Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
23
अध्याय 23 / 90

Adhyaya 23

115 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ115 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय २३

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे कुवलयाश्वीये मदालसावियोगो नाम द्वाविंशो ऽध्यायः त्रयोविंशो ऽध्यायः पुत्रावूचतुः स राजपुत्रः संप्राप्य वेगादात्मपुरं ततः ।पित्रोर्ववन्दिषुः पादौ दिदृक्षुश्च मदालसाम्

iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe kuvalayāśvīye madālasāviyogo nāma dvāviṃśo 'dhyāyaḥ trayoviṃśo 'dhyāyaḥ putrāvūcatuḥ sa rājaputraḥ saṃprāpya vegādātmapuraṃ tataḥ / pitrorvavandiṣuḥ pādau didṛkṣuśca madālasām

हिन्दी अर्थ

रूप और कर्तव्यका ज्ञान भी वे वेदोंसे ही प्रदान करते हैं। जिस ऋतुमें जिस प्रकारके अनेकों चिह्न देखे जाते हैं, युगादिमें सृष्टि होनेपर वे सभी वैसे ही दृष्टिगोचर होते हैं। रात्रिके अन्तमें जगे हुए अव्यक्तजन्मा ब्रह्माकी सृष्टि प्रत्येक कल्पमें ऐसी ही होती है।

English

Next hoar, my son, with faith this"* * * § ^ that I say, — what is to be avoided in order to please the pitpis, or what conduces ta their pleasure.

अध्याय २३

श्लोक 2

ददर्श जनमुद्विग्नमप्रहृष्टमुखं पुरः ।पुनश्च विस्मिताकारं प्रहृष्टवदनं ततः

dadarśa janamudvignamaprahṛṣṭamukhaṃ puraḥ / punaśca vismitākāraṃ prahṛṣṭavadanaṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

- इकहत्तर चतुर्युगोंके हिसाबसे चौदह मन्वन्तरोंमें ९९४ चतुर्युग होते हैं और ब्रह्माके एक दिनमें एक हजार चतुर्युग होते

English

The pitpis are satisfied with clarified butter and rice fora month. The paternal grandfathers receive satisfaction mi

अध्याय २३

श्लोक 3

अन्यमुत्फुल्लनयनं दिष्ट्या दिष्ट्येतिवादिनम् ।परिष्वजन्तमन्योन्यमतिकौतूहलान्वितम्

anyamutphullanayanaṃ diṣṭyā diṣṭyetivādinam / pariṣvajantamanyonyamatikautūhalānvitam

हिन्दी अर्थ

हैं, अत: छः: चतुर्युग और बचे। छः चतुर्युगोंका चौदहवाँ भाग कुछ कम पाँच हजार एक सौ तीन दिव्य वर्ष होता है, इस प्रकार एक मन्वन्तरमें इकहतत्तर चतुर्युगके अतिरिक्त इतने दिव्य वर्ष और अधिक होते हैं।

English

fish-meat for two months. Venison should be known to satis- fy the pitris for three months; and the flesh of bans

अध्याय २३

श्लोक 4

चिरं जीवोरुकल्याण ! हतास्ते परिपन्थिनः ।पित्रोः प्रह्लादय मनस्तथास्माकमकण्टकम्

ciraṃ jīvorukalyāṇa ! hatāste paripanthinaḥ / pitroḥ prahlādaya manastathāsmākamakaṇṭakam

हिन्दी अर्थ

प्रजाकी सृष्टि, निवास-स्थान, जीविकाके उपाय और वर्णाश्रम-धर्मके पालनका माहात्म्य

English

nourishes the pitpis for four months; birds ^ flesh satisfies th for five months; hog’s flesh for six months; goat’s flcsli

अध्याय २३

श्लोक 5

पुत्रावूचतुः इत्येवं वादिभिः पौरैः पुरः पृष्ठे च संवृतः ।तत्क्षणप्रभवानन्दः प्रविवेश पितुर्गृहम्

putrāvūcatuḥ ityevaṃ vādibhiḥ pauraiḥ puraḥ pṛṣṭhe ca saṃvṛtaḥ / tatkṣaṇaprabhavānandaḥ praviveśa piturgṛham

हिन्दी अर्थ

क्रौष्ठकिने कहा--ब्रह्मन! आपने अर्वाकृत्रोत नामक सर्गका, जो मानवसर्ग ही है, वर्णन किया; अब विस्तारपूर्वक यह बतलानेकी कृपा करें कि ब्रह्माजीने सृष्टिका विस्तार कैसे किया। महामते! उन्होंने वर्णोकी सृष्टि कैसे की? उनके गुण कया हैं तथा ब्राह्मण आदि वर्णोंका कर्म कौन-सा माना गया है?

English

satisfaction for ten months. Moreover sheep’s flesh§ satisfif*

अध्याय २३

श्लोक 6

पिता च तं परिष्वज्य माता चान्ये च बान्धवाः ।चिरं जीवेति कल्याणीर्ददुस्तस्मै तदाशिषः

pitā ca taṃ pariṣvajya mātā cānye ca bāndhavāḥ / ciraṃ jīveti kalyāṇīrdadustasmai tadāśiṣaḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी बोले--मुने! सत्यका चिन्तन करनेवाले ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जब सृष्टि- रचना आरम्भ की, तब उनके मुखसे एक हजार स्त्री-पुरुष उत्पन्न हुए। वे सब-के-सब सात्त्विक तथा सहृदय थे। तदनन्तर ब्रह्माजीने अपने वक्ष:स्थलसे एक सहस्र अन्य स्त्री- पुरुषोंको उत्पन्न किया। वे सभी रजोगुणकी अधिकतासे युक्त, शूरवीर और क्रोधी थे।

English

satisfaction for ten months. Moreover sheep’s flesh§ satisfif*

अध्याय २३

श्लोक 7

प्रणिपत्य ततः सो ऽथ किमेतदिति विस्मितः ।पप्रच्छ पितरं तात ! सो ऽस्मै सम्यक् तदुक्तवान्

praṇipatya tataḥ so 'tha kimetaditi vismitaḥ / papraccha pitaraṃ tāta ! so 'smai samyak taduktavān

हिन्दी अर्थ

उसके बाद उन्होंने अपनी दोनों जाँघोंसे दूसरे एक सहस्र स्त्री-पुरुषोंको प्रकट किया। वे सब तमोगुणी, श्रीहीन तथा मन्दबुद्धि थे। वे सब जोड़ेके रूपमें उत्पन्न हुए जीव अत्यन्त प्रसन्न होकर एक-दूसरेके साथ मैथुनकी क्रियामें प्रवृत्त हो गये। तभीसे इस कल्पमें मैथुनका प्रचार हुआ। फिर ब्रह्माजीने पिशाच, सर्प, राक्षस, डाह करनेवाले मनुष्य, पशु-पक्षी, मगर, मछली,

English

made of milk satisfies them a year. Flesh of the rhinoceros flesh of the red-goat, the dark tulsi plant, || and honey,

अध्याय २३

श्लोक 8

स भार्यां तां मृतां श्रुत्वा हृदयेष्टां मदालसाम् ।पितरौ च पुरो दृष्ट्वा लज्जाशोकाब्धिमध्यगः

sa bhāryāṃ tāṃ mṛtāṃ śrutvā hṛdayeṣṭāṃ madālasām / pitarau ca puro dṛṣṭvā lajjāśokābdhimadhyagaḥ

हिन्दी अर्थ

बिच्छू तथा अण्डज आदिको उत्पन्न किया।

English

karambha, fem., is Asparagus racemosusy which is also called i^ta-mdlf

अध्याय २३

श्लोक 9

चिन्तयामास सा बाला मां श्रुत्वा निधनं गतम् ।तत्याज जीवितं साध्वी धिङ्मां निष्ठुरमानसम्

cintayāmāsa sā bālā māṃ śrutvā nidhanaṃ gatam / tatyāja jīvitaṃ sādhvī dhiṅmāṃ niṣṭhuramānasam

हिन्दी अर्थ

पहलेकी प्रजा सात््विक और धर्मपरायण थी, अतः यहाँ सब ओर सुख-शान्ति थी। इसके बाद कालान्तरमें उनके भीतर लोभका उदय हुआ। फिर तो शीत, उष्ण, क्षुधा आदि दन्द्ध प्रकट हुए। प्रजाओंने उस द्वन्द्धको दूर करनेके लिये पहले पुरोंका निर्माण किया। कुछ लोग मरुभूमि अथवा धन्वदेशको शत्रुओंके लिये दुर्गग समझकर उसमें रहने लगे। कुछ

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 10

नृशंसो ऽहमनार्यो ऽहं विना तां मृगलोचनाम् ।मत्कृते निधनं प्राप्तां यज्जीवाम्यतिनिर्घृणः

nṛśaṃso 'hamanāryo 'haṃ vinā tāṃ mṛgalocanām / matkṛte nidhanaṃ prāptāṃ yajjīvāmyatinirghṛṇaḥ

हिन्दी अर्थ

लोगोंने पर्वतों और गुफाओंका आश्रय लिया। कुछ मनुष्योंने वृक्षों, पर्वतों और जलके दुर्गोको अपना निवास-स्थान बनाया। कुछ लोग कृत्रिम दुर्ग बनाकर उसमें रहने लगे। उन्होंने वस्तुओंकी लंबाई-चौड़ाई मापनेके लिये अँगुलियोंसे नाप-नापकर पहले कुछ माप तैयार किये। उनका पैमाना इस प्रकार बना। सबसे सूक्ष्म वस्तु है परमाणु। उससे बड़ा

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 11

पुनः स चिन्तयामास परिसंस्तभ्य मानसम् ।मोहोद्गममपास्याशु निः श्वस्योच्छवस्य चातरः

punaḥ sa cintayāmāsa parisaṃstabhya mānasam / mohodgamamapāsyāśu niḥ śvasyocchavasya cātaraḥ

हिन्दी अर्थ

त्रसरेणु होता है, जो पृथ्वीकी धूलिका एक कण है। उससे उत्तरोत्तर बड़े प्रमाण हैं--वालाग्र, लिक्षा, यूका और यवोदर। ये एक-दूसरेकी अपेक्षा आठ-आठ गुने बड़े हैं। आठ यवका एक अद्भजुल, छः अद्भुलका एक पद, दो पदका एक बित्ता और दो बित्तेका एक हाथ होता है। चार हाथका एक धरनुर्दण्ड होता है। इसीको नाड़िकायुग भी कहते हैं। दो हजार धनुषकी

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 12

मृतेति सा मन्नमित्तं त्यजामि यदि जीवितम् ।किं मयोपकृतं तस्याः श्लाघ्यमेतत्तु योषिताम्

mṛteti sā mannamittaṃ tyajāmi yadi jīvitam / kiṃ mayopakṛtaṃ tasyāḥ ślāghyametattu yoṣitām

हिन्दी अर्थ

एक गव्यूति और चार गव्यूतिका एक योजन होता है।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 13

यदि रोदिमि वा दीनो हा प्रियेति ! वदन्मुहुः ।तथाप्यश्लाघ्यमेतन्नो वयं हि पुरुषाः किल

yadi rodimi vā dīno hā priyeti ! vadanmuhuḥ / tathāpyaślāghyametanno vayaṃ hi puruṣāḥ kila

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर प्रजावर्गने अपने रहनेके लिये पुर, खेट, द्रोणीमुख, शाखा-नगर, खर्वट, द्रमी आदिका निर्माण किया। उन सबमें ग्राम, गोशाला आदिकी व्यवस्था करके वहाँ पृथक्- पृथक् निवास-स्थान बनवाये। जिसके चारों ओर ऊँची चहारदीवारी हो, जो खाइयोंसे घिरा

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 14

अथ शोकजडो दीनो स्त्रजा हीनो मलान्वितः ।विपक्षस्य भविष्यामि ततः परिभवास्पदम्

atha śokajaḍo dīno strajā hīno malānvitaḥ / vipakṣasya bhaviṣyāmi tataḥ paribhavāspadam

हिन्दी अर्थ

हो, जिसकी लंबाई दो कोस और चौड़ाई उसका आठवाँ भाग हो, वह पुर कहलाता है। उसके पूर्व और उत्तरमें जलप्रवाहका होना उत्तम माना गया है। वहाँसे बाहर निकलनेके लिये शुद्ध बाँसका पुल बना होना चाहिए। जिसकी लंबाई-चौड़ाई पुरकी अपेक्षा आधी हो, वह खेट कहलाता है और जो पुरके चौथाई हिस्सेके बराबर हो, उसे खर्वट कहते हैं।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 15

मयारिशातनं कार्यं राज्ञः शुश्रुषणं पितुः ।जीवितं तस्य चायत्तं सन्त्याज्यं तत्कथं मया

mayāriśātanaṃ kāryaṃ rājñaḥ śuśruṣaṇaṃ pituḥ / jīvitaṃ tasya cāyattaṃ santyājyaṃ tatkathaṃ mayā

हिन्दी अर्थ

जिसकी लंबाई-चौड़ाई पुरके आठवें हिस्सेके बराबर हो, वह द्रोणीमुख कहलाता है। जहाँ चहारदीवारी और खाई नहीं है, उस पुरको खर्वट कहते हैं। जहाँ मन्त्री, सामन्‍त तथा भोगके बहुत-से सामान हों, वह शाखानगर कहलाता है। जहाँ अधिकांश शूद्र हों, अपनी समृद्धिसे युक्त किसान रहते हों, जो खेतों और उपभोगयोग्य भूमि (बाग-बगीचों)के बीचमें बसा हो,

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 16

किन्त्वत्र मन्ये कर्तव्यस्त्यागो भागस्य योषितः ।स चापि नोपकाराय तन्वङ्ग्याः किन्तु सर्वथा

kintvatra manye kartavyastyāgo bhāgasya yoṣitaḥ / sa cāpi nopakārāya tanvaṅgyāḥ kintu sarvathā

हिन्दी अर्थ

उसका नाम गाँव है। जहाँ किसी कार्यके लिये मनुष्य अन्य नगर आदिसे आकर बसते हों, उसको बस्ती कहते हैं। जहाँ अधिकांश दुष्टोंका निवास हो, जहाँके रहनेवाले अपने पास खेत न होनेपर भी दूसरेकी भूमिपर अधिकार जमाते और भोगते हैं, वह गाँव द्रमीके नामसे पुकारा जाता है। वहाँ प्रायः वे ही लोग निवास करते हैं, जो राजाके प्रिय हों। जहाँ ग्वाले

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 17

मया नृशंस्यं कर्तव्यं नोपकार्यपकारि च ।या मदर्थे ऽत्यजत् प्राणांस्तदर्थे ऽल्पमिदं मम

mayā nṛśaṃsyaṃ kartavyaṃ nopakāryapakāri ca / yā madarthe 'tyajat prāṇāṃstadarthe 'lpamidaṃ mama

हिन्दी अर्थ

अपने बर्तन-भाँड़े गाड़ियोंपर लादकर रखते हों, बिना बाजारके ही गोरस मिलता हो, गायोंका समूह रहता हो, जहाँ इच्छानुसार भूमि रहनेके लिये सुलभ हो, उस स्थानका नाम

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 18

पुत्रावूचतुः इति कृत्वा मतिं सो ऽथ निष्पाद्योदकदानिकम् ।क्रियाश्चानन्तरं कृत्वा प्रत्युवाच ऋतध्वजः

putrāvūcatuḥ iti kṛtvā matiṃ so 'tha niṣpādyodakadānikam / kriyāścānantaraṃ kṛtvā pratyuvāca ṛtadhvajaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार नगर आदिका निर्माण करके प्रजाने अपने रहनेके लिये घर बनाये। वे घर इस उद्देश्यसे बनाये गये थे कि वहाँ शीत-उष्ण आदि द्वद्धोंसे रक्षा हो सके। जैसे पहले उनके घरके आकारके वृक्ष होते थे और वहाँ उन्हें जैसी सुविधाएँ प्राप्त होती थीं, उन सबका स्मरण करके उन्होंने घर बनाये। जैसे वृक्षकी शाखाएँ एकके बाद दूसरी तथा छोटी-

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 19

ऋतध्वज उवाच यदि सा मम तन्वङ्गी न स्याद्भार्या मदालसा ।अस्मिन् जन्मनि नान्या मे भवित्री सहचारिणी

ṛtadhvaja uvāca yadi sā mama tanvaṅgī na syādbhāryā madālasā / asmin janmani nānyā me bhavitrī sahacāriṇī

हिन्दी अर्थ

बड़ी, ऊँची-नीची होती हैं, उसी प्रकार उन्होंने अनेक प्रकारकी शालाएँ बनायीं। द्विजश्रेष्ठ! पूर्वकालमें जो कल्पवृक्षकी शाखाएँ थीं, वे ही उस समय प्रजावर्गके घरोंमें शाला बनानेके काममें आयीं। इस प्रकार गृह-निर्माणके द्वारा शीत-उष्ण आदि द्वन्द्"ोंको दूर करके सब लोग जीविकाका उपाय सोचने लगे; क्योंकि उस समय समस्त कल्पवृक्ष मधुसहित नष्ट हो चुके

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 20

तामृते मृगशावाक्षीं गन्धर्वतनयामहम् ।न भोक्ष्ये योषितं काञ्चिदिति सत्यं मयोदितम्

tāmṛte mṛgaśāvākṣīṃ gandharvatanayāmaham / na bhokṣye yoṣitaṃ kāñciditi satyaṃ mayoditam

हिन्दी अर्थ

थे। जब प्रजा भूख और प्याससे व्याकुल एवं शोकसे आतुर हो उठी तब त्रेताके आरम्भमें उनके अभीष्टकी सिद्धि हुई। उनकी इच्छाके अनुसार वर्षा हुई और वह वर्षाका जल नीची भूमिमें बढ़कर एकत्र होने लगा। उससे स्रोत, पोखरे और नदियाँ बन गयीं। उस जलका पृथ्वीके साथ संयोग होनेसे बिना जोते-बोये ही ग्राम्य और आरण्य--सब मिलकर चौदह

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 21

सद्धर्मचारिणीं पत्नीं तां मुक्त्वा गजगामिनीम्,।काञ्चिन्नाङ्गीकरिष्यामीत्येतत् सत्यं मयोदितम्

saddharmacāriṇīṃ patnīṃ tāṃ muktvā gajagāminīm,/ kāñcinnāṅgīkariṣyāmītyetat satyaṃ mayoditam

हिन्दी अर्थ

प्रकारके अन्न पैदा हुए। वृक्षों और लताओंमें ऋतुके अनुसार फ़ूल और फल लगने लगे। त्रेतायुगमें पहले-पहल अन्नका प्रादुर्भाव हुआ। उसीसे उस युगमें सब प्रजाका जीवन-निर्वाह होने लगा। फिर अकस्मात् सब लोगोंके मनमें राग और लोभका प्राकट्य हुआ। इससे वे एक-दूसरेके प्रति ईर्ष्या रखने लगे और अपनी शक्तिके अनुसार नदी, खेत, पर्वत, वृक्ष और

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 22

पुत्रावूचतुः परित्यज्य च स्त्रीभोगान् तात ! सर्वंस्तया विना ।क्रीडन्नास्ते समं तुल्यैर्वयस्यैः शीलसम्पदा

putrāvūcatuḥ parityajya ca strībhogān tāta ! sarvaṃstayā vinā / krīḍannāste samaṃ tulyairvayasyaiḥ śīlasampadā

हिन्दी अर्थ

झाड़ियोंपर अधिकार जमाने लगे। उनके इस दोषसे सबके देखते-देखते सब अनाज नष्ट हो गये। पृथ्वीने एक साथ ही सब ओषधियोंको अपना ग्रास बना लिया। अनाजके नष्ट होनेसे

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 23

एतत्तस्य परं कार्यं तात ! तत् केन शक्यते ।कर्तुमत्यर्थदुष्प्राप्यमीश्वरैः किमुतेतरैः

etattasya paraṃ kāryaṃ tāta ! tat kena śakyate / kartumatyarthaduṣprāpyamīśvaraiḥ kimutetaraiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रजा भूखसे व्याकुल होकर फिर इधर-उधर भटकने लगी और अन्तमें ब्रह्माजीकी शरणमें गयी। ब्रह्माजीने भी प्रजाका सारा समाचार ठीक-ठीक जानकर पृथ्वीको गायके रूपमें बाँधा और मेरु पर्वतको बछड़ा बनाकर उसका दूध दुहा। ब्रह्माजीने दूधके रूपमें सब प्रकारके अन्न दुह लिये थे, वे ही बीजरूपमें प्रकट हुए और उनसे ग्राम्य तथा आरण्य--सब

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 24

जड उवाच इति वाक्यं तयोः श्रुत्वा विमर्शमगमत्पिता ।विमृश्य चाह तौ पुत्रौ नागराट् प्रहसन्निव

jaḍa uvāca iti vākyaṃ tayoḥ śrutvā vimarśamagamatpitā / vimṛśya cāha tau putrau nāgarāṭ prahasanniva

हिन्दी अर्थ

प्रकारके अन्न पैदा हुए, जो फलके पक जानेपर काट लिये जाते हैं। धान, जौ, गेहूँ, छोटे धान्य, तिल, कँगनी, ज्वार, कोदो, तीना, उड़द, मूँग, मसूर, मटर, कुलथी, अरहर, चना और सन--ये सतरह ग्राम्य ओषधियोंकी जातियाँ हैं। यज्ञके काममें आनेवाली केवल चौदह ओषधियाँ हैं, जिनमें सात ग्राम्य और सात आरण्य हैं। उनके नाम ये हैं--धान, जौ, गेहूँ,

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 25

नागराडश्वतर उवाच यद्यशक्यमिति ज्ञात्वा न करिष्यन्ति मानवाः ।कर्मण्युद्यममुद्योगहान्या हानिस्ततः परम्

nāgarāḍaśvatara uvāca yadyaśakyamiti jñātvā na kariṣyanti mānavāḥ / karmaṇyudyamamudyogahānyā hānistataḥ param

हिन्दी अर्थ

जब बोनेपर भी ये ओषधियाँ फिर न जम सकीं, तब भगवान् ब्रह्माजीने अन्नकी वृद्धिके लिये हाथसे काम करनेकी प्रणालीको ही जीविकाका उपाय बनाया। तबसे जोतने-बोनेपर अन्नकी उपज होने लगी। इस प्रकार जीविकाका प्रबन्ध हो जानेपर ब्रह्माजीने न्याय और गुणके अनुसार वर्णाश्रम-धर्मकी मर्यादा स्थापित की। अपने कर्मोमें लगे हुए ब्राह्मणोंको

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 26

आरभेत नरः कर्म स्वपौरुषमहापयन् ।निष्पत्तिः कर्मणो दैवे पौरुषे च व्यवसथिता

ārabheta naraḥ karma svapauruṣamahāpayan / niṣpattiḥ karmaṇo daive pauruṣe ca vyavasathitā

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। युद्धमें पीठ न दिखानेवाले क्षत्रियोंको इन्द्रका पद प्राप्त होता है। स्वधर्मपरायण वैश्योंको मरुद्गरणोंका लोक मिलता है। सेवामें संलग्न रहनेवाले शाद्र गन्धर्वलोकमें जाते हैं। जो लोग गुरुकुलमें रहकर ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक वेदाध्ययन करते हैं, उन्हें अट्टासी हजार ऊर्ध्वरेता महर्षियोंको प्राप्त होनेवाला स्थान मिलता है। वानप्रस्थधर्मका

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 27

तस्मादहं तथा यत्नं करिष्ये पुत्रकावितः ।तपश्चर्यां समास्थाय यथैतत् साध्यते ऽचिरात्

tasmādahaṃ tathā yatnaṃ kariṣye putrakāvitaḥ / tapaścaryāṃ samāsthāya yathaitat sādhyate 'cirāt

हिन्दी अर्थ

पालन करनेवाले लोग सप्तर्षियोंके लोकमें जाते हैं। गृहस्थधर्मका विधिवत् पालन करनेवालोंको प्राजापत्य लोककी प्राप्ति होती है। संन्यासियोंको ब्रह्मपद और योगियोंको अमृतत्वकी उपलब्धि होती है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न वर्णधर्म और आश्रम धर्मोका पालन करनेवाले लोगोंके लिये पृथक्ू-पृथक् लोकोंकी कल्पना की गयी है।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 28

जड उवाच एवमुक्त्वा स नागेन्द्रः प्लक्षावतरणं गिरेः ।तीर्थं हिमवतो गत्वा तपस्तेपे सुदुश्चरम्

jaḍa uvāca evamuktvā sa nāgendraḥ plakṣāvataraṇaṃ gireḥ / tīrthaṃ himavato gatvā tapastepe suduścaram

हिन्दी अर्थ

स्वायम्भुव मनुकी वंश-परम्परा तथा अलक्ष्मी-पुत्र दुःसहके स्थान आदिका वर्णन

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 29

तुष्टाव गीर्भिश्च ततस्तत्र देवीं सरस्वतीम् ।तन्मना नियताहारो भूत्वा त्रिषवणाप्लुतः

tuṣṭāva gīrbhiśca tatastatra devīṃ sarasvatīm / tanmanā niyatāhāro bhūtvā triṣavaṇāplutaḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--मुने! तदनन्तर ब्रह्माजी जब ध्यान कर रहे थे, उस समय उनके मनसे मानसी प्रजा उत्पन्न हुई; साथ ही उनके शरीरसे कारण और कार्यका भी प्रादुर्भाव हुआ। देवताओंसे लेकर स्थावरपर्यन्त सभी जीव त्रिगुणात्मक माने गये हैं। इसी प्रकार समस्त चराचर भूतोंकी सृष्टि हुई। जब

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 30

अश्वतर उवाच जगद्धात्रीमहं देवीमारिराधयिषुः शुभाम् ।स्तोष्ये प्रणम्य शिरसा ब्रह्मयोनिं सरस्वतीम्

aśvatara uvāca jagaddhātrīmahaṃ devīmārirādhayiṣuḥ śubhām / stoṣye praṇamya śirasā brahmayoniṃ sarasvatīm

हिन्दी अर्थ

प्रयत्न करनेपर भी ब्रह्माजीकी प्रजा बढ़ न सकी, तब उन्होंने अपने ही सदृश सामर्थ्यसे युक्त नौ मानस-पुत्रोंको उत्पन्न किया। उनके नाम ये हैं--भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अड्भिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ। पुराणोंमें ये नौ ब्रह्मा माने गये हैं।- इसके बाद ब्रह्माजीने अपने क्रोधसे रुद्रको प्रकट किया;

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 31

सदसद्देवि ! सय् किञ्चिन्मोक्षवच्चार्थवत् पदम् ।तत्सर्वं त्वय्यसंयोगं योगवद्देवि ! संस्थितम्

sadasaddevi ! say kiñcinmokṣavaccārthavat padam / tatsarvaṃ tvayyasaṃyogaṃ yogavaddevi ! saṃsthitam

हिन्दी अर्थ

फिर संकल्प और धर्मको उत्पन्न किया, जो पूर्वजोंके भी पूर्वज हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीने जिन्हें सबसे पहले उत्पन्न किया, वे सनन्दन आदि चार भाई लोकमें आसक्त नहीं हुए। वे सब-के-सब निरपेक्ष, एकाग्रचित्त, भविष्यको जाननेवाले,

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 32

त्वमक्षरं परं देवि ! यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ।अक्षरं परमं देवि ! संस्थितं परमाणुवत्

tvamakṣaraṃ paraṃ devi ! yatra sarvaṃ pratiṣṭhitam / akṣaraṃ paramaṃ devi ! saṃsthitaṃ paramāṇuvat

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात् प्रजापतिने अनेक प्रकारके स्त्री-पुरुष उत्पन्न किये, जिनमें कोमल, क्रूर, शान्त, श्यामवर्ण तथा गौरवर्ण--सभी तरहके लोग थे। इसके बाद उन्होंने अपने ही समान प्रभावशाली एक पुत्रर॒त्न उत्पन्न किया, जिनका नाम स्वायम्भुव मनु हुआ। उन्हें ब्रह्माजीने प्रजाजनोंका रक्षक बनाया। फिर स्वायम्भुव मनुने

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 33

अक्षरं परमं ब्रह्म विश्वञ्चैतत् क्षरात्मकम् ।दारुण्यवस्थितो वह्निर्भौमाश्च परमाणवः

akṣaraṃ paramaṃ brahma viśvañcaitat kṣarātmakam / dāruṇyavasthito vahnirbhaumāśca paramāṇavaḥ

हिन्दी अर्थ

शतरूपाको अपनी पत्नी बनाया, जो तपस्याके प्रभावसे सर्वथा निष्पाप थी। शतरूपाने स्वायम्भुव मनुके सम्पर्कसे दो पुत्रोंको जन्म दिया। वे प्रियव्रत और उत्तानपादके नामसे विख्यात हुए। उन दोनोंकी अपने कर्मोसे प्रसिद्धि हुई। शतरूपाके गर्भसे दो कनन्‍्याओंका भी जन्म हुआ। उनमेंसे एकका नाम ऋद्धि

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 34

तथा त्वयि स्थितं ब्रह्म जगच्चेदमशेषतः ।ओङ्काराक्षरसंस्थानं यत्तु देवि ! स्थिरास्थिरम्

tathā tvayi sthitaṃ brahma jagaccedamaśeṣataḥ / oṅkārākṣarasaṃsthānaṃ yattu devi ! sthirāsthiram

हिन्दी अर्थ

(आकूति) और दूसरीका प्रसूति था। स्वायम्भुव मनुने प्रसूतिका विवाह दक्षसे और ऋद्धि (आकूति)-का रुचि प्रजापतिसे किया। प्रजापति रुचि और आकृूतिसे जुड़वीं सनन्‍्तान उत्पन्न हुई, जिनमें एक पुत्र था और दूसरी कन्या। पुत्रका नाम यज्ञ और कन्याका दक्षिणा था। यज्ञके “याम' नामसे विख्यात बारह

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 35

तत्र मात्रात्रयं सर्वमस्ति यद्देवि नास्ति च ।त्रयो लोकास्त्रयो वेदास्त्रैविद्यं पावकत्रयम्

tatra mātrātrayaṃ sarvamasti yaddevi nāsti ca / trayo lokāstrayo vedāstraividyaṃ pāvakatrayam

हिन्दी अर्थ

पुत्र हुए। ये ही स्वायम्भुव मन्वन्तरमें बारह देवता कहलाये। ये बड़े तेजस्वी थे।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 36

त्रीणि ज्योतींषि वर्णाश्च त्रयो धर्मागमास्तथा ।त्रयो गुणास्त्रयः शब्दस्त्रयो वेदास्तथाश्रमाः

trīṇi jyotīṃṣi varṇāśca trayo dharmāgamāstathā / trayo guṇāstrayaḥ śabdastrayo vedāstathāśramāḥ

हिन्दी अर्थ

दक्षने प्रसूतिके गर्भसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं; उनके नाम ये हैं, सुनो--

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 37

त्रयः कालास्तथावस्थाः पितरो ऽहर्निशादयः ।एतन्मात्रात्रयं देवि ! तव रूपं सरस्वति

trayaḥ kālāstathāvasthāḥ pitaro 'harniśādayaḥ / etanmātrātrayaṃ devi ! tava rūpaṃ sarasvati

हिन्दी अर्थ

तथा तेरहवीं कीर्ति। इन सबको धर्मने अपनी पत्नीके रूपमें ग्रहण किया। इनसे शेष जो ग्यारह छोटी कन्याएँ थीं, उनके नाम इस प्रकार हैं--ख्याति, सती,

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 38

विभिन्नदर्शिनामाद्या ब्रह्मणो हि सनातनाः ।सोमसंस्था हविः संस्थाः पाकसंस्थाश्च सप्त याः

vibhinnadarśināmādyā brahmaṇo hi sanātanāḥ / somasaṃsthā haviḥ saṃsthāḥ pākasaṃsthāśca sapta yāḥ

हिन्दी अर्थ

सबको क्रमश: भृगु, महादेवजी, मरीचि, अड्लिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, अत्रि, अग्नि और पितरोंने ग्रहण किया। श्रद्धाने कामको, लक्ष्मीने दर्पको, धृतिने नियमको, तुष्टिने संतोष और पुष्टिने लोभको उत्पन्न किया। मेधासे श्रुतका, क्रियासे दण्ड, नय और विनयका, बुद्धिसे बोधका, लज्जासे विनयका, वपुसे

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 39

तास्त्वदुच्चारणाद्देवि ! क्रियन्ते ब्रह्मवादिभिः ।अनिर्देश्यं तथा चान्यदर्धमात्रान्वितं परम्

tāstvaduccāraṇāddevi ! kriyante brahmavādibhiḥ / anirdeśyaṃ tathā cānyadardhamātrānvitaṃ param

हिन्दी अर्थ

व्यवसायका, शान्तिसे क्षेमका, सिद्धिसे सुखका और कीर्तिसे यशका जन्म हुआ। ये सभी धर्मके पुत्र हैं।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 40

अविकार्यक्षयं दिव्यं परिणामविवर्जितम् ।तवैतत्परमं रूपं यन्न शक्यं मयोदितुम्

avikāryakṣayaṃ divyaṃ pariṇāmavivarjitam / tavaitatparamaṃ rūpaṃ yanna śakyaṃ mayoditum

हिन्दी अर्थ

कामसे उसकी पत्नी रतिने हर्ष नामक पुत्र उत्पन्न किया, जो धर्मका पौत्र कहलाया। अधर्मकी स्त्री हिंसा थी। उसके गर्भसे अनृत नामक पुत्र और निर्ऋ्रति नामवाली कन्या उत्पन्न हुई। फिर इन दोनोंसे दो पुत्रों तथा दो कन्‍्याओंका जन्म हुआ। पुत्रोंके नाम थे नरक और भय तथा कन्याओंके नाम थे माया और वेदना।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 41

न चास्ये न च तज्जिह्वा ताम्रोष्ठादिभिरुच्यते ।इन्द्रो ऽपि वसवो ब्रह्मा चन्द्राकौ ज्योतिरेव च

na cāsye na ca tajjihvā tāmroṣṭhādibhirucyate / indro 'pi vasavo brahmā candrākau jyotireva ca

हिन्दी अर्थ

ये उनकी पत्नियाँ हुईं। इनमें भयकी स्त्री मायाने सब प्राणियोंका संहार करनेवाले "मृत्यु" नामक पुत्रको उत्पन्न किया और वेदनाने नरकके संसर्गसे दुःख नामक पुत्रको जन्म दिया। मृत्युसे व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा और क्रोध उत्पन्न हुए। ये सब अधर्मरूप हैं और दुःखके हेतु बतलाये जाते हैं। इनके स्त्री और पुत्र

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 42

विश्वावासं विश्वरूपं विश्वेशं परमेश्वरम् ।सांख्यवेदान्तवादोक्तं बहुशाखास्थिरीकृतम्

viśvāvāsaṃ viśvarūpaṃ viśveśaṃ parameśvaram / sāṃkhyavedāntavādoktaṃ bahuśākhāsthirīkṛtam

हिन्दी अर्थ

नहीं हैं। ये सभी ऊध्वरिता हैं।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 43

अनादिमध्यनिधनं सदसन्न सदेव यत् ।एकन्त्वनेकं नाप्येकं भवभेदसमाश्रैतम्

anādimadhyanidhanaṃ sadasanna sadeva yat / ekantvanekaṃ nāpyekaṃ bhavabhedasamāśraitam

हिन्दी अर्थ

अलक्ष्मीके चौदह पुत्र हैं, जिनमें तेरह तो क्रमश: दस इन्द्रिय, मन, बुद्धि और अहड्कारमें पृथक्-पृथक् रहते हैं। चौदहवेंका नाम दुःसह है, वह मनुष्योंके गृहोंमें निवास करता है। वह भूखसे दुर्बल, नीचा मुख किये, नंग-धड़ंग और चिथड़ा लपेटे रहता है; उसकी आवाज कौएके समान है। जब ब्रह्माजीने उसे

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 44

अनाख्यं षड्गुणाख्यञ्च वर्गाख्यं त्रिगुणाश्रयम् ।नानाशक्तिमतामेकं शक्तिवैभविकं परम्

anākhyaṃ ṣaḍguṇākhyañca vargākhyaṃ triguṇāśrayam / nānāśaktimatāmekaṃ śaktivaibhavikaṃ param

हिन्दी अर्थ

उत्पन्न किया, तब वह सबको खा जानेके लिये उद्यत हुआ। वह तमोगुणका भंडार था और बड़ी-बड़ी दाढ़ोंके कारण अत्यन्त विकराल जान पड़ता था। उसका मुँह फैला हुआ था, इससे वह और भी भयंकर जान पड़ता था। उसको आहारके लिये उत्सुक देख लोकपितामह ब्रह्माजीने कहा--'दुःसह! तुझे इस

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 45

सुखासुखं महासौख्यरूपं त्वयि विभाव्यते ।एवं देवि ! त्वया व्याप्तं सकलं निष्कलञ्च यत् ।अद्वैतावस्थितं ब्रह्म यच्च द्वैते व्यवस्थितम्

sukhāsukhaṃ mahāsaukhyarūpaṃ tvayi vibhāvyate / evaṃ devi ! tvayā vyāptaṃ sakalaṃ niṣkalañca yat / advaitāvasthitaṃ brahma yacca dvaite vyavasthitam

हिन्दी अर्थ

संसारका भक्षण नहीं करना चाहिए। तू अपना क्रोध शान्त कर। रजोगुणकी कला त्याग और इस तामसी वृत्तिको भी छोड़ दे।'

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 46

येर्ऽथा नित्या ये विनश्यन्ति चान्ये ये वा स्थूला ये च सूक्ष्मातिसूक्ष्माः ।ये वा भूमौ ये ऽन्तरीक्षे ऽन्यतो वा तेषां तेषां त्वत्त एवोपलब्धिः

yer'thā nityā ye vinaśyanti cānye ye vā sthūlā ye ca sūkṣmātisūkṣmāḥ / ye vā bhūmau ye 'ntarīkṣe 'nyato vā teṣāṃ teṣāṃ tvatta evopalabdhiḥ

हिन्दी अर्थ

दुःसहने कहा--जगदीश्वर! मैं भूखसे दुर्बल हो रहा हूँ और प्यास भी मुझे जोरसे सता रही है। नाथ! बताइये--मुझे कैसे तृप्ति हो, मैं किस तरह बलवान् बनूँ? तथा मेरा निवास-स्थान कौन है, जहाँ मैं सुखसे रह सकूँ?

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 47

यच्चामूर्तं यच्च मूर्तं समस्तं यद्वा भूतेष्वेकमेकञ्च किञ्चित् ।यद्दिव्यस्ति क्ष्मातले खे ऽन्यतो वा त्वत्सम्बद्धं त्वत्स्वरैर्व्यञ्जनैश्च

yaccāmūrtaṃ yacca mūrtaṃ samastaṃ yadvā bhūteṣvekamekañca kiñcit / yaddivyasti kṣmātale khe 'nyato vā tvatsambaddhaṃ tvatsvarairvyañjanaiśca

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीनी कहा--बेटा! मनुष्योंका घर तुम्हारा निवास-स्थान है, अधर्मपरायण पुरुष तुम्हारे बल हैं तथा नित्यकर्मके त्यागसे ही तुम्हारी पुष्टि होगी। मर्म-व्रण और फोड़े तुम्हारे वस्त्र होंगे। अब तुम्हारे लिये आहारकी व्यवस्था करता हूँ। जिसमें किसी प्रकारकी क्षति पहुँची हो, कीड़े पड़ गये हों,

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 48

जड उवाच एवं स्तुता तदा देवी विष्णोर्जिह्वा सरस्वती ।प्रत्युवाच महात्मानं नागमश्वतरं ततः

jaḍa uvāca evaṃ stutā tadā devī viṣṇorjihvā sarasvatī / pratyuvāca mahātmānaṃ nāgamaśvataraṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

कुत्तोंने दृष्टि डाली हो, जो फूटे बर्तनमें रखा हो, जिसे मुँहसे फूँक-फूककर ठंडा किया गया हो, जो जूँठा और अपक्व हो, जिसमेंसे पानी छूटता हो, जिसको किसीने चख लिया हो, जो शुद्धतापूर्वक तैयार न किया गया हो, जिसे फटे आसनोंपर बैठकर भोजन किया गया हो, जो अपने समीपवर्तीको नहीं दिया

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 49

सरस्वत्युवाच वरं ते कम्बलभ्रातः प्रयच्छाम्युरगाधिप ! ।तदुच्यतां प्रदास्यामि यत्ते मनसि वर्तते

sarasvatyuvāca varaṃ te kambalabhrātaḥ prayacchāmyuragādhipa ! / taducyatāṃ pradāsyāmi yatte manasi vartate

हिन्दी अर्थ

गया हो, विपरीत दिशा अथवा कोणकी ओर मुँह करके खाया गया हो, दोनों सन्ध्याओंके समय और नाच, बाजा एवं स्वर-तालके साथ जिसको खाया गया हो, जिसे रजस्वला स्त्रीके द्वारा लाया, खाया अथवा देखा गया हो तथा जो और किसी दोषसे युक्त हो--ऐसा कोई भी खाने-पीनेका सामान तुम्हारी पुष्टिके लिये

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 50

अश्वतर उवाच सहायं देहि देवि ! त्वं पूर्वं कम्बलमेव मे ।समस्तस्वरसम्बन्धमुभयोः संप्रयच्छ च

aśvatara uvāca sahāyaṃ dehi devi ! tvaṃ pūrvaṃ kambalameva me / samastasvarasambandhamubhayoḥ saṃprayaccha ca

हिन्दी अर्थ

यक्ष्मन्! बिना श्रद्धाका हवन, बिना नहाये, बिना जलके, अवहेलनापूर्वक दिया हुआ दान, जो व्यर्थ पड़ी हो अथवा फेंक दी जानेवाली हो, ऐसी वस्तुका दान और अत्यन्त अभिमानसे, दोषसे, क्रोधसे तथा कष्ट मानकर किया हुआ दान--इन सबका फल तुम्हें ही मिलेगा! कन्याका मूल्य चुकानेके लिये जो

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 51

सरस्वत्युवाच सप्त स्वरा ग्रामरागाः सप्त पन्नगसत्तम ! ।कीतकानि च सप्तैव तावतीश्चापि मूर्च्छनाः

sarasvatyuvāca sapta svarā grāmarāgāḥ sapta pannagasattama ! / kītakāni ca saptaiva tāvatīścāpi mūrcchanāḥ

हिन्दी अर्थ

धनोपार्जनकी क्रिया की जाती है तथा जो असत्-शास्त्रोंद्वारा सम्पादित होनेवाली क्रियाएँ हैं, उन सबका फल तुम्हारी पुष्टिके लिये तुम्हें देता हूँ। जो कार्य केवल धन कमानेके लिये किया जाता है, धर्मकी दृष्टिसे नहीं तथा जो सत्यकी अवहेलनापूर्वक अध्ययन किया जाता है, वह सब तुम्हारी इच्छा-पूर्तिके

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 52

तालाश्चैकोनपञ्चाशत्तथा ग्रामत्रयञ्च यत् ।एतत्सर्वं भवान् गाता कम्बलश्च तथानघ !

tālāścaikonapañcāśattathā grāmatrayañca yat / etatsarvaṃ bhavān gātā kambalaśca tathānagha !

हिन्दी अर्थ

लिये तुम्हें दे रहा हूँ। जो मनुष्य गर्भिणी स्त्रीके साथ समागम करते, सन्ध्या और नित्यकर्मका उल्‍्लड्घन करते तथा असत्-शास्त्रोंके अनुसार कार्य या उनकी चर्चा करके दूषित होते हैं, ऐसे मनुष्योंको दबानेकी तुममें पूरी शक्ति होगी।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 53

ज्ञास्यसे मत्प्रसादेन भुजगेन्द्रापरं तथा ।चतुर्विधं पदं तालं त्रिः प्रकारं लयत्रयम्

jñāsyase matprasādena bhujagendrāparaṃ tathā / caturvidhaṃ padaṃ tālaṃ triḥ prakāraṃ layatrayam

हिन्दी अर्थ

दुःसह! जहाँ एक ही पडुक्तिमें दो तरहका भोजन परोसा जाता हो, अतिथि-सत्कार और बलिवैश्वदेवका उद्देश्य न रखकर केवल अपने लिये भोजन बनाया जाता हो, भोजनमें भेद रखा जाता हो अर्थात् किसीके लिये अच्छा और किसीके लिये खराब बनता हो और जहाँ घरमें रोज-रोज कलह होता हो, वहीं

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 54

यदित्रयं तथाऽतोद्यं मया दत्तं चतुर्विधम् ।एतद्भवान् मत्प्रसादात् पन्नगेन्द्रापरञ्च यत्

yaditrayaṃ tathā'todyaṃ mayā dattaṃ caturvidham / etadbhavān matprasādāt pannagendrāparañca yat

हिन्दी अर्थ

तुम्हारा निवास है। जहाँ गाय-घोड़े आदि वाहन बिना खिलाये-पिलाये बाँध दिये जाते हों और संध्याके पहले ही जिस घरको धो-बुहारकर साफ नहीं किया जाता हो, वहाँ रहनेवाले मनुष्योंको तुमसे भय प्राप्त होगा। जो मनुष्य बिना व्रतके ही उपवास करते, जूए और स्त्रियोंमें आसक्त रहते, दुःसह वचन बोलते और

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 55

अस्यान्तर्गतमायत्तं स्वरव्यञ्जनसंमितम् ।तदशेषं मया दत्तं भवतः कम्बलस्य च

asyāntargatamāyattaṃ svaravyañjanasaṃmitam / tadaśeṣaṃ mayā dattaṃ bhavataḥ kambalasya ca

हिन्दी अर्थ

विडालव्रती होते--बिल्लियोंकी तरह ऊपरसे साधु बनकर छिपे-छिपे अपना उल्लू सीधा करते हैं, वे सब तुम्हारे उपकारी हैं। जो ब्रह्मचर्यपालनके बिना ही अध्ययन और विद्दान् हुए बिना ही यज्ञ करते हैं, तपोवनमें रहकर भी ग्राम्य

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 56

तथा नान्यस्य भूर्लोके पाताले चापि पन्नग ।प्रणेतारौ भवन्तौ च सर्वस्यास्य भविष्यतः ।पाताले देवलोके च भूर्लोके चैव पन्नगौ

tathā nānyasya bhūrloke pātāle cāpi pannaga / praṇetārau bhavantau ca sarvasyāsya bhaviṣyataḥ / pātāle devaloke ca bhūrloke caiva pannagau

हिन्दी अर्थ

जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र अपने-अपने कर्मसे भ्रष्ट होते हैं, ऐसे लोग परलोककी इच्छासे जो भी चेष्टा करते हैं, उसका सारा फल तुम्हींको मिलेगा।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 57

जड उवाच इत्युक्त्वा सा तदा देवी सर्वजिह्वा सरस्वती ।जगामादर्शनं सद्यो नागस्य कमलेक्षणा

jaḍa uvāca ityuktvā sā tadā devī sarvajihvā sarasvatī / jagāmādarśanaṃ sadyo nāgasya kamalekṣaṇā

हिन्दी अर्थ

यक्ष्मन्! तुम्हारी पुष्टिके लिये और भी उपाय बताता हूँ, सुनो। जो लोग बलिवैश्वदेवके अन्तमें तुम्हारे नामके उच्चारणपूर्वक तुम्हें बलि अर्पण करते हैं और “यक्ष्मैतत्ते निर्णेजनं नमः” कहकर उसे त्यागते हैं, जो शुद्धतापूर्वक बना हुआ अन्न विधिपूर्वक भोजन करते, बाहर-भीतरसे पवित्र रहते, लोलुपता नहीं

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 58

तयोश्च तद्यथावृत्तं भ्रात्रोः सर्वमजायत ।विज्ञानमुभयोरग्र्यं पदतालस्वरादिकम्

tayośca tadyathāvṛttaṃ bhrātroḥ sarvamajāyata / vijñānamubhayoragryaṃ padatālasvarādikam

हिन्दी अर्थ

रखते और स्त्रियोंके वशीभूत नहीं होते, ऐसे मनुष्योंके घरोंको तुम त्याग देना। जहाँ हविष्यसे देवताओंकी और श्राद्धान्नने पितरोंकी पूजा होती हो तथा कुलकी स्त्रियों, बहनों और अतिथियोंका स्वागत-सत्कार होता हो, उस घरको भी छोड़ देना। जहाँ बालक, वृद्ध, स्त्री-पुरुष तथा स्वजनवर्गमें प्रेम हो, जहाँकी

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 59

ततः कैलासशैलेन्द्र-शिखरस्थितमीश्वरम् ।गीतकैः स्प्तभिर्नागौ तन्त्रीलयसमन्वितौ

tataḥ kailāsaśailendra-śikharasthitamīśvaram / gītakaiḥ sptabhirnāgau tantrīlayasamanvitau

हिन्दी अर्थ

स्त्रियाँ आनन्दपूर्वक रहती हों, बाहर जानेके लिये उत्सुक नहीं होतीं तथा लज्जाकी रक्षा करती हैं, उस घरपर भी दृष्टि न डालना। जहाँ अवस्था और सम्बन्धके अनुसार शयन, आसन और भोजनकी व्यवस्था हो, जहाँके निवासी दयालु, सत्कर्मपरायण और साधारण सामग्रीसे युक्त हों तथा जिस घरके लोग

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 60

आरिराधयिषू देवमनङ्गाङ्गहरं हरम् ।प्रचक्रतुः परं यत्नमुभौ संहतवाक्कलौ

ārirādhayiṣū devamanaṅgāṅgaharaṃ haram / pracakratuḥ paraṃ yatnamubhau saṃhatavākkalau

हिन्दी अर्थ

गुरु, वृद्ध एवं ब्राह्मणोंके खड़े रहनेपर स्वयं भी आसनपर नहीं बैठते, वह घर भी तुम्हें छोड़ देना चाहिए। देवता, पितर, मनुष्य और अतिथियोंके भोजनसे बचा हुआ अन्न ही जिसका भोजन है, उस पुरुषके घरमें भी तुम पैर न रखना।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 61

प्रातर्निशायां मध्याह्ने सन्ध्ययोश्चापि तत्परौ ।तयोः कालेन महता स्तूयमानो वृषध्वजः

prātarniśāyāṃ madhyāhne sandhyayoścāpi tatparau / tayoḥ kālena mahatā stūyamāno vṛṣadhvajaḥ

हिन्दी अर्थ

जो सत्यवादी, क्षमाशील, अहिंसक, दूसरोंको पीड़ा न देनेवाले तथा दोषदृष्टिसे रहित हों, ऐसे पुरुषोंको तुम छोड़ देना। जो अपने पतिकी सेवामें संलग्न रहती, दुष्टा स्त्रियोंका साथ नहीं करती तथा कुटु॒म्बके लोगों एवं पतिके भोजन करनेसे बचे हुए अन्नको ही खाकर अपने शरीरका पोषण करती है, ऐसी

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 62

तुतोष गीतकैस्तौ च प्राहेशो गृह्यतां वरः ।ततः प्रणम्याश्वतरः कम्बलेन समं तदा

tutoṣa gītakaistau ca prāheśo gṛhyatāṃ varaḥ / tataḥ praṇamyāśvataraḥ kambalena samaṃ tadā

हिन्दी अर्थ

सत्रीको भी तुम हाथ न लगाना। जो सदा यज्ञ, अध्ययन, वेदाभ्यास और दानमें मन लगाता है, यज्ञ कराने, शास्त्र पढ़ाने तथा उत्तम दान ग्रहण करनेसे ही जिसकी जीविका चलती हो, ऐसे ब्राह्मणको भी तुम त्याग देना। दुःसह! जो सदा दान, अध्ययन और यज्ञके लिये उद्यत रहता और अपने लिये उत्तम एवं

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 63

व्यज्ञापयन्महादेवं शितिकण्ठमुमापतिम् ।यदि नौ भगवान् प्रीतो देवदेवस्त्रिलोचनः

vyajñāpayanmahādevaṃ śitikaṇṭhamumāpatim / yadi nau bhagavān prīto devadevastrilocanaḥ

हिन्दी अर्थ

विशुद्ध शस्त्रग्रहणकी वृत्तिसे जीविका चलाता हो, उस क्षत्रियके पास भी तुम न जाना। जो दान, अध्ययन और यज्ञ--इन तीन पूर्वोक्त गुणोंसे युक्त हो और पशु- पालन, व्यापार एवं कृषिसे जीविका चलाता हो, ऐसे पापरहित वैश्यको भी त्याग देना। यक्ष्मन! जो दान, यज्ञ और द्विजोंकी सेवामें तत्पर रहता और

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 64

ततो यथाभिलषितं वरमेनं प्रयच्छ नौ ।मृता कुवलयाश्वस्य पत्नी देव ! मदालसा

tato yathābhilaṣitaṃ varamenaṃ prayaccha nau / mṛtā kuvalayāśvasya patnī deva ! madālasā

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मण आदिकी सेवासे ही जीवन-निर्वाह करता हो--ऐसे शूद्रका भी त्याग कर

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 65

तेनैव वयसा सद्यो दुहितृत्वं प्रयातु मे ।जातिस्मरा यथा पूर्वं तद्वत्कान्तिसमन्विता ।योगिनी योगमाता च मद्गेहे जायतां भव

tenaiva vayasā sadyo duhitṛtvaṃ prayātu me / jātismarā yathā pūrvaṃ tadvatkāntisamanvitā / yoginī yogamātā ca madgehe jāyatāṃ bhava

हिन्दी अर्थ

जहाँ गृहस्थ पुरुष श्रुति-स्मृतिके अनुकूल उपायसे जीविका चलाता हो, उसकी पत्नी उसीकी अनुगामिनी हो, पुत्र गुरु, देवता और पिताका पूजन करता

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 66

महादेव उवाच यथोक्तं पन्नगश्रेष्ठ ! सर्वेमेतद्भविष्यति ।मत्प्रसादादसन्दिग्धं श्रुणु चेदं भुजङ्गम

mahādeva uvāca yathoktaṃ pannagaśreṣṭha ! sarvemetadbhaviṣyati / matprasādādasandigdhaṃ śruṇu cedaṃ bhujaṅgama

हिन्दी अर्थ

हो तथा पत्नी भी पतिकी पूजामें संलग्न रहती हो, वहाँ अलक्ष्मीका भय कैसे हो सकता है। यक्ष्मन्! जो प्रतिदिन संध्याके समय पानीसे धोया जाता और स्थान- स्थानपर फूलोंसे पूजित होता है, उस घरकी ओर तुम आँख उठाकर देख भी नहीं सकते। जिस घरमें बिछी हुई शय्याको सूर्य न देखते हों अर्थात् जहाँ लोग

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 67

श्राद्धे तु समनुप्राप्ते मध्यमं पिण्डमात्मना ।भक्षयेथाः फणिश्रेष्ठ ! शुचिः प्रयतमानसः

śrāddhe tu samanuprāpte madhyamaṃ piṇḍamātmanā / bhakṣayethāḥ phaṇiśreṣṭha ! śuciḥ prayatamānasaḥ

हिन्दी अर्थ

सूर्योदयसे पहले ही सोकर उठ जाते हों, जहाँ प्रतिदिन अग्नि और जल प्रस्तुत रहता हो, सूर्योदय होनेतक दीप जलता एवं सूर्यका पूर्ण प्रकाश पहुँचता हो, वह घर लक्ष्मीका निवास-स्थान है। जहाँ साँड़, चन्दन, वीणा, दर्पण, मधु, घृत, ब्राह्मण तथा ताँबेके पात्र हों, उस घरमें तुम्हारे लिये स्थान नहीं है।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 68

भक्षिते तु ततस्तस्मिन् भवतो मध्यमात् फणात् ।समुत्पत्स्यति कल्याणी तथारूपा यथामृता

bhakṣite tu tatastasmin bhavato madhyamāt phaṇāt / samutpatsyati kalyāṇī tathārūpā yathāmṛtā

हिन्दी अर्थ

दुःसह! जहाँ पके या कच्चे अन्नोंका अनादर और शास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लड्घन होता हो, उस घरमें तुम इच्छानुसार विचरण करो। जिस घरमें मनुष्यकी हड्डी हो और एक दिन तथा एक रात मुर्दा पड़ा रहा हो, उसमें तुम्हारा तथा अन्य राक्षसोंका भी निवास रहे। जो अपने भाई-बन्धुको तथा सपिण्ड एवं

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 69

कामञ्चेममभिध्याय कुरु त्वं पितृतर्पणम् ।तत्क्षणादेव सा सुभ्रूः श्वसतो मध्यमात् फणात्

kāmañcemamabhidhyāya kuru tvaṃ pitṛtarpaṇam / tatkṣaṇādeva sā subhrūḥ śvasato madhyamāt phaṇāt

हिन्दी अर्थ

समानोदक मनुष्योंको अन्न और जल दिये बिना ही भोजन करते हैं, उस समय उन लोगोंपर तुम आक्रमण करो। जहाँ पुरवासी पहलेसे ही बड़े-बड़े उत्सव मनानेमें प्रसिद्ध हो चुके हों और पहलेकी ही भाँति अब अपने घरपर उत्सव मनाते हों, ऐसे घरोंमें न जाना। जो सूपकी हवासे, भीगे कपड़ेके जलकी बूँदोंसे

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 70

समुत्पत्स्यति कल्याणी तथारूपा यथामृता ।एतच्छ्रुत्वा ततस्तौ तु प्रणिपत्य महेश्वरम्

samutpatsyati kalyāṇī tathārūpā yathāmṛtā / etacchrutvā tatastau tu praṇipatya maheśvaram

हिन्दी अर्थ

तथा नखके अग्रभागके जलसे स्नान करते हों, उन कुलक्षणी पुरुषोंके पास अवश्य जाओ। जो पुरुष देशाचार, प्रतिज्ञा, कुलधर्म, जप, होम, मड़ल, देवयज्ञ, उत्तम शौच तथा लोक-प्रचलित धर्मोंका भलीभाँति पालन करता हो, उसके संसर्गमें तुम्हें नहीं जाना चाहिए।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 71

रसातलं पुनः प्राप्तौ परितोषसमन्वितौ ।तथा च कृतवान् श्राद्धं स नागः कम्बलानुजः

rasātalaṃ punaḥ prāptau paritoṣasamanvitau / tathā ca kṛtavān śrāddhaṃ sa nāgaḥ kambalānujaḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--दुःसहसे ऐसी बात कहकर ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। फिर उसने भी ब्रह्माजीकी आज्ञाका उसी प्रकार पालन

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 72

पिण्डञ्च मध्यमं तद्वद्यथावदुपभुक्तवान् ।तञ्चापि ध्यायः कामं ततः सा तनुमध्यमा

piṇḍañca madhyamaṃ tadvadyathāvadupabhuktavān / tañcāpi dhyāyaḥ kāmaṃ tataḥ sā tanumadhyamā

हिन्दी अर्थ

पाया ----जबशनकन काना ऋरू- 7

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 73

जज्ञे निश्वसतः सद्यस्तद्रूपा मध्यमात् फणात् ।न चापि कथयामास कंस्यचित् स भुजङ्गमः

jajñe niśvasataḥ sadyastadrūpā madhyamāt phaṇāt / na cāpi kathayāmāsa kaṃsyacit sa bhujaṅgamaḥ

हिन्दी अर्थ

नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गता: ।।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 74

अन्तर्गृहे तां सुदतीं स्त्रीभिर्गुप्तामधारयत् ।तौ चानुदिनमागम्य पुत्रौ नागपतेः सुखम्

antargṛhe tāṃ sudatīṃ strībhirguptāmadhārayat / tau cānudinamāgamya putrau nāgapateḥ sukham

हिन्दी अर्थ

दुःसहकी सनन्‍्तानोंद्वारा होनेवाले विध्न और उनकी शान्तिके

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 75

ऋतध्वजेन सहितौ चिक्रीडाते ऽमराविव ।एकदा तु सुतौ प्राह नागराजौ मुदान्वितः

ṛtadhvajena sahitau cikrīḍāte 'marāviva / ekadā tu sutau prāha nāgarājau mudānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--दुःसहकी पत्नी निर्माष्टि हुई। यह कलिकी कन्या थी। कलिकी पत्नीने रजस्वला होनेपर चाण्डालका दर्शन किया था, उसीसे इस कन्याका जन्म हुआ था। दुःसह और निर्माष्टिकी सोलह सन्तानें हुईं जो समस्त संसारमें व्याप्त हैं। इनमें आठ पुत्र थे और आठ कन्याएँ। ये सब-के-सब अत्यन्त भयंकर थे। दन्ताकृष्टि, तथोक्ति,

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 76

यन्मया पूर्वमुक्तन्तु क्रियते किं न तत्तथा ।स राजपुत्रो युवयोरुपकारी ममान्तिकम्

yanmayā pūrvamuktantu kriyate kiṃ na tattathā / sa rājaputro yuvayorupakārī mamāntikam

हिन्दी अर्थ

परिवर्त, अड्भध्रुक, शकुनि, गण्डप्रान्तरति, गर्भभा तथा सस्यहा-ये आठ पुत्र थे। नियोजिका, विरोधनी, स्वयंहारिका, भ्रामणी, ऋतुहारिका, स्मृतिहरा, बीजहरा तथा विद्वेषिणी--ये आठ कन्याएँ थीं, जो सम्पूर्ण जगत्को भय देनेवाली हुईं। अब मैं इनके कर्म तथा इनसे होनेवाले दोषोंकी शान्तिके उपाय बतलाऊँगा। पहले आठ पुत्रोंके विषयमें सुनो।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 77

कस्मान्नानीयते वत्सावुपकाराय मानदः ।एवमुक्तौ ततस्तेन पित्रा स्नेहवता तु तौ

kasmānnānīyate vatsāvupakārāya mānadaḥ / evamuktau tatastena pitrā snehavatā tu tau

हिन्दी अर्थ

दन्ताकृष्टि छोटे बच्चोंके दाँतोंमें स्थित होकर उनमें रगड़ पैदा करता है। इस प्रकार वह दुःसह नामक अलक्ष्मी-पुत्रको वहाँ बुलाना चाहता है। उसकी शान्तिके लिये सोये हुए बालककी शब्या और दाँतोंपर सफेद सरसों छींटना चाहिए तथा सुवर्चला (ब्राह्मी) नामक ओषधिसे स्नान कराने और उत्तम शास्त्रोंका पाठ करानेसे भी यह दोष दूर होता है।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 78

गत्वा तस्य पुरं सख्यू रेमाते तेन धीमता ।ततः कुवलयाश्वं तौ कृत्वा किञ्चित्कथान्तरम्

gatvā tasya puraṃ sakhyū remāte tena dhīmatā / tataḥ kuvalayāśvaṃ tau kṛtvā kiñcitkathāntaram

हिन्दी अर्थ

दुःसहका दूसरा पुत्र तथोक्ति जब आता है, तब वह बारंबार “यही हो, यही हो” ऐसा कहता हुआ मनुष्योंको शुभाशुभमें लगा देता है। यदि अकस्मात् शुभाशुभकी प्रवृत्ति हो तो उसे तथोक्तिकी ही प्रेरणा समझनी चाहिए। यदि शुभका कथन या श्रवण हो तो विद्वान् पुरुष उसे मड़लमय बतावे और यदि अशुभका श्रवण या कथन हो तो उसकी शान्तिके लिये

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 79

अब्रूतां प्रणयोपेतं स्वगेहगमनं प्रति ।तावाह नृपपुत्रो ऽसौ नन्विदं भवतोर्गृहम्

abrūtāṃ praṇayopetaṃ svagehagamanaṃ prati / tāvāha nṛpaputro 'sau nanvidaṃ bhavatorgṛham

हिन्दी अर्थ

भगवान् विष्णु, चराचरगुरु ब्रह्मा तथा अपने-अपने कुलदेवताके नामोंका कीर्तन करना चाहिए। जो अन्यके गर्भमें दूसरे गर्भोकी रखने और बदलनेमें प्रसन्नताका अनुभव करता है तथा कोई बात कहनेके लिये उत्सुक मनुष्यके मुखसे किसी और ही बातको कहला देता है, वह दुःसहका तीसरा पुत्र परिवर्त है। उसकी शान्तिके लिये भी तत्त्ववेत्ता पुरुष पीली सरसों

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 80

धनवाहनवस्त्रादि यन्मदीयं तदेव वाम् ।यत्तु वां वाञ्छितं दातुं धनं रत्नमथापि वा

dhanavāhanavastrādi yanmadīyaṃ tadeva vām / yattu vāṃ vāñchitaṃ dātuṃ dhanaṃ ratnamathāpi vā

हिन्दी अर्थ

छिड़के और रक्षोघ्न-मन्त्रोंका पाठ करे।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 81

तद्दोयतां द्विजसुतौ यदि वां प्रणयो मयि ।एतावताहं दैवेन वञ्चितो ऽस्मि दुरात्मना

taddoyatāṃ dvijasutau yadi vāṃ praṇayo mayi / etāvatāhaṃ daivena vañcito 'smi durātmanā

हिन्दी अर्थ

अड्भध्ुक् नामक चौथा कुमार वायुके समान मनुष्योंके अड़ोंमें प्रवेश करके स्फुरण (फड़कने) आदिके द्वारा शुभाशुभ फलकी सूचना देता है। उसकी शान्तिके लिये कुशोंसे

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 82

यद्भवद्भ्यां ममत्वं नो मदीये क्रियते गृहे ।यदि वां मत्प्रियं कार्यमनुग्राह्यो ऽस्मि वां यदि

yadbhavadbhyāṃ mamatvaṃ no madīye kriyate gṛhe / yadi vāṃ matpriyaṃ kāryamanugrāhyo 'smi vāṃ yadi

हिन्दी अर्थ

आदि पशुओंके शरीरमें स्थित होकर अपनी बोलीसे शुभाशुभ फलको सूचित करता है। उसमें भी अशुभसूचक शब्द होनेपर कार्यारम्भका परित्याग करना चाहिए और शुभसूचक शब्द होनेपर अत्यन्त शीघ्रताके साथ कार्यारम्भ कर देना चाहिए। ऐसा प्रजापतिका कथन

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 83

तद्धने मम गेहे च ममत्वमनुकल्प्यताम् ।युवयोर्यन्मदीयं तन्मामकं युवयोः स्वकम्

taddhane mama gehe ca mamatvamanukalpyatām / yuvayoryanmadīyaṃ tanmāmakaṃ yuvayoḥ svakam

हिन्दी अर्थ

प्रकारके कार्यारम्भका नाश और माड़्लिक कर्म तथा अनिन्दनीयता (प्रतिष्ठा)-का अपहरण

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 84

एतत् सत्यं विजानीतं युवां प्राणा बहिश्चराः ।पुनर्नैवं विभिन्नार्थं वक्तव्यं द्विजसत्तमौ

etat satyaṃ vijānītaṃ yuvāṃ prāṇā bahiścarāḥ / punarnaivaṃ vibhinnārthaṃ vaktavyaṃ dvijasattamau

हिन्दी अर्थ

करता है। ब्राह्मणोंके आशीर्वाद, देवताओंकी स्तुति, मूलशान्ति, गोमूत्र और सरसों मिले हुए जलसे स्नान, जन्मकालिक नक्षत्र और ग्रहोंके पूजन, धर्ममय उपनिषदोंके पाठ, शास्त्रोंके दर्शन तथा गण्डान्तमें पैदा हुए बालककी अवज्ञा (कुछ कालतक उसका मुँह न देखने)-से उसके दोषकी शान्ति होती है। सातवाँ कुमार “गर्भहा” बड़ा भयंकर है, जो स्त्रियोंके गर्भमें

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 85

मत्प्रसादपरौ प्रीत्या शापितौ हृदयेन मे ।ततः स्नेहार्द्रवदनौ तावुभौ नागनन्दनौ

matprasādaparau prītyā śāpitau hṛdayena me / tataḥ snehārdravadanau tāvubhau nāganandanau

हिन्दी अर्थ

प्रवेश करके गर्भस्थ पिण्डको अपना ग्रास बना लेता है। प्रतिदिन पवित्रतापूर्वक रहने, प्रसिद्ध मन्त्र (कवच आदि) लिखकर बाँधने, उत्तम फूलों आदिकी माला धारण करने, पवित्र गृहमें रहने तथा अधिक परिश्रम न करनेसे गर्भवती स्त्रीकी उसके भयसे रक्षा होती है। अतः इसके लिये सदा चेष्टा करनी चाहिए। इसी प्रकार आठवाँ कुमार सस्यहा है, वह

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 86

ऊचतुर्नृपतेः पुत्रं किञ्चित् प्रणयकोपितौ ।ऋतध्वज ! न सन्देहो यथैवाह भवानिदम्

ūcaturnṛpateḥ putraṃ kiñcit praṇayakopitau / ṛtadhvaja ! na sandeho yathaivāha bhavānidam

हिन्दी अर्थ

खेतीकी उपजको नष्ट करता है। उसकी भी शान्ति करनी चाहिए; इसके लिये उपाय है-- खेतमें पुराना जूता रखना, अपसव्य होकर वहाँ जाना, चाण्डालका उसमें प्रवेश कराना, खेतके बाहर पूजा चढ़ाना और चन्द्रमा एवं जल (वरुण)-के नामों या मन्त्रोंका कीर्तन

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 87

तथैव चास्मन्मनसि नात्र चिन्त्यमतो ऽन्यथा ।किन्त्वावयोः स्वयं पित्रा प्रोक्तमेतन्महात्मना

tathaiva cāsmanmanasi nātra cintyamato 'nyathā / kintvāvayoḥ svayaṃ pitrā proktametanmahātmanā

हिन्दी अर्थ

दुःसहकी पहली कन्या नियोजिका है। वह मनुष्योंको परायी स्त्री और पराये धनके अपहरण आदिमें लगा देती है। पवित्र ग्रन्थों, मन्त्रों अथवा स्तुतियोंके पाठसे तथा क्रोध- लोभ आदि दुर्गुणोंका त्याग करनेसे उसकी शान्ति होती है। विद्वान् पुरुषको चाहिए कि “नियोजिका मुझे इन दुष्कर्मोमें लगा रही है” यों विचारकर उसका विरोध करते हुए उन

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 88

द्रष्टुं कुवलयाश्वं तमिच्छामीति पुनः पुनः ।ततः कुवलयाश्वो ऽसौ समुत्थाय वरासनात् ।यथाह तातेति वदन् प्रणाममकरोद्भुवि

draṣṭuṃ kuvalayāśvaṃ tamicchāmīti punaḥ punaḥ / tataḥ kuvalayāśvo 'sau samutthāya varāsanāt / yathāha tāteti vadan praṇāmamakarodbhuvi

हिन्दी अर्थ

कर्मोका त्याग करे। जब कोई अपनेको गाली दे या मार बैठे तो भी यही सोचकर कि नियोजिकाने ही इसे इस बुराईमें लगाया है, क्रोध आदिके वशीभूत न हो। इसी प्रकार विद्वान् पुरुष सदा इस बातका स्मरण करता रहे कि नियोजिका ही मुझको और मेरे चित्तको परस्त्री-संसर्गमें लगाती है। दूसरी कनन्‍्याका नाम विरोधिनी है। वह परस्पर प्रेम

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 89

कुवलयाश्व उवाच धन्यो ऽहमतिपुण्यो ऽहं को ऽन्यो ऽस्ति सदृशो मया ।यत्तातो मामभिद्रष्टुं करोति प्रवणं मनः

kuvalayāśva uvāca dhanyo 'hamatipuṇyo 'haṃ ko 'nyo 'sti sadṛśo mayā / yattāto māmabhidraṣṭuṃ karoti pravaṇaṃ manaḥ

हिन्दी अर्थ

रखनेवाले स्त्री-पुरुषोंमें, भाई-बन्धुओंमें, मित्रोंमें, पिता-मातामें, पिता-पुत्रमें तथा सजातीय पुरुषोंमें विरोध डाला करती है। अतः बलिकर्म (पूजोपहारसमर्पण) करने, कठोर बातोंको सहने तथा शास्त्रीय आचार-विचारका पालन करनेके द्वारा उसके भयसे अपनी रक्षा करे। तीसरी कन्याका नाम स्वयंहारिका है। वह खलिहानसे अनाज, घर और गोशालेसे दूध-घी

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 90

तदुत्तिष्ठत गच्छामस्ताताज्ञां क्षणमप्यहम् ।नातिक्रान्तुमिहेच्छामि पदेभ्यां तस्य शपाम्यहम्

taduttiṣṭhata gacchāmastātājñāṃ kṣaṇamapyaham / nātikrāntumihecchāmi padebhyāṃ tasya śapāmyaham

हिन्दी अर्थ

तथा बढ़नेवाले द्रव्यसे उसकी वृद्धि नष्ट कर देती है और सदा अन्तर्धान रहती है। इतना ही नहीं, रसोईघरसे अधपका अन्न तथा अन्नभंडारसे अनाज चुरा लेती है और परोसी हुई रसोईको भोजन करनेवाले मनुष्यके साथ स्वयं भी भोजन करती है। मनुष्योंके जूठे अन्नतक चुरा लेती है। जोते हुए खेत, घर और शालासे ऋद्धि-सिद्धिको हड़प लेती है। गायों

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 91

जड उवाच एवमुक्त्वा ययौ सो ऽथ सह ताभ्यां नृपात्मजः ।प्राप्तश्च गोमतीं पुण्यां निर्गम्य नगराद्वहिः

jaḍa uvāca evamuktvā yayau so 'tha saha tābhyāṃ nṛpātmajaḥ / prāptaśca gomatīṃ puṇyāṃ nirgamya nagarādvahiḥ

हिन्दी अर्थ

और स्त्रियोंके थनोंसे दूध गायब कर देती है। दहीसे घी, तिलसे तेल, कुसुम्भ आदिका रंग तथा रूईसे सूत हर लेती है। इस प्रकार स्वयंहारिका निरन्तर अपहरणमें ही लगी रहती है। उससे रक्षा होनेके लिये अपने घरमें मोरके जोड़े रखे। स्त्रीकी कृत्रिम मूर्ति बनाकर स्थापित करे, घरकी दीवारपर रक्षाके मन्त्र और वाक्य लिखे, घरके भीतर जूठन न रहने दे, हवनकी

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 92

तन्मध्येन ययुस्ते वे नागेन्द्रनृपनन्दनाः ।मेने च राजपुत्रो ऽसौ पारे तस्यास्तयोर्गृहम्

tanmadhyena yayuste ve nāgendranṛpanandanāḥ / mene ca rājaputro 'sau pāre tasyāstayorgṛham

हिन्दी अर्थ

अग्निसे तथा देवताको धूप देनेसे जो भस्म हो, उसे लेकर दूध आदिके बर्तनोंमें लगा दे

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 93

ततश्चाकृष्य पातालं ताभ्यां नीतो नृपात्मजः ।पाताले ददृशे चोभौ स पन्नगकुमारकौ

tataścākṛṣya pātālaṃ tābhyāṃ nīto nṛpātmajaḥ / pātāle dadṛśe cobhau sa pannagakumārakau

हिन्दी अर्थ

गाय और स्त्रीके स्तनोंमें तथा अन्नभंडार आदिमें भी उस भस्मका स्पर्श करा दे। इससे रक्षा होती है। जो एक स्थानपर निवास करनेवाले पुरुषके मनमें उद्वेग पैदा करती है, वह भ्रामणी नामकी कन्या है। उसकी शान्तिके लिये आसन, शय्या तथा उस भूमिपर, जहाँ मनुष्य रहता हो, पीली सरसों छींट दे। साथ ही एकाग्रचित्त होकर पृथ्वी-सूक्तका जप करे।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 94

फणामणिकृतोद्योतौ व्यक्तस्वस्तिकलक्षणौ ।विलोक्य तौ सुरूपाङ्गौ विस्मयोत्फुल्ललोचनः

phaṇāmaṇikṛtodyotau vyaktasvastikalakṣaṇau / vilokya tau surūpāṅgau vismayotphullalocanaḥ

हिन्दी अर्थ

दुःसहकी पाँचवीं कन्या स्त्रियोंके मासिक धर्म नष्ट करती है। इसलिये उसे ऋतुहारिका जानना चाहिए। उसकी शान्तिके लिये स्त्रीको तीर्थमें, देवालयके समीप, चैत्य वृक्षके नीचे, पर्ववके शिखरपर तथा नदीके संगम एवं सरोवरोंमें नहलाना चाहिए। साथ ही चिकित्साशास्त्रके ज्ञाता अच्छे वैद्यको बुलाकर उसकी दी हुई उत्तम ओषधियोंका सेवन भी

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 95

विहस्य चाब्रवीत् प्रेम्णा साधु भो द्विजसत्तमौ ।कथयामासतुस्तौ च पितरं पन्नगेश्वरम्

vihasya cābravīt premṇā sādhu bho dvijasattamau / kathayāmāsatustau ca pitaraṃ pannageśvaram

हिन्दी अर्थ

कराना चाहिए। छठी कन्याका नाम स्मृतिहरा है। यह स्त्रियोंकी स्मरणशक्तिको हर लेती है। पवित्र एवं एकान्त स्थानमें रहनेसे उसकी शान्ति होती है। सातवीं कन्या बीजहरा कहलाती है। यह अत्यन्त भयानक है। स्त्री-पुरुषोंके रज-वीर्यका अपहरण किया करती है। पवित्र अन्नके भोजन तथा नित्य स्नान करनेसे उसकी शान्ति होती है। आठवीं कन्या विद्वेषिणी है,

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 96

शान्तमश्वतरं नाम माननीयं दिवौकसाम् ।रमणीयं ततो ऽपस्यत् पातालं स नृपात्मजः

śāntamaśvataraṃ nāma mānanīyaṃ divaukasām / ramaṇīyaṃ tato 'pasyat pātālaṃ sa nṛpātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

जो सम्पूर्ण जगत्को भय देनेवाली है। यह स्त्री अथवा पुरुषको लोगोंका द्वेषपात्र बना देती है। उसकी शान्तिके लिये मधु, घृत, क्षीरमिश्रित तिलोंका हवन एवं मित्रविन्दा नामक यज्ञ

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 97

कुमारैस्तरुणैर्वृद्धैरुरगैरुपशोभितम् ।तथैव नागकन्याभिः क्रीडन्तीभिरितस्ततः

kumāraistaruṇairvṛddhairuragairupaśobhitam / tathaiva nāgakanyābhiḥ krīḍantībhiritastataḥ

हिन्दी अर्थ

दक्ष प्रजापतिकी संतति तथा स्वायम्भुव सर्गका वर्णन

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 98

चारुकुण्डलहाराभिस्ताराभिर्गगनं यथा ।गीतशब्दैस्तथान्यत्र वीणावेणुस्वनानुगैः

cārukuṇḍalahārābhistārābhirgaganaṃ yathā / gītaśabdaistathānyatra vīṇāveṇusvanānugaiḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--भूगुसे उनकी पत्नी ख्यातिने धाता और विधाता नामक दो

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 99

मृदङ्गपणवातोद्यं हारिवेश्मशताकुलम् ।वीक्षमाणः स पातालं ययौ शत्रुजितः सुतः

mṛdaṅgapaṇavātodyaṃ hāriveśmaśatākulam / vīkṣamāṇaḥ sa pātālaṃ yayau śatrujitaḥ sutaḥ

हिन्दी अर्थ

ख्यातिके ही गर्भसे प्रकट हुईं। महात्मा मेरुकी दो कन्याएँ थीं--आयति और नियति। ये ही धाता और विधाताकी पत्नियाँ हुईं। इन दोनोंसे दो पुत्र हुए--प्राण तथा मेरे महायशस्वी पिता मृकण्डु। श्रीमृकण्डुसे मेरा जन्म हुआ, मेरी माता मनस्विनी देवी थीं। मेरी पत्नी धूम्रवतीके गर्भसे मेरे पुत्र वेदशिराका जन्म हुआ। अब प्राणकी सन्तानका वर्णन सुनो।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 100

सह ताभ्यामभीष्टाभ्यां पन्नगाभ्यामरिन्दमः ।ततः प्रविश्य ते सर्वे नागराजनिवेशनम्

saha tābhyāmabhīṣṭābhyāṃ pannagābhyāmarindamaḥ / tataḥ praviśya te sarve nāgarājaniveśanam

हिन्दी अर्थ

प्राणका पुत्र द्युतिमान् और द्युतिमान्ूका अजरा हुआ। उन दोनोंके बहुत-से पुत्र-पौत्र हुए।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 101

ददृशुस्ते महात्मानमुरगाधिपतिं स्थितम् ।दिव्यमाल्याम्बरधरं मणिकुण्डलभूषणम्

dadṛśuste mahātmānamuragādhipatiṃ sthitam / divyamālyāmbaradharaṃ maṇikuṇḍalabhūṣaṇam

हिन्दी अर्थ

मरीचिकी पत्नी सम्भूतिने पौर्णमासको उत्पन्न किया। महात्मा पौर्णमासके दो पुत्र हुए --विरजा और पर्वत। अज्जिराकी पत्नी स्मृतिने चार कन्याओंको जन्म दिया। उनके नाम ये हैं-सिनीवाली, कुह्ू, राका तथा अनुमति। इसी प्रकार महर्षि अत्रिकी पत्नी अनसूयाने चन्द्रमा, दुर्वासा तथा योगी दत्तात्रेय--इन तीन पापरहित पुत्रोंको उत्पन्न किया। पुलस्त्यकी

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 102

स्वच्छमुक्ताफललताहारिहारोपशोभितम् ।केयूरिणं महाभागमासने सर्वकाञ्चने

svacchamuktāphalalatāhārihāropaśobhitam / keyūriṇaṃ mahābhāgamāsane sarvakāñcane

हिन्दी अर्थ

पत्नी प्रीतिसे दत्तोलि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो अपने पूर्वजन्ममें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें “अगस्त्य'के नामसे प्रसिद्ध था। क्षमा प्रजापति पुलहकी पत्नी थी। उसने कर्दम, अर्ववीर और सहिष्णु--ये तीन पुत्र उत्पन्न किये। क्रतुकी पत्नी सन्नतिने साठ हजार बालखिल्य नामक ऊध्वरेता महर्षियोंको उत्पन्न किया। वसिष्ठकी पत्नी ऊज्जकि गर्भसे सात पुत्र

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 103

मणिविद्रुमवैदूर्य-जालान्तरितरूपके ।स ताभ्यां दर्शितस्तस्य तातो ऽस्माकमसाविति

maṇividrumavaidūrya-jālāntaritarūpake / sa tābhyāṃ darśitastasya tāto 'smākamasāviti

हिन्दी अर्थ

उत्पन्न हुए--रज, गात्र, ऊर्ध्वबाहु, सबल, अनघ, सुतपा और शुक्र। ये सभी सप्तर्षि हुए।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 104

वीरः कुवलयाश्वो ऽयं पित्रे चासौ निवेदितः ।ततो ननाम चरणौ नागेन्द्रस्य ऋतध्वजः

vīraḥ kuvalayāśvo 'yaṃ pitre cāsau niveditaḥ / tato nanāma caraṇau nāgendrasya ṛtadhvajaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन! अग्नितत्त्वके अभिमानी देवता अग्नि ब्रह्माजीके प्रथम पुत्र थे। उनकी पत्नी स्वाहाने तीन पुत्र उत्पन्न किये, जो बड़े ही उदार और तेजस्वी हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं --पावक, पवमान और शुचि। इनमें शुचि जलको सोखनेवाला है। इन तीनोंके वंशमें प्रत्येकके पंद्रह-पंद्रहके क्रमसे पैंतालीस पुत्र हुए। इनके साथ पिता अग्नि और उनके तीन

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 105

तमुत्थाप्य बलाद्गाढं नागेन्द्रः परीषस्वजे ।मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय चिरं जीवेत्युवाच सः

tamutthāpya balādgāḍhaṃ nāgendraḥ parīṣasvaje / mūrdhni cainamupāghrāya ciraṃ jīvetyuvāca saḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्रोंकी संख्या जोड़नेसे कुल उनचास अग्नि होते हैं। ये सब-के-सब दुर्जय माने जाते हैं। ब्रह्माजीके द्वारा उत्पन्न जो अग्निष्वात्त, बर्हिषद, अनग्निक और साग्निक पितर बतलाये गये हैं, उनसे स्वधाने दो कन्याओंको जन्म दिया, जिनके नाम थे--मेना और धारिणी। वे दोनों ही उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न तथा सभी गुणोंसे सुशोभित, ब्रह्मवादिनी एवं योगिनी थीं। इस

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 106

निहतामित्रवर्गश्च पित्रोः सुश्रूषणं कुरु ।वत्स ! धन्यस्य कथ्यन्ते परोक्षस्यापि ते गुणाः

nihatāmitravargaśca pitroḥ suśrūṣaṇaṃ kuru / vatsa ! dhanyasya kathyante parokṣasyāpi te guṇāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकार यह दक्ष-कन्याओंकी वंश-परम्पराका वर्णन हुआ। जो श्रद्धापूर्वक इसका चिन्तन करता है, वह निःसन्तान नहीं रहता।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 107

भवतो मम पुत्राभ्यामसामान्या निवेदिताः ।त्वमेवानेन वर्धेथा मनोवाक्कायचेष्टितैः

bhavato mama putrābhyāmasāmānyā niveditāḥ / tvamevānena vardhethā manovākkāyaceṣṭitaiḥ

हिन्दी अर्थ

क्रौष्टकि बोले--भगवन्! आपने जो अभी स्वायम्भुव मन्वन्तरकी चर्चा की है, उसका वर्णन मैं अच्छी तरह सुनना चाहता हूँ। मन्वन्तरके कालमान, देवता, देवर्षि, राजा और इन्द्र --इन सबका वर्णन कीजिये।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 108

जीवितं गुणिनः श्लाघ्यं जीवन्नेव मृतो ऽगुणः ।गुणवान् निर्वृतिं पित्रोः शत्रुणां हृदयज्वरम्

jīvitaṃ guṇinaḥ ślāghyaṃ jīvanneva mṛto 'guṇaḥ / guṇavān nirvṛtiṃ pitroḥ śatruṇāṃ hṛdayajvaram

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजीने कहा--्रह्मन्! मन्वन्तरकी अवधि इकहत्तर चतुर्युगीसे कुछ अधिक कालकी होती है, यह बात बतायी जा चुकी है। अब मानव-वर्षसे मन्वन्तरका कालमान

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 109

करोत्यात्महितं कुर्वन् विश्वासञ्च महाजने ।देवताः पितरो विप्रा मित्रार्थिविकलादयः

karotyātmahitaṃ kurvan viśvāsañca mahājane / devatāḥ pitaro viprā mitrārthivikalādayaḥ

हिन्दी अर्थ

सुनो। तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्षोका एक मन्वन्तर होता है। देवताओंके मानसे आठ लाख बावन हजार वर्षोका यह काल है। सबसे पहले मनु स्वायम्भुव हैं। इसके बाद स्वारोचिष, औत्तम, तामस, रैवत और चारक्षुष हैं। ये छ: मनु बीत चुके हैं। इस समय वैवस्वत मनुका राज्य है। भविष्यमें सावर्णि नामवाले पाँच मनु, रौच्य मनु तथा भौम मनु--

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 110

बान्धवाश्च तथेच्छन्ति जीवितं गुणिनश्चिरम् ।परिवादनिवृत्तानां दुर्गतेषु दयावताम् ।गुणिनां सफलं जन्म संश्रितानां विपद्गतैः

bāndhavāśca tathecchanti jīvitaṃ guṇinaściram / parivādanivṛttānāṃ durgateṣu dayāvatām / guṇināṃ saphalaṃ janma saṃśritānāṃ vipadgataiḥ

हिन्दी अर्थ

ये सात और होनेवाले हैं। इनका विस्तृत वर्णन मन्वन्तरोंके प्रकरणमें करेंगे। ब्रह्म! इस समय मन्वन्तरोंके देवता, ऋषि, इन्द्र और पितरोंका परिचय देता हूँ तथा उनकी उत्पत्ति, संग्रह एवं संतानोंका भी वर्णन करता हूँ। साथ ही यह भी बतलाता हूँ कि मनु और उनके पुत्रोंके राज्यका क्षेत्र कितना था।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 111

जड उवाच एवमुक्त्वा स तं वीरं पुत्राविदमथाब्रवीत् ।पूजां कुवलयाश्वस्य कर्तुकामो भुजङ्गमः

jaḍa uvāca evamuktvā sa taṃ vīraṃ putrāvidamathābravīt / pūjāṃ kuvalayāśvasya kartukāmo bhujaṅgamaḥ

हिन्दी अर्थ

पहले स्वायम्भुव मन्वन्तरके प्रथम त्रेतायुगमें प्रियव्रतके पुत्रों अर्थात् स्वायम्भुव मनुके पौत्रोंने पृथ्वीके वर्ष-विभाग किये थे। प्रजापति कर्दमजीकी पुत्री प्रजावती राजा प्रियव्रतको ब्याही गयी थी, उसके गर्भसे दो कन्याएँ और दस पुत्र हुए। कन्याओंके नाम थे--सम्राट् और कुक्षि। उन दोनोंके दसों भाई प्रजापतिके समान तेजस्वी और बड़े शूरवीर थे। उनमें

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 112

स्नानादिकक्रमं कृत्वा सर्वमेव यथाक्रमम् ।मधुपानादिसम्भोगमाहारञ्च यथेप्सितम्

snānādikakramaṃ kṛtvā sarvameva yathākramam / madhupānādisambhogamāhārañca yathepsitam

हिन्दी अर्थ

सातके नाम इस प्रकार हैं--आग्नी प्र, मेधातिथि, वपुष्मान्, ज्योतिष्मान, ्युतिमान्, भव्य और सवन। इनके सिवा मेधा, अग्निबाहु और मित्र--ये तीन और थे, जो तपस्या और योगमें तत्पर रहते थे। इन्हें अपने पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंका स्मरण था। अतएव इन महाभाग्यशाली पुरुषोंने राज्य-भोगमें मन नहीं लगाया। राजा प्रियव्रतने शेष सातों पुत्रोंको

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 113

ततः कुवलयाश्वेन हृदयोत्सवभूतया ।कथया स्वल्पकं कालं स्थास्यामो हृष्टचेतसः

tataḥ kuvalayāśvena hṛdayotsavabhūtayā / kathayā svalpakaṃ kālaṃ sthāsyāmo hṛṣṭacetasaḥ

हिन्दी अर्थ

सातों द्वीपोंके राजपदपर धर्मपूर्वक अभिषिक्त कर दिया। अब द्वीपोंका वर्णन सुनो।

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 114

अनुमेन च तन्मौनो वचः शत्रुजितः सुतः ।तथा चकार नृपतिः पन्नगानामुदारधीः

anumena ca tanmauno vacaḥ śatrujitaḥ sutaḥ / tathā cakāra nṛpatiḥ pannagānāmudāradhīḥ

हिन्दी अर्थ

प्रियव्रतने जम्बूद्वीपमें आग्नीध्रको राजा बनाया। प्लक्षद्वीपका राज्य मेधातिथिको सौंपा। शाल्मलद्दीपमें वपुष्मानूको और कुशद्वीपमें ज्योतिष्मान्को राजा बनाया। द्ुतिमान् क्रौज्चद्वीपके, भव्य शाकद्वीपके तथा सवन पुष्करद्वीपके स्वामी बनाये गये। पुष्करराज सवनके दो पुत्र हुए--महावीर और धातकि। उन्होंने पुष्करद्वीपको दो भागोंमें बाँटकर

English

j not in Hooker).

अध्याय २३

श्लोक 115

समेत्य तैरात्मजभूपनन्दनैर् महोरगाणामधिपः स सत्यवाक् ।मुदान्वितो ऽन्नानि मधूनि चात्मवान् यथोपयोगं बुभुजे स भोगभुक्

sametya tairātmajabhūpanandanair mahoragāṇāmadhipaḥ sa satyavāk / mudānvito 'nnāni madhūni cātmavān yathopayogaṃ bubhuje sa bhogabhuk

हिन्दी अर्थ

बसाया। भव्यके सात पुत्र थे, उनके नाम ये हैं--जलद, कुमार, सुकुमार, वनीयक, कुशोत्तर, मेधावी और महाद्रुम। उन्होंने अपने-अपने नामसे शाकद्वीपके सात खण्ड किये। द्युतिमानके भी कुशल, मनुग, उष्ण, प्राकार, अर्थकारक, मुनि और दुन्दुभि--ये सात ही पुत्र थे। उनके नामसे क्रौज्चद्वीपके सात खण्ड हुए। राजा ज्योतिष्मानके कुशद्वीपमें भी उनके

English

j not in Hooker).

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता · Identifier:

Markandeya Purana — Chapter 23

मार्कण्डेयपुराण

संस्कृत संस्करण · Sanskrit Edition:

Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

प्रकाशक अथवा पुरालेखागार · Archive:

Open Sanskrit text archives (see the source link)

डिजिटल पुरालेख देखें
गणना पद्धति टिप्पणी · Numbering System:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.