Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
49
अध्याय 49 / 318

Adhyaya 49

29 श्लोक
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अध्याय ४९

श्लोक 1

ब्रह्मलोके भगवतः विष्णोः सत्कारं ब्रह्मणा देवदेवेन सार्धं सलिलयोनिना ।ब्रह्मलोकगतो ब्रह्मन् वैकुण्ठः किं चकार ह

brahmaloke bhagavataḥ viṣṇoḥ satkāraṃ brahmaṇā devadevena sārdhaṃ salilayoninā | brahmalokagato brahman vaikuṇṭhaḥ kiṃ cakāra ha

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तदनन्तर जरासंधके महावतों और अनुगामी नरेशोंके साथ वृष्णिवंशियोंके कई बड़े-बड़े युद्ध हुए॥ १॥ भरतग्रेष्ठ ! रुक्मीके साथ वासुदेव श्रीकृष्णका, भीष्मकके साथ आहुक (उग्रसेन)-का, क्रथके साथ वसुदेवका, बश्रु (अक्रूर)-के साथ कैशिकका, गदके साथ चेदिराज शिशुपालका, शंकुके साथ दन्तवक्त्रका तथा अन्य सैनिकोंके साथ वृष्णिकुलके महामना वीर नरेशोंका, सारांश यह कि उभय पक्षके सैनिकोंका प्रतिद्वन्द्दी सैनिकोंके चलता रहा॥ २--४॥ नरेश्वर! हाथियोंसे हाथी, घोड़ोंसे घोड़े, पैदलोंसे पैदल और रथोंसे रथ मिश्रित हो गये और इस प्रकार घोल-मेल कर सभी योद्धा विपक्षियोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ५॥ राजा जरासंधका बलरामजीके

English

²¹⁶ Literally means one having no end. The God has no beginning or

अध्याय ४९

श्लोक 2

किमर्थे चादिदेवेन नीतः कमलयोनिना ।विष्णुर्दैत्यवधे वृत्ते देवैश्च कृतसत्क्रियः

kimarthe cādidevena nītaḥ kamalayoninā | viṣṇurdaityavadhe vṛtte devaiśca kṛtasatkriyaḥ

अध्याय ४९

श्लोक 3

ब्रह्मलोके च किं स्थानं कं वा योगमुपास्त सः ।कं वा दधार नियमं स विभुर्भूतभावनः

brahmaloke ca kiṃ sthānaṃ kaṃ vā yogamupāsta saḥ | kaṃ vā dadhāra niyamaṃ sa vibhurbhūtabhāvanaḥ

हिन्दी अर्थ

हो गये तथा दोनोंके ही घोड़े और सारथि मारे गये। उभौ तौ परमाचार्यों लोके ख्यातौ महाबलौ। मत्ताविव गजौ युद्धे तावन्योन्यमयुध्यताम् ततो देवा: सगन्धर्वा: सिद्धाश्च समहर्षय: । समन्ततश्वाप्ससस: समाजग्मु: सहस्त्रशः तद् देवयक्षगन्धर्वमहर्षिभिरलंकृतम्। शशुभे5भ्यधिकं राजन् दिवं ज्योतिर्गणैरिव

English

²¹⁸ There are four principal _Varnas_ or castes, the _Brāhmanas_, _Kshatriyas_, _Vaisyas_ and _Sudras_. The Brāhmanas are said to have sprung from the mouth of Brahma and belong to the sacerdotal class. The Kshatriyas, or the military caste, are said to have arisen from His arms. The Vaisyas or the trading class are said to have sprung from His thighs and the Sudra or the servile class from His feet. The earliest reference to the origin of caste is seen in a hymn of the Rig-Veda called _Purusha Sukta_. There are various other accounts seen in the various Puranas.

अध्याय ४९

श्लोक 4

कथं तस्याऽऽसतस्तत्र विश्वं जगदिदं महत् ।श्रियमाप्नोति विपुलां सुरासुरनरार्चिताम्

kathaṃ tasyā''satastatra viśvaṃ jagadidaṃ mahat | śriyamāpnoti vipulāṃ surāsuranarārcitām

अध्याय ४९

श्लोक 5

कथं स्वपिति घर्मान्ते बुध्यते चाम्बुदप्लवे ।कथं च ब्रह्मलोकस्थो धुरं वहति लौकिकीम्

kathaṃ svapiti gharmānte budhyate cāmbudaplave | kathaṃ ca brahmalokastho dhuraṃ vahati laukikīm

हिन्दी अर्थ

वीरोंको युद्धके लिये उद्यत देख दूसरे योद्धाओंके युद्ध बंद हो गये। उन दोनोंकी गदायुद्धमें ख्याति थी। वे दोनों बड़े रोषमें भरकर एक-दूसरेपर धावा करते थे॥ १२-- १४॥ वे दोनों महाबली वीर संसारमें गदायुद्धके उत्तम आचार्यके रूपमें विख्यात थे तथा जैसे दो मतवाले हाथी लड़ते हैं, उसी प्रकार रणभूमिमें वे एक-दूसरेके साथ जूझ रहे थे॥ १५॥ उस समय गन्धर्वोंसहित देवता, सिद्ध, महर्षि तथा सहस्रों अप्सराएँ सब ओरसे उस युद्धको देखनेके लिये आ पहुँचीं॥ १६॥ राजन्! देवताओं, यक्षों, गन्धवों और महर्षियोंसे अलंकृत हुआ आकाशका वह भाग नक्षत्रसमूहोंसे विभूषित हुआ-सा अधिक शोभा पाने लगा। महाबली जरासंध बायेंसे पैंतरा देकर बलरामजीकी ओर दौड़ा और बलरामजीने दाहिनेसे उसपर आक्रमण किया॥ १७-१८ ॥ गदायुद्धमें कुशल वे दोनों बीर दसों दिशाओंको निनादित करते हुए एक-दूसरेपर उसी प्रकार प्रहार करने लगे, जैसे दो मतवाले हाथी परस्पर दाँतोंसे

English

²²⁰ An article intended as fit for offering with fire. Burnt offering, oblation with fire.

अध्याय ४९

श्लोक 6

चरितं तस्य विप्रेन्द्र दिव्यं भगवतो दिवि ।विस्तरेण यथातत्त्वं सर्वमिच्छामि वेदितुम्

caritaṃ tasya viprendra divyaṃ bhagavato divi | vistareṇa yathātattvaṃ sarvamicchāmi veditum

हिन्दी अर्थ

आघात करते हों। बलरामजी जब गदाका आघात करते, तब वज्रपातके समान भयानक शब्द सुनायी पड़ता था तथा रणभूमिमें जरासंधके गदाघातसे ऐसी आवाज होती थी, मानो कोई पर्वत फट पड़ा हो॥ १९-२०॥ जैसे प्रचण्ड वायु विन्ध्यपर्वतको नहीं हिला सकती, उसी प्रकार जरासंधके हाथसे छूटी हुई गदा गदाधारियोंमें श्रेष्ठ बलरामजीको कम्पित नहीं कर पाती थी। बलरामजीकी गदाके वेगको मगधराज जरासंध अपने बलकी अधिकताके कारण महान् धैर्यके साथ सह लेता था तथा अपनी शिक्षाके द्वारा उनके प्रहारको व्यर्थ कर देता था॥ २१-२२॥ इस प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों महाबली योद्धा उस संग्राममें विचित्र पैंतरे दिखाते हुए विचर रहे थे॥ २३॥ देरतक परिश्रम करके थक जानेपर दोनों खड़े हो जाते थे; फिर दो घड़ीतक सुस्ताकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगते थे॥ २४॥ इस प्रकार वे दोनों प्रमुख योद्धा समानभावसे देरतक लड़ते रहे। वे दोनों ही युद्धसे विमुख नहीं हुए॥ २५॥ तदनन्तर पराक्रमी बलरामजीने जब गदा-युद्धमें जरासंधकी विशेषता देखी, तब उन्होंने कुपित हो गदा त्यागकर उत्तम मूसल हाथमें लिया

English

²²¹ A name of Balaveda. It is also the name of the serpent-king, the thousand-headed snake who was the couch and canopy of Vishnu.

अध्याय ४९

श्लोक 7

शृणु नारायणस्यादौ विस्तरेण प्रवृत्तयः ।ब्रह्मलोकं यथारूढो ब्रह्मणा सह मोदते

śṛṇu nārāyaṇasyādau vistareṇa pravṛttayaḥ | brahmalokaṃ yathārūḍho brahmaṇā saha modate

हिन्दी अर्थ

अमोघं बलदेवेन क्रुद्धेन तु महारणे ततोडन्तरिक्षे वागासीत् सुस्वरा लोकसाक्षिणी । उबाच बलदेवं तं॑ समुद्यतहलायुधम् अचिरेणैव कालेन प्राणांस्त्यक्ष्यति मागध: दीर्घकाल॑ महाराज निधघ्नतामितरेतरम् पराजिते त्वपक्रान्ते जरासंधे महीपतौ

English

Vaishampayana said:—Thus ranging and sporting in the forest Krishna and Baladeva spent the two²²² months of the rainy season (1). Thereupon returning to Vraja those two heroic brothers heard that arrangements were being made for performing a _Yajna_ in honor of Indra and that the milkmen were busily engaged in merriments (2). Seeing this, Krishna, filled with curiosity, asked "What is that Sakra sacrifice for which you are all filled with delight?" (3) Amongst them an elderly milk-man replied:—"Hear, why Indra's flag is worshipped (4). O subduer of thy enemies, Indra, the king of the celestials and the lord of the world, is the master of clouds. For this reason from time immemorial and coming down from one family to another, this festival is being celebrated (5). Commanded by him and embellished by his bow the clouds produce corns with new showers of rain (6). Pleased with witnessing this festival the Lord Purandara, the giver of clouds and water, and the partaker of many sacrifices, brings about the gratification of the entire world (7). We and other men live by the corns produced by him and the celestials are also gratified thereby (8). Corns grow up when the king of gods sends down showers. And when the earth is gratified with oblations the whole universe appears as if full of ambrosia (9). Fed by the grass produced by him the kine, with the bulls and calves, have attained to nourishment and easiness (10). Wherever the cloud, pouring down water, is seen, there is observed neither a piece of ground shorn of grass and corns nor an hungry animal (11). The nectarine rays, of the sun that are milched by the Lord Sakra, are discharged by the clouds in the form of ambrosia-like showers of rain (12). The mighty leonine roar, announced by the air, which he emits with force from the clouds, is designated by the people as the muttering of clouds (13). The terrible sound, that he sends forth when carried by clouds accompanied by the wind, is heard like the clap of a thunder-bolt that shatters the mountains (14). O my child, as the great Lord Siva is encircled by the goblins, so Indra, surrounded by clouds coursing at will, and stationed in the sky, sends down showers accompanied by the clap of a thunder-bolt (15). Sometimes resembling an unfair day, sometimes resembling scattered gold, sometimes resembling collyrium and sometimes pouring water in drops the clouds paint the sky. Thus extracting water from the earth through the rays of the sun, Indra, the giver of water, sends it down again on earth for the behoof of all creatures (16–18).²²³ For these reasons O Krishna, this rainy season has been fixed upon as the time for worshipping Indra. The kings and others men with delight worship Indra in the rainy season. We

अध्याय ४९

श्लोक 8

कामं तस्य गतिः सूक्ष्मा देवैरपि दुरासदा ।यत् तु वक्ष्याम्यहं राजंस्तन्मे निगदतः शृणु

kāmaṃ tasya gatiḥ sūkṣmā devairapi durāsadā | yat tu vakṣyāmyahaṃ rājaṃstanme nigadataḥ śṛṇu

अध्याय ४९

श्लोक 9

एष लोकमयो देवो लोकाश्चैतन्मयास्त्रयः ।एष देवमयश्चैव देवाश्चैतन्मया दिवि

eṣa lokamayo devo lokāścaitanmayāstrayaḥ | eṣa devamayaścaiva devāścaitanmayā divi

हिन्दी अर्थ

कहा-- ॥ २७-२८ ॥ 'दूसरोंको मान देनेवाले बलरामजी ! जरासंधका वध आपके हाथसे होनेवाला नहीं है; अतः खेद करनेकी आवश्यकता नहीं है। इसकी मृत्युका हेतु मुझे विदित हो गया है; अत: आप इसे मारनेकी चेष्टासे निवृत्त हो जाइये। मगधराज जरासंध थोड़े ही समयमें अपने प्राणोंका परित्याग करेगा'॥ २९॥ यह सुनकर जरासंधका मन उदास हो गया और बलरामजीने फिर उसपर प्रहार नहीं किया॥ ३० ॥ अब वे दोनों युद्धसे विरत हो गये; फिर तो वृष्णिवंशी योद्धा तथा दूसरे राजाओंने भी युद्ध बंद कर दिया। महाराज! इस प्रकार दीर्घकालतक एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए उन योद्धाओंका जो अत्यन्त भयंकर युद्ध अविराम गतिसे चलता आ रहा था, वह शान्त हो गया। राजा जरासंध जब परास्त होकर युद्धसे हट गया और सूर्यदेव अस्त हो गये, तब रातके समय यादवोंने फिर उसका पीछा नहीं किया। भगवान् श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित महाबली यादव अपने लक्ष्यमें सफल हो चुके

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ४९

श्लोक 10

तस्य पारं न पश्यन्ति बहवः पारचिन्तकाः ।एष पारं परं चैव लोकानां वेद माधवः

tasya pāraṃ na paśyanti bahavaḥ pāracintakāḥ | eṣa pāraṃ paraṃ caiva lokānāṃ veda mādhavaḥ

अध्याय ४९

श्लोक 11

अस्य देवान्धकारस्य मार्गितव्यस्य दैवतैः ।शृणु वै यत्तदा वृत्तं ब्रह्मलोके पुरातनम्

asya devāndhakārasya mārgitavyasya daivataiḥ | śṛṇu vai yattadā vṛttaṃ brahmaloke purātanam

हिन्दी अर्थ

सा तमिष्ष्वाकुशार्दूलं कामयामास कामिनी । स कदाचित्नरश्रेष्ठो भ्रात्रा ज्येष्ठन माधव रेमे समेत्य कालज्ञः प्रियया कमलेक्षण:। भ्रात्रा विनिष्कृतं राज्यात् प्रोवाच कमलेक्षणा रम्यं मधुवनं नाम कामपुष्पफलद्गुमम्। सहितौ तत्र रंस्थावो यथा दिवि गतौ तथा पितुर्में दयितस्त्वं हि मातुर्मम च पार्थिव। मत्प्रियार्थ प्रियतरो भ्रातुश्न॒ लवणस्य वै

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ४९

श्लोक 12

स गत्वा ब्रह्मणो लोकं दृष्ट्वा पैतामहं पदम् ।ववन्दे तानृषीन् सर्वान् विष्णुरार्षेण कर्मणा

sa gatvā brahmaṇo lokaṃ dṛṣṭvā paitāmahaṃ padam | vavande tānṛṣīn sarvān viṣṇurārṣeṇa karmaṇā

अध्याय ४९

श्लोक 13

सोऽग्निं प्राक्सवने दृष्ट्वा हूयमानं महर्षिभिः ।अवन्दत महातेजाः कृत्वा पौर्वाह्णिकीं क्रियाम्

so'gniṃ prāksavane dṛṣṭvā hūyamānaṃ maharṣibhiḥ | avandata mahātejāḥ kṛtvā paurvāhṇikīṃ kriyām

हिन्दी अर्थ

विश्वासपर रहनेवाले नरश्रेष्ठ हर्यश्वको राज्यसे निकाल दिया, तब उन्होंने अयोध्या छोड़ दी और थोड़े-से परिवारके साथ अपनी प्रिया मधुमतीसहित वे बनमें रहने लगे॥ १६-१७॥ कालकी महिमाको जाननेवाले कमलनयन हर्यश्व अपनी प्यारी पत्नीके साथ मिलकर वहाँ बड़े आनन्दसे समय बिताने लगे।' एक दिन कमलनयनी मधुमतीने भाईद्वारा राज्यसे निकाले गये 'पतिसे कहा-- ॥ १८ ॥ 'नरश्रेष्ठ वीर अयोध्याके राज्यकी दोनों मेरे पिता मधुके घरपर चलें॥ १९॥ सुरम्य मधुवन नामक वन ही मेरे पिताका निवासस्थान है। वहाँके वृक्ष इच्छानुसार फूल और फल देनेवाले हैं। वहाँ हम दोनों साथ रहकर स्वर्गवासियोंके समान मौज करेंगे॥ २०॥ पृथ्वीनाथ! मेरे पिता और माता दोनोंको ही तुम बहुत प्रिय हो तथा मेरा प्रिय करनेके लिये मेरा भाई लवणासुर भी तुम्हें अत्यन्त प्रिय मानेगा

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ४९

श्लोक 14

स ददर्श मखेष्वाज्यैरिज्यमानं महर्षिभिः ।भागं यज्ञियमश्नानं स्वदेहमपरं स्थितम्

sa dadarśa makheṣvājyairijyamānaṃ maharṣibhiḥ | bhāgaṃ yajñiyamaśnānaṃ svadehamaparaṃ sthitam

अध्याय ४९

श्लोक 15

अभिवाद्याभिवाद्यानामृषीणां ब्रह्मवर्चसाम् ।परिचक्राम सोऽचिन्त्यो ब्रह्मलोकं सनातनम्

abhivādyābhivādyānāmṛṣīṇāṃ brahmavarcasām | paricakrāma so'cintyo brahmalokaṃ sanātanam

हिन्दी अर्थ

ततो मधुपुरं राजा हर्यश्व: स जगाम च। भार्यया सह कामिन्या कामी पुरुषपुड्रव: अमित्रनिग्रहे चैव कर्णधारत्वमेष्यति तद् भविष्यमहं मन्‍्ये कालयोगेन पार्थिव। अध्यास्यतां यथाकाल पार्थिव वृत्तमुत्तमम् दत्त्वा यास्यामि तपसे सागरं लवणालयम्

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ४९

श्लोक 16

स ददर्शोच्छ्रितान् यूपांश्चषालाग्रविभूषितान् ।मखेषु च ब्रह्मर्षिभिः शतशः कृतलक्षणान्

sa dadarśocchritān yūpāṃścaṣālāgravibhūṣitān | makheṣu ca brahmarṣibhiḥ śataśaḥ kṛtalakṣaṇān

हिन्दी अर्थ

स च हैत्यस्तपोवासं जगाम वरुणालयम् अचिरेणैव कालेन समृद्ध प्रत्यपद्यत ' श्रीकृष्ण! यद्यपि हर्यश्वका अपने बड़े भाईके प्रति अच्छा बर्ताव था (वह उनसे कोई प्रतिशोध नहीं लेना चाहता था) तो भी कामसे पीड़ित होनेके कारण उस नरेशको पत्नीकी बात पसंद आ गयी॥ २५॥ तब कामी पुरुषप्रवर राजा हर्यश्व अपनी कामवती पत्नीके साथ मधुपुरको चला गया'॥ २६॥ वहाँ दानवराज मधुने उससे सान्त्वनापूर्वक कहा--' बेटा हर्यश्व ! तुम्हारा स्वागत है। में तुम्हारे दर्शसे (अथवा तुमसे मिलकर) बहुत प्रसन्न हूँ॥ २७॥ राजेन्द्र यह जो मेरा सारा राज्य है, उसे मैं केवल मधुवनको छोड़कर तुम्हें सौंप रहा हूँ। तुम यहाँ निवास करो ॥ २८ ॥ इस बनमें यह मेरा पुत्र लवण भी तुम्हारा सहायक होगा तथा शत्रुओंका निग्रह करनेमें

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ४९

श्लोक 17

आज्यधूमं समाघ्राय शृण्वन्वेदान्द्विजेरितान् ।यज्ञैरिज्यन्तमात्मानं पश्यंस्तत्र चचार ह

ājyadhūmaṃ samāghrāya śṛṇvanvedāndvijeritān | yajñairijyantamātmānaṃ paśyaṃstatra cacāra ha

अध्याय ४९

श्लोक 18

ऊचुस्तमृषयो देवाः सदस्याः सदसि स्थिताः ।अर्घ्योद्यतभुजाः सर्वे पवित्रान्तरपाणयः

ūcustamṛṣayo devāḥ sadasyāḥ sadasi sthitāḥ | arghyodyatabhujāḥ sarve pavitrāntarapāṇayaḥ

अध्याय ४९

श्लोक 19

देवेषु वर्तते यद् वै तद्धि सर्वं जनार्दनात् ।यत्प्रवृत्तं च देवेभ्यस्तद्विद्धि मधुसूदनात्

deveṣu vartate yad vai taddhi sarvaṃ janārdanāt | yatpravṛttaṃ ca devebhyastadviddhi madhusūdanāt

अध्याय ४९

श्लोक 20

अग्नीषोममयं लोकं यं विदुर्विदुषो जनाः ।तं सोममग्निं लोकं च वेद विष्णुं सनातनम्

agnīṣomamayaṃ lokaṃ yaṃ vidurviduṣo janāḥ | taṃ somamagniṃ lokaṃ ca veda viṣṇuṃ sanātanam

अध्याय ४९

श्लोक 21

क्षीराद् यथा दधि भवेद्दध्नः सर्पिर्भवेद् यथा ।मथ्यमानेषु भूतेषु तथा लोको जनार्दनात्

kṣīrād yathā dadhi bhaveddadhnaḥ sarpirbhaved yathā | mathyamāneṣu bhūteṣu tathā loko janārdanāt

अध्याय ४९

श्लोक 22

यथेन्द्रियैश्च भूतैश्च परमात्मा विधीयते ।तथा देवैश्च वेदैश्च लोकैश्च विहितो हरिः

yathendriyaiśca bhūtaiśca paramātmā vidhīyate | tathā devaiśca vedaiśca lokaiśca vihito hariḥ

अध्याय ४९

श्लोक 22b

यथा भूतेन्द्रियावाप्तिर्विहिता भुवि देहिनाम् ।तथा प्राणेश्वरावाप्तिर्देवानां दिवि वैष्णवी

yathā bhūtendriyāvāptirvihitā bhuvi dehinām | tathā prāṇeśvarāvāptirdevānāṃ divi vaiṣṇavī

हिन्दी अर्थ

आसीद् राजा मनोर्वशे श्रीमानिक्ष्वाकुसम्भव: । हर्यश्व इति विख्यातो महेन्द्रसमविक्रम: वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महाबली भगवान् श्रीकृष्ण रोहिणीकुमार बलदेवजीके साथ मिलकर यादवोंसे भरी हुई उस मथुरापुरीमें सुखपूर्वक रहने लगे॥ १॥ उनके श्रीअज्ेंमें यौवनावस्थाका प्रवेश हुआ था। वे भगवान् राजोचित शोभासे सम्पन्न हो वनप्रान्तसे विभूषित मथुरामें प्रसन्नतापूर्वक्त विचरते थे॥२॥ कुछ कालके अनन्तर राजगृहके स्वामी प्रतापी राजा जरासंधने कंसके मारे जानेकी घटनाको फिरसे स्मरण किया उसकी दोनों कन्याओंने पुनः उसे युद्धके लिये उत्साहित किया। यादवोंने जरासंधको क्रमश: सत्रह बार युद्धका अवसर दिया; परंतु वे महारथी यादव समरभूमिमें उसे मार न सके ॥ ४॥ तदनन्तर श्रीमान् मगधराजने चतुरड्धिणी सेनाको साथ लेकर फिर अठारहवीं बार यादवोंके साथ युद्ध करनेका आयोजन किया॥ ५॥ राजगृहका स्वामी बलवान राजा श्रीमान् जरासंध इन्द्रके समान पराक्रमी था। उसने पहलेकी पराजयसे लज्जाका अनुभव करनेके

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ४९

श्लोक 24

सत्रिणां सत्रफलदः पवित्रं परमात्मवान् ।लोकतन्त्रधरो ह्येष मन्त्रैमन्त्र इवोच्यते

satriṇāṃ satraphaladaḥ pavitraṃ paramātmavān | lokatantradharo hyeṣa mantraimantra ivocyate

अध्याय ४९

श्लोक 25

स्वागतं ते सुरश्रेष्ठ पद्मनाभ महाद्युते ।इदं यज्ञियमातिथ्यं मन्त्रतः प्रतिगृह्यताम्

svāgataṃ te suraśreṣṭha padmanābha mahādyute | idaṃ yajñiyamātithyaṃ mantrataḥ pratigṛhyatām

अध्याय ४९

श्लोक 26

त्वमस्य यज्ञपूतस्य पात्रं पाद्यस्य पावनः ।अतिथिस्त्वं हि मन्त्रोक्तः स दृष्टः सततं मतः

tvamasya yajñapūtasya pātraṃ pādyasya pāvanaḥ | atithistvaṃ hi mantroktaḥ sa dṛṣṭaḥ satataṃ mataḥ

हिन्दी अर्थ

शशास चेमां वसुधां प्रशान्तरभयतस्कराम्। यदुरिन्द्रप्रतिकाशो नृपो येनास्म यादवा: “जलप्राय देशमें समुद्रतटवर्ती वनोंसे विभूषित, विचित्र खेतों और हरी-भरी खेतीसे सुशोभित, परकोटों और गाँवोंसे युक्त तथा धनधान्यसे सम्पन्न उस राष्ट्रपर राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले राजा हर्यश्व शासन करने लगे और राजधर्म एवं यशसे प्रजाका आनन्द बढ़ाने लगे॥ ४०-४१॥ महामना हर्यश्वके उत्तम आचार- व्यवहारके कारण वह अक्षोभ्य राष्ट्र उत्तम राष्ट्रके गुणोंसे सम्पन्न हो निरन्तर उन्‍नति करने लगा॥ ४२॥ राज्यपर स्थित होकर राजोचित बर्तावसे सुशोभित होनेवाले उन राजा हर्यश्वने सदाचार और उत्तम नीतिसे अपने कुलके लिये उचित लक्ष्मी प्राप्त कर ली॥४३॥ पुत्रकी इच्छा रखनेवाले उन्हीं सदाचारी एवं बुद्धिमान् हर्यश्वके मधु- मतीके गर्भसे महायशस्वी यदुका जन्म हुआ

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ४९

श्लोक 27

त्वयि योद्धुं गते विष्णौ न प्रावर्तन्त नः क्रियाः ।अवैष्णवस्य यज्ञस्य न हि कर्म विधीयते

tvayi yoddhuṃ gate viṣṇau na prāvartanta naḥ kriyāḥ | avaiṣṇavasya yajñasya na hi karma vidhīyate

हिन्दी अर्थ

महातेजस्वी यदुका स्वर दुन्दुभिनिनादके समान गम्भीर था। वे राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न होकर दिनोंदिन बढ़ने लगे। शत्रुओंके लिये वे सर्वथा दुर्जय थे हर्यश्वका वह पुत्र यदु नामसे ही विख्यात हुआ। यदु राजोचित लक्षणोंसे सम्मानित थे, ठीक उसी तरह जैसे उनके पूर्वज राजा महायशस्वी पूरु सम्मानित होते थे॥ ४६॥ महामना हर्यश्वके एक ही पुत्र यदु हुए। वे परम सुन्दर, बलवान् और पृथ्वीका भरण-पोषण करनेमें समर्थ थे॥ ४७॥ राजा हर्यश्व दस हजार वर्षोतक अक्षय राज्यका उपभोग करके स्वर्गलोकमें चले गये। वे भूमण्डलके अनृपम धर्मात्मा थे॥ ४८ ॥ पिताके मर जानेपर प्रजाओंने उदारचेता श्रीमान् यदुको उनके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वे क्रमशः: एक सूर्यके बाद दूसरे सूर्यके समान उदित हो प्रकाशित होने लगे॥४९॥ वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी यदु, जिनके कारण हमलोग यादव कहलाते

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ४९

श्लोक 28

सदक्षिणस्य यज्ञस्य त्वत्प्रसूतिः फलं लभेत् ।अद्यात्मानमिहास्माभिरिज्यमानं निरीक्षसे

sadakṣiṇasya yajñasya tvatprasūtiḥ phalaṃ labhet | adyātmānamihāsmābhirijyamānaṃ nirīkṣase

अध्याय ४९

श्लोक 29

एवमस्त्विति तान्सर्वान्भगवान्प्रत्यपूजयत् ।मुमुदे ब्रह्मलोकस्थो ब्रह्मा लोकपितामहः

evamastviti tānsarvānbhagavānpratyapūjayat | mumude brahmalokastho brahmā lokapitāmahaḥ

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.

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