Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
29
अध्याय 29 / 154

Adhyāya 29

2 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय २९

श्लोक 2.16.1

॥ वसन्तो हिंकारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतम्

|| vasanto hiMkAro grIShmaH prastAvo varShA udgIthaH sharatpratihAro hemanto nidhanametadvairAjamR^ituShu protam

हिन्दी अर्थ

अग्निकाः प्थमस्थानत्वात्‌ अग्न ईकार है, करयोकि उसका कर्मिणां तन्निधनात्‌। एतद्राजनं स्थान सर्वथम है । आनन्तर्ये तुल्यता होनेके छारण वायु प्रस्ताव हे । उच्ृषट होनेके कारण आदित्य रस उपासनाके विद्वानूको प्रा ण्ड २० शाङ्करभाष्यं २०३ मायुरेति ्योग्जीवति महान्‌ परजया पशुभिभैवति

English

The hiṅkâra is spring, the prastâva summer, the udgîtha the rainy season, the pratihâra autumn, the nidhana winter. That is the Vairâga Sâman, as interwoven in the seasons.

अध्याय २९

श्लोक 2.16.2

स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्यर्तून्न निन्देत्तद्व्रतम्

sa ya evametadvairAjamR^ituShu protaM veda virAjati prajayA pashubhirbrahmavarchasena sarvamAyureti jyogjIvati mahAnprajayA pashubhirbhavati mahAnkIrtyartUnna nindettadvratam

हिन्दी अर्थ

वह पुरुष, जो इस प्रकार इस राजनसामको देवताओं अनुस्यूत जानता है, उन्दी देवताओंके सालोक्य, सार्व ( तुल्य श्चर्यं ) ओर सायुज्यको प्रा हो नाता है । वह पूपं आघुको प्रत होता है, उज्ज्वल साषटितं दिलं साध्यं परस्पर मिरु जानेके भावको अर्थात्‌ तां समानद्वित॒सायुज्य एक ही देहके देदिखको प्राप्त हो व्यः समञ्चना चाहिये । अतः 'सखोकतां सवेविषयक सामकी उपएरसना त्रयी विदा हिकारख्रय इमे खोकाः प्रस्तावोऽन्नि.

English

He who thus knows the Vairâga, as interwoven in the seasons, shines (virâgati) through children, cattle, and glory of countenance. He reaches the full life, he lives long, becomes great with children and cattle, great by fame. His rule is, 'Never complain of the seasons.' Next: II, 17 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता · Identifier:

Chandogya Upanishad — Chapter 29

छान्दोग्योपनिषद्

संस्कृत संस्करण · Sanskrit Edition:

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