Garuda Purana· Garuḍa Purāṇa
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अध्याय 17 / 317

Book 1 - Adhyaya 17

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अध्याय १७

श्लोक 1

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे हरिध्यानसूर्यार्चनयोर्निरूपणं नाम षोडशो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- १७ हरिरुवाच ।पुनः सूर्यार्चनं वक्ष्ये यदुक्तं धनदाय हि ।अष्टपत्रं लिखेत्पद्मं शुचौ देशे सकर्णिकम्

iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe pūrvakhaṇḍe prathamāṃśākhye ācārakāṇḍe haridhyānasūryārcanayornirūpaṇaṃ nāma ṣoḍaśo 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 17 hariruvāca / punaḥ sūryārcanaṃ vakṣye yaduktaṃ dhanadāya hi / aṣṭapatraṃ likhetpadmaṃ śucau deśe sakarṇikam

हिन्दी अर्थ

इन तत्त्वोंके साथ राग (गानशास्त्रीय रागविशेष), ऐसे मूर्तिमान् देवका चिन्तन करनेवाला साधक बुद्धि, विद्या, कला, काल, नियति, माया, शुद्धविद्या, । सहैव कालभयसे रहित रहता है। इस प्रकार ईश्वर और सदाशिव जो सबके मूल हैं, उनकी भी शिवोपासना करनेवाले साधककी न तो अकालमृत्यु पूजा होनी चाहिए। इन समस्त तत्त्वोमें जो शिव होती है और न शीत तथा ऊष्णादि कारणोंसे ही

English

Next I shall expound the process of worship of the sun which had been explained to Dhanada (the lord of wealth—Kubera).

अध्याय १७

श्लोक 2

आवाहनीं ततो बद्धा मुद्रामावाहयेद्रविम् ।खखोल्कं स्थाप्य मुद्रां तु स्थापयेन्मन्त्ररूपिणीम्

āvāhanīṃ tato baddhā mudrāmāvāhayedravim / khakholkaṃ sthāpya mudrāṃ tu sthāpayenmantrarūpiṇīm

हिन्दी अर्थ

और शक्ति अर्थात् पुरुष एवं प्रकृतिका तत्त्व। उसको मृत्यु होती है। (अध्याय २१-२३)

English

Showing the mystical s%n Avdhini (the invoking) with the fingers, the worshipper should invoke Hari. The Sun*god Khakholka should be placed in the middle in the form of a Tantra (mechanical device) and sprinkled with holy water.

अध्याय १७

श्लोक 3

आग्नेय्यां दिशि देवस्य हृदयं स्थापयेच्छिव ! ।ऐशान्यां तु शिरः स्थाप्यं नैरृत्यां विन्यसेच्छिखाम्

āgneyyāṃ diśi devasya hṛdayaṃ sthāpayecchiva ! / aiśānyāṃ tu śiraḥ sthāpyaṃ nairṛtyāṃ vinyasecchikhām

हिन्दी अर्थ

भगवती त्रिपुरा तथा गणेश आदि देवोंको पूजा-विधि

English

0.1. Mflrw.

अध्याय १७

श्लोक 4

पौरन्दर्यां न्यसेद्धर्ंममेकाग्रस्थितमानसः ।वायव्यां चैव नेत्रं तु वारुण्यामस्त्रमेव च

paurandaryāṃ nyaseddharṃmamekāgrasthitamānasaḥ / vāyavyāṃ caiva netraṃ tu vāruṇyāmastrameva ca

हिन्दी अर्थ

सूतजीने कहा--अब मैं गणेश आदि देवोंको बीजमन्त्रोंसे निम्न रीतिसे हृदयादिन्यास करे- तथा त्रिपुरादेवीकी पूजाको कहूँगा, जो अपने ॐ गां हृदयाय नमः, ॐ गीं शिरसे स्वाहा, भक्तोंको सर्वदा अभीष्ट प्रदान करनेवाली तथा श्रेष्ठ 3७ गूं शिखायै वषटू, ३» गैं कवचाय हुम्, ॐ है। साधकको सबसे पहले गणपतिदेवके आसन गौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ३७ गः अस्त्राय फट्।

English

OSiva let him place the heart of the god in the south* eastern direction. The head should be placed in the north¬ eastern direction. Let him place the tuft in the South*west.

अध्याय १७

श्लोक 5

ऐशान्यां स्थापयेत्सोमं पौरन्दर्यां तु लोहितम् ।आग्नेय्यां सोमतनयं याम्यां चैव बृहस्पतिम्

aiśānyāṃ sthāpayetsomaṃ paurandaryāṃ tu lohitam / āgneyyāṃ somatanayaṃ yāmyāṃ caiva bṛhaspatim

हिन्दी अर्थ

एवं उनके मूर्तस्वरूपका पूजन करके न्यासपूर्वक इस न्यासके पश्चात् साधकको-- ३ दुर्गायाः उनकी पूजा करनी चाहिए। साधक 'गां' आदि पादुकाभ्यां नमः ', ' ॐ गुरुपादुकाभ्यां नमः '--

English

With the mind solely concentrated let him fix Dharma to the east, the eye to the north-west and the Astra (missile) to the west.

अध्याय १७

श्लोक 6

नैरृत्यां दानवगुरुं वारुण्यां तु शनैश्चरम् ।वायव्यां च तथा केतुं कौबेर्यां राहुमेव च

nairṛtyāṃ dānavaguruṃ vāruṇyāṃ tu śanaiścaram / vāyavyāṃ ca tathā ketuṃ kauberyāṃ rāhumeva ca

हिन्दी अर्थ

पञ्चवक्त्रः कराग्रै: स्वैर्दशभिश्चैव धारयन् । अभयं प्रसादं शक्तिं शूलं खट्वाङ्गमीश्वरः ॥ दक्षैः करैर्वामकैश्च भुजंगं चाक्षसूत्रकम्। डमरुकं नीलोत्पलं बीजपूरकमुत्तमम्॥ (२३। ५४-५६)

English

Let him place soma (Moon) in the north-east and Lohita (Mars) in the cast. Moon's sun (Budha—Mercury) is to be placed in the south-east and Bfhaspati (Jupiter) in the south.

अध्याय १७

श्लोक 7

द्वितीयायां तु कक्षायां सूर्यान्द्वादश पूजयेत् ।भगः सूर्योर्ऽय्यमा चैव मित्रो वै वरुणस्तथा

dvitīyāyāṃ tu kakṣāyāṃ sūryāndvādaśa pūjayet / bhagaḥ sūryor'yyamā caiva mitro vai varuṇastathā

हिन्दी अर्थ

करके देवी त्रिपुर के आसन और मूर्तिको प्रणाम करना बाद “भैरव” नामक देवोंकी पूजाका विधान है। चाहिए। तत्पश्चात् वह (साधक) ॐ हीं दुर्गे/असिताङ्ग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, रक्षिणि'--इस मन्त्रसे हृदयादिन्यास करे और फिर इसी भीषण तथा संहार नामवाले-ये आठ भैरव हैं।

English

Indra and ocher deities should be worshipped with reverence by the wonhipper. (The four forms of the goddess

अध्याय १७

श्लोक 8

सविता चैव धाता च विवस्वांश्च महाबलः ।त्वष्टा पूषा तथा चेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते

savitā caiva dhātā ca vivasvāṃśca mahābalaḥ / tvaṣṭā pūṣā tathā cendro dvādaśo viṣṇurucyate

हिन्दी अर्थ

चण्डा, चण्डवती, चण्डरूपा, चण्डिका तथा दुर्गा पञ्चबाण, योगिनी, बटुक, दुर्गा, विज्नराज, गुरु और इन नौ शक्तियोंका पूजन करे। तदनन्तर वज्र, खड्ग क्षेत्रपाल-देवोंका भी पूजन करे। आदि मुद्राओंका प्रदर्शनकर उसके अग्निकोणमें सदाशिव साधकको पद्मगर्भ-मण्डल या त्रिकोणपीठ आदि देवोंकी पूजा करे। अतः साधक पहलेबनाकर उसपर और हदयमें शुक्ल वर्णवाली,

English

Indra and ocher deities should be worshipped with reverence by the wonhipper. (The four forms of the goddess

अध्याय १७

श्लोक 9

पूर्वादावर्चयेद्देवानिन्द्रादीञ्छ्रद्धया नरः ।जया च विजया चैव जयन्ति चापराजिता ।शेषश्च वासुकिश्चैव नागानित्यादि पूजयेत्

pūrvādāvarcayeddevānindrādīñchraddhayā naraḥ / jayā ca vijayā caiva jayanti cāparājitā / śeṣaśca vāsukiścaiva nāgānityādi pūjayet

हिन्दी अर्थ

ॐ सदाशिवमहाप्रेतपद्यासनाय नमः ' कहकर प्रणाम वरदायिनी, अक्षमाला, पुस्तक एवं अभयमुद्रासे करे। तत्पश्चात् 'ॐ ऐं क्लीं (हीं) सौं त्रिपुरायै सुशोभित भगवती सरस्वतीका भी ध्यान करना नमः यह मन्त्रोच्चार करते हुए उस त्रिपुराशक्तिको चाहिए। एक लाख मन्त्रका जप और हवन करनेसे नमस्कार करे। भगवती त्रिपुरेश्वरी साधकके लिये सिद्धिदात्री हो

English

Indra and ocher deities should be worshipped with reverence by the wonhipper. (The four forms of the goddess

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_garuDapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता · Identifier:

Garuda Purana — Chapter 17

गरुडपुराण

संस्कृत संस्करण · Sanskrit Edition:

Imported text; printed edition not recorded

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