण द्वारा शारीरिक सातद्रव भी दिव्यगुणौसे होती है । भ्रापः का भ्रथं प्राण मी होता है ) यथा “आपो वे प्राणाः" (रत० १।२।३१३) । हन प्राणो क्रो शुद्धि मी उषा काल में रमया दवारा होती है । ११६ भरयर्गवेद-माष्य का७ १४1 भ्नु० २।सु०२

English

He went away to the great region. Itihāsa and Purāna and

अध्याय १५

श्लोक 6.25

स सर्वा॑नन्तर्दे॒शाननु॒ व्यऽचलत्

sa sarvānantardeśānanu vya'calat

हिन्दी अर्थ

भ्रमण में पारस्परिक नमस्कार ११०. सूर्यायै देवेभ्यो भरित्राय वरूणाय च । ये मतस्य भचैतसस्तेभ्यं इदम॑करं नम॑ः ॥४६॥ विद्वानों तथा +'ता-पिता-्राचा्ं श्रादि देवों कौ, (मित्राय) मिर््रोको, देवेभ्यः = विद्रासो वै देवाः 1 तथा मातुदेवो भव, पितृदेवो भव, ग्राचायदेवो भव (तत्ति° उप० १।०३) - के (ऋतेचित्)विना भी (संधिम्)शरीर के जोड़ो को (संघाता) जोडने वाला शारीर के कुटिल तथा टूटे-फूटे, भङ्ग को (पूनः) फिर (निष्कर्ता) ठीक कर , देता है । निष्कर्ता यथा “निष्कृण्वाना आयुघानि" ॐ ५४५ १२।१।७); कहते हैँ कि ६ सप्ताह के गभं मे नासिका; मुख, भाखों भौर कानोँकेदटिद्र बन जाते हैँ दूसरे महीने मलद्वार का चिन्ह दिखाई देने लगता है । तीसरे

English

Gāthās and Nārāsansis followed him. He who, etc.

अध्याय १५

श्लोक 6.26

तं प्र॒जाप॑तिश्च परमे॒ष्ठी च॑ पि॒ता च॑ पिताम॒हश्चा॑नु॒व्यऽचलन्

taṃ prajāpatiśca parameṣṭhī ca pitā ca pitāmahaścānuvya'calan

हिन्दी अर्थ

निदिष्ट किया है,--तथा भन्य करई भस्थिर्यो का विकास हौता है (“हमारे शरीर की रचना", भाग २) 1 क व्याख्या परमेरवर की स्तुति किस प्रकार करनी चाहिए इस का हमारे शरी तै, इन्द्रियो, तथा हदिड्यो ्रादि का निर्माण करने वाला परमेदवर है । उसने ही हमे जीवन प्रदान कियाहै। उसकारीगरनेही . हमारे शरीरो के भ्रवय्वों को तथा संधियोँको परस्पर जोड़ा है । वह मघवा है, पेष्वर्यवान् है, महाधनी है । संसार को वसाने वाला तथा संसार मे वसा हुम्ना है! शरोर कै रोगो तथा दूट-फूट को वही पुनः ठीक करता (पृषातकों) बिन्वु सदृश घर््बो वाली या बाण के सदु दुःख दायिका -एकरस परमेष्वर मेँ (भ्रा सजामि). भ्रासक्त करत ह सौपता हं । । उच्तु == उच्छी विवासे, निवास पृथक् करना, विगरत करना पृषातक्ोभ=पृषतक = वश, तीर' तद्वत दुःखदायिकाः प्रकृति । पृषत्क का (क) तामसिक-कमम, जिन्हँ किं मन्व में “नीलम्' कहा है । तथा (ख)

English

Sacrifice, and Sacrificer, and sacrificial victims followed him. He who, etc.

अध्याय १५

श्लोक 6.26-2

प्र॒जाप॑तेश्च॒ वै प॑रमे॒ष्ठिन॑श्च पि॒तुश्च॑ पिताम॒हस्य॑ च प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑

prajāpateśca vai parameṣṭhinaśca pituśca pitāmahasya ca priyaṃ dhāma bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

कमं जिनमें किं तमोगुण भ्रौर रजोगुण. भिश्चित रहते है, एसे कर्मो का के लिए रजोगुण को लोहित, सत्त्वगुण को शुक्ल, अ्रौर तमोगुण को कष्ण कहा है । यथा--“अनामेकां लोहित शुक्लृष्णाम्”' (श्वेता०' उप ४।५) ।. भथ है रिऽ एर0फपि (्राष्टे), लालभिधित भूरा रग। १.. “पृषोदर भरादि की तरह साघु । “पूषातकी” का यह भयं भी हो सकता भातंकमय तथा कृष्ुजीवी करने वाली प्रकृति । पृष् (सेचने) + भातंकमयी (तकिं "876 15 ए्ा1805 16 लि216 प60०४० भर्थात् श्चायद यहं भूतप्रेत का० १४ । भ्रनुऽ२ १ सुऽ२ श्रथववेद-भाष्य ११९

English

Sacrifice, and Sacrificer, and sacrificial victims followed him. He who, etc.

अध्याय १५

श्लोक 7.1

१-५ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ त्रिपदा निचृद् गायत्री; २ एकपदा विराड् बृहती; ३ विराडुष्णिक्; ४ एकपदा गायत्री; ५ पङ्क्तिः।स म॑हि॒मा सद्रु॑र्भू॒त्वान्तं॑ पृथि॒व्या अ॑गच्छ॒त् स स॑मु॒द्रोऽभवत्

1-5 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 tripadā nicṛd gāyatrī; 2 ekapadā virāḍ bṛhatī; 3 virāḍuṣṇik; 4 ekapadā gāyatrī; 5 paṅktiḥ| sa mahimā sadrurbhūtvāntaṃ pṛthivyā agacchat sa samudro'bhavat

हिन्दी अर्थ

पयः = दूष उत्तम नस्ल कौ गौग्रोंमेदूधकी मात्रा कम नहीं होती करे । यहं वधू को पयोदीक्षा है । (बृहस्पतिना “, श्रधारयनु), पू॑वत् । (गोषु) सूयं की किरणों मे के साथ इस वधू का हुम संसगं करते । पयप्केदो प्रथं हैः दूष अ्रौर जल । सूर्यं को किरणो को गाव कहा है । यथा “ता वां वासतुुदमति गामध्ये यत्र गावो सरिशुङ्गो यासः" (ऋ० १।१५४।६)» भर्थात् है पति-पत्नी ! तुम्हारे लिये हम एेसे घर चाहते

English

Parameshthin and the Father and the Great Father followed him. He who possesses this

अध्याय १५

श्लोक 7.2

तं प्र॒जाप॑तिश्च परमे॒ष्ठी च॑ पि॒ता च॑ पिताम॒हश्चाप॑श्च श्र॒द्धा च॑ व॒र्षं भू॒त्वानु॒व्यऽवर्तयन्त

taṃ prajāpatiśca parameṣṭhī ca pitā ca pitāmahaścāpaśca śraddhā ca varṣaṃ bhūtvānuvya'vartayanta

हिन्दी अर्थ

, “भुरिु्खाः गावः” द्वारा प्रज्वलितं सौर-रदिमयों का ग्रहण है (निर० सौर-रदिमर्यो का पेय-जल कै साय सम्बन्ध है । वधू को पयोदीक्षा देते हुए . यह निदिष्ट क्रिया है कि इस ववने भी गरुृस्थ के लिये रोगनिवारक पेय- को यक्ष्मा-रोग का. निवारकं कहा है । इससे पूरं के मन्त्र ३।१२।९ मेँ लाने का भ्रादेश् दिया है । घृतम् उदकनाम (निषं° ११२) । भौर “दमा श्राप" द्वारा वह् जल का श्राहुरण करती है। का० १४ 1 भ्रनु°० २। सू० २ भरथवेवेद-माष्य १२७ के साथ इस कन्या वध् का हम संसगं करते है। होता है, वसे तेरा स्वाभाविक दूष भी मधुर भावनाश्रं तथा मधुरस्वाद से सम्पन्न होना चाहिए । जसे कहा है कि- “अधुरं गवां दया; । इस

English

knowledge becomes the beloved home of Prajāpati and Parameshthin and the Father and the

अध्याय १५

श्लोक 7.3

ऐन॒मापो॑ गच्छ॒त्यैनं॑ श्र॒द्धा ग॑च्छ॒त्यैनं॑ व॒र्षं ग॑च्छति॒ य ए॒वं वेद॑

ainamāpo gacchatyainaṃ śraddhā gacchatyainaṃ varṣaṃ gacchati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

(रसः) नानारस (प्र विष्टः) प्रविष्ट ह, (तेन-“ ) उन नानाविध ररसोके साथ! इस कन्या का हम ससग करते है । गोषु गौः. पृथिवी नाम (निघं० १।१) । पृथिवी तीन प्रकारकीहै उपज की इष्टि से। यथा “मा यास्तिज्लः पुथिवीरतातसतां ह भूमिरतमा"” पृथिवियां ह, उन मे जो भ्रूमि भ्रच्छी उपजाऊ है, .वह उत्तम है तीन हस द्वारा विवादित कन्या.को उपदेश दिया है कि पुथिवो जैसे नाना भ्रकार के रसीले पदार्थो का पाकं किया करना, तथा ओषधिभ्रौर परलोके नाना है चिन दवारा अल वाष्पीभरुत हो कर वर्बाह्प भे बरखता है ।

English

Great Father.

अध्याय १५

श्लोक 7.4

तं श्र॒द्धा च॑ य॒ज्ञश्च॑ लो॒कश्चान्नं॑ चा॒न्नाद्यं॑ च भू॒त्वाभि॑प॒र्याव॑र्तन्त

taṃ śraddhā ca yajñaśca lokaścānnaṃ cānnādyaṃ ca bhūtvābhiparyāvartanta

हिन्दी अर्थ

१२८ भ्रथववेद-भाष्य का० १४ । श्रनु० २। सु०र हे वधु ! तेरे (ग्रहे). घर में (समनतिषुः) .इकट्टी हो कर-रोर्ई-पोटी हैँ ६।३।११) 1 समनतिषुः= नृती गात्रविक्षपे । दुःख के कारण भङ्गो का ईइधर- परन्तु बालकों, बालिका््रो, तथा यवो की मृत्युएं-किन्हीं पापों के नियमों को भावना नहीं 1 भ्रसामयिक मत्युए वतंमान तथा पवंजन्मो के संचित पापों के भीपरिणाम हो सकती है, तथा माता-पिता भ्रौर समाज कष्टों से बचने के लिये मनुष्यो को चाहिए कि वे पापकर्मो के करनेसे मृत्युश्नों तथा कष्टों के प्राकृतिक. कारण भी होते हैँ । यथा वायु, की स्थापना, उस मे देनिकं तथा भरन्यं ऋतु के भ्रनुकरल यज्ञो का करना,

English

He, having become moving majesty, went to the ends of the earth. He became the sea.

अध्याय १५

श्लोक 7.5

ऐनं॑ श्र॒द्धा ग॑च्छत्यैनं य॒ज्ञो ग॑च्छ॒त्यैनं॑ लो॒को ग॑च्छ॒त्यैन॒मन्नं॑ गच्छ॒त्यैन॑म॒न्नाद्यं॑ गच्छति॒ य ए॒वं वेद॑

ainaṃ śraddhā gacchatyainaṃ yajño gacchatyainaṃ loko gacchatyainamannaṃ gacchatyainamannādyaṃ gacchati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

तरथा गृहो मेँ सूर्यं के प्रकाच्च का होना,-दीघं जोवन के लिये भ्रावदयक है । का० १४। भरनु० २1 सुऽ२ भ्रथर्वंवेद-माष्य १२९ है किकेर्थोका शिर्यो पर रखना स्वियौ के लिए भरोवद्यक है) निकट इकट्ञ होना, भ्रौर स्वामाविक रोकं से प्रेरित होकर उन का रोना- यह भी परस्पर अ्रनुराग का स्वाभाविक परिणामदहै, जिसका कि मन्त हे वधु ! (यदि) यदि (इयम्) यह (तव) तेरी (दुहिता) पत्री घर मे, (विकेगी) केच व्रिखेर कर (अरुदत्) रोई है, तो (तस्मात्) उस विकेशी = दुःख भौरं श्रापत्ति के समय, . ग्रहस्य जीवनोपयोगी

English

Prajāpati and Parameshthin and the Father and the Great Father and the Waters and Faith,

अध्याय १५

श्लोक 8.1

१-३ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ साम्नी उष्णिक्, २ प्राजापत्याऽनुष्टुप्, ३ आर्ची पङ्क्तिः।सोऽरज्यत॒ ततो॑ राज॒न्योऽजायत

1-3 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 sāmnī uṣṇik, 2 prājāpatyā'nuṣṭup, 3 ārcī paṅktiḥ| so'rajyata tato rājanyo'jāyata

हिन्दी अर्थ

समयमे दृहिताके शृङ्गार के रभाव को विकैशौ पद द्वारा सूचित किया , हई (ते) है वधु ! तेरे (गृहे) घर मेँ (समनतिषुः) रोर्ह-पीटी है, (तस्मात्) उस (एनसः) मृत्यु के कारणोभूत पापस (ग्रमः) रग्नि (च) श्रौर १३० भ्रथवेवेद-माष्य का० १४। भ्रनु० २। सु०२ वधू के किसी निकट सम्बन्धी की मृत्यु के.भवसर पर, जाति-बिरा- दरी तथा परिचित वृद्धा तथा युवती स्त्रियों का, शोक प्रकट करने के लिये भ्राना, यहां सूचित किया है। भ्रसायमिक मृत्यु या रोगो से बचाव. १९९. यह तं मनाया षु द॑ गृहे निष्ठितमविरषं कतम् !

English

turned into rain, followed him.

अध्याय १५

श्लोक 8.2

स विशः॒ सब॑न्धू॒नन्न॑म॒न्नाद्य॑म॒भ्युद॑तिष्ठत्

sa viśaḥ sabandhūnannamannādyamabhyudatiṣṭhat

हिन्दी अर्थ

सूय । उदीयमान तथा भ्रस्तकाल के सूयं कां प्रकाश रोगजनक क्रिमियों सूयं रदिमयो द्वारा क्रिमियों का हनन करे" । एेसे सूयं का प्रकाश जब धरो मँ चमके तब घर के रोगजनक क्रिमि्यो के हनंन हो जाने के कारण रोग भौर रोग द्वारा. होने वाली मृत्युए नहीं होती । साथ ही भनग्निर्मे होता रहता है । रोग-क्रिमियो के लिए देखो (भ्रथवं० २।३१, ३२,.३३, “सयं रदिमि चिकित्सा" हारा थी रोगौ को हनन होता है । “कष्य १. वीवहेश भौर विवृष्टामसिभें भवि" उपसग पौर +. धातु का प्रयोब.है। . । वह का भं है,- उदयम् । प्रौर वि वृह, का भरथः है उ्म-रहित करना । रोगौ -को उदचम-रहित या निषवेष्ट करने का भरभिप्राय. है, अन्द शक्तिरहित फर छन का का० १४। भनु २ 1 सू°२ भ्रथर्गवेद-माष्य १३ १

English

The Waters, Faith, and rain approach him who possesses this knowledge.

अध्याय १५

श्लोक 8.3

वि॒शां च॒ वै स सब॑न्धूनां॒ चान्न॑स्य चा॒न्नाद्य॑स्य च प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑

viśāṃ ca vai sa sabandhūnāṃ cānnasya cānnādyasya ca priyaṃ dhāma bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

के यक्म.रोग के हनन का भो विघान किया है । कदयप=सुयं । “करययस्य ज्योतिवा वर्चला च" (प्रथं ० १७।२७) । वीवहं = रदिमसमूह १२७ शयं क पूट्यान्यावपन्तिका । (भ्रा वपन्तिका) श्राहृतियां देती हुई (उपब्रूते) कहती है कि (मे) मेरा पूल्यानि = पंजाब मे फुल्लियां बोलते है । पारस्कर गरह्यसूौ मे पूल्यानि के स्थान में “लाजान्” पठित है । मथा “दयं नापुंप अते लाना- मे लाजाभ्रो को लले. तथा पंजाबी भें पुल्लियां कहते है । ये भने हए ब्रोदि-भर्थात् धान होते . है । मरयुकंद मँ लीलौ को पथ्य-मोजन माना है।.. व्रीहियवौ (अथव ० ११।४।१३) । तथा ब्रीहि भ्रौर यव के सेवन से यम रोग का विनाद्य होता है । यथा “शिवौ ते स्ता व्रीहियवावबलासावदोमषौ । होता है किं वीव सम्भवतः सूयं की ददिम्यां हो, जो किःरोरगो को निदधभ-कर . १. ्ीहि (जाल). भौर यव ्) बल का निरसन महीं करते, प्रौर भ्रव -भरथात् खाने भे मनुर ते -है। थे. दोनों यक्मरोन के होने ड बाघ होते ह, ये

English

Faith, and Sacrifice and the world, having become food and nourishment, turned toward him.

अध्याय १५

श्लोक 9.1

१-३ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ आसुरी जगती, २ आर्ची गायत्री, ३ आर्ची पङ्क्तिः।स विशोऽनु॒ व्यऽचलत्

1-3 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ|1 āsurī jagatī, 2 ārcī gāyatrī, 3 ārcī paṅktiḥ| sa viśo'nu vya'calat

हिन्दी अर्थ

श्र . अथर्ववेद-भाष्य का० १४। भ्ननु० २।सू०२ १२८. शहेमविनदर सं लद चक्रवाकेव दम्प॑ती । पति-पत्नी को (इह) इस गृहस्थाश्रम में (सं नुद) इकट्ठे रहने, एक-दूसरे चक्रवाकौ, इव) चकवा-चकवी पक्षियों जोड़े के सदुश है । (एनौ) .. दृह नहीं रह सकता । विषय वासना ध्रादि कारण इस सम्बन्ध को चिथिल करदे, यदि राजदण्ड का मय इसमें बाधक नहो । इस उदेश्य से मन्त्रम. दुढृ-बद्ध रहने मे, लिया गया है ।

English

Faith Sacrifice, the world, food and nourishment approach him who possesses this

अध्याय १५

श्लोक 9.2

तं स॒भा च॒ समि॑तिश्च॒ सेना॑ च॒ शुरा॑ चानु॒व्यऽचलन्

taṃ sabhā ca samitiśca senā ca śurā cānuvya'calan

हिन्दी अर्थ

करने के लिए, मन्त्र मे, चकवा-चकवी को भ्ादशंरूप में पे कियागया है, एककी मृत्यु हो जने पर दसरा, किसी अरन्य नर-मादाके साथ , सम्बन्ध नहीं रखता, श्रौर दोनों के जीवित रहते इन का पारस्परिक चर- तथा एक-पतिव्रत का नियम सुदृढ होना चाद्ये । ॥ । पति-पत्नी का गृह सूना . है यदि उन की कोई.सन्तान नदीं । परन्तु कंसी-वसी भी सन्तान. गृहजीवन के सूनेपन कों दुरं नहीं कर सकतीः । का० १४। श्रनु० २।सू०२ अथववेद-भाष्य १३३ का वास नहीं । वेदिक गृहस्थ का उदर्य उत्तम सन्तानं है । गहस्थ लोवन मे संयम काभी उचित ध्यानं होना चाये । गृहस्थ जीवन अधिकार प्राप्त लम्पटता कां जीवन नहीं । उचित श्रौर विहित संयम के रहते ही पति-पत्नी के दीर्घायु पर, भोग के कारण, कोई भनुचित , प्रभाव नहीं. पडंतां । परिणामलरूप में इन दोर्नो की भ्रायु १०० वर्षों तक की होनी श्रधिक सम्भावितहो जातीहै।

English

knowledge.

अध्याय १५

श्लोक 9.3

स॒भाया॑श्च॒ वै स समि॑तेश्च॒ सेना॑याश्च॒ सुरा॑याश्च॒ प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑

sabhāyāśca vai sa samiteśca senāyāśca surāyāśca priyaṃ dhāma bhavati ya evaṃ veda

हिन्दी अर्थ

तकियों तथा गहियों पर, (उपवासने) उपवास क्रत को भवस्थार्मे,या (वासने, उप) बसे घर मेँ उपस्थित वस्तु पर (यत्) जो मलिनता का कृत्य (कृतम्) कर दिया गया है उसे, तथा (विवाहे) विवाहकाल मे " उन उन वस्तु को उन के नियत स्थानों मँ हम रख छांट भरं का भी वाचक है । विवाह काल मेँ सन्नी भादि के काटने, तथा न्य कारणो से मल एकत्रित हो जाता है, तथा विवाहेतर कालम भी षर. .. की वस्तुर्रों पर मल चढ़. जातां है, उरे जल हारा धोकरभ्रौरधुद्धकर ततु संमखस्य कर्बठे मृज्महे दुरितं वयम् ॥९६॥ १३४ ग्रथर्गवेद-भाष्य का० १४। भ्रनु० २। सू०२ कालम वरकेधर में, जो (दुष्कृतम्) धरको. दूषित करने वाला (यद्) तथा जो (शमलम्) शान्ति को भंग करने वाला मल एकत्रित हौ गया है, (च) भ्रौर (वहतौ) प्रयाणकाल में रथ मे स्थित वधू के धर

English

He who possesses this knowledge becomes the dear home of the people, kinsmen, food and

अध्याय १५

श्लोक 10.1

१-११ अथर्वा।अध्यात्मं, व्रात्यः।१ द्विपदा साम्नी बृहती, २ त्रिपदाऽर्ची पङ्क्तिः, ३ द्विपदा प्राजापत्या पङ्क्तिः, ४ त्रिपदा वर्धमाना गायत्री, ५ त्रिपदा साम्नी बृहती, ६,८,१० द्विपदा आसुरी गायत्री, ७, ९ साम्नी उष्णिक्, ११ आसुरी बृहती।तद् यस्यै॒वं वि॒द्वान् व्रात्यो॒ राज्ञोऽति॑थिर्गृ॒हाना॒गच्छे॑त्

1-11 atharvā| adhyātmaṃ, vrātyaḥ| 1 dvipadā sāmnī bṛhatī, 2 tripadā'rcī paṅktiḥ, 3 dvipadā prājāpatyā paṅktiḥ, 4 tripadā vardhamānā gāyatrī, 5 tripadā sāmnī bṛhatī, 6,8,10 dvipadā āsurī gāyatrī, 7, 9 sāmnī uṣṇik, 11 āsurī bṛhatī| tad yasyaivaṃ vidvān vrātyo rājño'tithirgṛhānāgacchet

हिन्दी अर्थ

बुरे परिणामों अर्थात रोगों -को पदा करता है-(तत्) उसे (वयम्) हम दोनों धरो के लोग! (कम्बले) जल मे (मृज्महे) घो डालते है, जल द्वारा शुद्ध कर देते है। दामलम्-10एा (आप्टे) । वहतौ = वहतु का अथं है, रथ । “रथस्य बुरे परिणामो ्र्थात् रोगौ को परेदा करने वाले (मलम्) मल कौ (कम्बले ) जल मेँ (सादयित्वा) स्थापित कर कै (वयम्) हम गृहवासी (यज्ञियाः) हम गृहवासियों कौ (आयुः) प्राय को (तारिषत्) बढाए । वर्णन मन्त्र ६६ मँहोचुा है । वरकेषरकी शुद्धि का पुनः वणन इस लिथेहृम्राहै फ विवराहके पश्वात् वधूने वरके घर रहना! भरतः उस का० १४। भनु० २1 सु०२ प्रथववेद-भाष्य १३५ अपास्याः केदयं मङमपं श्ीषै्यंखिखात् ।६८॥

English

nourishment.

अध्याय १५

श्लोक 10.2

श्रेयां॑समेनमा॒त्मनो॑ मानये॒त् तथा॑ क्ष॒त्राय॒ ना वृ॑श्चते॒ तथा॑ रा॒ष्ट्राय॒ ना वृ॑श्चते

śreyāṃsamenamātmano mānayet tathā kṣatrāya nā vṛścate tathā rāṣṭrāya nā vṛścate

हिन्दी अर्थ

१२८ म्रथववेद-भाष्य का० १४। श्रनु० २। सू०२ रिक बन्धन के रहते भी यदि सन्तान नहीं हुई, ब्रौर इस से यदि पतिमें प्रजाका होना, पारस्परिक बन्धन मे विशेष कारय है। ताविह सं भवाव भरनःम। ज॑नयावहै .॥४५१॥ (दौः) ययलोकरूप हूं, है पत्नि ! (त्वमु) तू (पृथिवी) पृथिवीरूप है । (तौ) वे हम दोनों (इह) इस गृहस्थ जीवन मे (सं भवाव) परस्पर -की भूमिका के उपासना विषय मँ “प्रमः'” का भ्रथं महषि दयानन्द ने “ज्ञान भ्नोर राग-रागिनी का परस्पर सम्बन्ध होता है। एक गीत कद रागोंमभेंगायाजा

English

Assembly, Army, and Wine.

अध्याय १५

श्लोक 10.3

अतो॒ वै ब्रह्म॑ च क्ष॒त्रं चोद॑तिष्ठतां॒ ते अ॑ब्रूतां॒ कं प्र वि॑शा॒वेति॑

ato vai brahma ca kṣatraṃ codatiṣṭhatāṃ te abrūtāṃ kaṃ pra viśāveti

हिन्दी अर्थ

का० १४।शअरनु०२।सु.२ भरथववंवेद-भाष्य १३६ उत्पत्ति मेँ उपादान कारणरूप है । दयौः भौर पृथिवी के रूपक मेँ एक श्नौर बात भो सुचितिकोहै। द्यौः 09६९९ शक्ति का प्राधार है, भ्रौर पृथिवी ब्दो दवारा सूचित किमा है । यभा “स मिथुनमुत्पादयते, रयिं च प्राणं च, माः (प्रदन° उप० १।४।५) । इसी लिये मन्व (१४।१।२३,२४) मेँ पति प्रौर पत्नी को सूयं भौर चन्द्रमा केरूपसे भी वशित किया। अरिष्टासु सचेवहि ब्रहते वाजसातये ॥७२॥ है । भ्रौर विवाहित हो जाने पर (सुदानवः) उत्तम-दानी हौ कर, का विनाच्च नकरते हए हम दोनों (बृहते, वाजसातये) महा-बल की

English

Honour him as superior to himself. So he Both not act against the interests of his princely

अध्याय १५

श्लोक 10.4

अतो॒ वै बृह॒स्पति॑मे॒व ब्रह्म॒ प्रा वि॑श॒त्विन्द्रं॑ क्ष॒त्रं तथा॒ वा इति॑

ato vai bṛhaspatimeva brahma prā viśatvindraṃ kṣatraṃ tathā vā iti

हिन्दी अर्थ

१८० भ्रयवंवेद-माष्य का १४। भ्रनु० २! सू०र् जनियन्ति-जन-। कच् (इच्छा) जन-=स््रीजन, तथा पुरुषजन । “प्रविरेषेण मिथुनाः पूत्रा दायादाः'' (निर० ३।१।३) में “मिथुनाः पुत्रा लिए मनु ने पञ्चमहायज्ञा का विधान किया ह+ विना दानं भावना के, है । इसी से सबं प्रारियों की वंरपरम्पराए. भ्रनादिकाल से चल करते हँ । वैदिक दुष्टि में पूत्रषणा पितृ-ऋर चुक्ाने के लिए है । पितु- ऋण सामाजिक ऋण है। समाज को उत्तम सन्ताने समर्पित कर पितु- ऋण चुकाया जा सकता है । वैदिक गृहुस्थी का धन-देदवर्यं भी समाजोपकार के लिये है, केवल निज-मोग के लिये नहीं ॥ पंचमहाय्ञो का दंनिक भ्नुष्ठान वेदिक गरहस्थी

English

rank or his kingdom.

अध्याय १५

श्लोक 10.5

अतो॒ वै बृह॒स्पति॑मे॒व ब्रह्म॒ प्रावि॑श॒दिन्द्रं॑ क्ष॒त्रम्

ato vai bṛhaspatimeva brahma prāviśadindraṃ kṣatram

हिन्दी अर्थ

इसी लिये वैदिक पति-पत्नी मनर मेँ कहते है कि हम दोनों भ्रन्नदान के लि परस्पर-संगी बने रँ (बृहते वाजसातये सचेवहि) । मन्तरं मे “श्ररिष्टासू पद पति-पत्नी का विशेषण है । इस विशेषर दवारा वे संकल्प करते हं कि गृहुस्थ-धमं का पालन करते हुए भी हम दोनों काऽ १४। श्रनु० र सु० र भ्रथर्गवेद-भाष्य १४१ की प्राणशाक्ति का विनाश न. हो । गभेपात की विधियां, या गभभविरौघ की विधियां प्रारविनाश की विधियां हैँ । वैदिक दृष्टिमें संयम भ्रौर ब्रह्मचयं ही एेसो विधिदहैजौ कि गभंविरोध की सर्वोत्तिम.विधि है, जिसके स्वस्थ रहते हँ । इसलिये भो मन्व मे “बहते वाजसातये" पद पटित ह इन करा भथ है “महाबलप्राप्ति" के लिये हम दोनों परस्पर-संगी बने रहें । (ये) जो (पितरः) बुजुग (वध् दर्घाः) वधु के दशंन के निमित्त भ्राने का वर्णन हृभ्रादहै। वे रथ पर बेठ कर विवाहगरहु से चल कर, पति- गृह को पहुंचे है । उस समय वरं-वध के दंनार्थं जो लोग एकत्रित होते

English

From him, verily, sprang Priesthood and Royalty. They said,

अध्याय १५

श्लोक 10.6

इ॒यं वा उ॑ पृथि॒वी बृह॒स्पति॒र्द्यौरे॒वेन्द्रः॑

iyaṃ vā u pṛthivī bṛhaspatirdyaurevendraḥ

हिन्दी अर्थ

वालीहौोजो कि तेरे लिये, गृहुवासिययों के लिये, तथा जगत् के लिये सुख- मे (भ्रा भगन्) भाई है, (रस्यं) इस वधू के लिये ( इह ) इस पतिगृह १४९ भरथवविद-माष्य काऽ १४। भ्रनु०२।सु०२ ये । (इयम्) यह ववू (विराट्) शोभायमाना प्रकृतिरूपा है, यह (सुप्रजाः) सनाभ्रो पर भडा-व्रिजय प्राप्त की है। = (्रथववं० १४।२।१५) । प्रकृतिरूपा वधू एेसी शिक्षा दीजिये जिस से यह ववू उत्तन-सन्तानों वाली हो, तथा धनंश्वयं का सदुपयोग कर सके 1 साथही यह वधू विरादृरूपा है, प्रकृतिरूपा है ।

English

Into whom shall we enter?

अध्याय १५

श्लोक 10.7

अ॒यं वा उ॑ अ॒ग्निर्ब्रह्मा॒सावा॑दि॒त्यः क्ष॒त्रम्

ayaṃ vā u agnirbrahmāsāvādityaḥ kṣatram

हिन्दी अर्थ

सन्तानो को माता,.बने । ताति कंदाजासकंकरिवषू गृहस्थपथ पर चलते हुए महाविजय प्राप्तकीहै। (दीर्घायुत्वाय) दीघं भ्रायुवाली होने के लिये, (शतशारदाय) भौर १०० (गृहान्) नाना कभरोत्राले पतिषहं को, या पति के गंहवासियों को (गच्छ) सके । (सविता) जगत् का उत्पादक पिता तै) तेरी (आयुः) भ्रायु को (दी्षेम्) दीषं (कृणोतु) करे । करे-एेसी.भ्राक्चा पितरोंकीदटै। का० १४ । भ्रनु० २। सूु०२ अथववेद-भाष्य १४३ का विषय मानादहै। यथा “प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं . हि विन्दते जाता है।वेदमे बोध म्मौर प्रतिबोध कोदो ऋषिकहाहै। यथा “ऋषी बोधश्रतौबोधौ'” (अथवं० ५।३०।१०) । क्योंकि बोघ प्मौर प्रतिबोध दारा

English

Let Priesthood enter into Brihaspati, and Royalty into Indra, was the answer.

अध्याय १५

श्लोक 10.8

ऐनं॒ ब्रह्म॑ गच्छति ब्रह्मवर्च॒सी भ॑वति

ainaṃ brahma gacchati brahmavarcasī bhavati

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मचारिणो बन कर तूने बोघ का उपाजन कियादहै, तूने प्रबोध की देना । श्रायु को दीघं करने के लिये नएःनए बोध की प्राप्ति के लिये भी साथ बोध का समन्वय सदा करते रहना । ग्रनहे वधु! तू रथ से. उतर भौर भ्रपने पतिगृह मेँ प्रवेहा कर। यहं पतिश्रह ्रबसेतेराहै। तुहस की स्वामिनी बन श्रन्त म पितुलोग वधू की दीर्घायु चाहते हुए कहते हु कि परमेद्वर तेरी श्रायु को दीघं करे । सृष्टि की रचना, उस का पालन तथा संहार, ऋतुशो का परिवत्तंन, ग्रह

English

Hence Priesthood entered into Brihaspati and Royalty into

अध्याय १५

श्लोक 10.9

यः पृ॑थि॒वीं बृह॒स्पति॑म॒ग्निं ब्रह्म॒ वेद॑

yaḥ pṛthivīṃ bṛhaspatimagniṃ brahma veda

हिन्दी अर्थ

व्रत के सुचक है । ईयमानः ईड गतौ । गतिक्रिया । “स्वामाविकी ज्ञानबलक्िा च" (रवेता० उप० ६।८) पर महि दयानन्द लिखते है कि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय न. कर सकता । इसलिये वह विभु तथापि चेतन होनेसे उसमें क्रियामौोहै। जितने देशकालमें क्रिया करनी उचित शिका मेँ छन्दोनिर्देदा किया है । ते जने के कारण, उन का हितकारी है । का० १५। अनु° १। सण १ म्रथ्ववेद-माष्य १४५ समता है उतने ही देशकाल मेँ क्रिया करता है, न श्रधिक न न्यून । क्यो नहीं हौ सकती । परमेश्वर का नाम प्रजापति है.। यथा "“तदेवाग्निस्तदा-

English

Indra.

अध्याय १५

श्लोक 10.10

ऐन॑मिन्द्रि॒यं ग॑च्छतीन्द्रि॒यवा॑न् भवति

ainamindriyaṃ gacchatīndriyavān bhavati

हिन्दी अर्थ

(यः) जो (एषः) यह् (कृत्रिमः) कारीगर का बनाया हूश्रा, (शतदन्) कघेसे केशे कामल दूर होताहै, तथा सिरके भ्र्थात् सिरके के्णोकी जहां जड़ होती हैँ वहां पर जमामल भी दूर होता है) १६५ ग्रथववेद-भाष्य का० १४ श्रनु० २। सू०२ वे देवाः" (शतपथ ३, ७, ३१०), दिवम् = मूर्ध, सिर, मस्तिष्क, "दिवं यदचके मूर्धानम्” (अथवं० १०।७३२), “्ीष्रणः छौः समवतंत (यजु कीटाशुभौमल के ही परिणाम होते है। यक्ष्मरोग मयानकःरोगहै। . होकर उसे दूषित करं देता है । यक्ष्मरोग सक्रामक है! पति-पत्नी के जोड़ मेंसेकिसीकोभी यहं रोग हो जाने पर दरसरेकोभी इसरोगकी प्राप्ति की सम्भावना वनी रहती है । संक्रामक होने के कारण यह रोग घर के भ्न्य निवासि्योमेभी दारा अग्निहत्र तथा ऋतु यज्ञो कै करते रहने से, तथा ऋत्वनुकुल

English

From him, verily, sprang Priesthood and Royalty. They said,

अध्याय १५

श्लोक 10.11

य आ॑दि॒त्यं क्ष॒त्रं दिव॒मिन्द्रं॒ वेद॑

ya ādityaṃ kṣatraṃ divamindraṃ veda

हिन्दी अर्थ

जा सकता है. 1 सूयं के उदयकाल तथा भ्रस्तकाल की रदिमयोँ के सेवन से भो यक्ष्मरोग दुर किया जा सकता है (भ्रथवं० २।३२, ३३।--) । सूर्यं भरी श्रग्निरूप है । १.५५ का० १४। ग्रतु०२। सु २ भ्रथववेद-माष्य १३७ पत्नी का प्रति दवारा बन्बन ह पत्नो ! (पृथिव्याः) पृथिवौ की (पयसा) सारभूत वस्तुनो के प्रदान (संनद्धा) मेरे साथ बन्धी हुई (सा) वह तू (दमम्) इम (वाजम्) बलकारी भ्रन्न को (भ्रा सनुहि) मु दिया कर । के होते हए भी. गृहस्थ जीवन मेँ यदि पत्नी को पति के साथ बान्धने के भरन्य साधन नहीं है तो यह सास्कारिक बन्धन ढीला भी पड़ जाता. है । तथा पेय पदाथं । गृहस्थ-जीवन मेँ इन के प्रभाव दवारा भी, पति-पत्नी का सहायक होते हँ । घन के भ्रमाव में एकं बन्धु दूसरे का परित्याग भी कर सकता है । इस लिये पति धनोपाजंन भ सदा यत्नवान् रहे ।

English

He who hath this knowledge becomes the dear home of Meeting,

स्रोत: bhavykhatri/DharmicData · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता · Identifier:

Atharva Veda — Chapter 15

अथर्ववेद

संस्कृत संस्करण · Sanskrit Edition:

Imported text; printed edition not recorded

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