Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
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अध्याय 11 / 232

Adhyaya 11

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अध्याय ११

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे नर्मदामाहात्म्ये नर्मदास्नानफलश्रुतिकथनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ११ युधिष्ठिर उवाच: अहो महत्पुण्यतमा विशिष्टा क्षयं न याता इह या युगान्ते ।तस्मात्सदा सेव्यतमा मुनीन्द्रैर् ध्यानार्चनस्नानपरायणैश्च

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe narmadāmāhātmye narmadāsnānaphalaśrutikathanaṃ nāma daśamo'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 11 yudhiṣṭhira uvāca: aho mahatpuṇyatamā viśiṣṭā kṣayaṃ na yātā iha yā yugānte / tasmātsadā sevyatamā munīndrair dhyānārcanasnānaparāyaṇaiśca

हिन्दी अर्थ

इनके रूप, आयु, शीत और चेष्ठाओं में पार्थकय या विशेषता नहीं थी। प्रजाओं के व्यापार ओर व्यवहार स्वाभाविक होते थे बुद्धिपुबक नहीं ।६०। कृत युग में शुभ और अशुभ कर्मों में प्रजा की श्रवृत्ति नहीं थी क्योंकि शुभ अशुभ का विभाग था ही नहों। उस समय वर्णाश्रम व्यवस्था न थी, न तो संकर दोष ही था ।६१। वे परस्पर अकाम और अनिच्छा पूर्वक व्यवहार करते थे । रूप, आयु में सभी तुल्य थे, उत्तम अधम

English

Sages of noble souls observe with divine vision and worship the vital breath [Prana) by establishing themselves in penance, whether it be for a great day or a day and night or a fortnight, or a month or six months or a year or a Yuga or thousands of great Yugas.

अध्याय ११

श्लोक 2

यामाश्रित्य गता मोक्षमृषयो धर्मवत्सलाः ।ये त्वयोक्तास्तु नियमा ऋषीणां वेदनिर्मिताः

yāmāśritya gatā mokṣamṛṣayo dharmavatsalāḥ / ye tvayoktāstu niyamā ṛṣīṇāṃ vedanirmitāḥ

हिन्दी अर्थ

का प्रश्न नहीं था, उस युग में तो सभी सुखी, विशोक, सदा प्रसंन्न, महासत्व ओर महाबलवान् थे

English

Henceforth, I shall explain the purpose and particularly the benefit of Pranayama as expounded by the Lord. 2

अध्याय ११

श्लोक 3

मोक्षावाप्तिर्भवेद्येषां नियमैश्च पृथग्विधैः ।दशद्वादशभिर्वापि षड्भिरष्टाभिर् एव वा

mokṣāvāptirbhavedyeṣāṃ niyamaiśca pṛthagvidhaiḥ / daśadvādaśabhirvāpi ṣaḍbhiraṣṭābhir eva vā

हिन्दी अर्थ

उनमें लाभ-अलाभ, मित्र-अमिन्न, प्रिय-अप्रिय के व्यवहार न थे, वे निरीह थे और मन की प्राकृतिक प्रेरणा से ही :विषयों में प्रवत्त होते थे। एक दूसरे के प्र/ते किसी की. कोई इच्छा, स्वार्थ न था, नतो परस्पर के अनुग्रह की आवश्यकता थी। तयुग में ध्यान का ही महत्व है, त्रेता में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ और कलि में दान ही श्रेष्ठ समझा जाता है ।६४-६ ९ ३। युगानुरूप क्ृतयुग में सतोगुण, द्वापर में रज और तम

English

Know that the objectives of Pranayama are four: §dnti y PraSantiy Prasada and Dipti (each term is explained in the following verses).

अध्याय ११

श्लोक 4

त्रिभिस्तथा चतुर्भिर्वा वर्षैर्मासैस्तथैव च ।मुच्यन्ते कलिदोषैस्ते देवेशानसमर्चनात्

tribhistathā caturbhirvā varṣairmāsaistathaiva ca / mucyante kalidoṣaiste deveśānasamarcanāt

हिन्दी अर्थ

और कलियुग में केवल तम की प्रधानता रहती है। कृतयुग का जो काल परिमाण है उसको सुनो ।६६-६७! चार हजार दिव्य वर्षों का कृतयुग है उसकी संध्या और संध्याशं का परिमाण आठ सो दिव्यवर्ष हैं

English

Actions whether terrible in form or auspicious in nature, if performed by oneself, do bear fruits here and hereafter in due course.

अध्याय ११

श्लोक 5

ब्रह्माणं वा सुरश्रेष्ठ केशवं वा जगद्गुरुम् ।अर्चयन्पापमखिलं जहात्येव न संशयः

brahmāṇaṃ vā suraśreṣṭha keśavaṃ vā jagadgurum / arcayanpāpamakhilaṃ jahātyeva na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

उस युग में प्रजाओं की मृत्यु, क्लेश और विपत्तियों की आशंका नहीं । तदनन्तर उस इतथुग में संध्यांश काल के

English

But the quelling of evils and sins committed by parents, cousins or other relatives or a mixture of both is called Santi.

अध्याय ११

श्लोक 6

एतद्विस्तरतः सर्वं कथयस्व ममानघ ।यस्मिन्संसारगहने निमग्नाः सर्वजन्तवः ।ते कथं त्रिदिवं प्राप्ता इति मे संशयो वद

etadvistarataḥ sarvaṃ kathayasva mamānagha / yasminsaṃsāragahane nimagnāḥ sarvajantavaḥ / te kathaṃ tridivaṃ prāptā iti me saṃśayo vada

हिन्दी अर्थ

पादावशिष्टो भवति यगधर्मस्तु सर्चंशः संध्यायाम्रप्यतीतायामन्तकाले युगसर्य तु

English

The present chapter is important as it throws a flood of light on the Pasupata Yoga as practised before the 10th cent. A.D. when the Va. P. came to be finally redacted.

अध्याय ११

श्लोक 7

श्रीमार्कण्डेय उवाच: जन्मान्तरैरनेकैस्तु मानुष्यमुपलभ्यते ।भक्तिरुत्पद्यते चात्र कथंचिदपि शङ्करे

śrīmārkaṇḍeya uvāca: janmāntarairanekaistu mānuṣyamupalabhyate / bhaktirutpadyate cātra kathaṃcidapi śaṅkare

हिन्दी अर्थ

सर्गादौ या मयाउष्टी त मानस्यो वै प्रकोतिताः। अष्ठी ताः क्रमयोगेन(ण) सिद्धयों यान्ति

English

Verses 3-11 describe the purpose or objectives of Pranayama, the first Dharma in this Yoga.

अध्याय ११

श्लोक 8

तीर्थदानोपवासानां यज्ञैर्देवद्विजार्चनैः ।अवाप्तिर्जायते पुंसां श्रद्धया परया नृप

tīrthadānopavāsānāṃ yajñairdevadvijārcanaiḥ / avāptirjāyate puṃsāṃ śraddhayā parayā nṛpa

हिन्दी अर्थ

वर्णाश्रभाचा रछृतः कर्मेसिद्धोऋवः स्मखतः। संध्या रुतस्य पादेन संध्यापादेन-चांशतः ७५ कतसंध्यांशका होते त्रींज्लीन्पादान्परस्परान् । हसन्ति युगधमस्ते तपः अ्रतबलायुचैः

English

The restraint of sins arising from covetousness is called Prafdnti. It is a form of penance that benefits both here and hereafter.

अध्याय ११

श्लोक 9

तस्माच्छ्रद्धा प्रकर्तव्या मानवैर्धर्मवत्सलैः ।ईशो ऽपि श्रद्धया साध्यस्तेन श्रद्धा विशिष्यते

tasmācchraddhā prakartavyā mānavairdharmavatsalaiḥ / īśo 'pi śraddhayā sādhyastena śraddhā viśiṣyate

हिन्दी अर्थ

प्रशश्यति तदा सिद्धि: कालयोगेन नान्यथा । तस्यां सिद्धों प्रनष्ठायामन्या सिद्धिरवर्तेत

English

Sages richly endowed with knowledge and perfect wisdom can reach the world of the sun, moon, planets and stars.

अध्याय ११

श्लोक 10

अन्यथा निष्फलं सर्वं श्रद्धाहीनं तु भारत ।तस्मात् समाश्रयेद् भक्तिं रुद्रस्य परमेष्ठिनः

anyathā niṣphalaṃ sarvaṃ śraddhāhīnaṃ tu bhārata / tasmāt samāśrayed bhaktiṃ rudrasya parameṣṭhinaḥ

हिन्दी अर्थ

बीत जाने पर उस समय का युगधर्म चौथाई शेष रह जाता है। इस प्रकार कृतयुग के बीत जाने पर उस युग की सिद्धि भी लुप्त हो गई ।६९-७१। उस मानसी सिद्धि के लुप्त हो जाने पर त्रेता ओर कृत युग के सन्धि-काल में दूसरी सिद्धि उत्पन्न हुई। मैंने सृष्टि के आरम्भ की जिन आठ भ्रकार की सिद्धियों को गिनाया है, वे आठों क्रमशः नष्ट हो जाती हैं। कल्प के आदि में कृतयुग में वह मानसी

English

To the enlightened, the vision of the past, present and future is possible. It is called Dipti. It is also a penance.

अध्याय ११

श्लोक 11

तेषांहि सफलं जन्म येषां भक्तिरचञ्चला ।सा चैव त्रिविधा भक्तिः सात्त्विकी राजसी तथा

teṣāṃhi saphalaṃ janma yeṣāṃ bhaktiracañcalā / sā caiva trividhā bhaktiḥ sāttvikī rājasī tathā

हिन्दी अर्थ

सिद्धि होती है। सब मन्वन्तरों में चारों युगों के विभाग के अनुसार वर्णाश्रम धर्म के आचार पालन के द्वारा कर्मों की सिद्धियाँ होती हैं। किन्तु युगशेष के साथ-ही-साथ वर्णाश्रमों के आधार ओर कमे- जन्य उनकी समस्त सिद्धियाँ भी विनष्ट हो जाती हैं। सत्य युग के सन्ध्याकाल में युगधर्म का एक पादु, सन्ध्यांशकाल में सन्ध्याकालीन धर्म का एक पाद् एवं त्रेता के प्रारम्भ में उस सन्ध्यांशकालीन

English

Thus the fourfold Prdndyama is the first Dharma. It should be known that it gives immediate fruit and results forth¬ with in composure (of mind).

अध्याय ११

श्लोक 12

तामसी सर्वलोकस्य त्रिविधं च फलं लभेत् ।ते कर्मफलसंयोगादावर्तन्ते पुनःपुनः

tāmasī sarvalokasya trividhaṃ ca phalaṃ labhet / te karmaphalasaṃyogādāvartante punaḥpunaḥ

हिन्दी अर्थ

धर्म का एक पाद नष्ट हो जाता है, इसी क्रम से तपस्या, शात्रज्ञान, बल और भायु भी क्षीण होती है। मुनिगण ! सत्ययुग और सन्ध्यांश के क्षीण हो जाने पर ज्ेता युग का प्रारम्भ होता है। जब प्रजाओं में युगादि कालीन वह सिद्धि नहीं रहती तब फिर उसमें दूसरी सिद्धि उत्पन्न होती है

English

Henceforth I shall explain the characteristics of Prdna- yama, the posture and the practice of Yoga precisely.

अध्याय ११

श्लोक 13

जन्मान्तरशतैस्तेषां ज्ञानिनां देवयाजिनाम् ।देवत्रये भवेद्भक्तिः क्षयात्पापस्य कर्मणः

janmāntaraśataisteṣāṃ jñānināṃ devayājinām / devatraye bhavedbhaktiḥ kṣayātpāpasya karmaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

जल समूह की सूक्ष्मता विनष्ट हो जाती है और वह गजनकारी मेघ के रूप में परिणत हो जाता है,

English

One should utter the syllable Om at the outset and bow to the moon or the sun. Then he should sit in the postures of Svaslika or Ardhapadma. The 'two knees shall be level with each other or one knee should be slightly raised. He should sit com¬ fortably with firmness. The feet shall be brought closer. The mouth should be kept closed, the eyes half-closed, the chest raised forward. With the heels he should cover the scrotum and the penis; the head should be slightly raised, the neck be straightened. He should fix Iris gaze on the tip of his nose, and should not look elsewhere in any direction. He should cover Tamas by Rajas which he should envelop by Sattva. Then he should remain established in Sattva and practise Yoga with pure mind. He should then hold (control) the aggregate of his sense-organs and their objects, his mind and the five vital breaths. He shall then begin Pratydhara (withdrawing in himself these together).

अध्याय ११

श्लोक 14

ईशानात्तु पुनर्मोक्षो जायते छिन्नसंशयः ।ये पुनर्नर्मदातीरमाश्रित्य द्विजपुंगवाः

īśānāttu punarmokṣo jāyate chinnasaṃśayaḥ / ye punarnarmadātīramāśritya dvijapuṃgavāḥ

हिन्दी अर्थ

धनुश्चिह्वान्तर्गतग्रन्थों ग. पुस्तके नास्ति।

English

He who withdraws his passion and desires as the tortoise does its limbs, becomes delighted in the self. Fixed (established) in it, he sees the Self in his self. Filling the body with air and remaining pure within and without, he shall begin the withdrawal by the process of Yoga from the navel to the

अध्याय ११

श्लोक 15

त्रयीमार्गम् असन्दिग्धास्ते यान्ति परमां गतिम् ।एकाग्रमनसो ये तु शङ्करं शिवमव्ययम्

trayīmārgam asandigdhāste yānti paramāṃ gatim / ekāgramanaso ye tu śaṅkaraṃ śivamavyayam

हिन्दी अर्थ

सकृंदेव तया वृष्ठद्या संयुक्‍ते पृथिवीतलले । प्रादुरासंस्तदा तासां वृक्षास्त गन से स्थिताः

English

All the defects (sins) of the Brahmana who is engaged in (i.e. practices) Pranayama and is self-controled are destroyed and he becomes established in Sattva.

अध्याय ११

श्लोक 16

अर्चयन्तीह निरताः क्षिप्रं सिध्यन्ति ते जनाः ।कालेन महता सिद्धिर्जायते ऽन्यत्र देहिनाम्

arcayantīha niratāḥ kṣipraṃ sidhyanti te janāḥ / kālena mahatā siddhirjāyate 'nyatra dehinām

हिन्दी अर्थ

ततः कालेन मद्ता तासामेव विपयेयात् । रागलोभमात्मकों भावस्तदा ह्याकस्मिको5भवत् ॥ यत्तक्ूवति नारीणां जीवितान्ते तदाउरतवम्। तदा तद्दे न भवति पुनयु गबलेन तु

English

Thus, with due restriction in the diet a sage (observing silence) engaged in Pranayama, shall conquer Yogic stages and ascend higher and higher.

अध्याय ११

श्लोक 17

नर्मदायाः पुनस्तीरे क्षिप्रं सिद्धिरवाप्यते ।षड्भिर्वर्षैस्तु सिध्यन्ति ये तु सांख्यविदो जनाः

narmadāyāḥ punastīre kṣipraṃ siddhiravāpyate / ṣaḍbhirvarṣaistu sidhyanti ye tu sāṃkhyavido janāḥ

हिन्दी अर्थ

ताखां पुनः भ्रवत्त॑ तु मासे मासे तदातंवम् । ततसस्‍्तेनैव योगेन वर्ततां मिथुने तदा ॥प८५ तासां तत्कालभावित्वान्मासि मास्युपगच्छताम् अकाले हातंदोत्पत्तिगंर्भा त्पत्तिरजञायत ॥८दे विपयंयेण तासां त-तेन कालेन भाधिना। प्रणुश्यन्ति ततः सच चृक्षास्त ग्रहसस्थिताः

English

The great ground (i.e. stage) if not subdued (overcome) may generate many defects. It may increase delusion. Hence one cannot go to a higher stage unless the initial stage is over¬ come.

अध्याय ११

श्लोक 18

वैष्णवा ज्ञानसम्पन्नास्ते ऽपि सिध्यन्ति चाग्रतः ।सर्वयोगविदो ये च समुद्रमिव सिन्धवः

vaiṣṇavā jñānasampannāste 'pi sidhyanti cāgrataḥ / sarvayogavido ye ca samudramiva sindhavaḥ

हिन्दी अर्थ

वेप्वेच जायते तासां गन्धवर्णरसान्वितम् । अमाक्षिक मद्दावीय पुटके पुटके मधु

English

Just as water is taken up by applying force through a pipe or mechanical device, so also the Yogin should drink in the wind with effort but conquering (without incurring) exhaustion.

अध्याय ११

श्लोक 19

एकीभवन्ति कल्पान्ते योगे माहेश्वरे गताः ।सर्वेषामेव योगानां योगो माहेश्वरो वरः

ekībhavanti kalpānte yoge māheśvare gatāḥ / sarveṣāmeva yogānāṃ yogo māheśvaro varaḥ

हिन्दी अर्थ

पुनः कालान्तरेणव पुनर्लोभान्ुतास्तु ताः। वृश्वांस्तान्पर्य ग्रढब्त मधु वा माक्षिक बलात्ू

English

The wind shall be retained gradually in the umbili¬ cus, in the heart, in the chest, in the throat, in the mouth, at the tip of the nose, in the eye, between the eyebrows and in the head. The retention of the breath a little above in the great lord is called Dharana. Since both the Prana and Apdna are obstructed, it is called Pranayama.

अध्याय ११

श्लोक 20

तमासाद्य विमुच्यन्ते ये ऽपि स्युः पापयोनयः ।शिवमर्च्य नदीकूले जायन्ते ते न योनिषु

tamāsādya vimucyante ye 'pi syuḥ pāpayonayaḥ / śivamarcya nadīkūle jāyante te na yoniṣu

हिन्दी अर्थ

और वृष्टि की सृष्टि हो जाती है ॥५०। एक बार भी वृष्टि के हो जाने से प्रजाओं के वासस्थानों में वृक्षादि उग आते हैं। इससे प्रजाओं को विविध उपभोग प्राप्त हो जाते है। त्रेता युग की प्रथम अवस्था में प्रजाजन उसी से जीविका-निर्वाह करते हैं ।८१-५२। इसके बाद क्रम-क्रमसे उनके भावों में परिवर्तन होने लगता है। वे आकस्मिक राग और लोभ से आक्रान्त हो जाते हैं। सत्ययुग में स्त्रियों को आयु के शेषकाल में

English

It is the steadying of the mind that is called Dharana. The withdrawal from the sense-objects is Pratyahara.

अध्याय ११

श्लोक 21

गतिरेषा दुरारोहा सर्वपापक्षयंकरी ।मुच्यन्ते मङ्क्षु संसाराद्रेवामाश्रित्य जन्तवः

gatireṣā durārohā sarvapāpakṣayaṃkarī / mucyante maṅkṣu saṃsārādrevāmāśritya jantavaḥ

हिन्दी अर्थ

ही गर्भ धारण करने की दाकिति उत्पन्न होती थी; किन्तु वह भाव युग प्रभाव से श्रेता में विलुप्त हो जाता है। इस युग में स्त्रियाँ प्रतिमास ऋतुमती होती हैं। सहवासकारी प्रजाओं के प्रतिमास॒ संगम करने से अकाल में ही गर्भात्पत्ति एवं आतंवोत्पत्ति होने लगती है । पुनः क्रमशः काल के परिवतेन-वश प्रजाओं के निवास में उगे हुए वृक्षादि विष्नट होने लगते हैं, इससे लोग विश्लान्त और व्याकुल चित्त होकर पहले

English

If Sattva is not accomplished, the vision is not possible. If the Yoga is practised in a defective place or at the wrong time, the vision is not possible.

अध्याय ११

श्लोक 22

तस्मात्स्नायी भवेन्नित्यं तथा भस्मविलेपनः ।नर्मदातीरमासाद्य क्षिप्रं सिद्धिमवाप्नुयात्

tasmātsnāyī bhavennityaṃ tathā bhasmavilepanaḥ / narmadātīramāsādya kṣipraṃ siddhimavāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

का सिद्धि विषयक ध्यान करने लगते हैं। उनके सत्याभिध्यान के फल से फिर घरों में वृक्षादि उगने लगते । इस प्रकार वे उसी वृक्षों से वस्त्र, फल, आभरण एवम उत्तम् गन्ध वाला, देखने में सुन्दर, सरस और अत्यन्त वीर्यकारी अमाक्षिक मधु हरे पत्तों से प्राप्त करने लगे ।८३-६०। त्रतायुग में प्रजागण उसी के द्वारा सुख से जीवन व्यतीत करते थे । सभी उसी सिद्धि के द्वारा दृष्ट-पुष्ट और क्षोभरहित होकर कालयापन करते थे ।

English

A Yogi should not practice concentration near fire, in the forest, over a heap of dry leaves, in a place infested with

अध्याय ११

श्लोक 23

त्रिकालं पूजयेच्छान्तो यो नरो लिङ्गम् आदरात् ।सर्वरोगविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम्

trikālaṃ pūjayecchānto yo naro liṅgam ādarāt / sarvarogavinirmuktaḥ sa yāti paramāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

फिर जब कालक्रम से प्रजावर्ग लोभ के वशीभूत होकर उन समस्त बुक्षों को और माक्षिक मधु को बलपूर्वक अपनाने लगे ॥९१-९२। तब उनके इस अपचार के कारण कहीं-कहीं वे कल्पवृक्ष मधु के साथ ही विनष्ट होने

English

In spite of knowing decisively these faults, if a person inadvertently engages in the practice of Yoga, the three hum¬ ours in his body become deranged and put up obstacles in his path.

अध्याय ११

श्लोक 24

षड्भिः सिध्यति मसैस्तु यद्यपि स्यात्स पापकृत् ।ये पुनः शुद्धमनसो मासैः शुध्यन्ति ते त्रिभिः

ṣaḍbhiḥ sidhyati masaistu yadyapi syātsa pāpakṛt / ye punaḥ śuddhamanaso māsaiḥ śudhyanti te tribhiḥ

हिन्दी अर्थ

सस्यामेवाल्पशिष्ठायां संध्याकालवशात्तदा । प्राचर्तन्त तदा तासां दन्द्वान्यभ्युत्थितानि तु

English

He develops sluggishness, deafness,muteness, blindness, loss of memory, old age and sickness.

अध्याय ११

श्लोक 25

यथा दिनकरस्पृष्टं हिमं शैलाद् विशीर्यन्ते ।तद्वद्विलीयते पापं स्पृष्टं भस्मकणैः शुभैः

yathā dinakaraspṛṣṭaṃ himaṃ śailād viśīryante / tadvadvilīyate pāpaṃ spṛṣṭaṃ bhasmakaṇaiḥ śubhaiḥ

हिन्दी अर्थ

रृत्वा दन्द्प्रतीकार्र निकेतानि हि भेजिरे। पूर्वा निकामचारास्ते अभिकेताश्रया भुशम्

English

The bodily humours of a person practising Yoga igno¬ rantly, become virulent. Hence a Yogin should practise Yoga with pure knowledge of the mind and body.

अध्याय ११

श्लोक 26

वैनतेयभयत्रस्ता यथा नश्यन्ति पन्नगाः ।तद्वत्पापानि नश्यन्ति भस्मनाभ्युक्षितानि ह

vainateyabhayatrastā yathā naśyanti pannagāḥ / tadvatpāpāni naśyanti bhasmanābhyukṣitāni ha

हिन्दी अर्थ

यथायोग्यं यथाप्रीति निकेतेष्वचसन्पुनः । मरुधन्वखु निम्नेषु पबंतेषु नदीषु चर

English

If he is alert and careful in the practice of Yoga, he will not suffer from any defects. I shall explain the remedy for the defects originating from the wrong performance of Prana- yama.

अध्याय ११

श्लोक 27

नर्मदातोयपूतेन भस्मनोद्धूलयन्ति ये ।सद्यस्ते पापसङ्घाच्च मुच्यन्ते नात्र संशयः

narmadātoyapūtena bhasmanoddhūlayanti ye / sadyaste pāpasaṅghācca mucyante nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

संश्रयन्ति च दुर्गाणि घन्वार्न शाश्वतोदकम् यथायोगं॑ यथाकामं समेथ्ु 'विषमेषु च ।€८ आरब्धास्ते निकेता (वै(न्वै) कतु शीतोष्णचारणम् ततः संस्थापयामास खेंटानि पुराणि च ॥€र ग्रामांश्चेव यथासागं तथेबान्तःपुराणि च । तासामायाभविष्कस्मान्सनिवेशान्त राखि तर १००

English

The enlargement of the spleen (due to the derange¬ ment of the wind humour) calms down, if the patient drinks thick, sticky gruel (while it is) very hot.

अध्याय ११

श्लोक 28

व्रतं पाशुपतं भक्तया यथोक्तं पालयन्ति ये ।शूद्रान्नेन विहीनास्तु ते यान्ति परमां गतिम्

vrataṃ pāśupataṃ bhaktayā yathoktaṃ pālayanti ye / śūdrānnena vihīnāstu te yānti paramāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

अष्टाडगगुलः प्रदेशिन्या व्यासः प्रादेश उच्यते। तालः रुखुतो मध्यमया गोकर्णाश्वाप्यनामया ॥।

English

He shall fix firmly something in the mind and hold on to it as though observing some holy rite. If there is palpitation of the heart, the vital breath shall be retained in the cardiac region and near the throat.

अध्याय ११

श्लोक 29

अमृतं ब्राह्मणस्यान्नं क्षत्रियान्नं पयः स्मृतम् ।वैश्यान्नम् अन्नमेव स्याच्छूद्रान्नं रुधिरं स्मृतम्

amṛtaṃ brāhmaṇasyānnaṃ kṣatriyānnaṃ payaḥ smṛtam / vaiśyānnam annameva syācchūdrānnaṃ rudhiraṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

लगे । उस काल में कल्पव॒क्षों के क्षीण होने से प्रजाओं में शीतोष्णादि दन्द्र-क्लेश भी उत्पन्न हो गये

English

If there is obsrruction to speech, the vital breath should be retained in the organ of speech; in deafness it shall be re¬ tained in the ears. In affliction by thirst, he shall (apply) oil or ghee to the tip of the tongue by means of threads. Concentrat¬ ing thus on the effect of the treatment, a Yogin achieves happi¬ ness.

अध्याय ११

श्लोक 30

शूद्रान्नरससंपुष्टा ये म्रियन्ते द्विजोत्तमाः ।ते तपोज्ञानहीनास्तु काका गृध्रा भवन्ति ते

śūdrānnarasasaṃpuṣṭā ye mriyante dvijottamāḥ / te tapojñānahīnāstu kākā gṛdhrā bhavanti te

हिन्दी अर्थ

वायु, ठंडक और गर्मी से पीड़ित होकर लोग गात्रावरण (वस्त्र) धारण करने लगे । वे यथेच्छविहारी गृहहीन प्रजागण गात्रावास द्वारा वायु शीत और घाम के कष्ट का निवारण करने के लिये घर बना कर रहने लगे । यथायोग्य अपनी रुचि के अनुसार गृह निर्माण कर सुख से निवास करने लगे ।६५-६ ६स। उन्होंने मरु, उन्नत, निम्त, पव॑त, नदी, जलप्राय सम, विषम, दुर्गम, इत्यादि नाना स्थान में अपनी रुचि के अनुसार शीतातप-क्लेश

English

In the state of consumption and leprosy, the Sattvika breath shall be centred on the parts affected. If a part is affected by Rajas, the Yoga shall be practised with respect to that particular part. If a Brahmana practising Yoga, suffers from illness the following treatment should be pursued. His head shall be beaten with a wedge of bamboo or the wedge shall be placed on his head and beaten with a wooden stick. Thus over¬ whelmed by fear, he will regain consciousness. Or if he has lost consciousness he can beheld with hands. After regaining con¬ sciousness he should retain Dharana in the head. He shall eat oily substance yet in small quantity. Thus the Yogin becomes happy.

अध्याय ११

श्लोक 31

दुष्कृतं हि मनुष्याणामन्नमाश्रित्य तिष्ठति ।यो यस्यान्नं समश्नाति स तस्याश्नाति किल्बिषम्

duṣkṛtaṃ hi manuṣyāṇāmannamāśritya tiṣṭhati / yo yasyānnaṃ samaśnāti sa tasyāśnāti kilbiṣam

हिन्दी अर्थ

से बचने के लिये दुर्ग भवनादि बनाना आरम्भ कर दिया । तब खेट (क्षुद्रग्राम), पुर, अन्तःपुर, ह्म्यादि बनाये गए ।६ ७-६ €। उनकी लम्बाई चोड़ाई यथाबुद्धि निश्चित की गयी, उनके दीघंप्रस्थादि परिमाण के लिये अडगुलि के माप द्वारा विविध परिमाण की संज्ञा भी निश्चित हुई। प्रादेश, हस्त, किष्कु, धनु इत्यादि संज्ञाये तभी से प्रचलित हुईं दश अंगुलिपर्वों का एक प्रदेश, अड्गुष्ठा से लेकर तर्जनी तक के विस्तार-परिणाम को प्रादेश,

English

When he is possessed by a non-human being, he should perform the Dharana of heaven, earth, wind and fire.

अध्याय ११

श्लोक 32

विशेषाद्यतिधर्मेण तपोलौल्यं समाश्रिताः ।नरकं यान्त्यसन्दिग्धमित्येवं शङ्करो ऽब्रवीत्

viśeṣādyatidharmeṇa tapolaulyaṃ samāśritāḥ / narakaṃ yāntyasandigdhamityevaṃ śaṅkaro 'bravīt

हिन्दी अर्थ

मध्यमापयनत का ताल, अनामिका के अन्त तक गोकर्ण और कनिष्ठान्त परिमाण की एक वितस्ति (वित्ता) होंती है । वितस्ति का परिमाण बारह अंगुलियों का होता है ।! ००-१०३३। इक्कीस अंगुलियों के पर्वों की रत्नि, चौबीस अंगुलियों के पर्वों का हस्त और दो रत्नियों का भर्थात् बयालीस अंगुलियों का एक किष्कु होता है। चार हाथ का एक धनु, दण्ड था नालिका युग होता है। दो हजार धनुओं की एक गव्यूति और आठ हजार धनुओं का

English

Being burnt by Pranayama everything comes under control. Still if it enters the body, he should ward it off.

अध्याय ११

श्लोक 33

ईदृग्रूपाश्च ये विप्राः पाशुपत्ये व्यवस्थिताः ।ते महत्पापसंघातं दहन्त्येव न संशयः

īdṛgrūpāśca ye viprāḥ pāśupatye vyavasthitāḥ / te mahatpāpasaṃghātaṃ dahantyeva na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

धनुश्चिह्वास्तर्गतग्रन्थः कः पुस्तके नास्ति। धनुषिचिन्ान्तगंतग्रन्थो नास्ति ।

English

Then after stupefying it with one's Yogic power, the fire of Pranayama be burnt over its head and it is completely perished.

अध्याय ११

श्लोक 34

विडम्बेन च संयुक्ता लौलुप्येन च पीडिताः ।असंग्राह्या इत्येवं श्रुतिनोदना

viḍambena ca saṃyuktā laulupyena ca pīḍitāḥ / asaṃgrāhyā ityevaṃ śrutinodanā

हिन्दी अर्थ

चतुहंसस्‍त॑ घनुदंण्डो नालिकायुगमेव च। घनुःसइस्म दे तत्र गव्यूतिस्तैविंभाव्यते

English

Drinking the fruit of the poison, he shall retain it but make it ineffective. He should perform Dharana conceiving in his mind the whole earth along with the mountains all round.

अध्याय ११

श्लोक 35

मातापितृकृतैर्दोषैरन्ये केचित्स्वकर्मजैः ।नष्टा ज्ञानावलेपेन अहङ्कारेण ऽपरे

mātāpitṛkṛtairdoṣairanye kecitsvakarmajaiḥ / naṣṭā jñānāvalepena ahaṅkāreṇa 'pare

हिन्दी अर्थ

सौधोच्ववप्रप्राकारं सर्वतश्चातकाघृतम । तदेक॑ स्वस्तिकद्वारं कुमारीपुरमेव च ॥

English

After placing the oceans in the heart and remembering the deities therein, he should bathe with a thousand vessels.

अध्याय ११

श्लोक 36

शाङ्करे प्रस्थिता धर्मे ये स्मृत्यर्थबहिष्कृताः ।क्लिश्यमानास्तु कलेन ते यान्ति परमां गतिम्

śāṅkare prasthitā dharme ye smṛtyarthabahiṣkṛtāḥ / kliśyamānāstu kalena te yānti paramāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

परमाधांधेमायामं प्रागुद्कप्रवर्ण पुरम। छिन्नकर बिकरा त् व्यजञ्ञन कृतसस्थितम् ॥

English

With waters upto the neck, Dhdrand shall be fixed the head. When afflicted by the back-current of poison he shall perform Dkdrana over all the parts of his body.

अध्याय ११

श्लोक 37

अश्रद्दधानाः पुरुषा मूर्खा दम्भविवर्धिताः ।न सिध्यन्ति दुरात्मानः कुदृष्टान्तार्थकीर्तनाः

aśraddadhānāḥ puruṣā mūrkhā dambhavivardhitāḥ / na sidhyanti durātmānaḥ kudṛṣṭāntārthakīrtanāḥ

हिन्दी अर्थ

एक योजन होता है ।१०४-१०६३। इस योजन परिमाण के अनुसार से उन लोगों ने अपना-अपना वासस्थान बनाया था । उन लोगों ने चार तरह के दुर्गों का भी निर्माण किया। जिनमें तीन दुर्ग तो प्राकृतिक होते थे, परन्तु चौथा कृत्रिम होता था। इस कृत्रिम दुर्ग की भी विधि सुनिये--उसमें ऊँचे घेरे वाले कोठे, बहुजलपूर्ण परिखा, सेतु संयुक्त द्वारदेश और स्वतिक द्वार होते हैं । ढु्ग में कुमारिपुर भी रहता है ।( ०७-१० ६ परिखा को

English

He shall drink in the clay from the ant-hill with the cups of the withered fallen leaves of the Arka plant. This Yogic mode of treatment is well known in the world.

अध्याय ११

श्लोक 38

महाभाग्ये ऽपि तीर्थस्य शाङ्करं व्रतमास्थिताः ।वियोनिं यान्त्यसन्दिग्धं लौलुप्येन समन्विताः

mahābhāgye 'pi tīrthasya śāṅkaraṃ vratamāsthitāḥ / viyoniṃ yāntyasandigdhaṃ laulupyena samanvitāḥ

हिन्दी अर्थ

लम्बाई और चौड़ाई दश और आठ हाथ की ठीक होती है, या नौ और आठ हाथ की भी होती है। खेट, , नगर, ग्राम और त्रिविध दुर्गों की सीमा पंत अथवा जल द्वरा बाँधी जाती है। विष्कम्भ परिमाण के त्रिविध दुर्गों का आयतन परिमाण साढ़े आठ अंश का होता है ।११७। लम्बाई से आधी चौड़ाई वाला पुर श्रेष्ठ होता है। पूर्वोत्तर दिशा का भाग कुछ निम्त रहना चाहिए ।११६। छिन्नकर्ण, विकर्ण, छिटफुट,

English

It has been- explained briefly in the manner found among the topics of Yoga. You should know the suitable traits of the Brahmana before you shall reveal it.

अध्याय ११

श्लोक 39

न तीर्थैर्न च दानैश्च दुष्कृतं हि विलुप्यते ।अज्ञानाच्च प्रमादाच्च कृतं पापं विनश्यति

na tīrthairna ca dānaiśca duṣkṛtaṃ hi vilupyate / ajñānācca pramādācca kṛtaṃ pāpaṃ vinaśyati

हिन्दी अर्थ

घना, गोल, छोटा और बड़ा पुर निन्‍्दनीय होता है । चौकोर कुछ बड़ा एवम् एक दिशा में घना पुर उत्तम होता है, किन्तु इनमें भी अपेक्षा कृत पहला ही उत्तम है। चौबीस हाथ और एक सौ आठ हाथों के विष्कम्भ परिमाण से युक्त सम चतुरत्र (चौकोर) मध्य भाग प्रशंशनीय होता है। पुरमध्यवर्ती मुख्य वासस्थान का विष्कम्भ-परिणाम अष्ट शत किष्क है।११०-११५३॥ नगर के परिमाण से खेट का

English

Strength, health, indifference to sensual objects, lust-

अध्याय ११

श्लोक 40

एवं ज्ञात्वा तु विधिना वर्तितव्यं द्विजातिभिः ।परं ब्रह्म जपद्भिश्च वार्तितव्यं मुहुर्मुहुः

evaṃ jñātvā tu vidhinā vartitavyaṃ dvijātibhiḥ / paraṃ brahma japadbhiśca vārtitavyaṃ muhurmuhuḥ

हिन्दी अर्थ

परिमाण आधा होता है और खेट (कस्बा) के परिमाण से ग्राम का परिमाण छोटा रहता है। नगर से खेट एक योजन प्लर और ख्ेट से ग्राम आधे योजन पर रहता है। परम (चरम) सीमा दो कोसों की, क्षेत्र

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 41

ऊर्ध्वरूपं विरूपाक्षं योऽधीते रुद्रमेव च ।ईशानं पश्यते साक्षात् षण्मासात् सङ्गवर्जितः

ūrdhvarūpaṃ virūpākṣaṃ yo'dhīte rudrameva ca / īśānaṃ paśyate sākṣāt ṣaṇmāsāt saṅgavarjitaḥ

हिन्दी अर्थ

नगराद्रोजनं खेर खेटादुप्रामोइधयोजनम् । द्धिकोशे परमा सीमा क्षेत्रसीमा ये तर्ध॑ज्ञुः

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 42

संहिताया दशावृत्तीर्यः करोति सुसंयतः ।नर्मदातटमाश्रित्य स मुच्येत्सर्वपातकैः

saṃhitāyā daśāvṛttīryaḥ karoti susaṃyataḥ / narmadātaṭamāśritya sa mucyetsarvapātakaiḥ

हिन्दी अर्थ

धनंषि चैव चत्वारि शाखारथ्यास्तु तैः रताः । ग्॒हरथ्योपरध्याश्व छिकाश्ाप्युपरथ्यकाः

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 43

पुराणसंहितां वापि शैवीं वा वैष्णवीमपि ।यः पठेन्नर्मदातीरे शिवाग्रे स शिवात्मकः

purāṇasaṃhitāṃ vāpi śaivīṃ vā vaiṣṇavīmapi / yaḥ paṭhennarmadātīre śivāgre sa śivātmakaḥ

हिन्दी अर्थ

अवस्करं परीवाहं पद्मात्र समन्‍ततः । छकतेथु तेषु स्थानेघु पुनश्चक्रण द्वारणिं वे ।

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 44

आ भूतसंक्षयं यावत्स्वर्गलोके महीयते ।संसाख्यसनं हातुं पुरा प्रोक्तं तु नन्दिना

ā bhūtasaṃkṣayaṃ yāvatsvargaloke mahīyate / saṃsākhyasanaṃ hātuṃ purā proktaṃ tu nandinā

हिन्दी अर्थ

की सीमा चार धनु की होती है ।११६-११७। प्रत्येक दिकृषथ का विस्तार बीस बीस धनुओं का होता है। ग्राम्य पथका विस्तार भी,बीस घनु और सीमापथ का परिमाण दस धनु होता है। श्रीसम्पन्न राजपथ का विस्तार दस धनुओं का होता है, जिसमें मनुष्य, हाथी, घोड़े, रथ आदि सुख पूर्वक चल फिर सके

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 45

देवर्षिसिद्धगन्धर्वसमवाये शिवालये ।नन्दिगीतामिमां राजञ्छृणुष्वैकमनाः शुभाम्

devarṣisiddhagandharvasamavāye śivālaye / nandigītāmimāṃ rājañchṛṇuṣvaikamanāḥ śubhām

हिन्दी अर्थ

उस काल के प्रजांगण दाखागली चार धनुका बनाते थे। घरेलू गली दो धनुकी, साधारण गली एक धनुकी, घंटापथ चार पदका और गहास्तर तीन पदका होता था । वत्तिपषय आधा पदका और प्राग्वंश एक पदका एवम् अवस्कर और जलनिगंम स्थान एक पदका होता था ।११८-१२१३॥। वे प्रजागण ऐसा करके पहले जिस प्रकार वक्षों के निकट वास करते थे बसे ही घरों को भी उन्हीं वृक्षों के अनुकरण से बार-बार सोच विचार

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 46

स्वर्गमोक्षप्रदां पुण्यां संसारभयनाशिनीम्

svargamokṣapradāṃ puṇyāṃ saṃsārabhayanāśinīm

हिन्दी अर्थ

कर बनाने लगे ।१२०-१२३। वक्ष की शाखा जिस प्रकार आगे पीछे, ऊपर और इधर-उधर फंली रहती है, उसी प्रकार काठ फैला कर उन लोगों ने उत्तम घर बनाया वृक्षशाखा की तरह विन्यस्त होने से वेसे घरों का नाम शाला रखा गया। शालतरा के आकार में बनाये जाने के कारण वे गृह शाला के नाम से प्रसिद्ध हुए। ल्‍यही शाला शब्द का योगाथे है; क्योंकि शाखाओं से ही शाला और

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 47

संसारगह्वरगुहां प्रविहातुमेतां चेदिच्छथ प्रतिपदं भवतापखिन्नाः ।नानाविधैर्निजकृतैर्बहुकर्मपाशैर्बद्धाः सुखाय शृणुतैकहितं मयोक्तम्

saṃsāragahvaraguhāṃ pravihātumetāṃ cedicchatha pratipadaṃ bhavatāpakhinnāḥ / nānāvidhairnijakṛtairbahukarmapāśairbaddhāḥ sukhāya śṛṇutaikahitaṃ mayoktam

हिन्दी अर्थ

शालात्व बने हैं ।१२४५-१२६। जिस घर से मन प्रसन्न हो और जो मन को प्रसन्न करे ऐसे, गृह और शाला

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 48

शक्र वक्रगतिं मा गा मा कृथा यम यातनाम् ।चेतः प्रचेतः शमय लौलुप्यं त्यज वित्तप

śakra vakragatiṃ mā gā mā kṛthā yama yātanām / cetaḥ pracetaḥ śamaya laulupyaṃ tyaja vittapa

हिन्दी अर्थ

“धनुश्चिह्ास्तगंतग्रल्थों ड. पुस्तके नास्ति।

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 49

दीनानाथविशिष्टेभ्यो धनं सर्वं परित्यज ।यदि संसारजलधेर् वीचीप्रेङ्खोल्लनातुरः

dīnānāthaviśiṣṭebhyo dhanaṃ sarvaṃ parityaja / yadi saṃsārajaladher vīcīpreṅkhollanāturaḥ

हिन्दी अर्थ

छत्वा उंह्वोपघातास्तांस्तान्वातापायमचिन्तयन। नष्टेचु मघुना साथ कर्पचृक्षेषु वै तदा

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 50

जन्मोद्विग्नं मृतेस्त्रस्तं ग्रस्तं कामादिभिर्नरम् ।स्रस्तं यो न यमादिभ्यः पिनाकी पाति पावनः

janmodvignaṃ mṛtestrastaṃ grastaṃ kāmādibhirnaram / srastaṃ yo na yamādibhyaḥ pinākī pāti pāvanaḥ

हिन्दी अर्थ

विषादव्याकुल्ास्ता चै प्रजास्तृष्णाछुधात्मिकाः ततः प्रादुधभों तासां सिद्धिल्न तायुगे पुनः ।। वाताथिसाधिका 5प्यन्या वुत्तिसतासां हि कामत)। तासां वृश्युद्कानीह यानि निम्नैगंतानि तु ॥

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 51

मा धेहि गर्वं कीनाश हास्यं यास्यसि पीडयन् ।प्राणिनं सर्वशरणं तद्भावि शरणं तव

mā dhehi garvaṃ kīnāśa hāsyaṃ yāsyasi pīḍayan / prāṇinaṃ sarvaśaraṇaṃ tadbhāvi śaraṇaṃ tava

हिन्दी अर्थ

पे परस्तादपां स्तोका आपन्नाः पृथिवीतले । भपां भूमेश्य संयोगादोषध्यस्तासु चाभवन ॥

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 52

कालः करालको बालः को मृत्युः को यमाधमः ।शिवविष्णुपराणां हि नराणां किं भयं भवेत्

kālaḥ karālako bālaḥ ko mṛtyuḥ ko yamādhamaḥ / śivaviṣṇuparāṇāṃ hi narāṇāṃ kiṃ bhayaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मणा। मानवास्ते वा उत्पन्ना योजनादिह। शान्ताश्व शुष्मिणश्चैच कमिणों दुःश्विनस्तदा ॥

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 53

भवभारार्तजन्तूनां रेवातीरनिवासिनाम् ।भर्गश्च भगवांश्चैव भवभीतिविभेदनौ

bhavabhārārtajantūnāṃ revātīranivāsinām / bhargaśca bhagavāṃścaiva bhavabhītivibhedanau

हिन्दी अर्थ

2... नम प-+आ० ०७ ००४५०००७००॥५४०७३३-५५५५०५७. अमन पा ॥५७७७७७७४+३७७७७७७७७++५७७४.-५०५७७७७७७४७५७४४७४७५४३ पहन ३००+०३५+ 9048 «;७॥७७७६७४५७:५+०-+मेका-४++न+ मम आ+ 3१४४ धमम वुमन नी बी. ५७० ० नी पीनी-+ मेक ४५४५० प३५+५+५++++++ नानक +०म ++ नाम नाव मन भ ०७४५ बडी ४४५५७-४४+;५०००++++ मनन» +-४८+-नन+नतनतक्‍नन न ५५५५3 ++ननन-+- 4-5 भा 33-५3 नकल +++ननननपआनआन+नननननन----+ ८“ आ-नन----ज

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 54

शिवं भज शिवं ध्याय शिवं स्तुहि शिवं यज ।शिवं नम वराक त्वं ज्ञानं मोक्षं यदीच्छसि

śivaṃ bhaja śivaṃ dhyāya śivaṃ stuhi śivaṃ yaja / śivaṃ nama varāka tvaṃ jñānaṃ mokṣaṃ yadīcchasi

हिन्दी अर्थ

का नाम प्रासाद रखा गया। उस काल के प्रजागण इस प्रकार शीतोष्णादि दन्द्द क्लेश का निवारण करके जीविका का उपाय सोचने गगे। मधु के साथ-साथ कल्पबुक्षों के विनष्ट हो जाने से वे प्रजागण भूख, प्यास और विषाद से व्याकुल हो रहे थे। तब सत्ययुग की ही तरह उस त्रेतायुग में उनके बीच कामानुरूप वार्तायंसाधक (जीविका साधक) वृष्टि रूप सिद्ध उत्पन्न हुईं । इसीसे उनकी वृत्ति जीविका” चली।

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 55

पठ पञ्चाननं शास्त्रं मन्त्रं पञ्चाक्षरं जप ।धेहि पञ्चात्मकं तत्त्वं यज पञ्चाननं परम्

paṭha pañcānanaṃ śāstraṃ mantraṃ pañcākṣaraṃ japa / dhehi pañcātmakaṃ tattvaṃ yaja pañcānanaṃ param

हिन्दी अर्थ

उस द्वितीय वुष्टि-सृष्टि से पृथ्वी का जो स्थान जल हीन और शुष्क हो गया था, वह जल पूर्ण हो गया । गड्ढे नदी के रूप में परिणत हो गये और जगह-जगह से जो जल रुक गये थे, उससे पृथ्वी रसवती होकर शस्यशालिनी हो गई । बिना जोते-बोये चौदह तरह की फल-फूल मूल वाली ओषधियाँ गाँवों और जंगलों में उज॒ आईं। उस ज्रेता युग में ही ऋतुओं के अनुकूल पुष्प, फल, व॒क्ष-गरुल्म और जीविका की बहुबिध

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 56

किं तैः कर्मगणैः शोच्यैर्नानाभावविशेषितैः ।यदि पञ्चाननः श्रीमान् सेव्यते सर्वथा शिवः

kiṃ taiḥ karmagaṇaiḥ śocyairnānābhāvaviśeṣitaiḥ / yadi pañcānanaḥ śrīmān sevyate sarvathā śivaḥ

हिन्दी अर्थ

ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। उन औषधियों के गुण से उस काल के प्रजा लोग सुख पूर्वक कालयापन करते थे । तब युग धर्म के अनुसार अवश्यम्भावी रोग और लोभ उनमें उत्पन्न हुए। अपनी शक्ति के अनुसार उन लोगों ने क्षेत्र, पंत वृक्ष, गुल्म और औषधियों को अपने अपने अधिकार में करने लगे सत्ययुग के पूर्व जिन सिद्धात्माओं की कथा को कहा है, वे ब्रह्मा की मानस सृष्टि हैं। यजन से ही उनकी उत्पत्ति है।

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 57

किं संसारगजोन्मत्तबृंहितैर् निभृतैरपि ।यदि पञ्चाननो देवो भावगन्धोपसेवितः

kiṃ saṃsāragajonmattabṛṃhitair nibhṛtairapi / yadi pañcānano devo bhāvagandhopasevitaḥ

हिन्दी अर्थ

वे ही फिर तज्रेतायुग में जन्मग्रहण करते हैं ।!२--१३८२। शुभाशुभ कर्म के गुरुत्व और लघुत्व के अनुसार यथा

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 58

रे मूढ किं विषादेन प्राप्य कर्मकदर्थनाम् ।भवानीवल्लभं भीमं जप त्वं भयनाशनम्

re mūḍha kiṃ viṣādena prāpya karmakadarthanām / bhavānīvallabhaṃ bhīmaṃ japa tvaṃ bhayanāśanam

हिन्दी अर्थ

+ एतदधंस्थाने “बृष्टया निम्ता निरभवत्स्नोत:खातानि निमम्ता'” इति क. ख. घ. ड. पुस्तकेषु ।

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 59

नर्मदातीरनिलयं दुःखौघविलयंकरम् ।स्वर्गमोक्षप्रदं भर्गं भज मूढ सुरेश्वरम्

narmadātīranilayaṃ duḥkhaughavilayaṃkaram / svargamokṣapradaṃ bhargaṃ bhaja mūḍha sureśvaram

हिन्दी अर्थ

तेर्षा कर्माणि कुर्वन्ति तेभ्यश्वैचाबलास्तु ये- परिचर्यास्व(सु) वर्तन्‍्ते तेभ्यश्वान्ये इल्पतेजसः ।। पएुव॑ विप्रतिपन्‍नेषु प्रपन्नेष परस्परम् । तेन दोषेण तेषां ता ओषध्यों मिषता तदां

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 60

विहाय रेवां सुरसिन्धुसेव्यां तत्तीरसंस्थं च हरं हरिं च ।उन्मत्तवद् भावविवर्जितस्त्वं क्व यासि रे मूढ दिगन्तराणि

vihāya revāṃ surasindhusevyāṃ tattīrasaṃsthaṃ ca haraṃ hariṃ ca / unmattavad bhāvavivarjitastvaṃ kva yāsi re mūḍha digantarāṇi

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मा स्वयं भूर्मग वाज्ज्ञात्वा तासां मनीषितम्। युक्त॑ प्रत्यक्षरष्टेन दशनेन घिचाये च

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 61

भज रेवाजलं पुण्यं यज रुद्रं सनातनम् ।जप पञ्चाक्षरीं विद्यां व्रज स्थानं च वाञ्छितम्

bhaja revājalaṃ puṇyaṃ yaja rudraṃ sanātanam / japa pañcākṣarīṃ vidyāṃ vraja sthānaṃ ca vāñchitam

हिन्दी अर्थ

ओषध्यः फलपाकान्ताः सप्तसप्तदशास्तु ताः। घीहयश्व यवाश्चैध (गोधूमा अणचस्तिलाः

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 62

क्लेशयित्वा निजं कायम् उपायैर् बहुभिस्तु किम् ।भज रेवां शिवं प्राप्य सुखसाध्यं परं पदम्

kleśayitvā nijaṃ kāyam upāyair bahubhistu kim / bhaja revāṃ śivaṃ prāpya sukhasādhyaṃ paraṃ padam

हिन्दी अर्थ

+प्रियंगवों हुवा राष्र कारूषाश्ध सची(ती)नका!। माषा मुदगा मखूरास्ध निष्पाचाःसकुलत्थकाः आढक्याश्वणकाश्वैव सप्तसप्तद्शाः स्मूताः । इत्येता भोषचधीनां तु प्रास्याणां जातयः स्मृताः ।।

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 63

एवं कैलासमासाद्य नदीं स शिवसन्निधौ ।जगौ यल्लोकपालानां तन्मयोक्तं तवाधुना

evaṃ kailāsamāsādya nadīṃ sa śivasannidhau / jagau yallokapālānāṃ tanmayoktaṃ tavādhunā

हिन्दी अर्थ

क्रम से ब्राह्मण, क्षत्रिय बैश्य और इन तीनों का द्रोहकारी शूद्र, इस तरह चतुविध प्रजा उत्पन्न हुईं। उनके

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 64

मार्कण्डेय उवाच: स्नानदानपरो यस्तु नित्यं धर्ममनुव्रतः ।नर्मदातीरमाश्रित्य मुच्यते सर्वपातकैः

mārkaṇḍeya uvāca: snānadānaparo yastu nityaṃ dharmamanuvrataḥ / narmadātīramāśritya mucyate sarvapātakaiḥ

हिन्दी अर्थ

में रहते थे। इसकी अपेक्षा जो दुबंल थे, वे इनसे प्रतिग्रह दान! लिया करते थे ।१३६-१४१। जो इनकी अपेक्षा भी दुबंल थे, इनका कर्म किया करते थे जो इनसे भी दुबंल थे, वे इनकी परिचर्या किया करते थे । इस तरह वे परस्पर आश्रय लेकर कालयापन करते थे । उनके इस दोष से ओषधियाँ इस तरह नष्ट हो गईं, जिस प्रकार क्रमशः मुठठी-मुद्ठी हटाने से बालुका राशि नष्ट हो जाती है। युगधर्मानुकल पृथ्वी ने तब

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 65

विधिहीनो जपेन्नित्यं वेदान्सर्वाञ्छतं समाः ।मृत्युलाङ्गलजाप्येन समो यो ऽप्यधिको गुणैः

vidhihīno japennityaṃ vedānsarvāñchataṃ samāḥ / mṛtyulāṅgalajāpyena samo yo 'pyadhiko guṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

चौदहों प्रकार के जंगली और' ग्रामीण ससयों को अपने में छिपा लिया । प्रजागण उस समय फल लेते समय पुष्ष और पुष्प लेते समय पत्र को भी तोड़ लिया करते थे, इससे वे सब नष्ट हो गये ओर प्रजागण व्याकुल हो उठे । वे व्याकुल हो पुतः जीविका लाभ के लिये स्वयम्भू-प्रजापति ब्रह्मा के पास उपस्थित हुये । उस ज्रेतायुग के आदि काल में स्वयम्भू प्रजापति (ब्रह्मा ने उनकी अभिलाषा को जान लिया ओर प्रत्यक्ष

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 66

बीजयोन्यविशुद्धस्तु यथा रुद्रं न विन्दति ।तथा लाङ्गलमन्त्रो ऽपि न तिष्ठति गतायुषि

bījayonyaviśuddhastu yathā rudraṃ na vindati / tathā lāṅgalamantro 'pi na tiṣṭhati gatāyuṣi

हिन्दी अर्थ

भी देखा विचार करने के बाद यह जान कर कि पृथ्वी ने ओषधियों को अपने में छिपा लिया है, प्रथ्वी को फिर से दुहा । उन्होंने सुमेह को बछड़ा बनाकर इस पृथ्षी को दुह्ा दुहे जाने पर इस धेनु रूपा प्रथ्वी ने जंगली और ग्रामीण बीजों को प्रृथ्वी तल पर उत्पन्न क्रिया । फल पकने तक जिसके बीज रहें वे ओषधियां हैं । ये ओषधियाँ सत्रह प्रकार की हैं। धान, जौं, गेहूं, तिल, प्रियंगु, उदार, कारूष, सवीतक, माष, मूंग,

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 67

गायत्रीजपसंयुक्तः संयमी ह्यधिको गुणैः ।अग्निम् ईडे इषेत्वो वा अग्न आयाहि नित्यदा

gāyatrījapasaṃyuktaḥ saṃyamī hyadhiko guṇaiḥ / agnim īḍe iṣetvo vā agna āyāhi nityadā

हिन्दी अर्थ

मसूर, निष्पाव कुलथी, आढृक्य, ओर चना ये सत्रह प्रकार की ओषधियाँ ग्रामीण कही जाती हैं ।१४२-:५२॥।

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 68

शन्नो देवीति कूलस्थो जपेन्मुच्येत किल्बिषैः

śanno devīti kūlastho japenmucyeta kilbiṣaiḥ

हिन्दी अर्थ

एलच्चिह्लान्तगंतग्रन्थो ड. पुस्तके नास्ति । + धनुश्चिह्नान्तगंतग्रन्थों घ. पुस्तके नास्ति ।

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 69

साङ्गोपाङ्गांस् तथा वेदाञ्जपन्नित्यं समाहितः ।न तत्फलमवाप्नोति गायत्र्या संयमी यथा

sāṅgopāṅgāṃs tathā vedāñjapannityaṃ samāhitaḥ / na tatphalamavāpnoti gāyatryā saṃyamī yathā

हिन्दी अर्थ

प्रियंगुसप्तमा होते अष्टमी तु कुलत्थिका श्यामाकास्त्वथ नीवारा जतिलाः सगवेधुकाः

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 70

रुद्राध्यायं सकृज्जप्त्वा विप्रो वेदसमन्वितः ।मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति

rudrādhyāyaṃ sakṛjjaptvā vipro vedasamanvitaḥ / mucyate sarvapāpebhyo viṣṇulokaṃ sa gacchati

हिन्दी अर्थ

कुरुचिन्दा वेशुयवास्तथा मकटकाश्च ये । ग्रास्यारण्याः स्खता छोता ओष ध्यस्त चतुद श

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 71

अन्यद्वै जप्यसंस्थानं सूक्तमारण्यकं तथा ।मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति

anyadvai japyasaṃsthānaṃ sūktamāraṇyakaṃ tathā / mucyate sarvapāpebhyo viṣṇulokaṃ sa gacchati

हिन्दी अर्थ

यदा प्रसष्ठा ओषध्यो न प्ररोहन्ति ता; पुनः ततः ख ताखां चृत्त्यथ बार्तापा चकार है

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 72

यत्किंचित्क्रियते जाप्यं यच्च दानं प्रदीयते ।नर्मदाजलमाश्रित्य तत्सर्वं चाक्षयं भवेत्

yatkiṃcitkriyate jāpyaṃ yacca dānaṃ pradīyate / narmadājalamāśritya tatsarvaṃ cākṣayaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मा स्वयं भूभेगवान्दष्ठा सिद्धि त कमंजाम् । ततः प्रभ्ृत्यथोंष ध्यः कृष्टपच्यास्तु जज्निरे

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 73

एवंविधैर्व्रतैर्नित्यं नर्मदां ये समाश्रिताः ।ते मृता वैष्णवं यान्ति पदं वा शैवम् अव्ययम्

evaṃvidhairvratairnityaṃ narmadāṃ ye samāśritāḥ / te mṛtā vaiṣṇavaṃ yānti padaṃ vā śaivam avyayam

हिन्दी अर्थ

ये वे परिग्रहीतार स्तामासामासन्विधात्मका। । इतरेषां छृतत्राणाः स्थापयामास क्षत्नरियान

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 74

सत्यलोकं नराः केचित्सूर्यलोकं तथापरे ।अप्सरोगणसंवीता यावदाभूतसम्प्लवम्

satyalokaṃ narāḥ kecitsūryalokaṃ tathāpare / apsarogaṇasaṃvītā yāvadābhūtasamplavam

हिन्दी अर्थ

ये चान्येडप्यबालास्तेषां चेशस कर्म संस्थिताः । कीनाशा नाशयबन्ति सम प्ृृथिव्या।

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 75

एवं वै वर्तमाने ऽस्मिंल्लोके तु नृपपुंगव ।ऋषीणां दशकोट्यस्तु कुरुक्षेत्रनिवासिनाम्

evaṃ vai vartamāne 'smiṃlloke tu nṛpapuṃgava / ṛṣīṇāṃ daśakoṭyastu kurukṣetranivāsinām

हिन्दी अर्थ

ग्रामीण और जंगली चोदह प्रकार की ओषधियाँ यज्ञसाधन हैं। ब्रीहिं, यव, माष, गोधूम, अणु, तिल, प्रियंगु, कुलथी, इ्यामाक, नीवार, जतिल गवेधुक, कुरुविन्द, वेणुयव और मर्कटक ये चौदह प्रकार की ओबषधियाँ ग्रामीण और आरण्यक दोनों हैं । त्रतायुग के आदि काल में पहले से उत्पन्न हुईं । बिना जोते ये ओषधियाँ जंगलों और ग्रामों में उत्पन्न हुईं । इनके अतिरिक्त वृक्ष, ग्रुलम, लता, वल्‍ली बीरुध तृण आदि

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 76

मया सह महाभाग नर्मदातटमाश्रिताः ।फलमूलकृताहारा अर्चयन्तः स्थिताः शिवम्

mayā saha mahābhāga narmadātaṭamāśritāḥ / phalamūlakṛtāhārā arcayantaḥ sthitāḥ śivam

हिन्दी अर्थ

भी प्रादुर्भूत होकर मूल, फल, पृष्प आदि से प्रजाओं को सुख समृद्ध करने लगे। ब्रह्मा द्वारा दुहे जाने पर पृथ्वी ने जिन बीजों को उत्पन्न किया था, उनसे ऋतुओं के अनुकूल उनसे विविध प्रकार के फल उत्पन्न हुए किन्तु जब वे ओषधियाँ अच्छी तरह उगीं नहीं तब तक के लिये उन्होंने उनकी जीविका का उपाय किया कि भूमि जोतकर अन्न उपजाया जाय स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा ने उनकी कमंजन्य सिद्धि

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 77

तच्च वर्षशतं दिव्यं कालसंख्यानुमानतः ।षड्विंशतिसहस्राणि तानि मानुषसंख्यया

tacca varṣaśataṃ divyaṃ kālasaṃkhyānumānataḥ / ṣaḍviṃśatisahasrāṇi tāni mānuṣasaṃkhyayā

हिन्दी अर्थ

को देखकर ऐसा किया । तभी से कर्षणज सस्योत्पत्ति आरम्भ हुई है। उनकी संदिग्ध वार्ता में यानी जीविकोपाय के विवाद-संवाद में ब्रह्मा ने बहुतेरी मर्यादा (व्यवस्था) स्थापित की। उनके बीच जो बलवानू और भूमिपति थे। उन क्षत्रियों को दूसरे की रक्षा का भार सौंपा। जो उन क्षत्रियों के निकट निर्भव होकर जाते थे, सत्यवादी और सवंभृतों में ब्रह्मज्ञानवान् थे वे ब्राह्मण बहलाये

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 78

ततस्तस्यामतीतायां सन्ध्यायां नृपसत्तम ।शेषं मानुष्यमेकं तु काले वर्षशतं स्थितम्

tatastasyāmatītāyāṃ sandhyāyāṃ nṛpasattama / śeṣaṃ mānuṣyamekaṃ tu kāle varṣaśataṃ sthitam

हिन्दी अर्थ

जो उनकी अपेक्षा निम्नक्र कर्म करने वाले और यमकी तरह जानबल्कर प्रथ्वी पर प्रजाओं

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 79

ततो ऽभवदनावृष्टिर्लोकक्षयकरी तदा ।यया यातं जगत्सर्वं क्षयं भूयो हि दारुणम्

tato 'bhavadanāvṛṣṭirlokakṣayakarī tadā / yayā yātaṃ jagatsarvaṃ kṣayaṃ bhūyo hi dāruṇam

हिन्दी अर्थ

घौश्यन्येच तु तानाहु! की नाशान्वुक्तिसाधकान् । शोचन्तश्न द्वच-्तञ्व परिच्यांसु ये रताः १६४ निस्तेजसो 5पवीयांश्व शूद्धांस्तानअवीच खः ठेषां कर्मांणि,घर्माश्च ब्लक्षा। तु व्यद्चात्प ॥

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 80

ये पूर्वमिह संसिद्धा ऋषयो वेदपारगाः ।तेषां प्रभावाद् भगवान् ववर्ष बलवृत्रहा

ye pūrvamiha saṃsiddhā ṛṣayo vedapāragāḥ / teṣāṃ prabhāvād bhagavān vavarṣa balavṛtrahā

हिन्दी अर्थ

वर्णधममं रजीवन्त्यो व्यरध्यन्त परस्परम् । ब्रह्मा तभर्थ बुदूष्चा त याथातथ्येन वे प्रभु:

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 81

महती भूरिसलिला समन्ताद्वृष्टिराहिता ।ततो वृष्ट्या तु तेषां वै वर्तनं समजायत

mahatī bhūrisalilā samantādvṛṣṭirāhitā / tato vṛṣṭyā tu teṣāṃ vai vartanaṃ samajāyata

हिन्दी अर्थ

शिव्पाजीवं भ्ूर्ति चैव शूद्वाणां व्यद्धात्मभ्भुः सामान्यानि त॒ कर्माणि ब्लक्षत्रविशां पुनः

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 82

पुनर् युगान्ते सम्प्राप्ते किंचिच्छेषे कलौ युगे ।निःशेषम् अभवत् सर्वं शुष्कं स्थावरजङ्गमम्

punar yugānte samprāpte kiṃciccheṣe kalau yuge / niḥśeṣam abhavat sarvaṃ śuṣkaṃ sthāvarajaṅgamam

हिन्दी अर्थ

यजनाध्ययन दान॑ सामानन्‍्यानि त॒ तेषु च्। कर्माजीव॑ ततो द्र्वा तेभ्यश्वेव परस्परम्

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 83

निर्वृक्षौषधगुल्मं च तृणवीरुद्विवर्जितम् ।अनावृष्टिहतं सर्वं भूमण्डलम् अभूद्भृशम्

nirvṛkṣauṣadhagulmaṃ ca tṛṇavīrudvivarjitam / anāvṛṣṭihataṃ sarvaṃ bhūmaṇḍalam abhūdbhṛśam

हिन्दी अर्थ

लोकान्तरेष स्थानानि तेषां सिद्धाद्दात्प्रभुः प्राजापत्यं॑ ब्राझ्णानां रुखत॑ स्थान

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 84

ततस्ते ऋषयः सर्वे क्षुत्तृषार्ताः सहस्रशः ।युगस्वभावमाविष्टा हीनसत्त्वा अभवन्नृप

tataste ṛṣayaḥ sarve kṣuttṛṣārtāḥ sahasraśaḥ / yugasvabhāvamāviṣṭā hīnasattvā abhavannṛpa

हिन्दी अर्थ

स्थानमैन्द्र क्षत्रियाणां सडग्नामेष्वपलायिनाम् चेश्यानां मारुत॑ स्थानं स्वधर्ममुपजीचिनाम् ॥।

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 85

नष्टहोमस्वधाकारे युगान्ते समुपस्थिते ।किं कार्यं क्व नु यास्यामः को ऽस्माकं शरणं भवेत्

naṣṭahomasvadhākāre yugānte samupasthite / kiṃ kāryaṃ kva nu yāsyāmaḥ ko 'smākaṃ śaraṇaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

तल स्थितेष वर्णंष स्थापयामास चा55भ्रमान् । ग्रहस्थो ब्रह्मचारित्व॑ वानप्रस्थं समिच्ुकम्॥

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 86

तानहं प्रत्युवाचेदं मा भैष्टेति पुनःपुनः ।ईदृग्विधा मया दृष्टा बहवः कालपर्ययाः

tānahaṃ pratyuvācedaṃ mā bhaiṣṭeti punaḥpunaḥ / īdṛgvidhā mayā dṛṣṭā bahavaḥ kālaparyayāḥ

हिन्दी अर्थ

का नाश करते थे उन्हें कीनाश पद से अभिहितकर वेश्य कहा और उन्हें सर्व साधारण के वत्ति साधन कारये में लगाया । जो सोचते हुए शोक करते हुए इधर उधर भ्रमण करते थे और निस्तेज थे, उन्हें शूद्र कहा और उन्हें परिचर्या-कार्य में लगाया। इस तरह ब्रह्मा ने उनके धर्म-कर्म का प्रणयन किया और वे चतुर्वणं अपने - अपने कतेब्यों का पालन करने लगे। फिर वे क्रम क्रम से मोहवश होकर उन सकल

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 87

नर्मदातीरमाश्रित्य ते सर्वे गमिता मया ।एषा हि शरणं देवी सम्प्राप्ते हि युगक्षये

narmadātīramāśritya te sarve gamitā mayā / eṣā hi śaraṇaṃ devī samprāpte hi yugakṣaye

हिन्दी अर्थ

वर्णधर्म नियमों का अनादर कर परस्पर विरुद्धाचरण में प्रवृत्त हुए । प्रभु ब्रह्मा ने यथाथेतः उनके आचरणों को जानकर क्षत्रियों को बल, शासन और युद्ध जीविकोपाय बताया, ब्राह्मणों को याजन, अध्यापन और प्रतिग्रह रूप तीन कर्म बतलाये, पशुपालन, वाणिज्य और क्ृषिकर्म रूप जीविकोपाय वैश्यों को दिया, एवं शुद्रों के लिये शिल्प तथा दास्तत्व की व्यवस्था की । ब्राह्मण, क्षत्रिय और वंश्यों के लिये यजन, अध्ययन

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 88

नान्या गतिरिहास्माकं विद्यते द्विजसत्तमाः ।जनित्री सर्वभूतानां विशेषेण द्विजोत्तमाः

nānyā gatirihāsmākaṃ vidyate dvijasattamāḥ / janitrī sarvabhūtānāṃ viśeṣeṇa dvijottamāḥ

हिन्दी अर्थ

एवं दान की सामान्य रूप से व्यवस्था की । ब्रह्मा. ने उन्हें परस्पर कर्म और जीविका देकर उनकी सिद्धि के अनुरूप लोकान्तर में भी स्थानों का निर्देश कर दिया । क्रियाशील ब्राह्मणों के लिये प्राजापत्यस्थान, संग्राम में डटे रहने वाले क्षत्रियों के लिये ऐन्द्रस्थान, स्वधर्मनिष्ठ वैइयों के लिये मारुत नामक स्थान और अपने आचरण में निरत शूद्रों के लिये गान्धर्व स्थान का निरूपण किया। स्वधर्मनिष्ठ वर्णचतुष्टयों के लिये

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 89

पितामहा ये पितरो ये चान्ये प्रपितामहाः ।ते समस्ता गताः स्वर्गं समाश्रित्य महानदीम्

pitāmahā ye pitaro ye cānye prapitāmahāḥ / te samastā gatāḥ svargaṃ samāśritya mahānadīm

हिन्दी अर्थ

उन्होंने इन स्थानों का विधान किया इस तरह वर्णंधमे के प्रतिष्ठित हो जाने पर उन्होंने आश्रमों का स्थापन किया ।१६४-१७५३। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानत्रस्थ और भिक्षुक नामक चार आश्रमों को ब्रह्मा ने पहले स्थापित

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 90

भृग्वाद्याः सप्त ये त्वासन्मम पूर्वपितामहाः ।धौमृणी च महाभागा मम भार्या शुचिस्मिता ।मनस्वती च या मता भार्गवोऽङ्गिरसस्तथा

bhṛgvādyāḥ sapta ye tvāsanmama pūrvapitāmahāḥ / dhaumṛṇī ca mahābhāgā mama bhāryā śucismitā / manasvatī ca yā matā bhārgavo'ṅgirasastathā

हिन्दी अर्थ

आश्रमांश्वत॒रों छेतास्पूर्वमास्थापयत्परभुः। चर्णकर्माण ये केचित्तेषामिह न कुचते

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 91

पुलस्त्यः पुलहश्चैव वसिष्ठात्रेयकाश्यपाः ।तथान्ये च महाभागा नियमव्रतचारिणः ।अन्ये च शतसाहस्रा अत्र सिद्धिं समागताः

pulastyaḥ pulahaścaiva vasiṣṭhātreyakāśyapāḥ / tathānye ca mahābhāgā niyamavratacāriṇaḥ / anye ca śatasāhasrā atra siddhiṃ samāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

कुतः कर्माक्षिति प्राइराश्रमस्थानधासिन। । बज्ञा तान्स्थापयामास भाश्रमान्नाम नामतः

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 92

तस्मादियं महाभागा न मोक्तव्या कदाचन ।नान्या काचिन्नदी शक्ता लोकत्रयफलप्रदा

tasmādiyaṃ mahābhāgā na moktavyā kadācana / nānyā kācinnadī śaktā lokatrayaphalapradā

हिन्दी अर्थ

निर्देशार्थ ततस्तेषां ब्रल्ला धर्मानमाषत भ्रस्थानानि च तेषां वे यमांश्व नियमांस्य ह १७७

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 93

द्वन्द्वैरनेकैर्बहुभिः क्षुत्तृषाद्यैर् महाभयैः ।मुच्यन्ते ते नराः सद्यो नर्मदातीरवासिनः

dvandvairanekairbahubhiḥ kṣuttṛṣādyair mahābhayaiḥ / mucyante te narāḥ sadyo narmadātīravāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

उसे संध्ये चगाहृम्ध होमश्वारण्यवासिनाम । आसबन्नमुसले भैक्षमस्तेयं शौचमेव च

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

अध्याय ११

श्लोक 94

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन सेवितव्या सरिद्वरा ।वाञ्छद्भिः परमं श्रेय इह लोके परत्र च

tasmāt sarvaprayatnena sevitavyā saridvarā / vāñchadbhiḥ paramaṃ śreya iha loke paratra ca

हिन्दी अर्थ

दशलक्षणको छोष घर्मः प्रोक्त। स्वयंघ्रुवा भिक्षोत्नेतानि पश्चात्न पश्चेधोपन्नतानि च

English

If he sees himselfand the earth blazing and one enter-

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 11
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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