Matsya Purana· Matsya Purāṇa
26
अध्याय 26 / 176

Adhyaya 26

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अध्याय २६

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण २६ समापितव्रतं तं तु विसृष्टं गुरुणा तदा प्रस्थितं त्रिदशावासं देवयानीदमब्रवीत्

matsya-purāṇa 26 samāpitavrataṃ taṃ tu visṛṣṭaṃ guruṇā tadā prasthitaṃ tridaśāvāsaṃ devayānīdamabravīt

हिन्दी अर्थ

ययाति बोले-नरदेव! जो अपने मुखसे अपने पुण्यकर्मोका बखान करते हैं, वे सभी इस भौम नरकमें आ गिरते हैं । यहाँ वे गीधों, गीदड़ों और कौओं आदिके खानेयोग्य इस शरीरके लिये पृथ्वीपर पुत्र-पौत्रादिरूपसे बहुधा विस्तारको प्राप्त होते हैं। इसलिये नरेन्द्र! इस लोकमें जो दुष्ट और निन्दनीय कर्म हो, उसे सर्वथा त्याग देना चाहिए। भूपाल! मैंने तुमसे सब कुछ कह दिया; बोलो, अब तुम्हें क्या बताऊँ

English

Iaunakassid: — On the fnifilmentof his vow when Kacha, after taking leave of lukra, was about to start for heaven, DevayAnf addressed the following Words to him: — I,

अध्याय २६

श्लोक 2

ऋषेर् अङ्गिरसः पौत्र वृत्तेनाभिजनेन च भ्राजसे विद्यया चैव तपसा च दमेन च

ṛṣer aṅgirasaḥ pautra vṛttenābhijanena ca bhrājase vidyayā caiva tapasā ca damena ca

हिन्दी अर्थ

अष्टकने पूछा--जब मनुष्योंको मृत्युके पश्चात् पक्षी, गीध, मयूर और पतङ्ग-ये नोच-नोचकर खा लेते हैं तब वे कैसे और किस रूपमें उत्पन्न होते हैं? आज मैं आपके ही मुखसे (प्रथम बार) भौम नरकका (जिसे कभी नहीं सुना था) नाम सुन रहा हूँ ययाति बोले--कर्मसे उत्पन्न होने और बढ़नेवाले शरीरको पाकर गर्भसे निकलनेके पश्चात् जीव सबके समक्ष इस पृथ्वीपर (विषयोंमें) विचरते हैं। उनका यह विचरण ही भौम नरक कहा गया है। इसीमें वे पड़ते हैं। इसमें

English

DevayAni said; — " 0, grandson of Ahgiras! You shine on account of your wealth, family status, learning, pious conduct, asceticism, and sobriety. As the sage Ahgira, of great renown, is respected by my father, so is Bfihaspati respected and revereil by me. Knowing this, 0 seer! consider what I say unto you. You know how I behaved towards you, while you were observing the vow with its restrictions. Your learn- ing is now accomplished. You sliould not forsake me, who am devoted to you; therefore accept my liand in marriage acoorditig to due rites and Mantras." — 2-5.

अध्याय २६

श्लोक 3

ऋषिर् यथाङ्गिरा मान्यः पितुर्मम महायशाः तथा मान्यश्च पूज्यश्च मम भूयो बृहस्पतिः

ṛṣir yathāṅgirā mānyaḥ piturmama mahāyaśāḥ tathā mānyaśca pūjyaśca mama bhūyo bṛhaspatiḥ

हिन्दी अर्थ

पड्नेपर वे व्यर्थ बीतनेवाले अनेक वर्षसमूहोंकी ओर दृष्टिपात नहीं करते। कितने ही प्राणी स्वर्गादि लोकोंमें साठ हजार वर्ष रहते हैं। कुछ अस्सी हजार वर्षोतक वहाँ निवास करते हैं। इसके बाद वे भूमिपर गिरते हैं। यहाँ उन गिरनेवाले जीवोंको तीखी दाढोंवाले पृथ्वीके भयानक राक्षस (दुष्ट प्राणी) अत्यन्त पीड़ा देते हैं

English

Eacha said: — "Your father, being iny preceptor, is just like my own father anti commands my respect and honour. Similar'' you, too, being the daughter of my preceptor and the btdovcd of Bhrirgava Sukra), are worthy of being venerated and adored by me. Your father, the sage iikra, is my venerable preceptor, consequently it <loe8 not behove yon to make any such proposal to me because you are to be honoied as a daughter of my guru and therefore slionid be hi»nored as my guru.*' 0-8.

अध्याय २६

श्लोक 4

एवं ज्ञात्वा विजानीहि यद्ब्रवीमि तपोधन व्रतस्थे नियमोपेते यथा वर्ताम्यहं त्वयि

evaṃ jñātvā vijānīhi yadbravīmi tapodhana vratasthe niyamopete yathā vartāmyahaṃ tvayi

हिन्दी अर्थ

अष्टकने पूछा--तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके भयंकर राक्षस पापवश आकाशसे गिरते हुए जिन जीवोंको सताते हैं, वे गिरकर कैसे जीवित रहते हैं ? किस प्रकार इन्द्रिय आदिसे युक्त होते हे? और गर्भमें कैसे आते हैं ? ययाति बोले अन्तरिक्षसे गिरा हुआ प्राणी असृक् (रक्त) होता है। फिर वही क्रमशः नूतन शरीरका बीजभूत वीर्य बन जाता है। (फिर) वह पुष्पके रससे संयुक्त होकर कर्मानुरूप योनिका अनुसरण करता है। गर्भाधान करनेवाले पुरुषके द्वारा स्त्रीसंसर्ग होनेपर वीर्यमें आविष्ट हुआ वह जीव उस स्त्रीके रजसे मिल जाता है। तदनन्तर वही गर्भरूपमें परिणत हो जाता है। जीव जलरूपसे गिरकर वनस्पतियों और ओषधियोंमें प्रवेश

English

Devayani said: — "You are the son of Brihaspati and not of my father; and consequently you are worthy of being respected and Iioiiored by me. You must reeall to your mind my uniicasing warm love for you ever since you were killed by the Asuras again and again Is not this a sufRcient proof of my unbounded love, attuclimenr ami devotion towards you. I, therefore, 0 You, who know the law, your devotee, do not deserve being discarded by you."— 9-11,

अध्याय २६

श्लोक 5

स समापितविद्यो मां भक्तां न त्यक्तुमर्हसि गृहाण पाणिं विधिवन् मम मन्त्रपुरस्कृतम्

sa samāpitavidyo māṃ bhaktāṃ na tyaktumarhasi gṛhāṇa pāṇiṃ vidhivan mama mantrapuraskṛtam

हिन्दी अर्थ

करते हैं तथा जल, वायु, पृथ्वी और अन्तरिक्ष आदिमें प्रवेश करते हुए कर्मानुसार पशु अथवा मनुष्य सब कुछ होते हैं। इस प्रकार वे भूमिपर आकर फिर पूर्वोक्त भवन्ति॥ ११ क्रमके अनुसार गर्भभावको प्राप्त होते हैं

English

Eacha said; — " 0, Pious one! You ask me to enter into an engage- ment which is so improper You are greater even than the preceptor. Be pleased, 0 moon-faced! 1 have, also lived in the stomach of lukra where

अध्याय २६

श्लोक 6

पूज्यो मान्यश्च भगवान् यथा मम पिता तव तथा त्वमनवद्याङ्गि पूजनीयतमा मता

pūjyo mānyaśca bhagavān yathā mama pitā tava tathā tvamanavadyāṅgi pūjanīyatamā matā

हिन्दी अर्थ

उताहोस्वित् स्वेन कामेन याति। चक्षुः श्रोत्रे लभते केन संज्ञाम्। वायुः समुत्कर्षति गर्भयोनि-

English

you had also lived; in this way you are lawfully my sister. I passed my days in comfort here. I have cornmirted no fault, am not angry with you at your illegal proposal. Now I take leave of you; wish *me a happy journey. You may tliink of me in connection with anything which may be in conforitiity with Dharrna. You should always adui'e my pre- ceptor with constant attention."— 12-16.

अध्याय २६

श्लोक 7

आत्मप्राणैः प्रियतमा भार्गवस्य महात्मनः त्वं भद्रे धर्मतः पूज्या गुरुपुत्री सदा मम

ātmaprāṇaiḥ priyatamā bhārgavasya mahātmanaḥ tvaṃ bhadre dharmataḥ pūjyā guruputrī sadā mama

हिन्दी अर्थ

स तत्र तन्मात्रकृताधिकारः संज्ञामधिष्ठाय ततो मनुष्यः।

English

Devayani said: — " I rescued you, with the idea of making you my husband, when you were killed by the Asuras. Now as you are abandoning

अध्याय २६

श्लोक 8

यथा मम गुरुर्नित्यं मान्यः शुक्रः पिता तव देवयानि तथैव त्वं नैवं मां वक्तुमर्हसि

yathā mama gururnityaṃ mānyaḥ śukraḥ pitā tava devayāni tathaiva tvaṃ naivaṃ māṃ vaktumarhasi

हिन्दी अर्थ

त्वचा स्पर्श मनसा देवभावम्। इत्यष्टकेहोपचितं हि विद्धि केनात्मानं चेतयते पुरस्तात् योनिं पुण्यपापानुसारां

English

CHAPTER XXVI.

अध्याय २६

श्लोक 9

गुरुपुत्रस्य पुत्रो मे न तु त्वमसि मे पितुः तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च ममापि त्वं द्विजोत्तम

guruputrasya putro me na tu tvamasi me pituḥ tasmānmānyaśca pūjyaśca mamāpi tvaṃ dvijottama

हिन्दी अर्थ

पापां योनिं पापकृतो तजन्ति। पतङ्गाश्च भवन्ति पापा- अष्टकने पूछा राजन्! इस मनुष्ययोनिमें आनेवाला जीव अपने इसी शरीरसे गर्भमें आता है या दूसरा शरीर धारण करता है? आप यह रहस्य मुझे बताइये। में संशय होनेके कारण पूछता हूँ । गर्भमें आनेपर वह भिन्न-

English

me who makes a lawful request, you will not be able to successfully apply this safijtvani knowledge." — 17.

अध्याय २६

श्लोक 10

असुरैर्हन्यमाने तु कचे त्वयि पुनः पुनः तदाप्रभृति या प्रीतिस् तां त्वमेव स्मरस्व मे

asurairhanyamāne tu kace tvayi punaḥ punaḥ tadāprabhṛti yā prītis tāṃ tvameva smarasva me

हिन्दी अर्थ

भिन्न शरीररूपी आश्रयको, आँख और कान आदि इन्द्रियोंको तथा चेतनाको भी कैसे उपलब्ध करता है? लोग आपको क्षेत्रज्ञ (आत्मज्ञानी) मानते हैं ययाति बोले--ऋतुकालमें पुष्परससे संयुक्त वीर्यको वायु गर्भाशयमें खींच लेता है और वह वहाँ उसपर अधिकार जमाकर क्रमश: गर्भको वृद्धि करता रहता है। वह गर्भ बढ़कर जब सम्पूर्ण अवयवोंसे सम्पन्न

English

Kacha said: — " Why are you pronouncing such a curse on me? I am going away with the penuissionuf my preceptor and have not accepted you, on account of your being the daughter of my preceptor, and notin consideration ofjthere being any fault in you. DevayAni! You ought not to curse me who lias only expounded the Law of the ftiis to you [for according to that Law, our marriage would be illegal]. Because you have cursed me, you will never be able to gain your desire. No son of a Riiji will ever accept you as his wife. My sahjivani knowledge will, of course, jiot be fruitful to rne on account of your curse, but it will most decidedly bear fruit to one to whom I shall impart it." — 18-21.

अध्याय २६

श्लोक 11

सौहार्दे चानुरागे च वेत्थ मे भक्तिमुत्तमाम् न मामर्हसि धर्मज्ञ त्यक्तुं भक्तामनागसम्

sauhārde cānurāge ca vettha me bhaktimuttamām na māmarhasi dharmajña tyaktuṃ bhaktāmanāgasam

हिन्दी अर्थ

हो जाता है तब चेतनाका आश्रय ले योनिसे बाहर निकलकर मनुष्य कहलाता है। वह कानोंसे शब्द सुनता है, आँखोंसे रूप देखता है, नासिकासे गन्ध लेता है, जिह्वासे रसका आस्वादन करता है, त्वचासे स्पर्श और मनसे आन्तरिक भावोंका अनुभव करता है। अष्टक! इस प्रकार महान् आत्मबलसे सम्पन्न प्राणधारियोंके शरीरमें जीवकी स्थापना होती है॥ १४--१६॥

English

nnaka said: — Kacha, after thus addressing Devaydnl, instantly went to heaven, where Indra and other Devas finding him returned said to him: —

अध्याय २६

श्लोक 12

अनियोज्ये नियोगे मां नियुनक्षि शुभव्रते प्रसीद सुभ्रूर्मह्यं त्वं गुरोर् गुरुतरा शुभे

aniyojye niyoge māṃ niyunakṣi śubhavrate prasīda subhrūrmahyaṃ tvaṃ guror gurutarā śubhe

हिन्दी अर्थ

अष्टकने पूछा--जो मनुष्य मर जाता है, वह जलाया जाता है या गाड़ दिया जाता है अथवा जलमें बहा दिया जाता है। इस प्रकार विनाश होकर स्थूल शरीरका अभाव हो जाता है। फिर वह चेतन जीवात्मा किस शरीरके आधारपर रहकर चैतन्ययुक्त व्यवहार करता है ? ययाति बोले--राजसिंह ! जैसे मनुष्य श्वास लेते हुए प्राणयुक्त स्थूल शरीरको छोड़कर स्वप्रमें विचरण करता है, वैसे ही यह चेतन जीवात्मा अस्फुट शब्दोच्चारणके साथ इस मृतक स्थूल शरीरको त्यागकर सूक्ष्म शरीरसे

English

" Kaqha! You have done a great deed for our sake; consequently your fame will never diminish; it will diffuse all round." — 22-24.

अध्याय २६

श्लोक 13

यत्रोषितं विशालाक्षि त्वया चन्द्रनिभानने तत्राहमुषितो भद्रे कुक्षौ काव्यस्य भामिनि

yatroṣitaṃ viśālākṣi tvayā candranibhānane tatrāhamuṣito bhadre kukṣau kāvyasya bhāmini

हिन्दी अर्थ

संयुक्त होता है और फिर पुण्य अथवा पापको आगे रखकर उसी पुण्य-पापके अनुसार अन्य योनिको प्राप्त होता है। पुण्य करनेवाले मनुष्य पुण्य-योनिमें और पाप करनेवाले मनुष्य पाप-योनिमें जाते हैं। इस प्रकार पापी जीव कीट-पतङ्ग आदि होते हैं। महानुभाव! इन सब

English

Here ends the twenty-sixth chapter describing the curses of Deoaydnt

अध्याय २६

श्लोक 14

भगिनी धर्मतो मे त्वं मैवं वोचः शुभानने सुखेनाध्युषितो भद्रे न मन्युर्विद्यते मम

bhaginī dharmato me tvaṃ maivaṃ vocaḥ śubhānane sukhenādhyuṣito bhadre na manyurvidyate mama

हिन्दी अर्थ

न्न मे विवक्षास्ति महानुभाव॥ १९ विषयोंको विस्तारके साथ कहनेकी इच्छा नहीं होती। च्छुभाँल्लोकान् येन गच्छेत् क्रमेण स्वर्गस्य लोकस्य वदन्ति सन्तो द्वाराणि समैव महान्ति पुंसाम्

English

and Kacha.

अध्याय २६

श्लोक 15

आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शिवमस्त्वथ मे पथि अविरोधेन धर्मस्य स्मर्तव्यो ऽस्मि कथान्तरे अप्रमत्तोद्यता नित्यम् आराधय गुरुं मम

āpṛcche tvāṃ gamiṣyāmi śivamastvatha me pathi avirodhena dharmasya smartavyo 'smi kathāntare apramattodyatā nityam ārādhaya guruṃ mama

हिन्दी अर्थ

तपः प्रधानान्यभिमर्षकेण । पुंसः सहैवेति वदन्ति सन्तः

English

and Kacha.

अध्याय २६

श्लोक 16

दैत्यैर्हतस्त्वं यद्भर्तृबुद्ध्या त्वं रक्षितो मया यदि मां धर्मकामार्थं प्रत्याख्यास्यसि धर्मतः

daityairhatastvaṃ yadbhartṛbuddhyā tvaṃ rakṣito mayā yadi māṃ dharmakāmārthaṃ pratyākhyāsyasi dharmataḥ

हिन्दी अर्थ

तस्यान्तवन्तः पुरुषस्य लोका न चास्य तद् ब्रह्मफलं ददाति चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि

English

and Kacha.

अध्याय २६

श्लोक 17

ततः कच न ते विद्या सिद्धिमेषा गमिष्यति

tataḥ kaca na te vidyā siddhimeṣā gamiṣyati

हिन्दी अर्थ

मानेनाधीतमुत मानयज्ञः सन्तः सतः पूजयन्तीह लोके

English

and Kacha.

अध्याय २६

श्लोक 18

गुरुपुत्रीति कृत्वाहं प्रत्याख्यास्ये न दोषतः गुरुणा चाभ्यनुज्ञातः काममेव शपस्व माम्

guruputrīti kṛtvāhaṃ pratyākhyāsye na doṣataḥ guruṇā cābhyanujñātaḥ kāmameva śapasva mām

हिन्दी अर्थ

ये चाश्रयं वेदयन्ते पुराणं नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार जीव गर्भमें आकर चार पैरवाले (चतुष्पाद), दो पैरवाले मनुष्यादि और पक्षियोंके रूपमें उत्पन्न होते हैं । यह सब मैंने पूरा-पूरा बतला दिया। अब अष्टकने पूछा--तात ! मनुष्य कौन-सा कर्म करके उत्तम यश प्राप्त करता है? वह यश तपसे प्राप्त होता है या विद्यासे मैं यही पूछता हूँ। जिस कर्मके द्वारा क्रमश: श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति हो सके, वह सब यथार्थ-

English

and Kacha.

अध्याय २६

श्लोक 19

आर्षं धर्मं ब्रुवाणो ऽहं देवयानि यथा त्वया शप्तुं नार्हो ऽस्मि कल्याणि कामतो ऽद्य च धर्मतः

ārṣaṃ dharmaṃ bruvāṇo 'haṃ devayāni yathā tvayā śaptuṃ nārho 'smi kalyāṇi kāmato 'dya ca dharmataḥ

हिन्दी अर्थ

ययाति बोले--राजन्! साधु पुरुष स्वर्गलोकके सात महान् दरवाजे बतलाते हैं, जिनसे प्राणी उसमें प्रवेश करते हें । उनके नाम ये हैं--तप, दान, शम, दम, लज्जा, सरलता और समस्त प्राणियोंके प्रति दया। वे तप आदि द्वार सदा ही पुरुषके अभिमानरूप तमसे आच्छादित होनेपर नष्ट हो जाते हैं, यह संत पुरुषोंका कथन है। जो वेदोंका अध्ययन करके अपनेको सबसे बड़ा पण्डित मानता और अपनी विद्याद्वारा दूसरोंके यशका नाश

English

and Kacha.

अध्याय २६

श्लोक 20

तस्माद्भवत्या यः कामो न तथा सम्भविष्यति ऋषिपुत्रो न ते कश्चिज् जातु पाणिं ग्रहीष्यति

tasmādbhavatyā yaḥ kāmo na tathā sambhaviṣyati ṛṣiputro na te kaścij jātu pāṇiṃ grahīṣyati

हिन्दी अर्थ

करता है, उसके पुण्यलोक अन्तवान् (विनाशशील) होते हैं और उसका पढ़ा हुआ वेद भी उसे फल नहीं देता। अग्निहोत्र, मौन, अध्ययन और यज्ञ-ये चार कर्म मनुष्यको भयसे मुक्त करनेवाले हैं; परंतु वे ही ठीकसे न किये जाये, दूषित भावसे अनुष्ठित हों तो वे उलटे भय प्रदान करते हैं। विद्वान् पुरुष सम्मानित होनेपर हो। इस लोकमें संत पुरुष ही सत्पुरुषोंका आदर करते हैं। दुष्ट पुरुषॉंको “यह सत्पुरुष है” ऐसी बुद्धि प्राप्त ही नहीं होती। ऐसा दान देना चाहिए, इस प्रकार यजन करना चाहिए, इस तरह स्वाध्यायमें लगा रहना चाहिए

English

and Kacha.

अध्याय २६

श्लोक 21

फलिष्यति न मे विद्या त्वद्वचश्चेति तत्तया अध्यापयिष्यामि च यं तस्य विद्या फलिष्यति

phaliṣyati na me vidyā tvadvacaśceti tattayā adhyāpayiṣyāmi ca yaṃ tasya vidyā phaliṣyati

हिन्दी अर्थ

ये सभी वचन अभयदायक हैं, अतः नित्य पालनीय हैं-ऐसा मैंने सुना है। जो सबका आश्रय है, पुराण (कूटस्थ) है तथा जहाँ मनकी गति भी रुक जाती है, वह (परब्रह्म परमात्मा) तुम सब लोगोंके लिये कल्याणकारी हो। जो विद्वान् उसे जानते हैं वे उस परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होकर इहलोक और परलोकमें परम शान्तिको प्राप्त होते हैं॥ २२--२८ ॥

English

and Kacha.

अध्याय २६

श्लोक 22

एवमुक्त्वा नृपश्रेष्ठ देवयानीं कचस्तदा त्रिदशेशालयं शीघ्रं जगाम द्विजसत्तमः

evamuktvā nṛpaśreṣṭha devayānīṃ kacastadā tridaśeśālayaṃ śīghraṃ jagāma dvijasattamaḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक उन्तालीसवा अध्याय सम्पूर्ण हुआ ययाति और अष्टकका आश्रमधर्मसम्बन्धी संवाद

English

and Kacha.

अध्याय २६

श्लोक 23

तमागतमभिप्रेक्ष्य देवाः सेन्द्रपुरोगमाः बृहस्पतिं सभाज्येदं कचमाहुर्मुदान्विताः

tamāgatamabhiprekṣya devāḥ sendrapurogamāḥ bṛhaspatiṃ sabhājyedaṃ kacamāhurmudānvitāḥ

हिन्दी अर्थ

चरन् गृहस्थः कथमेति देवान् कथं भिक्षुः कथमाचार्यकर्मा। गुरुकर्मसु चोद्यतः

English

and Kacha.

अध्याय २६

श्लोक 24

त्वं कचास्मद्धितं कर्म कृतवान्महदद्भुतम् न ते यशः प्रणशिता भागभाक्च भविष्यसि

tvaṃ kacāsmaddhitaṃ karma kṛtavānmahadadbhutam na te yaśaḥ praṇaśitā bhāgabhākca bhaviṣyasi

हिन्दी अर्थ

स्वाध्यायशीलः सिध्यति ब्रह्मचारी दद्यात् सहैवातिथीन् भोजयेच्च। गृहस्थोपनिषत् पुराणी

English

and Kacha.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता · Identifier:

Matsya Purana — Chapter 26

मत्स्यपुराण

संस्कृत संस्करण · Sanskrit Edition:

Imported text; printed edition not recorded

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