Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
33
अध्याय 33 / 318

Adhyaya 33

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अध्याय ३३

श्लोक 1

यदोःवंशस्य वर्णनम्, कार्तवीर्यस्य उत्पत्तिः चरित्रं च, ययातेः पञ्चानां पुत्राणां वंशवर्णनस्य श्रवणस्य महिमा बभूवुस्तु यदोः पुत्राः पञ्च देवसुतोपमाः ।सहस्रदः पयोदश्च क्रोष्टा नीलोऽञ्जिकस्तथा

yadoḥvaṃśasya varṇanam, kārtavīryasya utpattiḥ caritraṃ ca, yayāteḥ pañcānāṃ putrāṇāṃ vaṃśavarṇanasya śravaṇasya mahimā babhūvustu yadoḥ putrāḥ pañca devasutopamāḥ | sahasradaḥ payodaśca kroṣṭā nīlo'ñjikastathā

अध्याय ३३

श्लोक 2

सहस्रदस्य दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः ।हैहयश्च हयश्चैव राजन् वेणुहयस्तथा

sahasradasya dāyādāstrayaḥ paramadhārmikāḥ | haihayaśca hayaścaiva rājan veṇuhayastathā

अध्याय ३३

श्लोक 3

हैहयस्याभवत् पुत्रो धर्मनेत्र इति स्मृतः ।धर्मनेत्रस्य कार्तस्तु साहञ्जस्तस्य चात्मजः

haihayasyābhavat putro dharmanetra iti smṛtaḥ | dharmanetrasya kārtastu sāhañjastasya cātmajaḥ

अध्याय ३३

श्लोक 4

साहञ्जनी नाम पुरी येन राज्ञा निवेशिता ।साहञ्जस्य तु दायादो महिष्मान् नाम पार्थिवः

sāhañjanī nāma purī yena rājñā niveśitā | sāhañjasya tu dāyādo mahiṣmān nāma pārthivaḥ

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त कोमल प्रतीत हुआ और दूसरेका कठोर तब जलजजन्मा भगवान् ब्रह्माने उन दोनोंका नामकरण- संस्कार किया और कहा--यह जो मृदु (कोमल) है, इसका नाम “मधु' होगा और जो कठोर है, वह 'कैटभ' अत्यन्त दुर्जय हैत्य बलके घमंडसे मतवाले होकर युद्धकी इच्छासे समस्त एकार्णव जगतूमें विचरने लगे॥ २६॥ उन दोनोंको युद्धेके लिये आया देख लोकपितामह ब्रह्मा वहीं एकार्णवकी जलराशिमें अदृश्य हो गये॥ २७॥ उन चतुर्मुख ब्रह्माने भगवान् पद्मनाभकी नाभिके मध्यभागसे प्रकट हुए कमलपर ही गुप्तरूपसे निवास करना पसंद किया॥ २८॥ वे दोनों भगवान् नारायण और ब्रह्मा जलके भीतर स्थित हो बहुत वर्षोतक

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अध्याय ३३

श्लोक 5

माहिष्मती नाम पुरी येन राज्ञा निवेशिता ।आसीन्महिष्मतः पुत्रो भद्रश्रेण्यः प्रतापवान्

māhiṣmatī nāma purī yena rājñā niveśitā | āsīnmahiṣmataḥ putro bhadraśreṇyaḥ pratāpavān

अध्याय ३३

श्लोक 6

वाराणस्यधिपो राजा कथितः पूर्वमेव तु ।भद्रश्रेण्यस्य पुत्रस्तु दुर्दमो नाम विश्रुतः

vārāṇasyadhipo rājā kathitaḥ pūrvameva tu | bhadraśreṇyasya putrastu durdamo nāma viśrutaḥ

अध्याय ३३

श्लोक 7

दुर्दमस्य सुतो धीमान्कनको नाम वीर्यवान् ।कनकस्य तु दायादाश्चत्वारो लोकविश्रुताः

durdamasya suto dhīmānkanako nāma vīryavān | kanakasya tu dāyādāścatvāro lokaviśrutāḥ

अध्याय ३३

श्लोक 8

कृतवीर्यः कृतौजाश्च कृतवर्मा तथैव च ।कृताग्निस्तु चतुर्थोऽभूत्कृतवीर्यात्तथार्जुनः

kṛtavīryaḥ kṛtaujāśca kṛtavarmā tathaiva ca | kṛtāgnistu caturtho'bhūtkṛtavīryāttathārjunaḥ

अध्याय ३३

श्लोक 9

यस्तु बाहुसहस्रेण सप्तद्वीपेश्वरोऽभवत् ।जिगाय पृथिवीमेको रथेनादित्यवर्चसा

yastu bāhusahasreṇa saptadvīpeśvaro'bhavat | jigāya pṛthivīmeko rathenādityavarcasā

अध्याय ३३

श्लोक 10

स हि वर्षायुतं तप्त्वा तपः परमदुश्चरम् ।दत्तमाराधयामास कार्तवीर्योऽत्रिसम्भवम्

sa hi varṣāyutaṃ taptvā tapaḥ paramaduścaram | dattamārādhayāmāsa kārtavīryo'trisambhavam

अध्याय ३३

श्लोक 11

तस्मै दत्तो वरान् प्रादाच्चतुरो भूरितेजसः ।पूर्वं बाहुसहस्रं तु प्रार्थितं सुमहद्वरम्

tasmai datto varān prādāccaturo bhūritejasaḥ | pūrvaṃ bāhusahasraṃ tu prārthitaṃ sumahadvaram

हिन्दी अर्थ

बले: सकाशाद् हैत्यस्य विष्णुना प्रभविष्णुना उन दुर्जय, विशालकाय एवं भयंकर असुरोंको देखकर ब्रह्माजीनी कमलकी नालसे भगवानू विष्णुको ठोंका (उन्हें जग जानेके लिये संकेत किया)। तब महातेजस्वी भगवान् पद्मनाभ शय्यासे उछलकर खड़े हो गये ॥ ३१॥ उस एकार्णव जगतूमें, जब कि तीनों लोक जलमें मिल गये थे, उन दोनों असुरों तथा भगवान् विष्णुमें घोर युद्ध हुआ॥ ३२ ॥ उस समय सहसीरों वर्षोतक वह तुमुल युद्ध चलता रहा, किंतु वे दोनों असुर युद्धमें थके नहीं॥ ३३॥ दीर्घकालतक युद्ध करके वे दोनों रणदुर्मद हैत्य मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और भगवान् नारायण हरिसे इस प्रकार बोले-- ॥ ३४ ॥ “देव ! तुम्हारे युद्धसे हम दोनों भाई बहुत प्रसन्न हैं। तुम हमारे लिये

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अध्याय ३३

श्लोक 19

अधर्मे वर्तमानस्य सद्भिस्तत्र निवारणम् ।उग्रेण पृथिवीं जित्वा स्वधर्मेणानुरञ्जनम्

adharme vartamānasya sadbhistatra nivāraṇam | ugreṇa pṛthivīṃ jitvā svadharmeṇānurañjanam

अध्याय ३३

श्लोक 13

सङ्ग्रामान् सुबहून्कृत्वा हत्वा नारीन्सहस्रशः ।सङ्ग्रामे वर्तमानस्य वधं चाप्यधिकाद् रणे

saṅgrāmān subahūnkṛtvā hatvā nārīnsahasraśaḥ | saṅgrāme vartamānasya vadhaṃ cāpyadhikād raṇe

अध्याय ३३

श्लोक 14

तस्य बाहुसहस्रं तु युध्यतः किल भारत ।योगाद् योगेश्वरस्येव प्रादुर्भवति मायया

tasya bāhusahasraṃ tu yudhyataḥ kila bhārata | yogād yogeśvarasyeva prādurbhavati māyayā

हिन्दी अर्थ

स मां ब्रह्मर्षिरप्याह किमुर्वि त्वमवाडन्मुखी। वीरपल्लीत्रतमिदं धारयन्ती विषीदस्सि साहं विज्ञापितवती कश्यपं लोकभावनम्। पतयो मे हता ब्रह्मन् भार्गवेण महात्मना स श्रुत्वा भगवान् वाक्य बाढमित्यब्रवीत् प्रभु: । ततो मां मानवेन्द्राय मनवे स प्रदत्तवान् अकेली मैं जिस चराचर जगत्को धारण करती हूँ, मेरे द्वारा धारण किये गये इस समस्त जगत्को (तथा मुझे भी) भगवान् गदाधर ही धारण करते हैं

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अध्याय ३३

श्लोक 15

तेनेयं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना ।ससमुद्रा सनगरा उग्रेण विधिना जिता

teneyaṃ pṛthivī sarvā saptadvīpā sapattanā | sasamudrā sanagarā ugreṇa vidhinā jitā

हिन्दी अर्थ

इन्होंने ही जमदग्रिनन्दन परशुरामके रूपमें प्रकट होकर मेरा भार उतारनेकी इच्छासे रोषपूर्वक मुझे इक्कीस बार क्षत्रियोंसे रहित किया था॥४६॥ मैं वही हूँ, जिसे रणयज्ञकी वेदीमें प्रतिष्ठित करके भृगुनन्दन परशुरामने राजाओंके रक्तसे तृत्त किया था और पिताके श्राद्धमें महर्षि कश्यपको मेरा दान कर दिया था॥४७॥ मैं क्षत्रियोंक रक्तसे भीगी हुई थी। मेरे शरीरसे (मरे हुए राजाओंके) मांस, मेद और अस्थियोंकी दुर्गन्ध फैल रही थी। उसी दशामें रजस्वला युवतीकी भाँति मैं महर्षि कश्यपकी सेवामें उपस्थित हुई ॥ ४८ ॥ उस समय बत्रह्मर्षि कश्यपने मुझसे कहा--'वसुधे ! क्या कारण है, तू नीचे मुख किये वीर-पत्नीके इस ब्रतको धारण करके विषादमें डूबी हुई है?॥४९॥ उस समय मैंने लोकपिता कश्यपजीको यह सूचित किया--ब्रह्मन्! महात्मा परशुरामने मेरे पतियोंको मार डाला है॥ ५० ॥ शस्त्रग्रहण ही जिनकी जीविकाका साधन था, उन पराक्रमी क्षत्रियोंसे हीन

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अध्याय ३३

श्लोक 16

तेन सप्तसु द्वीपेषु सप्त यज्ञशतानि वै ।प्राप्तानि विधिना राज्ञा श्रूयन्ते जनमेजय

tena saptasu dvīpeṣu sapta yajñaśatāni vai | prāptāni vidhinā rājñā śrūyante janamejaya

हिन्दी अर्थ

होकर मैं विधवा हो गयी हूँ। मेरे सारे नगर राजाओंसे शून्य हो गये हैं, अतः अब मुझमें जीवित रहनेका उत्साह नहीं रह गया है ॥ ५१॥ अतः भगवन्! मुझे ऐसा कोई नरेश पति दीजिये, जो आपके समान ही शक्तिशाली हो और समुद्रसे घिरी हुई मेरी ग्राम और नगरोंसहित रक्षा कर सके'॥५२॥ प्रभावशाली भगवान् कश्यपने मेरी यह बात सुनकर कहा “बहुत अच्छा '। फिर उन्होंने मुझे राजा मनुके हाथमें दे दिया॥५३॥ इस प्रकार मैं विपुलेनास्मि कालेन पार्थिवात् पार्थिवं गता॥ ५४ वैस्वत मनुसे प्रकट हुए दिव्य इक्ष्वाकुकुलमें आ ते च कालवएशूं प्राप्य मय्येव प्रलयं गता:

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अध्याय ३३

श्लोक 17

सर्वे यज्ञा महाबाहोस्तस्यासन् भूरिदक्षिणाः ।सर्वे काञ्चनयूपाश्च सर्वे काञ्चनवेदयः

sarve yajñā mahābāhostasyāsan bhūridakṣiṇāḥ | sarve kāñcanayūpāśca sarve kāñcanavedayaḥ

हिन्दी अर्थ

मत्कृते विग्रहा लोके वृत्ता वर्तन्त एव च। क्षत्रियाणां बलवतां संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् पहुँची। उस कुलके सभी लोग नरेश थे। वहाँ दीर्घकालतक एक राजासे दूसरे राजाके अधिकारमें आती रही इस प्रकार मैं बुद्धिमान् राजा मनुके हाथमें सौंपी गयी और महर्षिसमुदायके तुल्य तेजस्वी सहस्नों राजाओंके उपभोगमें आयी॥ ५५॥ बहुत-से शूरवीर क्षत्रिय मुझे जीतकर स्वर्गलोकको चले गये। वे कालके अधीन होकर मुझमें ही लीन हुए थे॥५६॥ जगत्में मेरे ही लिये युद्धस्थलोंमें कभी पीठ न दिखानेवाले बलवान क्षत्रियोंक परस्पर युद्ध हुए हैं और हो रहे हैं

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अध्याय ३३

श्लोक 18

सर्वैर्देवैर्महाराज विमानस्थैरलङ्कृताः ।गन्धर्वैरप्सरोभिश्च नित्यमेवोपशोभिताः

sarvairdevairmahārāja vimānasthairalaṅkṛtāḥ | gandharvairapsarobhiśca nityamevopaśobhitāḥ

अध्याय ३३

श्लोक 19b

यस्य यज्ञे जगौ गाथां गन्धर्वो नारदस्तथा ।वरीदासात्मजो विद्वान् महिम्ना तस्य विस्मितः

yasya yajñe jagau gāthāṃ gandharvo nāradastathā | varīdāsātmajo vidvān mahimnā tasya vismitaḥ

हिन्दी अर्थ

लिये ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे रणभूमिमें राजाओंका संहार हो॥५८॥ यदि मुझपर भगवान्की दया हो तो यह एकमात्र चक्रधारी श्रीमान् भगवान् विष्णु मेरा भार शिथिल करनेके लिये मुझे अभयदान दें मैं भारसे संतत्त होकर शरण खोजती हुई जिनकी शरणमें आयी हूँ, वे ही ये भगवान् विष्णु यदि मेरा भार उतारना भारो यद्यवरोप्तव्यो विष्णुरेव ब्रवीतु माम्॥ ६० उचित समझें तो इसके लिये मुझे आश्वासन दें इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वण धरणीवाक्ये द्विपश्लाशत्तमो5ध्याय:

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अध्याय ३३

श्लोक 20

न नूनं कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः ।यज्ञैर्दानैस्तपोभिर्वा विक्रमेण श्रुतेन च

na nūnaṃ kārtavīryasya gatiṃ yāsyanti pārthivāḥ | yajñairdānaistapobhirvā vikrameṇa śrutena ca

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हारिवंशके अन्तर्गत हरिव॑शपर्वमें एथ्वीका वाक्यविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका अंशावतरण शरीरकर्ता लोकानां त्वं हि लोकस्य चेश्वर: यत् कर्तव्यं महेन्द्रेण यमेन वरुणेन च। यद् वा कार्य धनेशेन स्वयं नारायणेन वा

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अध्याय ३३

श्लोक 21

स हि सप्तसु द्वीपेषु खङ्गी चर्मी शरासनी ।रथी द्वीपाननुचरन् योगी सन्दृश्यते नृभिः

sa hi saptasu dvīpeṣu khaṅgī carmī śarāsanī | rathī dvīpānanucaran yogī sandṛśyate nṛbhiḥ

अध्याय ३३

श्लोक 22

अनष्टद्रव्यता चैव न शोको न च विभ्रमः ।प्रभावेण महाराज्ञः प्रजा धर्मेण रक्षतः

anaṣṭadravyatā caiva na śoko na ca vibhramaḥ | prabhāveṇa mahārājñaḥ prajā dharmeṇa rakṣataḥ

हिन्दी अर्थ

हुए भारको उतारिये; क्योंकि आप ही सब लोगोंके शरीरकी सृष्टि करनेवाले तथा सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर हैं॥ २॥ इस विषयमें देवराज इन्द्र, वरुण और यमको क्या करना चाहिए? धनाध्यक्ष कुबेर अथवा साक्षात् भगवान् नारायणका भी क्‍या कर्तव्य है 2॥ ३॥ चन्द्रमा, सूर्य, वायु, बारह आदित्य, आठ वसु तथा लोकोंका कल्याण करनेवाले ग्यारह रुद्रोंको भी इस विषयमें क्या करना चाहिए ?॥ ४॥ दोनों देववैद्य अश्विनीकुमार, स्वर्गवासी साध्यगण, बृहस्पति, शुक्राचार्य, काल तथा कलिका भी इस समय क्‍या कर्तव्य है 2॥ ५॥ ब्रह्मन्! भगवान् महे धर, विशाख, स्वामिकार्तिकेय, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, चारण तथा बड़े-बड़े नागोंको भी इस कार्यके सम्बन्धमें क्‍या करना है 2॥ ६॥ सुरेश्वर ! पक्षी, पर्वत, बड़ी-बड़ी लहरोंसे युक्त समुद्र तथा गड्डा आदि दिव्य सरिताएँ भी इस विषयमें क्या कर सकती हैं ?'

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अध्याय ३३

श्लोक 22b

पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणां वै नराधिपः ।स सर्वरत्नभाक् संराट् चक्रवर्ती बभूव ह

pañcāśītisahasrāṇi varṣāṇāṃ vai narādhipaḥ | sa sarvaratnabhāk saṃrāṭ cakravartī babhūva ha

अध्याय ३३

श्लोक 24

स एव यज्ञपालोऽभूत् क्षेत्रपालः स एव च ।स एव वृष्ट्यां पर्जन्यो योगित्वादर्जुनोऽभवत्

sa eva yajñapālo'bhūt kṣetrapālaḥ sa eva ca | sa eva vṛṣṭyāṃ parjanyo yogitvādarjuno'bhavat

अध्याय ३३

श्लोक 25

स वै बाहुसहस्रेण ज्याघातकठिनत्वचा ।भाति रश्मिसहस्रेण शरदीव दिवाकरः

sa vai bāhusahasreṇa jyāghātakaṭhinatvacā | bhāti raśmisahasreṇa śaradīva divākaraḥ

अध्याय ३३

श्लोक 26

स हि नागान् मनुष्येषु माहिष्मत्यां महाद्युतिः ।कर्कोटकसुताञ्जित्वा पुर्यां तस्यां न्यवेशयत्

sa hi nāgān manuṣyeṣu māhiṣmatyāṃ mahādyutiḥ | karkoṭakasutāñjitvā puryāṃ tasyāṃ nyaveśayat

अध्याय ३३

श्लोक 27

स वै वेगं समुद्रस्य प्रावृट्कालेऽम्बुजेक्षणः ।क्रीडन्निव भुजोद्भिन्नं प्रतिस्रोतश्चकार ह

sa vai vegaṃ samudrasya prāvṛṭkāle'mbujekṣaṇaḥ | krīḍanniva bhujodbhinnaṃ pratisrotaścakāra ha

अध्याय ३३

श्लोक 28

लुण्ठिता क्रीडिता तेन फेनस्रग्दाममालिनी ।चलदूर्मिसहस्रेण शङ्किताभ्येति नर्मदा

luṇṭhitā krīḍitā tena phenasragdāmamālinī | caladūrmisahasreṇa śaṅkitābhyeti narmadā

अध्याय ३३

श्लोक 29

तस्य बाहुसहस्रेण क्षुभ्यमाणे महोदधौ ।भयान्निलीना निश्चेष्टाः पातालस्था महासुराः

tasya bāhusahasreṇa kṣubhyamāṇe mahodadhau | bhayānnilīnā niśceṣṭāḥ pātālasthā mahāsurāḥ

अध्याय ३३

श्लोक 30

चूर्णीकृतमहावीचिं चलन्मीनमहातिमिम् ।मारुताविद्धफेनौघमावर्तक्षोभदुःसहम्

cūrṇīkṛtamahāvīciṃ calanmīnamahātimim | mārutāviddhaphenaughamāvartakṣobhaduḥsaham

अध्याय ३३

श्लोक 31

प्रावर्तयत् तदा राजा सहस्रेण च बाहुना ।देवासुरसमाक्षिप्तः क्षीरोदमिव मन्दरः

prāvartayat tadā rājā sahasreṇa ca bāhunā | devāsurasamākṣiptaḥ kṣīrodamiva mandaraḥ

अध्याय ३३

श्लोक 32

मन्दरक्षोभचकिता अमृतोद्भवशङ्किताः ।सहसोत्पतिता भीता भीमं दृष्ट्वा नृपोत्तमम्

mandarakṣobhacakitā amṛtodbhavaśaṅkitāḥ | sahasotpatitā bhītā bhīmaṃ dṛṣṭvā nṛpottamam

अध्याय ३३

श्लोक 33

नता निश्चलमूर्धानो बभूवुस्ते महोरगाः ।सायाह्ने कदलीखण्डाः कम्पितास्तस्य वायुना

natā niścalamūrdhāno babhūvuste mahoragāḥ | sāyāhne kadalīkhaṇḍāḥ kampitāstasya vāyunā

अध्याय ३३

श्लोक 34

स वै बद्ध्वा धनुर्ज्याभिरुत्सिक्तं पञ्चभिः शरैः ।लङ्केशं मोहयित्वा तु सबलं रावणं बलात् ।निर्जित्यैव समानीय माहिष्मत्यां बबन्ध तम्

sa vai baddhvā dhanurjyābhirutsiktaṃ pañcabhiḥ śaraiḥ | laṅkeśaṃ mohayitvā tu sabalaṃ rāvaṇaṃ balāt | nirjityaiva samānīya māhiṣmatyāṃ babandha tam

अध्याय ३३

श्लोक 35

श्रुत्वा तु बद्धं पौलस्त्यं रावणं त्वर्जुनेन तु ।ततो गत्वा पुलस्त्यस्तमर्जुनं ददृशे स्वयम् ।मुमोच रक्षः पौलस्त्यं पुलस्त्येनानुयाचितः

śrutvā tu baddhaṃ paulastyaṃ rāvaṇaṃ tvarjunena tu | tato gatvā pulastyastamarjunaṃ dadṛśe svayam | mumoca rakṣaḥ paulastyaṃ pulastyenānuyācitaḥ

अध्याय ३३

श्लोक 36

यस्य बाहुसहस्रस्य बभूव ज्यातलस्वनः ।युगान्ते त्वम्बुदस्येव स्फुटतो ह्यशनेरिव

yasya bāhusahasrasya babhūva jyātalasvanaḥ | yugānte tvambudasyeva sphuṭato hyaśaneriva

अध्याय ३३

श्लोक 37

अहो बत मृधे वीर्यं भार्गवस्य यदच्छिनत् ।राज्ञो वाहुसहस्रं तु हैमं तालवनं यथा

aho bata mṛdhe vīryaṃ bhārgavasya yadacchinat | rājño vāhusahasraṃ tu haimaṃ tālavanaṃ yathā

अध्याय ३३

श्लोक 38

तृषितेन कदाचित् स भिक्षितश्चित्रभानुना ।स भिक्षामददाद् वीरः सप्तद्वीपान्विभावसोः

tṛṣitena kadācit sa bhikṣitaścitrabhānunā | sa bhikṣāmadadād vīraḥ saptadvīpānvibhāvasoḥ

अध्याय ३३

श्लोक 39

पुराणि ग्रामघोषांश्च विषयांश्चैव सर्वशः ।जज्वाल तस्य सर्वाणि चित्रभानुर्दिधक्षया

purāṇi grāmaghoṣāṃśca viṣayāṃścaiva sarvaśaḥ | jajvāla tasya sarvāṇi citrabhānurdidhakṣayā

अध्याय ३३

श्लोक 40

स तस्य पुरुषेन्द्रस्य प्रभावेण महात्मनः ।ददाह कार्तवीर्यस्य शैलांश्चैव वनानि च

sa tasya puruṣendrasya prabhāveṇa mahātmanaḥ | dadāha kārtavīryasya śailāṃścaiva vanāni ca

अध्याय ३३

श्लोक 41

स शून्यमाश्रमं रम्यं वरुणस्यात्मजस्य वै ।ददाह वनवद् भीतश्चित्रभानुः सहैहयः

sa śūnyamāśramaṃ ramyaṃ varuṇasyātmajasya vai | dadāha vanavad bhītaścitrabhānuḥ sahaihayaḥ

अध्याय ३३

श्लोक 42

यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भास्वन्तमुत्तमम् ।वसिष्ठं नाम स मुनिः ख्यात मापव इत्युत

yaṃ lebhe varuṇaḥ putraṃ purā bhāsvantamuttamam | vasiṣṭhaṃ nāma sa muniḥ khyāta māpava ityuta

अध्याय ३३

श्लोक 43

यत्रापवस्तु तं क्रोधाच्छप्तवानर्जुनं विभुः ।यस्मान्न वर्जितमिदं वनं ते मम हैहय

yatrāpavastu taṃ krodhācchaptavānarjunaṃ vibhuḥ | yasmānna varjitamidaṃ vanaṃ te mama haihaya

अध्याय ३३

श्लोक 44

तस्मात् ते दुष्करं कर्म कृतमन्यो हनिष्यति ।रामो नाम महाबाहुर्जामदग्न्यः प्रतापवान्

tasmāt te duṣkaraṃ karma kṛtamanyo haniṣyati | rāmo nāma mahābāhurjāmadagnyaḥ pratāpavān

अध्याय ३३

श्लोक 45

छित्त्वा बाहुसहस्रं ते प्रमथ्य तरसा वली ।तपस्वी ब्राह्मणश्च त्वां वधिष्यति स भार्गवः

chittvā bāhusahasraṃ te pramathya tarasā valī | tapasvī brāhmaṇaśca tvāṃ vadhiṣyati sa bhārgavaḥ

अध्याय ३३

श्लोक 46

अनष्टद्रव्यता यस्य बभूवामित्रकर्शन ।प्रभावेण नरेन्द्रस्य प्रजा धर्मेण रक्षतः

anaṣṭadravyatā yasya babhūvāmitrakarśana | prabhāveṇa narendrasya prajā dharmeṇa rakṣataḥ

हिन्दी अर्थ

'सुरश्रेष्ठणण! तुमलोगोंका जो निश्चय है. वह मुझे भी अच्छा लगता है। तुमलोग भूतलपर अपने ही समान तेजस्वी अपने शरीरके अंशोंको प्रकट ऋगे ॥ १२॥ श्रेष्ठ लो और तीनों लोकोंकी लक्ष्मीको ए८ऋः भूदेवीकी रक्षा करते हुए वहाँ रहो॥ १३॥ मैं एृध्वोपर आनेवाले इस भयको पहलेसे ही जानता था। ऋह: भूललपर स्थित भरतवंशके लिये मैंने जो कुछ (ठिच्चर जिया है, उसे सुनो॥ १४॥ पहलेकी बात है, मैं एवं समद्रके पश्चिम तटपर अपने पुत्र महात्मा कश्यपके साथ जैटा था। उस समय लोक और वेदका अनुसरण ऋरनंठालो प्राचीन कथाओं तथा बहुत-से उत्तम गुणवाल पैगणिऊ इतिहासोंकी

English

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अध्याय ३३

श्लोक 47

रामात्ततोऽस्य मृत्युर्वै तस्य शापान्मुनेर्नृप ।वरश्चैव हि कौरव्य स्वयमेव वृतः पुरा

rāmāttato'sya mṛtyurvai tasya śāpānmunernṛpa | varaścaiva hi kauravya svayameva vṛtaḥ purā

अध्याय ३३

श्लोक 48

तस्य पुत्रशतस्यासन् पञ्च शेषा महात्मनः ।कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो यशस्विनः

tasya putraśatasyāsan pañca śeṣā mahātmanaḥ | kṛtāstrā balinaḥ śūrā dharmātmāno yaśasvinaḥ

हिन्दी अर्थ

उक्त: संरब्धया वाचा शान्तोडइसीति मया तदा सकारणां मतिं कृत्वा युष्माकं हितकाम्यया भविष्यसि नृणां भर्ता भारतानां कुलोद्वह: सुतनुर्यशसा लोके शान्तनुस्त्वं भविष्यसि

English

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अध्याय ३३

श्लोक 49

शूरसेनश्च शूरश्च धृष्टोक्तः कृष्ण एव च ।जयध्वजश्च नाम्नाऽऽसीदावन्त्यो नृपतिर्महान्

śūrasenaśca śūraśca dhṛṣṭoktaḥ kṛṣṇa eva ca | jayadhvajaśca nāmnā''sīdāvantyo nṛpatirmahān

हिन्दी अर्थ

मां प्रभो देवदेवानां क्रिमर्थ शप्तवानसि यद्यहं चलितो ब्रह्मन् कोउत्र दोषो महात्मनः अन्न मे कि नु भगवन् विद्यते शापकारणम् उद्धतैश्व महावातैः प्रवृद्धैश्ष बलाहके:ः। पर्वणा चेन्दुयुक्तेन त्रिभि: क्षुब्धोडस्मि कारणै:

English

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अध्याय ३३

श्लोक 50

कार्तवीर्यस्य तनया वीर्यवन्तो महारथाः ।जयध्वजस्य पुत्रस्तु तालजङ्घो महाबलः

kārtavīryasya tanayā vīryavanto mahārathāḥ | jayadhvajasya putrastu tālajaṅgho mahābalaḥ

अध्याय ३३

श्लोक 51

तस्य पुत्राः शतं ख्यातास्तालजङ्घा इति श्रुताः ॥ तेषां कुले महाराज हैहयानां महात्मनाम्

tasya putrāḥ śataṃ khyātāstālajaṅghā iti śrutāḥ || teṣāṃ kule mahārāja haihayānāṃ mahātmanām

अध्याय ३३

श्लोक 52

वीतिहोत्राः सुजाताश्च भोजाश्चावन्तयः स्मृताः ।तौण्डिकेरा इति ख्यातास्तालजङ्घास्तथैव च

vītihotrāḥ sujātāśca bhojāścāvantayaḥ smṛtāḥ | tauṇḍikerā iti khyātāstālajaṅghāstathaiva ca

अध्याय ३३

श्लोक 53

भरताश्च सुता जाता बहुत्वान्नानुकीर्तिताः ।वृषप्रभृतयो राजन् यादवाः पूर्णकर्मिणः

bharatāśca sutā jātā bahutvānnānukīrtitāḥ | vṛṣaprabhṛtayo rājan yādavāḥ pūrṇakarmiṇaḥ

अध्याय ३३

श्लोक 54

वृषो वंशधरस्तत्र तस्य पुत्रोऽभवन्मधुः ।मधोः पुत्रशतं त्वासीद् वृषणस्तस्य वंशभाक्

vṛṣo vaṃśadharastatra tasya putro'bhavanmadhuḥ | madhoḥ putraśataṃ tvāsīd vṛṣaṇastasya vaṃśabhāk

हिन्दी अर्थ

अस्यास्तु देवगड़ाया गां गतायास्त्वदाज्ञया। मम दोषात् सदोषाया: प्रसादं कर्तुमहसि अकारणज्ञ देवानां त्रस्तं शापानलेन तम् शापे5स्मिन् सरितां नाथ भविष्य श्रुणु कारणम् पालयंश्वतुरों वर्णान् रंस्यसे सलिलेश्वर

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय ३३

श्लोक 55

वृषणाद् वृष्णयः सर्वे मधोस्तु माधवाः स्मृताः ।यादवा यदुना चाग्रे निरुच्यन्ते च हैहयाः

vṛṣaṇād vṛṣṇayaḥ sarve madhostu mādhavāḥ smṛtāḥ | yādavā yadunā cāgre nirucyante ca haihayāḥ

हिन्दी अर्थ

तत्काल रमणीयाड्री गड़ा परिचरिष्यति त्वरता चैव कर्तव्यं त्वयेदं मम शासनम्। प्राजापत्येन विधिना गड़या सह सागर “ब्रह्मनू! इस तरह आपके बनाये हुए कारणों (नियमों )-से ही क्षुब्ध होकर यदि मैंने अपराध किया है तो आप उसके लिये मुझे क्षमा कर दें और इस शापको लौटा लें॥३३॥ देवेश्वर! मुझे दूसरा कोई सहारा देनेवाला नहीं है। मैं शापसे शिथिल हो गया हूँ। यदि आप शरणागतकी रक्षाका प्रतिपादन करनेवाले प्रमाणपर दृष्टि रखते हैं तो मुझपर अवश्य दया करें॥ ३४॥ यह देवनदी गड्भा आपकी ही आज्ञासे

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय ३३

श्लोक 56

न तस्य वित्तनाशोऽस्ति नष्टं प्रतिलभेच्च सः ।कार्तवीर्यस्य यो जन्म कीर्तयेदिह नित्यशः

na tasya vittanāśo'sti naṣṭaṃ pratilabhecca saḥ | kārtavīryasya yo janma kīrtayediha nityaśaḥ

अध्याय ३३

श्लोक 57

एते ययातिपुत्राणां पञ्च वंशा विशाम्पते ।कीर्तिता लोकवीराणां ये लोकान्धारयन्ति वै

ete yayātiputrāṇāṃ pañca vaṃśā viśāmpate | kīrtitā lokavīrāṇāṃ ye lokāndhārayanti vai

हिन्दी अर्थ

जलके स्वामी महासागर ! उस भरतवंशमें भूपाल बनकर राजलक्ष्मीसे सम्पन्न हो तुम चारों वर्णोका पालन करते हुए बड़े सुखसे रहोगे॥३९॥ यह जो तुम्हारी प्रिया सरिताओंमें श्रेष्ठ गड्ा है, यह भी उस समय रमणीय अज्ञोंसे सुशोभित परम सुन्दर रूप धारण करके वहाँ तुम्हारी सेवा करेगी॥४०॥ सागर! तुम मेरी आज्ञासे वहाँ इस जाह्वीके साथ आनन्दपूर्वक रहते हुए मुझे जलसे भिगोनेके कारण मिले हुए इस शापके दुःखको इस आज्ञाका पालन करना चाहिए। वहाँ इस गड़ाके साथ तुम्हारा प्राजापत्यविधिसे विवाह होगा आठों वसु स्वर्गसे भ्रष्ट होकर रसातलमें जा पहुँचे हैं। उन्हें मनुष्यरूपमें उत्पन्न करनेके लिये मैंने तुम्हें नियुक्त किया है॥४३॥ अग्रिदेवके समान गुणशाली तथा देवताओंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाले उन आठों

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय ३३

श्लोक 58

भूतानीव महाराज पञ्च स्थावरजङ्गमान् ।श्रुत्वा पञ्चविसर्गं तु राजा धर्मार्थकोविदः

bhūtānīva mahārāja pañca sthāvarajaṅgamān | śrutvā pañcavisargaṃ tu rājā dharmārthakovidaḥ

अध्याय ३३

श्लोक 59

वशी भवति पञ्चानामात्मजानां तथेश्वरः ।लभेत् पञ्च वरांश्चैव दुर्लभानिह लौकिकान्

vaśī bhavati pañcānāmātmajānāṃ tatheśvaraḥ | labhet pañca varāṃścaiva durlabhāniha laukikān

अध्याय ३३

श्लोक 60

आयुः कीर्तिं तथा पुत्रानैश्वर्यं भूमिमेव च ।धारणाच्छ्रवणाच्चैव पञ्चवर्गस्य भारत

āyuḥ kīrtiṃ tathā putrānaiśvaryaṃ bhūmimeva ca | dhāraṇācchravaṇāccaiva pañcavargasya bhārata

अध्याय ३३

श्लोक 61

क्रोष्टोस्तु शृणु राजेन्द्र वंशमुत्तमपौरुषं यदोर्वंशधरस्याथ यज्वनः पुण्यकर्मणः

kroṣṭostu śṛṇu rājendra vaṃśamuttamapauruṣaṃ yadorvaṃśadharasyātha yajvanaḥ puṇyakarmaṇaḥ

अध्याय ३३

श्लोक 62

क्रोष्टुर्हि वंशं श्रुत्वेमं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।यस्यान्ववायजो विष्णुर्हरिर्वृष्णिकुलोद्वहः

kroṣṭurhi vaṃśaṃ śrutvemaṃ sarvapāpaiḥ pramucyate | yasyānvavāyajo viṣṇurharirvṛṣṇikulodvahaḥ

हिन्दी अर्थ

है। तुमलोग उन्हींके पक्ष और विपक्षमें पृथक्-पृथक् अपने वंश उत्पन्न करो॥५३॥ उनके पैतृक राज्यके बँटवारेके सम्बन्धमें विवाद होनेपर बड़ा भारी संग्राम छिड़ जायगा और उसमें बहुत-से नरेशोंका विनाश होगा। वह महान् युद्ध प्रलयकालके समान भयंकर एवं संहारकारी होगा॥ ५४॥ जब सेनासहित राजालोग उस युद्धमें उपस्थित होंगे, उस समय एक-दूसरेसे लड़-भिड़कर उन सबकी शान्ति (मृत्यु) हो जायगी। उस दशामें इस भूतलके सभी नगर और राष्ट्र निर्जन-से हो जायँगे और यह पृथ्वी शिथिलताको प्राप्त हो जायगी॥ ५५ ॥ द्वापरयुगके अन्तमें घटित होनेवाले इस भावी विनाशको मैंने पहलेसे ही देख लिया है। उस समय अपने सैनिक मनुष्योंसहित युद्धोसे जो लोग बच जायँगे, उन्हें रातमें अचेत होकर सोते समय भगवान् शट्डूरका अंशभूत अश्वत्थामा अग्नितुल्य अस्त्रके तेजसे जलाकर भस्म कर डालेगा

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता · Identifier:

Harivamsha Purana — Chapter 33

हरिवंशपुराण

संस्कृत संस्करण · Sanskrit Edition:

Imported text; printed edition not recorded

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