Brihadaranyaka Upanishad· Bṛhadāraṇyakopaniṣad
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अध्याय 14 / 45

Adhyāya 14

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पूर्ण अध्याय पाठ12 श्लोक

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अध्याय १४

श्लोक 1

॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ।मन्त्र १ [III.I.1] अथ हैनं जारत्कारव आर्तभागः पप्रच्छ ।याज्ञवल्क्येति होवाच कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इत्य् अष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ये तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः कतमे त इति

|| dvitIyaM brAhmaNam . mantra 1 ##[III.I.1]## atha hainaM jAratkArava ArtabhAgaH paprachCha | yAj~navalkyeti hovAcha kati grahAH katyatigrahA ity aShTau grahA aShTAvatigrahA iti ye te.aShTau grahA aShTAvatigrahAH katame ta iti

हिन्दी अर्थ

. तथा आदित्यो मधु । चष्ु- इसी प्रकार आदिल्य मघुहै॥ इसा दिशनः सर्वषां भूतानां मध्वासां दिशा ये दिशां समस्त भूतोका मधु हँ तथा समस्त भूत इन दिशाओके मधु है । यह जौ इन दिशाओमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है ओर जो यह्‌ तथा दिक्षो मधु। दिशां इष प्रकार दिशं मधु हं। । यद्यपि श्रोत्र दिजशाओंका अध्यात्म परिणाम है तो भी शब्दश्रवणके

English

Ganaka Vaideha (the king of the Videhas) sacrificed with a sacrifice at which many presents were offered to the priests of (the Asvamedha). Brâhmanas of the Kurus and the Pâñkâlas had come thither, and Ganaka Vaideha wished to know, which of those Brâhmanas was the best read. So he enclosed a thousand cows, and ten pâdas (of gold) were fastened to each pair of horns.

अध्याय १४

श्लोक 2

मन्त्र २ [III.I.2] प्राणो वै ग्रहः ।सोऽपानेनातिग्राहेण गृहीतो ऽपानेन हि गन्धाञ्जिघ्रति

mantra 2 ##[III.I.2]## prANo vai grahaH | so.apAnenAtigrAheNa gR^ihIto .apAnena hi gandhA~njighrati

हिन्दी अर्थ

यय वृहदारण्यकोपनिंषद्‌ अध्याय २ यहं चन्द्रमा समस्त भूर्तोका मघु है ओर समस्त मूत इस चन्द्रमाके मधु हं । यह जो इस चन्द्रमामे तेजोमय अमरतमय पुरुष है ओर जो यह्‌ अध्यात्म मनःसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है यही वह है जो कि यह्‌ तथा चन्द्रः । अध्यात्मं इसी प्रकार चन्द्रमा मधु है। मान्तः । ७ यहां अध्यात्म मानस पुरुष है ।

English

'Prâna (breath) is one Graha, and that is seized by Apâna (down-breathing) as the Atigrâha , for one smells with the Apâna.'

अध्याय १४

श्लोक 3

मन्त्र ३ [III.I.3] वाग्वै ग्रहः ।स नाम्नातिग्राहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति

mantra 3 ##[III.I.3]## vAgvai grahaH | sa nAmnAtigrAheNa gR^ihIto vAchA hi nAmAnyabhivadati

हिन्दी अर्थ

यह विद्युत्‌ समस्त भूतोका मधरु है ओर समस्त भृत इस विद्युुके मधु हं । यह जो इस विदयुतूमे तेजोमय अमृतमय पुरुषै ओर जो यह्‌ अध्यात्म तेजस तेजोमय अमृतमय पुरुष हे, यही वह दहै जौ कि । तथा षद्युत्‌ । त्वक्तंजसि मव- इसी पकार विद्युत्‌ सधु है । व्वचाके तेजमे रहतेवाला तैजस बराह्मण ५ शाङ्करभाष्याथं ४५८९ यह मेव समस्त मूतोंका मधु है तथा समस्त मूत इस मषक मधु हं । यह जो इस मेधमे तेजोमय अमृतमय पुरुष हं ओर जो यह्‌ अध्यात्म

English

'Speech (vâk) is one Graha, and that is seized by name (nâman) as the Atigrâha, for with speech one pronounces names.

अध्याय १४

श्लोक 4

मन्त्र ४ [III.I.4] जिह्वा वै ग्रहः ।स रसेनातिग्राहेण गृहीतो जिह्वया हि रसान्विजानाति

mantra 4 ##[III.I.4]## jihvA vai grahaH | sa rasenAtigrAheNa gR^ihIto jihvayA hi rasAnvijAnAti

हिन्दी अर्थ

अयमाकाशः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याकारास्य सर्वाणि भूतानि मधु यक््चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयो- यह आकाश समस्त भूतोका मधु है तथा समस्त भूत इस आकालके मधु है । यह जो इस आकाशम तेजोमय अमृतमय पुरुष दे ओर जो यह्‌ अध्यात्म हृदयाकाशरूप तेजोमय अमृतमय पुरुष दे, यही वह हैजो कि ४५९० बृहदारण्यकोपनिषद्‌ अध्याय्‌ २ तथा आकाशः । च्रष्यात्सं इसी प्रकार आकाल मधु है।

English

'The tongue is one Graha, and that is seized by taste as the Atigrâha, for with the tongue one perceives tastes.'

अध्याय १४

श्लोक 5

मन्त्र ५ [III.I.5] चक्षुर्वै ग्रहः ।स रूपेणातिग्राहेण गृहीतश् चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति

mantra 5 [##III.I.5]## chakShurvai grahaH | sa rUpeNAtigrAheNa gR^ihItash chakShuShA hi rUpANi pashyati

हिन्दी अर्थ

श्माकाशान्ताः प्रथिव्यादयो पृथिवीसे लेकर आकाशपयंन्त (9 देवगण उपकार करनेके कारण स्वातात्मान उद्डनन्ता मधरु प्रत्येक देहधारीके लिये मधु होते अयं धमः-अयम्‌' इत्यप्रत्य- यह धमं मधु है । अयम्‌" (यह्‌) । इस पदका प्रयोग प्रत्यक्ष वस्तुक = . लिये होता है, यद्यपि धमं प्रत्यक्ष ४९२ . बृहदारण्यकोपनिषद्‌ अध्याय २

English

'The eye is one Graha, and that is seized by form as the Atigrâha, for with the eye one sees forms.'

अध्याय १४

श्लोक 7

मन्त्र ६ [III.I.6] श्रोत्रं वै ग्रहः ।स शब्देनातिग्राहेण गृहीतः श्रोत्रेण हि शब्दाञ्शृणोति ।मन्त्र ७ [III.I.7] मनो वै ग्रहः ।स कामेनातिग्राहेण गृहीतो मनसा हि कामान्कामयते

mantra 6 ##[III.I.6]## shrotraM vai grahaH | sa shabdenAtigrAheNa gR^ihItaH shrotreNa hi shabdA~nshR^iNoti | mantra 7 ##[III.I.7]## mano vai grahaH | sa kAmenAtigrAheNa gR^ihIto manasA hi kAmAnkAmayate

हिन्दी अर्थ

यह्‌ सत्य समस्त भूतोका मधु है ओर समस्त भूत इस सत्यके मधु- हँ । यह जो इस सत्यमे तेजोमय अम्रृतमय पुरूष है ओर जो यह्‌ अध्यात्म सत्यसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि यह्‌ आत्मा एव धेः । सोऽपि द्विप्रकार एव विशेषरूपः कायकरणसङ्कातसम- ध्यात्मं कायकरणसङ्कतसमवेते इसी प्रकार वही धमं दष्ट- अनुष्टीयमान यानी आचाररूपसे सत्य संज्ञावाला होता हे। वहभी

English

'The ear is one Graha, and that is seized by sound as the Atigrâha, for with the ear one hears sounds.'

अध्याय १४

श्लोक 8

मन्त्र ८ [III.I.8] हस्तौ वै ग्रहः ।स कर्मणाऽतिग्राहेण गृहीतो हस्ताभ्याँ हि कर्म करोति

mantra 8 ##[III.I.8]## hastau vai grahaH | sa karmaNA.atigrAheNa gR^ihIto hastAbhyA{\m+} hi karma karoti

हिन्दी अर्थ

९ षमंसत्यामभ्यां प्रयुक्तोऽयं का- यहु देदेन्दियसंघातविशेष धमं यकरणसह्घातविशेषः, स॒ येन ओर सतयदवारा प्रेरित है, यह जिस यह मनुष्यजाति समस्त मूतोका मधु है ओौर समस्त मूत इस मनुष्य- जातिके मधु हँ । यह जो इस मनुष्यजातिमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है ओर जो यह्‌ अध्यात्म मानुष तेजोमय अमृतमय पुरुष हे, यहो वह है जो भूतानां मधु । तत्र॒ मादुषादि- मृतोका मधु हे। वह मनुष्यजाति जातिरपि बाह्या आध्यासिक भी बाह्य ओर आध्यात्मिक भेदसे चेतयुभयथा निदंशभ।ग्मवति।१३॥ दो तरहक निर्देशवाली है

English

'The arms are one Graha, and these are seized by work as the Atigrâha, for with the arms one works work.'

अध्याय १४

श्लोक 9

मन्त्र ९ [II.I.9] त्वग्वै ग्रहः ।स स्पर्शेनातिग्राहेण गृहीतस् त्वचा हि स्पर्शान्वेदयत ।इत्येतेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः

mantra 9 ##[II.I.9]## tvagvai grahaH | sa sparshenAtigrAheNa gR^ihItas tvachA hi sparshAnvedayata | ityete.aShTau grahA aShTAvatigrahAH

हिन्दी अर्थ

यस्तु कायंकरणसङ्घातो माचु- जो भी मनृष्यादि जातिविशिष्ट षादिजातिविशिष्टः मः- देहेन्द्रियसंघात है वह्‌-- र ५९४ बृहदारण्यकोपनिषद्‌ श्रध्याय २ यह्‌ आत्मा(देह) समस्त भतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आत्मा- क मधु है । यह जो इस आत्मार्मे तेजोमय अमृतमय पुरूष है ओर जो यह्‌ आत्मा तेजोमय अमृतमय पुरुष हे, यही वह है जो कि यह आत्मा है' इस श्रयमातमा सर्वषां मृतानां मधु। यहं आत्मा ( देह ) समस्त नन्वयं शारीरशब्देन निर्दिष्टः शङ्का- कितु यह तो शारीरः शब्दसे बतलाया हआ पृथिवीका

English

Gârgya said: 'The person that is in the mirror, that I adore as Brahman.' Agâtasatru said to him: 'No, no! Do not speak to me on this. I adore him verily as the brilliant.' Whoso adores him thus, he becomes brilliant, his offspring becomes brilliant, and with whomsoever he comes together, he outshines them.

अध्याय १४

श्लोक 10

मन्त्र १० [III.I.10] याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदँ सर्वं मृत्योरन्नं का स्वित्सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्य् अग्निर्वै मृत्युः सोऽपामन्नम् अप पुनर्मृत्युं जयति

mantra 10 ##[III.I.10]## yAj~navalkyeti hovAcha yadida{\m+} sarvaM mR^ityoranna.n kA svitsA devatA yasyA mR^ityurannamity agnirvai mR^ityuH so.apAmannam apa punarmR^ityuM jayati

हिन्दी अर्थ

ग्रा्माका सर्वाधिपतित्व श्रौर सर्वाश्रयत्वनिरूपण सर्वँ खोकाः सर्व प्राणाः सवं एत आत्मानः समपिंताः। १५ वह्‌ यहं आत्मा समस्त मृतोका अधिपति एवं समस्त भूतोका राजा यस्मिन्नार्मनि परिशिशे विज्ञा जिसका पहलेके पर्यायोमें उप- नमयोऽन्त्ये पर्याये प्रवेशितः, मयका अन्तिम पर्यायमे जिस आत्मामं प्रवेश कराया गया है, .स॒रण करनेवाले ह, वे हौ अविद्या- कापार पतेहंओौर वे ही इस, अतः उनमें जो. श्रुति

English

'Yâgñavalkya,' he said, 'everything is the food of death. What then is the deity to whom death is food?'

अध्याय १४

श्लोक 11

मन्त्र ११ [III.I.11] याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियत उदस्मात्प्राणाः क्रामन्त्य् अहो३ नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो ऽत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्य् आध्मायति आध्मातो मृतः शेते

mantra 11 ##[III.I.11]## yAj~navalkyeti hovAcha yatrAyaM puruSho mriyata udasmAtprANAH krAmanty aho3 neti neti hovAcha yAj~navalkyo .atraiva samavanIyante sa uchChvayaty AdhmAyati AdhmAto mR^itaH shete

हिन्दी अर्थ

दध्यङ्डाथवंणद्रारा प्रहिवनीकूमारोको मधुविद्याके उपदेशकी भ्राख्यायिका परिसमाप्ता ब्रह्मविद्याग्रतल- उस इस्त मधुको दध्यङ्डाथरववंण ऋषिते अधिनीकुमारोसे कहा था । इस मधुको देखते हुए ऋषि ( मन्त्र ) ने कहा - ेष जिस प्रकार वृष्टि करता है, उसी प्रकार हेनराकार अश्चिनीकुमारो ! मै लाभके लिये कयि हुए “इदम्‌' यह पद पीछे बतलाये हए 5 । विषयका समीपस्थ वस्तुकी भांति दिशति, इद्धौ सनिहितलात्‌ । । निर्दल करता है; क्योंकि वह बुद्धिमें

English

'Three,' replied Yâgñavalkya. 'And what are these three?' 'Those which are called Puronuvâkyâ, Yâgyâ, and, thirdly, Sasyâ.' 'And what are these with regard to the body (adhyâtmam)?' 'The Puronuvâkyâ is Prâna (up-breathing), the Yâgyâ the Apâna (down-breathing), the Sasyâ the Vyâna (back-breathing).' 'What does he gain by them?' 'He gains the earth by the Puronuvâkyâ, the sky by the Yâgyâ, heaven by the Sasyâ.' After that Asvala held his peace.

अध्याय १४

श्लोक 12

मन्त्र १२ [III.I.12] याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति ।नामेत्य् अनन्तं वै नामानन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति

mantra 12 [##III.I.12]## yAj~navalkyeti hovAcha yatrAyaM puruSho mriyate kimenaM na jahAtIti | nAmety anantaM vai nAmAnantA vishve devA anantameva sa tena lokaM jayati

हिन्दी अर्थ

शङ्का-कितु ये दोनों मन्त्र अच्िनीकरुमारोको स्तुतिके लिये केसेटो सक्ते दहै ये तो उनकी ६०८ बृहदारण्यकोपनिषद्‌ अध्याय २ उस इस मधुका दध्यङ्काथवंणने अश्चिनीकुमारोको उपदेश किया । इसे देखते हए ऋषि ( मन्तदर्टा ) ने कहा है-ह अधिनीकुमारो ! तुम किया हुजा सत्य था, उसका पालन करनेके लिये । यह इस वातका सुचक टे कि सत्यधसंका पालन

English

'Yâgñavalkya,' he said, 'when such a man dies, what does not leave him?'

अध्याय १४

श्लोक 13

मन्त्र १३ [III.I.13] याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश् चक्षुरादित्यम् मनश्चन्द्रं दिशः श्रोत्रम् पृथिवीँ शरीरम् आकाशमात्मौषधीर्लोमानि वनस्पतीन्केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्वायं तदा पुरुषो भवतीत्य् अहर सौम्य हस्तम् आर्तभागेति होवाऽऽचावामेवैतस्य वेदिष्यावो एतद् k एव एतस्य वेदिष्यावस् न नावेतत्सजन इति ।तौ होत्क्रम्य मन्त्रयां चक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुर् अथ ह यत्प्रशँसतुः कर्म हैव तत् प्रशँसतुः पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ।ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम

mantra 13 ##[III.I.13]## yAj~navalkyeti hovAcha yatrAsya puruShasya mR^itasyAgniM vAgapyeti vAtaM prANash chakShurAdityam manashchandra.n dishaH shrotram pR^ithivI{\m+} sharIram AkAshamAtmauShadhIrlomAni vanaspatInkeshA apsu lohitaM cha retashcha nidhIyate kvAyaM tadA puruSho bhavatIty ahara saumya hastam ArtabhAgeti hovA.a.achAvAmevaitasya vediShyAvo etad ##k ## eva etasya vediShyAvas na nAvetatsajana iti | tau hotkramya mantrayAM chakrAte tau ha yadUchatuH karma haiva tadUchatur atha ha yatprasha{\m+}satuH karma haiva tat prasha{\m+}satuH puNyo vai puNyena karmaNA bhavati pApaH pApeneti | tato ha jAratkArava ArtabhAga upararAma

हिन्दी अर्थ

उस इस मधुका दध्यङ्डायवंणने अश्धिनीकरुमारोको उपदेशा किया । इसे देखते हए ऋषिने कहा--परमात्माने दो पैयोंबाले शरीर बनाये ओर चार पैरोबाले शरीर बनाये । पहले वह्‌ पुरुष पक्षी हौकर शरीरो प्रविष्ट का अथं पूववत्‌ है। उपयुक्त दो सन्त्र प्रव्यंसम्बन्धी आख्यायिकाका न्ष्याख्यायिकोपसंहर्ताये। द्योः उपसंहार करनेवाले है । परवग्यकमं ६१२ बृहदारण्यकोपनिषद्‌ अध्याय २ उस इस मधुका दध्यङ्डाथवंणने अधिनीकूमारोको उपदेश किया । यह देखते हुए ऋषिने कहा- वह रूप-रूपके प्रतिरूप हो गया । इसका

English

'Yâgñavalkya,' he said,' when the speech of this dead person enters into the fire , breath into the air, the eye into the sun, the mind into the moon, the hearing into space, into the earth the body, into the ether the self, into the shrubs the hairs of the body, into the trees the hairs of the head, when the blood and the seed are deposited in the water, where is then that person?' Yâgñavalkya said: 'Take my hand, my friend. We two alone shall know of this; let this question of ours not be (discussed) in public.' Then these two went out and argued, and what they said was karman (work), what they praised was karman , viz. that a man becomes good by good work, and bad by bad work. After that Gâratkârava Ârtabhâga held his peace.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/brihadaaraNyaka.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Brihadaranyaka Upanishad — Chapter 14
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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