अध्याय १७
श्लोक 1
इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे हरिध्यानसूर्यार्चनयोर्निरूपणं नाम षोडशो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- १७ हरिरुवाच ।पुनः सूर्यार्चनं वक्ष्ये यदुक्तं धनदाय हि ।अष्टपत्रं लिखेत्पद्मं शुचौ देशे सकर्णिकम्
iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe pūrvakhaṇḍe prathamāṃśākhye ācārakāṇḍe haridhyānasūryārcanayornirūpaṇaṃ nāma ṣoḍaśo 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 17 hariruvāca / punaḥ sūryārcanaṃ vakṣye yaduktaṃ dhanadāya hi / aṣṭapatraṃ likhetpadmaṃ śucau deśe sakarṇikam
हिन्दी अर्थ
इन तत्त्वोंके साथ राग (गानशास्त्रीय रागविशेष), ऐसे मूर्तिमान् देवका चिन्तन करनेवाला साधक बुद्धि, विद्या, कला, काल, नियति, माया, शुद्धविद्या, । सहैव कालभयसे रहित रहता है। इस प्रकार ईश्वर और सदाशिव जो सबके मूल हैं, उनकी भी शिवोपासना करनेवाले साधककी न तो अकालमृत्यु पूजा होनी चाहिए। इन समस्त तत्त्वोमें जो शिव होती है और न शीत तथा ऊष्णादि कारणोंसे ही
English
Next I shall expound the process of worship of the sun which had been explained to Dhanada (the lord of wealth—Kubera).