Garuda Purana· Garuḍa Purāṇa
8
अध्याय 8 / 317

Book 1 - Adhyaya 8

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अध्याय ८

श्लोक 1

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे सूर्यादीनां सरस्वत्याश्च पूजनं नाम सप्तमो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- ८ हरिरुवाच ।भूमिष्ठे मण्डपे स्नात्वा मण्डले विष्णुमर्चयेत् ।पञ्चरङ्गिकचूर्णेन वज्रनाभं तु मण्डलम्

iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe pūrvakhaṇḍe prathamāṃśākhye ācārakāṇḍe sūryādīnāṃ sarasvatyāśca pūjanaṃ nāma saptamo 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 8 hariruvāca / bhūmiṣṭhe maṇḍape snātvā maṇḍale viṣṇumarcayet / pañcaraṅgikacūrṇena vajranābhaṃ tu maṇḍalam

हिन्दी अर्थ

करके सूर्यादि ग्रहोंकी पूजा करनी चाहिए। अनिरुद्धाय नमः--इन मन्त्रोंके द्वारा साधक हरिके ॐ हां शिवाय नमः-मन्त्रसे आसनकी पूजाकर चतुर्व्यूहको नमन करे। उसके बाद --३ नारायणाय ॐ हां शिवमूर्तये शिवाय नमः-मन्त्रसे नमस्कार नमः। ३ तत्सद्ब्रह्मणे नमः। 3 हूं विष्णवे करे और साधक शिवपूजामें सर्वप्रथम-3 हां नमः । ॐ क्षौं नमो भगवते नरसिंहाय नमः

English

The well-versed devotee should then extend the strings into those corners too, which are on either side of the ordinal comers.

अध्याय ८

श्लोक 2

षोडशैः कोष्ठकैस्तत्र संमितं रुद्र? कारयेत् ।चतुर्थपञ्चकोणेषु सूत्रपातं तु कारयेत्

ṣoḍaśaiḥ koṣṭhakaistatra saṃmitaṃ rudra? kārayet / caturthapañcakoṇeṣu sūtrapātaṃ tu kārayet

हिन्दी अर्थ

हृदयाय नमः। ॐ हीं शिरसे स्वाहा। ॐ हूं भूः ३० नमो भगवते वराहाय नमः। ॐ कं टं पं शिखायै वषट्। ॐ हैं कवचाय हुं। ॐ हों।शं वैनतेयाय नमः। ३ जं खं रं सुदर्शनाय

English

On the alternative comers too this should be done. In the interval juncture of the lines the first centre is to be taken.

अध्याय ८

श्लोक 3

कोणसूत्रादुभयतः कोणा ये तत्र संस्थिताः ।तेषु चैव प्रकुर्वीत सूत्रपातं विचक्षणः

koṇasūtrādubhayataḥ koṇā ye tatra saṃsthitāḥ / teṣu caiva prakurvīta sūtrapātaṃ vicakṣaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

काण्ड देवपूजा-विधान, विष्णुपूजोपयोगी वज्रनाभमण्डल २५

English

In all the interstices, there are such eight centres. Tht thread should be whirled round from the earlier and the middle centres.

अध्याय ८

श्लोक 4

तदनन्तरकोणेषु एवमेव हि कारयेत् ।प्रथमा नाभिरुद्दिष्टा मध्ये रेखाप्रसंगमे

tadanantarakoṇeṣu evameva hi kārayet / prathamā nābhiruddiṣṭā madhye rekhāprasaṃgame

हिन्दी अर्थ

नमः। ३ खं ठं फं षं गदायै नमः। ॐ वं लं मं विशेष पूजाके लिये पाँच प्रकारके रंगोंसे बने हुए क्षं पाञ्चजन्याय नम: 3 घं ढं भं हं श्रियै नम: चूर्णके द्वारा वञ्रनाभ-मण्डलका निर्माण करना ॐ गं डं वं सं पुष्टयै नमः। 3 धं षं बं सं चाहिए, जो सोलह समान कोष्ठकोंसे संयुक्त हो। वनमालायै नमः। 3 सं दं लं श्रीवत्साय नम: । वज्रनाभ-मण्डल बनाकर सबसे पहले न्यास

English

The well-versed devotee should draw the filaments of the lotus in two parts on either side of the hypotenuse* The petaJs should be drawn on the top of it,

अध्याय ८

श्लोक 5

अन्तरेषु च सर्वेषु अष्टौ चैव तुनाभयः ।पूर्वमध्यमनाभि भ्यामथं सूत्रं तु भ्रामयेत्

antareṣu ca sarveṣu aṣṭau caiva tunābhayaḥ / pūrvamadhyamanābhi bhyāmathaṃ sūtraṃ tu bhrāmayet

हिन्दी अर्थ

३ ठं चं भं यं कौस्तुभाय नमः। ३ गुरुभ्यो करे और उसके बाद भगवान् श्रीहरिकी पूजा करे। नमः। ॐ इन्द्रादिभ्यो नमः। ३ॐ विष्वक्सेनाय हृदयके मध्यमें भगवान् विष्णु, कण्ठमें सङ्कर्षण, नम:--इन मन्त्रोंसे भगवान् श्रीहरिके अवतारों, सिरपर प्रद्युम्न, शिखाभागमें अनिरुद्ध, सम्पूर्ण आयुधों एवं वाहन आदिको नमस्कार करते हुए शरीरमें ब्रह्मा तथा दोनों हाथोंमें श्रीधरका न्यास

English

Openings should be made (drawn) in proportion to the fint thread—length. The opening should be embellished about half way.

अध्याय ८

श्लोक 6

अन्तरा स द्विजश्रेष्ठः पादोनं भ्रामयेद्धर ! ।अनेन नाभिसूत्रस्य कर्णिकां भ्रामयेच्छिव !

antarā sa dvijaśreṣṭhaḥ pādonaṃ bhrāmayeddhara ! / anena nābhisūtrasya karṇikāṃ bhrāmayecchiva !

हिन्दी अर्थ

उन्हें आसनादि उपचार प्रदान करने चाहिए। करे। तत्पश्चात् ' अहं विष्णु: (मैं ही विष्णु हूँ) - हे वृषध्वज! भगवान् विष्णुको शक्ति देवी ऐसा ध्यान करते हुए पद्मके कर्णिका-भागमें सरस्वतीकी मङ्गलकारिणी पूजामें ॐ ह्लीं सरस्वत्यै भगवान् श्रीहरिकी स्थापना करे। इसी प्रकार नमः-इस मन्त्रसे देवी सरस्वतीको नमस्कारकर मण्डलके पूर्वमें सङ्कर्षण, दक्षिणमें प्रद्युम्न, पश्चिममें

English

In the mystic diagram the colours chosen (for the

अध्याय ८

श्लोक 7

कर्णिकाया द्विभागेन केसराणि विचक्षणः ।तदग्रेण सदा विद्वान्दलान्येव समालिखेत्

karṇikāyā dvibhāgena kesarāṇi vicakṣaṇaḥ / tadagreṇa sadā vidvāndalānyeva samālikhet

हिन्दी अर्थ

निम्न मन्त्रोंसे षडङ्गन्यास करना चाहिए अनिरुद्ध और उत्तरमें ब्रह्मकी स्थापना करे । तदनन्तर 3७ हां हृदयाय नमः। ॐ हीं शिरसे नमः। ईशानकोणमें श्रीधर तथा पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि ॐ हुँ शिखायै नमः। ३ हैं कवचाय नमः। ॐ देवोंको स्थापना करनी चाहिए। यथा-पूर्वं दिशामें हौं नेत्रत्रयाय नम: । ३ हुः अस्त्राय नमः। (ॐ इन्द्राय नमः मन्त्रसे) इन्द्र, अग्निकोणमें

English

One should fix Sankarna in the east, Pradyumna in the south, Aniruddha in the west and Brahma in the north.

अध्याय ८

श्लोक 8

सर्वेषु नाभिक्षेत्रषु मानेनानेन सुव्रत ! ।पद्मानि तानि कुर्वीत देशिकः पर मार्थवित्

sarveṣu nābhikṣetraṣu mānenānena suvrata ! / padmāni tāni kurvīta deśikaḥ para mārthavit

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार श्रद्धा, ऋद्धि, कला, मेधा, तुष्टि, (३७ अग्नये नमः मन्त्रसे) अग्नि, दक्षिण दिशामें पुष्टि, प्रभा तथा मति-ये जो सरस्वतीदेवीकी (ॐ यमाय नमः मन्त्रसे) यम, नैर्ऋ्रत्यकोणमें आठ शक्तियाँ हैं, इनका पूजन निम्न नाममन्त्रोंसे (३ निर्ऋतये नमः मन्त्रसे) निर्क्रति, पश्चिम दिशामें करे (ॐ वरुणाय नमः मन्त्रसे) वरुण, वायुकोणमें

English

One should fix Sankarna in the east, Pradyumna in the south, Aniruddha in the west and Brahma in the north.

अध्याय ८

श्लोक 9

आदिसूत्रविभागेन द्वाराणि परिकल्पयेत् ।द्वारशोभां तथा तत्र तदर्धेन तु कल्पयेत्

ādisūtravibhāgena dvārāṇi parikalpayet / dvāraśobhāṃ tathā tatra tadardhena tu kalpayet

हिन्दी अर्थ

3३» हीं श्रद्धायै नमः । 3 ह्वीं ऋद्ध्यै नमः । (३ वायवे नमः मन्त्रसे) वायु, उत्तर दिशामें ३» हीं कलायै नमः । ॐ ह्लीं मेधायै नमः । ॐ ह्वीं (ॐ कुबेराय नमः मन्त्रसे) कुबेर और ईशानकोणमें तुष्टयै नमः। ३» हीं पुष्ट्यै नमः। ॐ हीं प्रभायै (३ ईशानाय नमः मन्त्रसे) ईशान नामक दिकपालकी नमः। ॐ हीं मत्यै नमः। स्थापना करे। उसके बाद उन सभी देवोंकी गन्धादि

English

One should fix Sankarna in the east, Pradyumna in the south, Aniruddha in the west and Brahma in the north.

अध्याय ८

श्लोक 10

कर्णिकां पीतवर्णेन सितरक्तादिकेसरैः ।अन्तरं नीलवर्णेन दलानि असितेन च

karṇikāṃ pītavarṇena sitaraktādikesaraiḥ / antaraṃ nīlavarṇena dalāni asitena ca

हिन्दी अर्थ

इन शक्तियोंकी पूजा करनेके पश्चात् क्षेत्रपाल, उपचारोंके द्वारा पूजा करनी चाहिए। इससे साधक गुरु और परम गुरुका ॐ क्षेत्रपालाय नमः। ३ परमपदको प्राप्त हो जाता है। गुरुभ्यो नम: । ॐ परमगुरुभ्यो नमः-इन मन्त्रोंसे श्रीहरिने पुनः कहा--हे रुद्र! दीक्षित शिष्यको नमस्कार करना चाहिए। वस्त्रसे अपने दोनों नेत्र बंद करके अग्निमें देवताके

English

One should fix Sankarna in the east, Pradyumna in the south, Aniruddha in the west and Brahma in the north.

अध्याय ८

श्लोक 11

कृष्णवर्णेन रजसा चतुरश्रं प्रपूरयेत् ।द्वाराणि शुक्लवर्णेन रेखाः पञ्च च मण्डले

kṛṣṇavarṇena rajasā caturaśraṃ prapūrayet / dvārāṇi śuklavarṇena rekhāḥ pañca ca maṇḍale

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर कमलवासिनी सरस्वतीदेवीको मूलमन्त्रसे एक सौ आठ आहुतियाँ प्रदान करनी आसनादि उपचार प्रदान करने चाहिए। पूजनके चाहिए । है रुद्र! पुत्र-लाभके लिये द्विगुण (दो सौ अनन्तर सूर्यादि देवताओंके लिये प्रयुक्त होनेवाले सोलह), साधनासिद्धिके निमित्त त्रिगुण (तीन सौ

English

One should fix Sankarna in the east, Pradyumna in the south, Aniruddha in the west and Brahma in the north.

अध्याय ८

श्लोक 12

सिता रक्ता तथा पीता कृष्णा चैव यथाक्रमम् ।कृत्वैव मण्डलञ्चादौ न्यासं कृत्वार्चयेद्धरिम्

sitā raktā tathā pītā kṛṣṇā caiva yathākramam / kṛtvaiva maṇḍalañcādau nyāsaṃ kṛtvārcayeddharim

हिन्दी अर्थ

श्रीहरिने कहा-हे शिव! भगवान् विष्णुको (उपदेष्टा आचार्य)-को चाहिए कि वह चतुर्गुण

English

One should fix Sankarna in the east, Pradyumna in the south, Aniruddha in the west and Brahma in the north.

अध्याय ८

श्लोक 13

हृन्मध्ये तु न्यसेद्विष्णुं कण्ठे सङ्कर्षणं तथा ।प्रद्युम्नं शिरसि न्यस्य शिखायामनिरुद्धकम्

hṛnmadhye tu nyasedviṣṇuṃ kaṇṭhe saṅkarṣaṇaṃ tathā / pradyumnaṃ śirasi nyasya śikhāyāmaniruddhakam

हिन्दी अर्थ

(चार सौ बत्तीस) आहुतियाँ उसी विष्णु-मन्त्रसे उस हाथको शिष्यके सिरपर रखे, क्योंकि हाथमें प्रदान करे। विष्णु विद्यमान रहते हैं, अत: यह हाथ स्वयं विष्णु- विद्वान् देशिकको सबसे पहले भगवानका ध्यान स्वरूप है। उस हाथके स्पर्शमात्रसे शिष्यके समस्त करना चाहिए। तदनन्तर वे वायची कला (यं बीज- पाप विनष्ट हो जाते हैं। तदनन्तर गुरु शिष्यकी

English

One should fix Sankarna in the east, Pradyumna in the south, Aniruddha in the west and Brahma in the north.

अध्याय ८

श्लोक 14

ब्रह्माणं सर्वगात्रेषु करयोः श्रीधरं तथा ।अहं विष्णुरिति ध्यात्वा कर्णिकायां न्यसेद्धरिम्

brahmāṇaṃ sarvagātreṣu karayoḥ śrīdharaṃ tathā / ahaṃ viṣṇuriti dhyātvā karṇikāyāṃ nyaseddharim

हिन्दी अर्थ

कला (बं बीज-मन्त्र)-से हृदयकी स्थिति (धर्मको प्राप्त करनेके लिये स्थण्डिल आदिमें को जानेवाली अभिरुचि)-का विचार करें। इसके बाद देशिकको श्रीलक्ष्मीकी पूजाके सम्बन्धमें कह रहा हूँ । सबसे उस परम तेजमें आत्मतेजका निक्षेप करके जीवात्मा पहले ॐ श्रीं हीं महालक्ष्म्यै नम: यह कहकर और परमात्माके ऐक्य अर्थात् अभेद-ज्ञानका चिन्तन साधक-- 'श्रां श्रीं भ्रूं शरै श्रौं श्र: '--इन बीजमन्त्रंसे

English

One should fix Sankarna in the east, Pradyumna in the south, Aniruddha in the west and Brahma in the north.

अध्याय ८

श्लोक 15

न्यसेत्सङ्कर्षणं पूर्वे प्रद्युम्नं चैव दक्षिणे ।अनिरुद्धं पश्चिमे च ब्रिह्माणं चोत्तरे न्यसेत्

nyasetsaṅkarṣaṇaṃ pūrve pradyumnaṃ caiva dakṣiṇe / aniruddhaṃ paścime ca brihmāṇaṃ cottare nyaset

हिन्दी अर्थ

करना चाहिए। तदनन्तर वे आकाश-तत्त्वमें क्रमशः हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और 'ॐकार' का ध्यानकर शरीरमें स्थित अन्य कारणभूत अस्त्रमें इस प्रकारसे षडङ्गन्यास करे- वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी-तत्त्वका चिन्तन करें। ३ श्रां हृदयाय नमः । ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा। इस प्रकार प्रणव (३कार)-मन्त्रका चिन्तन करते ३ श्रूं शिखायै वषट्। ३» श्रैं कवचाय हुम्।

English

One should fix Sankarna in the east, Pradyumna in the south, Aniruddha in the west and Brahma in the north.

अध्याय ८

श्लोक 16

श्रीधरं रुद्रकोणेषु इन्द्रादीन्दिक्षु विन्यसेत् ।ततो ऽभ्यर्च्य च गन्धाद्यैः प्राप्नुयात्परमं पदम्

śrīdharaṃ rudrakoṇeṣu indrādīndikṣu vinyaset / tato 'bhyarcya ca gandhādyaiḥ prāpnuyātparamaṃ padam

हिन्दी अर्थ

हुए प्रत्येक कारणभूत तत्त्वोंपर जो साधक विजय ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय बौषट्। 3 श्रः अस्त्राय फट्।' प्राप्त करता है, बह शरीरधारी होनेके कारण उस साधनारत भक्तको अङ्गन्यास करके आसनसहित पञ्चमहाभूतके ज्ञानरूपी शरीरको ग्रहण कर लेता है। श्रीमहालक्ष्मीकी पूजा करनी चाहिए। अतः है वृषभध्वज! अपने अन्तःकरणमें उस सूक्ष्म इसके बाद चार प्रकारके वर्णोसे अनुरञ्जित

English

One should fix Sankarna in the east, Pradyumna in the south, Aniruddha in the west and Brahma in the north.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_garuDapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Garuda Purana — Chapter 8
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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