अध्याय ५
श्लोक 5.1
ॐ क्लीं ऋषिरुवाच
OM klIM R^iShiruvAcha
हिन्दी अर्थ
१. किसी-किसी प्रतिमें 'ऋषिरुवाच'के बाद “ततः सुरगणा: सर्वे देव्या इन्द्रपुरोगमा: । स्तुतिमारेभिरे कर्तु निहते महिषासुरे ।। ” इतना पाठ अधिक है। २. पा०--च अध्य०। ३. पा०-पैः सुधूपिता। २. मार्कण्डेयपुराणकी आधुनिक प्रतियोंमें--“ददाम्यहमतिप्रीत्या स्तवैरेभि: सुपूजिता।'-- इतना पाठ अधिक है। किसी-किसी प्रतिमें--“कर्त्तव्यमपरं यच्च दुष्करं तन्न विदमहे। इत्याकर्णयय वचो देव्या: प्रत्युचुस्ते दिवौकस: ॥। ” इतना और अधिक पाठ है। ३. किसी-किसी प्रतिमें 'गौरादेहा सा” “गौरी देहासा” इत्यादि पाठ भी उपलब्ध होते हैं। पजञ्चमो5 ध्याय: देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति, चण्ड-मुण्डके मुखसे अम्बिकाके रूपकी प्रशंसा सुनकर शुम्भका उनके पास दूत भेजना और दूतका निराश लौटना विनियोग [3 अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य रुद्रऋषि:, महासरस्वती देवता, अनुष्टप् छन््द:, भीमा शक्तिः, भ्रामरी बीजम्, सूर्यस्तत््वम, सामवेद: स्वरूपम्, महासरस्वतीप्रीत्यर्थे उत्तरचरित्रपाठे विनियोग: । ७ इस उत्तर चरित्रके रुद्र ऋषि हैं, महासरस्वती देवता हैं, अनुष्टप् छनन््द है, भीमा शक्ति हैं, भ्रामरी बीज है, सूर्य तत्त्व है और सामवेद स्वरूप है। महासरस्वतीकी प्रसन्नताके लिये उत्तर चरित्रके पाठमें इसका विनियोग किया जाता है। ध्यान ३० घण्टाशूलहलानि शड्खमुसले चक्र धनु: सायकं हस्ताब्जैर्दधतीं बनानन््तविलसच्छीतांशुतुल्यप्र भाम् । गौरीदेहसमुद्धवां त्रिजगतामाधारभूतां महा- पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम् ॥। जो अपने करकमलोंमें घण्टा, शूल, हल, शड्ख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, शरदऋतुके शोभासम्पन्न चन्द्रमाके समान जिनकी मनोहर कान्ति है, जो तीनों लोकोंकी आधारभूता और शुम्भ आदि दैत्योंका नाश करनेवाली हैं तथा गौरीके शरीरसे जिनका प्राकट्य हुआ है, उन महासरस्वती देवीका मैं निरन्तर भजन करता हूँ।] “३6 कली! ऋषिरुवाच
English
Then suddenly, from the frowning forehead-plate of the Goddess, Kali — of terrifying face, bearing sword and noose — sprang forth.