अध्याय १८
श्लोक 1
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्र्यां संहितायां पूर्वविभागे सप्तदशो ऽध्यायः सूत उवाच एतानुत्पाद्य पुत्रांस्तु प्रजासंतानकारणात् ।कश्यपो गोत्रकामस्तु चचार सुमहत् तपः
iti śrīkūrmapurāṇe ṣaṭsāhastryāṃ saṃhitāyāṃ pūrvavibhāge saptadaśo 'dhyāyaḥ sūta uvāca etānutpādya putrāṃstu prajāsaṃtānakāraṇāt / kaśyapo gotrakāmastu cacāra sumahat tapaḥ
हिन्दी अर्थ
भयभीत राजा नवरथने समीपमें ही (देवी) सरस्वतीसे रक्षित एक परम श्रेष्ठ स्थान देखा। वह बुद्धिमान् राजा अति शीघ्र ही वहाँ पहुँचा और साक्षात् देवी सरस्वतीका दर्शन करके उसने सिर झुकाकर प्रणाम नमस्यामि महादेवीं साक्षाद देवीं सरस्वतीम्। वाग्देवतामनाद्यन्तामीश्वरीं ब्रह्मचारिणीम्
English
He went to the army of Devas which increased the delight of the Ganas. All beings moving about in the firmament eulogised lord Bhairava thus.