अध्याय ३०
श्लोक 2.17.1
॥ पृथिवी हिंकारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोताः
|| pR^ithivI hiMkAro.antarikShaM prastAvo dyaurudgItho dishaH pratihAraH samudro nidhanametAH shakvaryo lokeShu protAH
हिन्दी अर्थ
त्रयीविद्या हकार है । ये तीन लोक प्रस्ताव है । अग्नि, वायु र आदिय ये उद्गीथ है । नक्र, पक्षी जोर किरणे ये प्रतिहार है । सप, गन्धव नौर पितृगण-ये निधन है । य सामोपासना स्म तरयी विद्या हिंकारः । अगन्या- त्रयीविद्या हिका है । त्रयीविद्या अगि आदिकरा का्य॑है--रेसी श्रुति होनेके कारण जयीविद्या अमि जीर धकारमे समामता होनेके । कारण सर्पादिका निघनत्व बतलाया यह साम--किसी नामविरोषः
English
The hiṅkâra is the earth, the prastâva the sky, the udgîtha heaven, the pratihâra the regions, the nidhana the sea. These are the Sakvarî Sâmans, as interwoven in the worlds .