Vamana Purana· Vāmana Purāṇa
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अध्याय 25 / 95

Adhyaya 25

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पूर्ण अध्याय पाठ75 श्लोक

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अध्याय २५

श्लोक 1

इति श्रीवामनपुराणे चतुर्विंशो ऽध्यायः ________________________________________________________________________ पुलस्त्य उवाच ।मेनायाः कन्यकास्तिस्रो जाता रूपगुणान्विताः ।सुनाभ इति च ख्यातश्चतुर्थस्तनयो ऽभवत्

iti śrīvāmanapurāṇe caturviṃśo 'dhyāyaḥ ________________________________________________________________________ pulastya uvāca / menāyāḥ kanyakāstisro jātā rūpaguṇānvitāḥ / sunābha iti ca khyātaścaturthastanayo 'bhavat

हिन्दी अर्थ

रहित तथा इन्द्रियोंसे युक्त (नाथ)! आपकी जय हो। नृकेसरिन् सुरारातिवक्षःस्थलविदारण । साम्प्रतं जय विश्वात्मन् मायावामन केशव

English

Vedic hymns, the Dvijas expert in all learning and experienced in the best Lokayatikas . 1 They all were chanting hymns. The sons of Kasyapa saw there the best Brahmins who were expert at executing japa, havana in an orderly manner. Lokapitamaha Brahma was seated in that

अध्याय २५

श्लोक 2

रक्ताङ्गी रक्तनेत्रा च रक्ताम्बरविभूषिता ।रागिणि नाम संजाता ज्येष्ठा मेनासुता मुने

raktāṅgī raktanetrā ca raktāmbaravibhūṣitā / rāgiṇi nāma saṃjātā jyeṣṭhā menāsutā mune

हिन्दी अर्थ

वर्द्धस्व वर्धितानेकविकारप्रकृते हरे। त्वय्येषा जगतामीशे संस्थिता धर्मपद्धतिः ज्ञातुमीशा न मुनयः सनकाद्या न योगिनः

English

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अध्याय २५

श्लोक 3

शुभाङ्गी पद्मपत्राक्षी नीलकुञ्चितमूर्धजा ।श्वेतमाल्याम्बरधरा कुटिला नाम चापरा

śubhāṅgī padmapatrākṣī nīlakuñcitamūrdhajā / śvetamālyāmbaradharā kuṭilā nāma cāparā

हिन्दी अर्थ

स एव केवलं देवं वेत्ति त्वां नेतरो जन: एवं स्तुतो हृषीकेशः स तदा वामनाकृतिः। प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचारूढसम्पदम्

English

The Prajapatis present there were adoring lord Brahma who is the preceptor to the gods and demons alike and enriched with Vidya (learning) and

अध्याय २५

श्लोक 4

नीलाञ्चनचयप्रख्या नीलेन्दीवरलोचना ।रूपेणानुपमा काली जघन्या मेनकासुता

nīlāñcanacayaprakhyā nīlendīvaralocanā / rūpeṇānupamā kālī jaghanyā menakāsutā

हिन्दी अर्थ

यथा शक्राय दास्यामि त्रैलोक्यं हतकण्टकम् सोऽहं तथा करिष्यामि यथेन्द्रो जगतः पतिः । भविष्यति सहस्त्राक्षः सत्यमेतद् ब्रवीमि व:

English

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अध्याय २५

श्लोक 5

जातास्ताः कन्यकास्तिस्रः षडब्दात् परतो मुने ।कर्तुं तपः प्रयातास्ता देवास्ता ददृशुः शुभाः

jātāstāḥ kanyakāstisraḥ ṣaḍabdāt parato mune / kartuṃ tapaḥ prayātāstā devāstā dadṛśuḥ śubhāḥ

हिन्दी अर्थ

'ततः कृष्णाजिनं ब्रह्मा हृषीकेशाय दत्तवान्। यज्ञोपवीतं भगवान् ददौ तस्य बृहस्पतिः हे अपनी मायासे योगमें स्थित रहनेवाले (स्वामी)! आपकी जय हो। शेषकी शय्यापर सोनेवाले अविनाशी शेषशायी प्रभो! आपकी जय हों। एक दाँतके कोनेपर पृथ्वीको उठानेवाले बराहरूपधारी भगवन्! आपकी

English

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अध्याय २५

श्लोक 6

ततो दिवाकरैः सर्वैर्वसुभिश्च तपस्विनी ।कुटिला ब३ह्मलोकं तु नीता शशिकरप्रभा

tato divākaraiḥ sarvairvasubhiśca tapasvinī / kuṭilā ba3hmalokaṃ tu nītā śaśikaraprabhā

हिन्दी अर्थ

जय हो। है देवताओंके शत्रु (हिरण्यकशिपु) -के वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले नृसिंहभगवान् तथा विश्वकी आत्मा एवं अपनी मायासे वामनका रूप धारण करनेवाले केशव! आपकी जय हो। है अपनी मायासे आवृत तथा संसारको धारण करनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो। हे ध्यानसे परे अनेक स्वरूप धारण करनेवाले तथा एकविध प्रभो! आपकी जय हो। हरे! आपने प्रकृतिके भाँति-भाँति विकार बढ़ाये हैं। आपकी वृद्धि हो।

English

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अध्याय २५

श्लोक 7

अथोचुर्देवताः सर्वाः किं त्वियं जनयिष्यति ।पुत्रं महिषहन्तारं ब्रह्मन् व्याख्यातुमर्हसि

athocurdevatāḥ sarvāḥ kiṃ tviyaṃ janayiṣyati / putraṃ mahiṣahantāraṃ brahman vyākhyātumarhasi

हिन्दी अर्थ

जगतका यह धर्ममार्ग आप प्रभुमें स्थित है हे हरे! मैं, शंकर, इन्द्र आदि देव, सनकादि मुनि तथा योगिगण आपको जाननेमें असमर्थ हैं । है जगत्पते! आप इस संसारमें मायारूपी वस्त्रसे ढके हैं। है सर्वेश! आपकी प्रसन्नताके बिना कौन ऐसा मनुष्य है जो

English

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अध्याय २५

श्लोक 8

ततो ऽब्रवीत् सुरपतिर्नेयं शक्ता तपस्विनी ।शार्वं धारयितुं तेजो वराकी मुच्यातां त्वियम्

tato 'bravīt surapatirneyaṃ śaktā tapasvinī / śārvaṃ dhārayituṃ tejo varākī mucyātāṃ tviyam

हिन्दी अर्थ

आपको जान सके। प्रभो! जो मनुष्य आपकी आराधना करता है और आप उसपर प्रसन्न होते हैं, वही आपको जानता है, अन्य नहीं। है ईश्वरोंके भी ईश्वर! है ईशान! हे विभो! है भावन! है विश्वात्मन्! है पृथुलोचन! इस विश्वके प्रभव (उत्पत्ति -सृष्टिके कारण) विष्णु! आपकी वृद्धि हो जय हो

English

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अध्याय २५

श्लोक 9

ततस्तु कुटुला ऋद्धा ब्रह्माणं प्राह नारद ।तथा यतिष्ये भगवन् यता शार्वं सुदुर्द्धरम्

tatastu kuṭulā ṛddhā brahmāṇaṃ prāha nārada / tathā yatiṣye bhagavan yatā śārvaṃ sudurddharam

हिन्दी अर्थ

लोमहर्षणने कहा--इस प्रकार जब वामनरूपमें अवतीर्ण भगवानूकी स्तुति सम्पन्न हुई, तब हृषीकेश भगवान् हँसकर अभिप्रायपूर्ण ऐश्वर्ययुक्त वाणीमें बोले- पूर्वकालमें आपने, इन्द्र आदि देवों तथा कश्यपने मेरी स्तुति की थी। मैंने भी आपलोगोंसे इन्द्रके लिये त्रिभुवनको देनेकी प्रतिज्ञा की थी। इसके बाद अदितिने मेरी स्तुति की तो उससे भी मैंने प्रतिज्ञा की थी कि मैं बाधाओंसे रहित तीनों लोकोंको इन्द्रको दूँगा। अतः

English

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अध्याय २५

श्लोक 10

धारयिष्याम्यहं तेजस्तथैव श्रुणु सत्तम ।तपसाहं सुतप्तेन समाराध्य जनार्दनम्

dhārayiṣyāmyahaṃ tejastathaiva śruṇu sattama / tapasāhaṃ sutaptena samārādhya janārdanam

हिन्दी अर्थ

मैं ऐसा करूँगा, जिससे हजारों नेत्रोंवाले (इन्र) संसारके स्वामी होंगे। मेरा यह कथन सत्य है (हृषीकेश भगवानूके इस प्रकार अपने वचनकी सत्यता घोषित करनेके बाद) ब्रह्माने हृषीकेशको कृष्ण मृगचर्म समर्पित किया एवं भगवान् बृहस्पतिने उन्हे

English

O the great Dvijas! Lord Brahma was being worshipped by Daksa, Praceta, Pulaha, Marici, Bhrgu, Atri, Vasistha, Gautama and Narada, all learnings, the ether, air, splendour, water, earth, word, touch, complexion, essence and smell, nature, deformation, another great causes, the four Vedas with their angas (parts) and lokapati, ethics, offering, resolution, breathing (prana) and by numerous others. O great dvijas! Artha, Dharma, Kama, anger, gaiety, Venus, Jupiter, Mars, Mercury

अध्याय २५

श्लोक 11

यथा हरस्य मूर्धानं नमयिथ्ये पितामह ।तथा देव करिष्यामि सत्यं सत्यं मयोदितम्

yathā harasya mūrdhānaṃ namayithye pitāmaha / tathā deva kariṣyāmi satyaṃ satyaṃ mayoditam

हिन्दी अर्थ

अध्याय ३१ वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराट्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४१ आषाढमददाद् दण्डं मरीचिर्ब्रह्मणः सुत: ।

English

Saturn and demon head stars were also present in an orderly manner there. Marudganas, Visvakarma, Vasu, sun, moon, day, night, fortnight, month and six seasons were also

अध्याय २५

श्लोक 12

पुलस्त्य उवाच ।ततः पितामहः क्रुद्धः कुटिलां प्राह दारुणाम् ।भगवानादिकृद् ब्रह्मा सर्वेशो ऽपि महामुन्

pulastya uvāca / tataḥ pitāmahaḥ kruddhaḥ kuṭilāṃ prāha dāruṇām / bhagavānādikṛd brahmā sarveśo 'pi mahāmun

हिन्दी अर्थ

आसनं चैव पुलहः पुलस्त्यः पीतवाससी स वामनो जटी दण्डी छत्री धृतकमण्डलुः। सर्वदेवमयो देवो बलेरध्वरमभ्यगात्

English

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अध्याय २५

श्लोक 13

ब्रह्मोवाच ।यस्मान्मद्वचनं पापे न क्षान्तं कुटिले त्वया ।तस्मान्मच्छापनिर्दग्धा सर्वा आपो भविष्यसि

brahmovāca / yasmānmadvacanaṃ pāpe na kṣāntaṃ kuṭile tvayā / tasmānmacchāpanirdagdhā sarvā āpo bhaviṣyasi

हिन्दी अर्थ

यत्र यत्र पदं विप्रा भूभागे वामनो ददौ। ददाति भूमिर्विवरं तत्र तत्राभिपीडिता स वामनो जडगतिर्मृदु गच्छन् सपर्वताम्। साब्धिद्वीपवतीं सर्वा चालयामास मेदिनीम्

English

mraTfelT f^JIdTJTOTT^II^m

अध्याय २५

श्लोक 14

इत्येवं ब्रह्मणा शप्ता हिमवद् दुहिता मुने ।आपोमयी ब्रह्मलोकं प्लावयामास वेगिनी

ityevaṃ brahmaṇā śaptā himavad duhitā mune / āpomayī brahmalokaṃ plāvayāmāsa veginī

हिन्दी अर्थ

साहाय्यं कल्पयामास देवदेवस्य चक्रिण: तस्य संदर्शनादेव नागेभ्यो न भयं भवेत्

English

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अध्याय २५

श्लोक 15

तामुद्वृत्तजलां दृष्ट्वा प्रबबन्ध पितामहः ।ऋक्सामाथर्वयजुभिर्वाङ्मयैर्बन्धनैर्दृढम्

tāmudvṛttajalāṃ dṛṣṭvā prababandha pitāmahaḥ / ṛksāmātharvayajubhirvāṅmayairbandhanairdṛḍham

हिन्दी अर्थ

यज्ञोपवीत दिया। ब्रह्मपुत्र मरीचिने उन्हें पलाशदण्ड, पुलहने आसन तथा पुलस्त्यने दो पीले वस्त्र दिये। ओंकारके स्वरसे अलंकृत वेद, सभी शास्त्र तथा सांख्ययोग आदि दर्शनोंकी उक्तियाँ उनका उपस्थान करने लगीं। समस्त देवताओंके मूर्तिरूप वामनभगवान्

English

OTJTOT ^cr sr?rf^: WII 3 $ II

अध्याय २५

श्लोक 16

सा बद्धा सिस्थिता ब्रह्मन् तत्रैव गिरिकन्यका ।आपोमयी प्लावयन्ती ब्रह्मणो विमला जटाः

sā baddhā sisthitā brahman tatraiva girikanyakā / āpomayī plāvayantī brahmaṇo vimalā jaṭāḥ

हिन्दी अर्थ

जटा, दण्ड, छत्र एवं कमण्डलु धारण करके बलिकी यज्ञभूमिमें पधारे॥ ३६--३९॥ ब्राह्मणो ! पृथ्वीपर वामनभगवान् जिस-जिस स्थानपर डग रखते थे, वहाँकी दबी हुई भूमिमें दरार पड़ जाता था-गटड्ढा हो जाता था। मधुरभावसे धीरे-धीरे चलते हुए वामनभगवानूने समुद्रों, द्वीपों तथा पर्वतोंसे युक्त

English

The best among religion abiding hermits Kasyapa entered that auditorium filled with all desires, splendour, brilliance, radiating with splendour of Brahma (the knowledge). It was indescribable and beyond imagination. He turned towards Brahma in that auditorium who was seated on the best chair and saluted him with all hermits known to Brahma.

अध्याय २५

श्लोक 17

या सा रागवती नाम सापि नीता सुरैर्दिवम् ।ब्रह्मणे तां निवेद्यैवं तामप्याह प्रजापतिः सापि क्रुद्धाब्रवीन्नूनं तथा तप्स्ये महत्तपः ।यथा मन्नामसंयुक्तो महिषघ्नो भविष्यति

yā sā rāgavatī nāma sāpi nītā surairdivam / brahmaṇe tāṃ nivedyaivaṃ tāmapyāha prajāpatiḥ sāpi kruddhābravīnnūnaṃ tathā tapsye mahattapaḥ / yathā mannāmasaṃyukto mahiṣaghno bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

सारी पृथ्वीको कँपा दिया। बृहस्पति भी शनैः-शनैः उन्हें सारे कल्याणकारी मार्गको दिखाने लगे एवं स्वयं भी क्रीडापूर्ण मनोरञ्जनके लिये अत्यन्त धीरे-धीरे चलने लगे। उसके बाद महानाग शेष रसातलसे ऊपर आकर देवदेव चक्रधारी भगवान्की सहायता करने लगे। आज भी वह श्रेष्ठ सर्पोंका बिल विख्यात है और उसके दर्शनमात्रसे नागोंसे भय नहीं होता ॥ ४०--४४॥

English

OTP. TOTTOT tRuft fOTOTT: WOTOTPI fOTJOTT: TTRTT foOTTOTcOTOT: II 3^911

अध्याय २५

श्लोक 18

तामप्यथाशपद् ब्रह्म सन्ध्या पापे भविष्यसि ।या मद्वाक्यमलङ्घ्यं वै सुरैर्लङ्घयसे बलात्

tāmapyathāśapad brahma sandhyā pāpe bhaviṣyasi / yā madvākyamalaṅghyaṃ vai surairlaṅghayase balāt

हिन्दी अर्थ

वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराद्रूपसे तीनों लोकोंको तीन 'पगमें नाप लेना और बलिका पातालमें जाना कस्माच्च नासुरान् भागान् प्रतिगृह्णन्ति वह्वयः

English

All those resolute attained de-nova mental power; their sins were absolved and they cooled down when they saluted that supreme

अध्याय २५

श्लोक 19

तामप्यथाशपद् ब्रह्म सन्ध्या पापे भविष्यसि ।या मद्वाक्यमलङ्घ्यं वै सुरैर्लङ्घयसे बलात्

tāmapyathāśapad brahma sandhyā pāpe bhaviṣyasi / yā madvākyamalaṅghyaṃ vai surairlaṅghayase balāt

हिन्दी अर्थ

इति पृष्टोऽथ बलिना काव्यो वेदविदां वर: । उवाच हैत्याधिपतिं चिरं ध्यात्वा महामतिः लोमहर्षण बोले बलिने वनों और पर्वतोंके साथ सम्पूर्ण पृथ्वीको क्षोभसे भरी देखकर हाथ जोड़ करके शुक्राचार्यको प्रणाम कर पूछा -आचार्यदेव ! समुद्र तथा पर्वतोंके साथ पृथ्वीके क्षुब्ध होनेका क्या कारण

English

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अध्याय २५

श्लोक 20

सापि जाता मुनिश्रेष्ठ सन्ध्या रागवती ततः ।प्रतीच्छत् कृत्तिकायोगं शैलेया विग्रहं दृढम्

sāpi jātā muniśreṣṭha sandhyā rāgavatī tataḥ / pratīcchat kṛttikāyogaṃ śaileyā vigrahaṃ dṛḍham

हिन्दी अर्थ

है और अग्निदेव असुरोंके भागोंको क्यों नहीं ग्रहण कर रहे हैं? बलिके इस प्रकार प्रश्‍न करनेपर वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ

English

Lord of celestials Brahma said when he saw the gods came there with Kasyapa.

अध्याय २५

श्लोक 21

ततो गते कन्यके द्वे ज्ञात्वा मेना तपस्विनी ।तपसो वारयमास उमेत्येवाब्रवीच्च सा

tato gate kanyake dve jñātvā menā tapasvinī / tapaso vārayamāsa umetyevābravīcca sā

हिन्दी अर्थ

बुद्धिमान् शुक्राचार्यने चिरकालतक ध्यान लगाकर (और 'वामनेनेह रूपेण परमात्मा सनातनः

English

Departure of Kasyapa and gods to

अध्याय २५

श्लोक 22

तदेव माता नामास्याश्चक्रे पितृसुता शुभा ।उमेत्येव हि कन्यायाः सा जगाम तपोवनम्

tadeva mātā nāmāsyāścakre pitṛsutā śubhā / umetyeva hi kanyāyāḥ sā jagāma tapovanam

हिन्दी अर्थ

स नूनं यज्ञमायाति तव दानवपुंगव। तत्पादन्यासविक्षोभादियं प्रचलिता मही कम्पन्ते गिरयश्चेमे क्षुभिता मकरालयाः। नेयं भूतपतिं भूमिः समर्था बोढुमीश्वरम्

English

Brahma said- O mighty gods! I am pondering over the matter earlier for which you all have now come to me.

अध्याय २५

श्लोक 23

ततः सा मनसा देवं शूलपाणिं वृषध्वजम् ।रुद्रं चेतसि संधाय तपस्तेपे सुदुष्करम्

tataḥ sā manasā devaṃ śūlapāṇiṃ vṛṣadhvajam / rudraṃ cetasi saṃdhāya tapastepe suduṣkaram

हिन्दी अर्थ

सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः। धारयत्यखिलान् देवान् मनुष्यांश्च महासुरान्

English

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अध्याय २५

श्लोक 24

ततो ब्रह्माब्रवीद् देवान् गच्छध्वं हिमवत्सुताम् ।इहानयध्वं तां कालीं तपस्यन्तीं हिमालये

tato brahmābravīd devān gacchadhvaṃ himavatsutām / ihānayadhvaṃ tāṃ kālīṃ tapasyantīṃ himālaye

हिन्दी अर्थ

धन्योऽहं कृतपुण्यश्च यन्मे यज्ञपतिः स्वयम्। यञ्ञमभ्यागतो ब्रह्मन् मत्तः कोऽन्योऽधिकः पुमान् द्रष्टुमिच्छन्ति देवोऽसौ ममाध्वरमुपेष्यति। यन्मयाचार्य॑ कर्त्तव्यं तन्ममादेष्टुमहसि

English

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अध्याय २५

श्लोक 25

ततो देवाः समाजग्मुर्ददृशुपः शैलनन्दिनीम् ।तेजसा विजितास्तस्या न शेकुरुपसर्पितुम्

tato devāḥ samājagmurdadṛśupaḥ śailanandinīm / tejasā vijitāstasyā na śekurupasarpitum

हिन्दी अर्थ

यज्ञभागभुजो देवा वेदप्रामाण्यतोऽसुर। त्वया तु दानवा हैत्य यज्ञभागभुजः कृताः अयं च देवः सत्त्वस्थः करोति स्थितिपालनम्। विसृष्टं च तथाऽयं च स्वयमत्ति प्रजाः प्रभुः

English

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अध्याय २५

श्लोक 26

इन्द्रो ऽमरगणैः सार्द्धं निर्द्धूतस्तेजसा तया ।ब्रह्मणो ऽधिकतेजो ऽस्या विनिवेद्य प्रतिष्ठितः

indro 'maragaṇaiḥ sārddhaṃ nirddhūtastejasā tayā / brahmaṇo 'dhikatejo 'syā vinivedya pratiṣṭhitaḥ

हिन्दी अर्थ

भवांस्तु बन्दी भविता नूनं विष्णुः स्थितौ स्थितः। विदित्वैवं महाभाग कुरु यत् ते मनोगतम् तथ्य समझकर) हैत्येन्द्रसे कहा-कश्यपके घरमें 'जगद्योनि संसारको उत्पन्न करनेवाले सनातन परमात्मा वामनके रूपमें अवतीर्ण हो गये हैं

English

O great gods! Your desire shall reap complete success. The creator of the universe who will defeat the demon king Bali is not only the god of gods but I also adore him and consider him saviour. He is the leader of the three-worlds and sovereign to all gods.

अध्याय २५

श्लोक 27

ततो ब्रह्माब्रवीत् सा दि ध्रवं शङ्करवल्लभा ।यूयं यत्तेजसा नूनं विक्षिप्तास्तु हतप्रभाः

tato brahmābravīt sā di dhravaṃ śaṅkaravallabhā / yūyaṃ yattejasā nūnaṃ vikṣiptāstu hataprabhāḥ

हिन्दी अर्थ

दानवश्रेष्ठ! वे ही प्रभु तुम्हारे यज्ञमें आ रहे हैं। उन्हींके पैर रखनेसे पृथ्वीमें विक्षोभ हो रहा है जिससे यह पृथ्वी काँप रही है, ये पर्वत भी काँप रहे हैं और सिन्धुमें जोरोंकी लहरें उठ रही हैं। इस भूमिमें उन भूतपति भगवानको वहन करनेकी शक्ति नहीं है। ये ही (परमात्मा) देव, असुर, गन्धर्व देवों, मनुष्यों एवं महासुरोंको धारण करते हैं। जगतूको धारण करनेवाले भगवान् कृष्णकी ही यह गम्भीर (अचिन्त्य) माया है,

English

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अध्याय २५

श्लोक 28

तस्माद् भजध्वं स्व स्वं हि स्थानं भो विगतज्वराः ।सतारकं हि महिषं विदध्वं निहतं रणे

tasmād bhajadhvaṃ sva svaṃ hi sthānaṃ bho vigatajvarāḥ / satārakaṃ hi mahiṣaṃ vidadhvaṃ nihataṃ raṇe

हिन्दी अर्थ

जिस मायाके द्वारा यह संसार धार्यधारकभावसे क्षुब्ध हो रहा है उनके सन्निधान होनेके कारण देवताओंके शत्रु हैत्यलोग यज्ञ-भाग पानेके योग्य नहीं रह गये हैं, अतएव तीनों अग्निदेव भी असुरोंके भागको नहीं ले रहे हैं। शुक्राचार्यकी बात सुननेके बाद बलिके रोंगटे

English

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अध्याय २५

श्लोक 29

इत्येवमुक्ता देवेन ब्रह्मणा सेन्द्रकाः सुराः ।जग्मुः स्वान्येव धिष्ण्यानि सद्यो वै विगतज्वराः

ityevamuktā devena brahmaṇā sendrakāḥ surāḥ / jagmuḥ svānyeva dhiṣṇyāni sadyo vai vigatajvarāḥ

हिन्दी अर्थ

खड़े हो गये। उसके बाद बलिने (शुक्राचार्यसे) कहा-ब्रह्मन्! मैं धन्य एवं कृतकृत्य हो गया, जो स्वयं यज्ञके अधिपति भगवान् लगातार मेरे यज्ञमें पधार रहे हैं। कौन दूसरा पुरुष मुझसे श्रेष्ठ है? सहैव सावधान रहनेवाले योगीलोग जिन नित्य परमात्माको देखना चाहते हैं, वे ही देव मेरे यज्ञमें (कृपाकर) पधार रहे हैं। आचार्य! मुझे जो करना चाहिए, उसे आप आदिष्ट कीजिये

English

The god of all worlds, forefather to all is also addressed as Sanatana

अध्याय २५

श्लोक 30

उमामपि तपस्यन्तीं हिमवान् पर्वतेश्वरः ।निवर्त्य तपसस्तस्मात् सदारो ह्यनयद्गृहान्

umāmapi tapasyantīṃ himavān parvateśvaraḥ / nivartya tapasastasmāt sadāro hyanayadgṛhān

हिन्दी अर्थ

शुक्राचार्य बोले असुर! वेदोंका विधान है कि यज्ञभागके भोक्ता देवता हैं। परंतु हैत्य! तुमने यज्ञभागका भोक्ता दानवोंको बना दिया है। (यह वेद-विधानके विपरीत किया है-विधानका उल्लङ्घन किया है।) ये ही देव सत्त्वगुणका आश्रय लेकर विश्वकी स्थिति और पालन करते हैं और ये ही सृष्टि भी करते हैं, फिर ये ही प्रभु स्वयं प्रजाका (जीवोंका) अन्त भी करते हैं। विष्णु स्थितिके कार्यमें (कल्याणमय मर्यादाके स्थापनमें)

English

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अध्याय २५

श्लोक 31

देवो ऽप्याश्रित्य तद्रौद्रं व्रतं नाम्ना निराश्रयम् ।विचचार महाशैलान् सेरुप्राग्र्यान् महामतिः

devo 'pyāśritya tadraudraṃ vrataṃ nāmnā nirāśrayam / vicacāra mahāśailān seruprāgryān mahāmatiḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पर हो गये हैं। अतः आपको निश्चय ही बन्दी होना है। महाभाग! इसपर विचारकर तुम्हारे मनमें जैसी अध्याय ३१ वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराद्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना

English

^cTTTOFI.fft ftra ^T fW^xHTMimi

अध्याय २५

श्लोक 32

स कदाचिन्महाशैलं हिमवन्तं समागतः ।तेनार्चितः श्रद्धयासौ तां रात्रिमवसद्धरः

sa kadācinmahāśailaṃ himavantaṃ samāgataḥ / tenārcitaḥ śraddhayāsau tāṃ rātrimavasaddharaḥ

हिन्दी अर्थ

त्वयाउस्य हैत्याधिपते स्वल्पकेऽपि हि वस्तुनि। प्रतिज्ञा नैव वोढव्या वाच्यं साम तथाउफलम् कृतकृत्यस्य देवस्य देवार्थं चैव कुर्वतः।

English

The gods etc. do not know that supreme soul but he is well introduced to the gods, myself, Sruti and the universe very well.

अध्याय २५

श्लोक 33

द्वितीये ऽह्नि गिरीशेन महादेवो नमन्त्रितः ।इहैव तिष्ठस्व विभो तपःसाधनाकारणात्

dvitīye 'hni girīśena mahādevo namantritaḥ / ihaiva tiṣṭhasva vibho tapaḥsādhanākāraṇāt

हिन्दी अर्थ

अलं दद्यां धनं देवे त्वेतद्वाच्यं तु याचतः। कृष्णस्य देवभूत्यर्थ प्रवृत्तस्य महासुर

English

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अध्याय २५

श्लोक 34

इत्येवमुक्तो गिरिणा हरश्चक्रे मतिं च ताम् ।तस्थावाश्रममाश्रित्य त्यक्त्वा वासं निराश्रयम्

ityevamukto giriṇā haraścakre matiṃ ca tām / tasthāvāśramamāśritya tyaktvā vāsaṃ nirāśrayam

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन् कथमहं ब्रूयामन्येनापि हि याचितः। नास्तीति किमु देवस्य संसारस्याघहारिणः

English

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अध्याय २५

श्लोक 35

वसतो ऽप्याश्रमे तस्य देवदेवस्य शूलिनः ।तं देशमगमत् काली गिरिराजसुता शुभा

vasato 'pyāśrame tasya devadevasya śūlinaḥ / taṃ deśamagamat kālī girirājasutā śubhā

हिन्दी अर्थ

यज्ञाः क्रियन्ते यज्ञेशः स मे देहीति वक्ष्यति तत्साधु सुकृतं कर्म तपः सुचरितं च नः। यन्मां देहीति विश्वेशः स्वयमेव वदिष्यति

English

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अध्याय २५

श्लोक 36

तामागतां हरो दृष्ट्वा भूयो जातां प्रियां सतीम् ।स्वागतेनाभिसंपूज्य तस्थौ योगरतो हरः

tāmāgatāṃ haro dṛṣṭvā bhūyo jātāṃ priyāṃ satīm / svāgatenābhisaṃpūjya tasthau yogarato haraḥ

हिन्दी अर्थ

नास्तीत्यहं गुरो वक्ष्ये तमभ्यागतमीश्वरम्। प्राणत्यागं करिष्येऽहं न तु नास्ति जने क्नचित् न बाधाकारि यद्दानं तदङ्ग बलवत् स्मृतम्

English

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अध्याय २५

श्लोक 37

सा चाभ्येत्य वरारोहा कृताञ्जपरिग्रहा ।ववन्दे चरणौ शौवौ सखीभिः सह भामिनी

sā cābhyetya varārohā kṛtāñjaparigrahā / vavande caraṇau śauvau sakhībhiḥ saha bhāminī

हिन्दी अर्थ

इच्छा हो वैसा करो। हैत्यपते! (देखना) तुम थोड़ी- सी भी वस्तु देनेके लिये उनसे प्रतिज्ञा मत करना। व्यर्थकी कोमल और मधुर बातें करना। महासुर! कृतकृत्य एवं देवताओंका कार्य पूरा करनेवाले तथा याचना करनेपर “मैं देवताओंके हेतु पर्याप्त धन दूँगा! ऐसा कहना

English

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अध्याय २५

श्लोक 38

ततस्तु सुचिराच्छर्वः समीक्ष्य गिरिकन्यकाम् ।न युक्तं चैवमुक्त्वाथ सगणो ऽन्तर्दधे ततः

tatastu sucirāccharvaḥ samīkṣya girikanyakām / na yuktaṃ caivamuktvātha sagaṇo 'ntardadhe tataḥ

हिन्दी अर्थ

बलि बोले- ब्रह्मन्! मैं दूसरोंके याचना करनेपर भी “नहीं है'-एऐसा कैसे कह सकता हूँ? फिर संसारके पापोंको दूर करनेवाले (उन) देवसे कहनेकी तो बात ही क्या है? विविध प्रकारके व्रतों एवं 'उपवासोंसे जो परमेश्वर ग्रहण किये जाने योग्य हैं, वे ही गोविन्द मुझसे “दो' इस प्रकार कहेंगे तो इससे बढ़कर (मेरे लिये) और (भाग्य) क्या हो सकता है? जिनके लिये दम-शमादि शौच --भीतरी-बाहरी

English

I, on his pleasure suggest to you the best measures for resolving your problem. All people go to the best place addressed by scholars as Amrta. It is located at the northern bank of Kslrasagara that falls at north from here. The creator of this universe is seated there in a tough penance under Yoga. You all resolute should at that place and sit in

अध्याय २५

श्लोक 39

सापि शर्ववचो रौद्रं श्रुत्वा ज्ञानसमन्विता ।अन्तर्दुःखेन दह्यन्ती पितरं प्राह पार्वती

sāpi śarvavaco raudraṃ śrutvā jñānasamanvitā / antarduḥkhena dahyantī pitaraṃ prāha pārvatī

हिन्दी अर्थ

पवित्रता आदि गुणोंसे युक्त लोग यज्ञीय उपकरणों एवं सम्पत्तियोंको लगाकर यज्ञ करते हैं, वे ही यज्ञेश (यज्ञके स्वामी) यदि मुझसे “दो” इस प्रकार कहेंगे तो मेरे किये हुए सभी कर्म सफल हो गये और हमारा तपश्चरण भी सफल हो गया; क्योंकि विश्वके स्वामी स्वयं मुझसे 'दो'-इस तरह कहेंगे

English

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अध्याय २५

श्लोक 40

तात यास्ये महारण्ये तप्तुं घोरं महत्तपः ।आराधनाय देवस्य शङ्करस्य पिनाकिनः

tāta yāsye mahāraṇye taptuṃ ghoraṃ mahattapaḥ / ārādhanāya devasya śaṅkarasya pinākinaḥ

हिन्दी अर्थ

गुरुदेव! क्या अपने यहाँ (याचकरूपमें) आये उन परमेश्वरसे “नहीं है'--मैं ऐसा कहूँ? (यह तो उचित नहीं जँचता) भले ही प्राणोंका त्याग कर दूँगा; किंतु किसी भी याचक मनुष्यसे “नहीं है'-यह नहीं कह सकता। दूसरोंके भी याचना करनेपर जब मैंने “नहीं है'-एऐसा नहीं कहा तो आज अपने यहाँ स्वयं पूर्ण परमेश्वरके आ जानेपर मैं यह कैसे कहूँगा कि “नहीं है'? दानके कारण यदि कठिनाई आती है तो उसे वीर

English

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अध्याय २५

श्लोक 41

तथेत्युक्तं वचः पित्रा पादे तस्यैव विस्तृते ।ललिताख्या तपस्तेपे हराराधनाकाम्यया

tathetyuktaṃ vacaḥ pitrā pāde tasyaiva vistṛte / lalitākhyā tapastepe harārādhanākāmyayā

हिन्दी अर्थ

पुरुष प्रशंसनीय ही मानते हैं। क्योंकि दानका महत्त्व उससे और बढ़ जाता है। गुरो! (हाँ, साधारणतया यह समझा जाता है कि--) जो दान बाधा डालनेवाला नहीं होता, वह निःसंदेह बलवान् कहा गया है। (पर ऐसा प्रसङ्ग नहीं आ सकता; क्योंकि) मेरे राज्यमें ऐसा कोई भी नहीं है, जो सुखी न हो और न कोई रोगी या दु:खी ही है, न कोई किसीके द्वारा उद्वेजित किया गया है और न कोई

English

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अध्याय २५

श्लोक 42

तस्याः सख्यस्तदा देव्याः परिचर्या तु कुर्वते ।समित्कुशफलं चापि मूलाहरणमादितः

tasyāḥ sakhyastadā devyāḥ paricaryā tu kurvate / samitkuśaphalaṃ cāpi mūlāharaṇamāditaḥ

हिन्दी अर्थ

विदितं मुनिशार्दूल मयैतत् त्वन्मुखाच्छुतम् मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः। मम दानमवाप्यासौ पुष्णाति यदि देवताः

English

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अध्याय २५

श्लोक 43

विनोदनार्थं पार्वत्या मृन्मयः शूलधृग् हरः ।कृतस्तु तेजसा युक्तो भद्रमस्त्विति साब्रवीत्

vinodanārthaṃ pārvatyā mṛnmayaḥ śūladhṛg haraḥ / kṛtastu tejasā yukto bhadramastviti sābravīt

हिन्दी अर्थ

विशिष्टं मम तद्दानं परितुष्टश्च देवताः। उपभोगाच्छतगुणं दानं सुखकरं स्मृतम् मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः। तेनाभ्येति न संदेहो दर्शनादुपकारकृत्

English

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अध्याय २५

श्लोक 44

पूजां करोति तस्यैव तं पश्यति मुहुर्मुहुः ।ततो ऽस्यास्तुष्टिमगमच्छ्रद्धया त्रिपुरान्तकृत्

pūjāṃ karoti tasyaiva taṃ paśyati muhurmuhuḥ / tato 'syāstuṣṭimagamacchraddhayā tripurāntakṛt

हिन्दी अर्थ

अथ कोपेन चाभ्येति देवभागोपरोधतः। मां निहन्तुं ततो हि स्याद् वधः श्लाघ्यतरोऽच्युतात् एतज्ज्ञात्वा मुनिश्रेष्ठ दानविघ्नकरेण मे।

English

You will hear at the end of the summer season the voice of that lord. It will appear as a thundering cloud, tender with grave sound, filled with love, attractive, impressive words intertwined, all benevolent, processed like the follower of Brahma, divine, truthful and competent to abolish the evils. Thus, when Yogavrata of metaphysician Kasyapa will be over, lord Visnu will address you all- "O gods! I greet you all come to me. I want to bless you. Ask you all the desirous thing and each will definitely receive the same.

अध्याय २५

श्लोक 45

बटुरूपं समाधाय आषाढी मुञ्जमेखली ।यज्ञोपवीती छत्री च मृगाजिनधरस्तथा

baṭurūpaṃ samādhāya āṣāḍhī muñjamekhalī / yajñopavītī chatrī ca mṛgājinadharastathā

हिन्दी अर्थ

सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो मायावामनरूपधृक् तं दृष्टा यज्ञवाटं तु प्रविष्टमसुराः प्रभुम्।

English

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अध्याय २५

श्लोक 46

कमण्डलुव्यग्रकरो भस्मारुणितविग्रहः ।प्रत्याश्रमं पर्यटन् स तं काल्याश्रममागतः

kamaṇḍaluvyagrakaro bhasmāruṇitavigrahaḥ / pratyāśramaṃ paryaṭan sa taṃ kālyāśramamāgataḥ

हिन्दी अर्थ

वसिष्ठो गाधिजो गर्गो अन्ये च मुनिसत्तमाः प्रत्येकं देवदेवेशं पूजयामास तेजसा। अथासुरपतिं प्रह्न॑ दृष्टा मुनिवरांश्च तान्

English

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अध्याय २५

श्लोक 47

तमुत्थाय तदा काली सखीभिः सह नारद ।पूजयित्वा यथान्यायं पर्यपृच्छदिदं ततः

tamutthāya tadā kālī sakhībhiḥ saha nārada / pūjayitvā yathānyāyaṃ paryapṛcchadidaṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

शम आदि गुणोंसे रहित है। महाभाग! सभी लोग हृष्ट, तुष्ट, पुण्यात्मा-धर्मपरायण तृप्त एवं सुखी हैं। अधिक क्या है? मैं तो सदा सुखी हूँ॥ २१--२५॥ मुनिशार्दूल! आपके मुखसे सुनकर मुझे यह मालूम हो गया कि मैं यहाँपर बिशिष्ट दानरूपी बीजका शुभ फल प्राप्त कर रहा हूँ। वे हरि यदि मुझसे दान लेकर देवताओंकी पुष्टि करते हैं तो यज्ञसे आराधित वे

English

Aditi and Kasyapa then bowed their heads at the feet of lord Brahma and wished that the god might appear as their son with his pleasure. He impliedly fulfil their desire when it is blessed by him.

अध्याय २५

श्लोक 48

उमोवाच ।कस्मादागम्यते भिक्षो कुत्र स्थाने तवाश्रमः ।क्व च त्वं प्रतिगन्तासि मम शीघ्रं निवेदय

umovāca / kasmādāgamyate bhikṣo kutra sthāne tavāśramaḥ / kva ca tvaṃ pratigantāsi mama śīghraṃ nivedaya

हिन्दी अर्थ

(हरि) मुझपर निश्चय ही प्रसन्न हैं। यदि श्रेष्ठ बीज (ऐसा दान) महान् (योग्य) पात्र, पूज्य जनार्दनको मिल गया तो फिर मुझे क्या नहीं मिला? निश्चय ही मेरा यह दान विशिष्ट गुणोंवाला है और देवता मेरे ऊपर प्रसन्न हैं। दानके उपभोगकी अपेक्षा दान देना सौ-गुना सुख देनेवाला माना गया है

English

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अध्याय २५

श्लोक 49

भिक्षुरुवाच।।ममाश्रमपदं बाले वाराणस्यां शुचिव्रते ।अथातस्तीर्थयात्रायां गमिष्यामि पृथूदकम्

bhikṣuruvāca/ / mamāśramapadaṃ bāle vārāṇasyāṃ śucivrate / athātastīrthayātrāyāṃ gamiṣyāmi pṛthūdakam

हिन्दी अर्थ

यज्ञसे पूजे गये श्रीहरि निश्चय ही मेरे ऊपर प्रसन्न हैं। तभी तो निस्संदेह मुझे दर्शन देकर मेरा कल्याण करनेवाले वे प्रभु आ रहे हैं, निश्चय ही यही बात है। यदि वे क्रोधवश मेरा वध करने भी आ रहे हों तो भी उन अच्युतसे होनेवाला मेरा वध भी प्रशंसनीय ही होगा। मुनिश्रेष्ठ! यह समझकर जगन्नाथ गोविन्दके यहाँ समुपस्थित होनेपर आप मेरे दानमें विघ्न न डालें

English

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अध्याय २५

श्लोक 50

देव्युवाच ।किं पुण्यं तत्र विप्रेन्द्र लब्धासि त्वं पृथूदके ।पथि स्नानेन च फलं केषु किं लब्दवानसि

devyuvāca / kiṃ puṇyaṃ tatra viprendra labdhāsi tvaṃ pṛthūdake / pathi snānena ca phalaṃ keṣu kiṃ labdavānasi

हिन्दी अर्थ

लोमहर्षण बोले शुक्राचार्य और बलिमें इस प्रकार बात हो ही रही थी कि सर्वदेवमय, अचिन्त्य भगवान् अपनी मायासे अपना वामनरूप धारणकर वहाँ पहुँच गये। उन प्रभुको यज्ञस्थानमें उपस्थित देखकर हैत्यलोग उनके प्रभावसे अशान्त और तीव्र तेजसे रहित हो गये। उस महायज्ञमें एकत्र (उपस्थित) वसिष्ठ, विश्वामित्र, गर्ग एवं अन्य श्रेष्ठ मुनिजन अपना- अपना जप करने लगे। बलिने भी अपने सम्पूर्ण

English

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अध्याय २५

श्लोक 51

भिक्षुरुवाच ।मया स्नानं प्रयागे तु कृतं प्रथममेव हि ।ततो ऽथ तीर्थे कुब्जाम्रे जयन्ते चण्डिकेश्वरे

bhikṣuruvāca / mayā snānaṃ prayāge tu kṛtaṃ prathamameva hi / tato 'tha tīrthe kubjāmre jayante caṇḍikeśvare

हिन्दी अर्थ

जन्मको सफल माना; किंतु उसके बाद (इधर) खलबली मच गयी और संक्षुब्ध होनेके कारण किसीने कुछ भी नहीं कहा उनके देदीप्यमान तेजके कारण प्रत्येकने देवाधिदेवकी पूजा की। उसके बाद वामनरूपमें प्रत्यक्ष प्रकट हुए विष्णुभगवानूने लोगोंसे पूजित होनेके बाद एक दृष्टिसे (चारों ओर देखकर) उन विनम्र हैत्यपतिं एवं

English

Kasyapa, Aditi and all gods accepted unanimously the suggestion, bowed their heads in honour and marched towards north from the Svetadvlpa.

अध्याय २५

श्लोक 52

बन्धुवृन्दे च कर्कन्धे तीर्थे कनखले तथा ।सरस्वत्यामग्निकुण्डे भद्रायां तु त्रिविष्टपे

bandhuvṛnde ca karkandhe tīrthe kanakhale tathā / sarasvatyāmagnikuṇḍe bhadrāyāṃ tu triviṣṭape

हिन्दी अर्थ

अध्याय ३१ वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराट्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४५ देवदेवपतिः साक्षाद् विष्णुर्बामनरूपधृक् । तुष्टाव यज्ञं वह्निं च यजमानमथार्चित: । यज्ञकर्माधिकारस्थान् सदस्यान् द्रव्यसम्पदम्

English

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अध्याय २५

श्लोक 53

कोनटे कोटितीर्थे च कुब्जके च कृसोदरि ।निथ्कामेन कृतं स्नानं ततो ऽभ्यागां तवाश्रमम्

konaṭe koṭitīrthe ca kubjake ca kṛsodari / nithkāmena kṛtaṃ snānaṃ tato 'bhyāgāṃ tavāśramam

हिन्दी अर्थ

सदस्याः पात्रमखिलं वामनं प्रति तत्क्षणात्। यज्ञवाटस्थितं विप्राः साधु साध्वित्युदीरयन् स्त्रियो स्त्राण्यलंकारान् गावो ग्रामाश्च पुष्कलाः

English

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अध्याय २५

श्लोक 54

इहस्थां त्वां समाभाष्य गमिष्यामि पृथूदकम् ।पृच्छामि यदहं त्वां वै तत्र न क्रोद्धुमर्हसि

ihasthāṃ tvāṃ samābhāṣya gamiṣyāmi pṛthūdakam / pṛcchāmi yadahaṃ tvāṃ vai tatra na kroddhumarhasi

हिन्दी अर्थ

इत्युक्तो हैत्यपतिना प्रीतिगर्भान्वितं वचः। प्राह सस्मितगम्भीरं भगवान् वामनाकृतिः त्रिभिः प्रयोजनं किं ते पहैः पदवतां वर।

English

They all reached shortly the bank of K§Irasagara as suggested by lord Brahma.

अध्याय २५

श्लोक 55

अहं यत्तपसात्मानं शोषयामि कृशोदरि ।बाल्ये ऽपि संयततनुस्तत्तु श्लाघ्यं द्विजन्मनाम्

ahaṃ yattapasātmānaṃ śoṣayāmi kṛśodari / bālye 'pi saṃyatatanustattu ślāghyaṃ dvijanmanām

हिन्दी अर्थ

एतावता हैत्यपते कृतकृत्योऽस्मि मार्गणे। एतच्छुत्वा तु गदितं वामनस्य महात्मनः। वाचयामास वै तस्मै वामनाय महात्मने

English

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अध्याय २५

श्लोक 56

किमर्थं भवती रौद्रं प्रथमे वयसि स्थिता ।तपः समाश्रिता भीरु संशयः प्रतिभाति मे

kimarthaṃ bhavatī raudraṃ prathame vayasi sthitā / tapaḥ samāśritā bhīru saṃśayaḥ pratibhāti me

हिन्दी अर्थ

'पाणौ तु पतिते तोये वामनोऽभूदवामनः। सर्वदेवमयं रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् पादाङ्गुल्यः पिशाचास्तु हस्ताङ्गुल्यश्च गुह्यकाः

English

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अध्याय २५

श्लोक 57

प्रथमे वयसि स्त्रीणां सह भर्त्रा विलासिनि ।सुभोगा भोगिताः काले व्रजन्ति स्थिरयौवने

prathame vayasi strīṇāṃ saha bhartrā vilāsini / subhogā bhogitāḥ kāle vrajanti sthirayauvane

हिन्दी अर्थ

विश्वेदेवाश्च जानुस्था जङ्घे साध्याः सुरोत्तमाः। यक्षा नखेषु सम्भूता रेखास्वप्सरसस्तथा मुनिवरोंको देखा तथा यज्ञ, अग्नि, यजमान, यज्ञकर्ममें अधिकृत सदस्यों एवं द्रव्यकी सामग्रियोंकी प्रशंसा की। विप्रो! तत्काल ही सभी सदस्यगण यज्ञमण्डपमें उपस्थित पात्रस्वरूप वामनके प्रति 'साधु-साधु' कहने

English

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अध्याय २५

श्लोक 58

तपसा वाञ्छयन्तीह गिरिजे सचराचराः ।रूपाभिजनमैश्वर्यं तच्च ते विद्यते बहु

tapasā vāñchayantīha girije sacarācarāḥ / rūpābhijanamaiśvaryaṃ tacca te vidyate bahu

हिन्दी अर्थ

लगे। उस समय हर्षमें विहल होकर महासुर बलिने अर्घ लिया और गोविन्दकी पूजा की तथा उनसे यह कहा॥ ३७--४०॥ बलिने कहा-- (वामनदेव !) अनन्त सुवर्ण और रलरोंके ढेर तथा हाथी, घोड़े, स्त्रियाँ, वस्त्र, आभूषण,

English

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अध्याय २५

श्लोक 59

तत् किमर्थमपास्यैतानलङ्काराञ् जटा धृताः ।चीनांशुकं परित्यज्य किं त्वं वल्कलधारिणी

tat kimarthamapāsyaitānalaṅkārāñ jaṭā dhṛtāḥ / cīnāṃśukaṃ parityajya kiṃ tvaṃ valkaladhāriṇī

हिन्दी अर्थ

अथवा आपकी जो अभिलाषा हो वह मैं देता हूँ। आप अर्थ आपके लिये हैं

English

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अध्याय २५

श्लोक 60

पुलस्त्य उवाच ।ततस्तु तपसा वृद्धा देव्याः सोमप्रभा सखी ।भिक्षवे कथयामास यथावत् सा हि नारद

pulastya uvāca / tatastu tapasā vṛddhā devyāḥ somaprabhā sakhī / bhikṣave kathayāmāsa yathāvat sā hi nārada

हिन्दी अर्थ

हैत्यपति बलिके इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक उदार वचन कहनेपर वामनका आकार धारण करनेवाले भगवानूने हँसते हुए दुर्बोध वाणीमें कहा राजन्! मुझे अग्निशालाके लिये तीन पग (भूमि) दें। सुवर्ण, ग्राम एवं रत्र आदि उनकी इच्छा रखनेवाले याचकोंको प्रदान करें

English

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अध्याय २५

श्लोक 61

सोमप्रभोवाच ।तपश्चर्या द्विजश्रेष्ठ पार्वत्या येन हेतुना ।तं शृणुष्व त्वियं काली हरं भर्तारमिच्छति

somaprabhovāca / tapaścaryā dvijaśreṣṭha pārvatyā yena hetunā / taṃ śṛṇuṣva tviyaṃ kālī haraṃ bhartāramicchati

हिन्दी अर्थ

बलिने कहा-- है पदधारियोंमें श्रेष्ठ! तीन पग भूमिसे आपका कौन-सा स्वार्थ सिद्ध होगा। सौ अथवा सौ हजार पग भूमि आप माँगिये श्रीवामनने कहा-- है हैत्यपते! मैं इतना पानेसे ही कृतकृत्य हूँ। (मेरा स्वार्थ इतनेसे ही सिद्ध हो जायगा।) आप दूसरे याचना करनेवाले याचकोंको उनके इच्छानुकूल दान दीजियेगा। महात्मा वामनकी यह वाणी

English

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अध्याय २५

श्लोक 62

पुलस्त्य उवाच ।सोमप्रभाया वचनं श्रुत्वा संकम्प्य वै शिरः ।विहस्य च महाहासं भिक्षुराह वचस्त्विदम्

pulastya uvāca / somaprabhāyā vacanaṃ śrutvā saṃkampya vai śiraḥ / vihasya ca mahāhāsaṃ bhikṣurāha vacastvidam

हिन्दी अर्थ

सुनकर (बलिने) उन महात्मा वामनको तीन पग भूमि देनेके लिये वचन दे दिया। दान देनेके लिये हाथपर जल गिरते ही वामन अवामन (विराट्) बन गये। तत्क्षण उन्होंने उन्हें अपना सर्वदेवमय स्वरूप दिखाया। चन्द्र और सूर्य उनके दोनों नेत्र, आकाश सिर, पृथ्वी दोनों चरण, पिशाच पैरकी अँगुलियाँ एवं गुह्यक हाथोंकी अँगुलियाँ थे

English

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अध्याय २५

श्लोक 63

भिक्षुरुवाच।।वदामि ते पार्वति वाक्यमेवं केन प्रदत्ता तव बुद्धिरेषा ।कथं करः पल्लवकोमलस्ते समेष्यते शार्वकरं ससर्पम्

bhikṣuruvāca/ / vadāmi te pārvati vākyamevaṃ kena pradattā tava buddhireṣā / kathaṃ karaḥ pallavakomalaste sameṣyate śārvakaraṃ sasarpam

हिन्दी अर्थ

जानुओंमें विश्वेदेवगण, दोनों जङ्घाओंमें सुरश्रेष्ठ साध्यगण, नखोंमें यक्ष एवं रेखाओंमें अप्सराएँ थीं।

English

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अध्याय २५

श्लोक 64

तथा दुकूलाम्बरशालिनी त्वं मृगारिचर्माभिवृतस्तु रुद्रः ।त्वं चन्दनाक्ता स भस्मभूषितो न युक्तरूपं प्रतिभाति मे त्विदम्

tathā dukūlāmbaraśālinī tvaṃ mṛgāricarmābhivṛtastu rudraḥ / tvaṃ candanāktā sa bhasmabhūṣito na yuktarūpaṃ pratibhāti me tvidam

हिन्दी अर्थ

दृष्टिऋक्षाण्यशेषाणि केशाः सूर्याशव: प्रभोः । तारका रोमकूपाणि रोमेषु च महर्षयः अश्विनौ श्रवणे तस्य नासा वायुर्महात्मनः

English

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अध्याय २५

श्लोक 65

पुलस्त्य उवाच ।एवं वादिनि विप्रेन्द्र पार्वती भिक्षुमब्रवीत् ।मा मैवं वद बिक्षो त्वं हरः सर्वगुणाधिकः

pulastya uvāca / evaṃ vādini viprendra pārvatī bhikṣumabravīt / mā maivaṃ vada bikṣo tvaṃ haraḥ sarvaguṇādhikaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रसादे चन्द्रमा देवो मनो धर्मः समाश्रितः। सत्यमस्याभवद् वाणी जिह्वा देवी सरस्वती हृदयं च परं ब्रह्म पुंस्त्वं वै कश्यपो मुनिः

English

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अध्याय २५

श्लोक 66

शिवो वाप्यथवा भीमः सधनो निर्धनो ऽपि वा ।अलङ्कृतो वा देवेशस्तथा वाप्यनलङ्कृतः

śivo vāpyathavā bhīmaḥ sadhano nirdhano 'pi vā / alaṅkṛto vā deveśastathā vāpyanalaṅkṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

पृष्ठेऽस्य वसवो देवा मरुतः सर्वसन्धिषु । वक्षःस्थले तथा रुद्रो धैर्य चास्य महार्णवः लक्ष्मीमेंधा धृतिः कान्तिः सर्वविद्याश्च वै कटिः

English

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अध्याय २५

श्लोक 67

यादृशस्तादृशो वापि स मे नाथो भविष्यति ।निवार्यतामयं भिक्षुर्विवक्षुः स्फुरिताधरः ।न तथा निन्दकः पापी यथा शृण्वन् शशिप्रभे

yādṛśastādṛśo vāpi sa me nātho bhaviṣyati / nivāryatāmayaṃ bhikṣurvivakṣuḥ sphuritādharaḥ / na tathā nindakaḥ pāpī yathā śṛṇvan śaśiprabhe

हिन्दी अर्थ

तस्य देवाधिदेवस्य तेजः प्रोद्धूतमुत्तमम् ततस्य देवमयं रूपं दृष्टा विष्णोर्महात्मनः। उपसर्पन्ति ते हैत्याः पतङ्गा इव पावकम्

English

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अध्याय २५

श्लोक 68

पुलस्त्य उवाच ।इत्येवमुक्त्वा वरदा समुत्थातुमथैच्छत ।ततो ऽत्यजद् भिक्षुरूपं स्वरूपस्थो ऽभवच्छिवः

pulastya uvāca / ityevamuktvā varadā samutthātumathaicchata / tato 'tyajad bhikṣurūpaṃ svarūpastho 'bhavacchivaḥ

हिन्दी अर्थ

चिक्षुरस्तु महाहैत्यः पादाङ्गुष्ठं गृहीतवान् दन्ताभ्यां तस्य वै ग्रीवामङ्गष्ठेनाहनद्धरिः कृत्वा रूपं महाकायं संजहाराशु मेदिनीम्

English

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अध्याय २५

श्लोक 69

भूत्वोवाच प्रिये गच्छ स्वमेव भवनं पितुः ।तवार्थाय प्रहेष्यामि महर्षिन् हिमवद्गृहे

bhūtvovāca priye gaccha svameva bhavanaṃ pituḥ / tavārthāya praheṣyāmi maharṣin himavadgṛhe

हिन्दी अर्थ

पर॑ विक्रममाणस्य जानुमूले प्रभाकरौ। विष्णोरास्तां स्थितस्यैतौ देवपालनकर्मणि जित्वा लोकत्रयं तांश्च हत्वा चासुरपुंगवान्। पुरंदराय त्रैलोक्यं ददौ विष्णुरुरुक्रमः

English

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अध्याय २५

श्लोक 70

यच्चेह रुद्रमीहन्त्या मृन्मयश्चेश्वरः कृतः ।असौ भद्रेश्वरेत्येवं ख्यातो लोके भविष्यति

yacceha rudramīhantyā mṛnmayaśceśvaraḥ kṛtaḥ / asau bhadreśvaretyevaṃ khyāto loke bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

समस्त नक्षत्र उनकी दृष्टियाँ, सूर्यकिरणें प्रभुके केश, तारकाएँ उनके रोमकूप एवं महर्षिगण रोमोंमें स्थित थे। विदिशाएँ उनकी बाहे, दिशाएँ उन महात्माके कर्ण, दोनों अश्विनीकुमार श्रवण एवं वायु उन महात्माके नासिका-स्थानपर थे। उनके प्रसादमें (मधुर हास्यछटामें) चन्द्रदेव तथा मनमें धर्म आश्रित थे। सत्य उनकी वाणी तथा जिह्वा सरस्वतीदेवी थीं

English

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अध्याय २५

श्लोक 71

देवदानवगन्धर्वा यक्षाः किंपुरुषोरगाः ।पूजयिष्यन्ति सततं मानवाश्च शुभेप्सवः

devadānavagandharvā yakṣāḥ kiṃpuruṣoragāḥ / pūjayiṣyanti satataṃ mānavāśca śubhepsavaḥ

हिन्दी अर्थ

देवमाता अदिति उनकी ग्रीवा, विद्या उनकी बलियाँ, स्वर्गद्वार उनकी गुदा तथा त्वष्टा एवं पूषा उनकी भौँहें थे। वैश्वानर उनके मुख तथा प्रजापति वृषण थे। परंब्रह्म उनके हृदय तथा कश्यप मुनि उनके पुंस्त्व थे। उनकी पीठमें बसु देवता, सभी सन्धियोंमें मरुद्गण, वक्षःस्थलमें रुद्र तथा उनके धैर्यमें महार्णव आश्रित थे। उनके उदरमें गन्धर्व एवं महाबली मरुद्गण स्थित थे। लक्ष्मी, मेधा, धृति, कान्ति एबं सभी विद्याएँ उनकी

English

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अध्याय २५

श्लोक 72

इत्येवमुक्ता देवेन गिरिराजसुता मुने ।जगामाम्बरमाविश्य स्वमेव भवनं पितुः

ityevamuktā devena girirājasutā mune / jagāmāmbaramāviśya svameva bhavanaṃ pituḥ

हिन्दी अर्थ

'कटिमें स्थित थीं॥ ५४--५७॥ देवाधिदेवके उत्तम तेज थे। उनके शरीर एवं कुक्षियोंमें वेद थे तथा बड़े-बड़े यज्ञ इष्टियाँ थीं, पशु एवं ब्राह्मणोंकी चेष्टाएँ उनकी दोनों जानुएँ थीं। उन महात्मा विष्णुके सर्वदेवमय रूपको देखकर वे हैत्य

English

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अध्याय २५

श्लोक 73

शङ्करो ऽपि महातेजा विसृज्य किरिकन्यकाम् ।पृथूदकं जगामाथ स्नानं चक्रे विधानतः

śaṅkaro 'pi mahātejā visṛjya kirikanyakām / pṛthūdakaṃ jagāmātha snānaṃ cakre vidhānataḥ

हिन्दी अर्थ

उनके निकट उसी प्रकार जाते थे, जिस प्रकार अणिके निकट पतिंगे जाते हैं। महाहैत्य चिक्षुरने दाँतोंसे उनके पैरके अँगूठेको दबोच लिया। फिर भगवानूने अँगूठेसे उसकी ग्रीवापर प्रहार किया और-- अपने पैरों एवं हाथोंके तलवोंसे समस्त असुरोंको रगड़ डाला तथा विराट् शरीर धारण करके शीघ्र ही उन्होंने पृथ्वीको उनसे छीन लिया। भूमिको नापते समय चन्द्र और सूर्य उनके स्तनोंके मध्य स्थित थे तथा

English

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अध्याय २५

श्लोक 74

ततस्तु देवप्रवरो महेश्वरः पृथूदके स्नानमपास्तकल्मषः ।कृत्वा सनन्दिः सगणः सवाहनो महागिरिं मन्दरमाजगाम

tatastu devapravaro maheśvaraḥ pṛthūdake snānamapāstakalmaṣaḥ / kṛtvā sanandiḥ sagaṇaḥ savāhano mahāgiriṃ mandaramājagāma

हिन्दी अर्थ

आकाशके नापते समय उनके सक्थिप्रदेश (जाँघ)-में स्थित हो गये एवं परम (ऊर्ध्व) लोकका अतिक्रमण करते समय देवताओंकी रक्षा करनेमें स्थित श्रीविष्णुके जानुमूल (घुटनेके स्थान)-में चन्द्र एवं सूर्य स्थित हो गये। उरुक्रम (लंबी डगोंवाले) विष्णुने तीनों लोकोंको जीतकर एवं उन बड़े-बड़े असुरोंका वध कर तीनों लोक इन्द्रको दे दिये

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अध्याय २५

श्लोक 75

आयाति त्रिपुरान्तके सह गणैर्ब्रह्मर्षिभिः सप्तभिरारोहत्पुलको बभौ गिरिवरः संहृष्टतित्तः क्षणात् ।चक्रे दिव्यफलैर्जलेन शुचिना मूलैश्च कन्दादिभिः पूजां सर्वगणेश्वरैः सह विभोरद्रिस्त्रिनेत्रस्य तु

āyāti tripurāntake saha gaṇairbrahmarṣibhiḥ saptabhirārohatpulako babhau girivaraḥ saṃhṛṣṭatittaḥ kṣaṇāt / cakre divyaphalairjalena śucinā mūlaiśca kandādibhiḥ pūjāṃ sarvagaṇeśvaraiḥ saha vibhoradristrinetrasya tu

हिन्दी अर्थ

अध्याय ३९ वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराट्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४७ बलेर्दत्तं भगवता विष्णुना प्रभविष्णुना

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/1_sanskr/3_purana/vamp__u.htm | https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_vAmanapurANasaromAhAtmya.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता · Identifier:

Vamana Purana — Chapter 25

वामनपुराण

संस्कृत संस्करण · Sanskrit Edition:

Imported text; printed edition not recorded

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प्रकाशक अथवा पुरालेखागार · Archive:

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गणना पद्धति टिप्पणी · Numbering System:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.