Narasimha Purana· Nṛsiṁha Purāṇa
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अध्याय 21 / 68

Adhyaya 21

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पूर्ण अध्याय पाठ17 श्लोक

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अध्याय २१

श्लोक 1

॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे विंशतितमो ऽध्याय ॥ नर्प् २० ॥ अनुसर्गश् च सर्गश् च त्वया चित्रा कथेरिता वंशमन्वन्तरे ब्रूहि वंशानुचरितं च मे

|| iti śrīnarasiṃhapurāṇe viṃśatitamo 'dhyāya || narp 20 || anusargaś ca sargaś ca tvayā citrā katheritā vaṃśamanvantare brūhi vaṃśānucaritaṃ ca me

हिन्दी अर्थ

उनके इस प्रकार कहनेपर राजाके हितमें सदा लगे रहनेवाले सर्वधर्मज्ञ मुनिवर वसिष्ठजीने तपमें आसक्तचित्त उन नरेशसे कहा--' महाराज! यदि तुम परमात्मा नारायणका साक्षात्कार करना चाहते हो तो तपस्या और शुभकर्मोके द्वारा उन भगवान् जनार्दनकी आराधना करो। कोई भी पुरुष तपस्या किये बिना देवदेव जनार्दनका दर्शन नहीं पा सकता। इसलिये तुम तपस्याके द्वारा उनका पूजन करो। यहाँसे पाँच योजन दूर सरयूके तटपर पूर्व और दक्षिण

English

Description of Suryavamsa

अध्याय २१

श्लोक 2

राज्ञां वंशः पुराणेषु विस्तरेण प्रकीर्तितः संक्षेपात् कथयिष्यामि वंशमन्वन्तराणि ते

rājñāṃ vaṃśaḥ purāṇeṣu vistareṇa prakīrtitaḥ saṃkṣepāt kathayiṣyāmi vaṃśamanvantarāṇi te

हिन्दी अर्थ

भागमें एक पवित्र स्थान है, जहाँ गालव आदि ऋषियोंका स्वराज्यभारं विन्यस्य कर्मकाण्डमपि द्विज

English

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अध्याय २१

श्लोक 3

वंशानुचरितं चैव शृणु विप्र महामते शृण्वन्तु मुनयश् चेमे श्रोतुम् आगत्य ये स्थिताः

vaṃśānucaritaṃ caiva śṛṇu vipra mahāmate śṛṇvantu munayaś ceme śrotum āgatya ye sthitāḥ

हिन्दी अर्थ

ध्यायन् नारायणं देवमिमं मन्त्रं सदा जप 3७ नमो भगवते वासुदेवाय। एष सिद्धिकरो मन्त्रो द्वादशाक्षरसंज्ञितः।

English

Bharadvaja said- Suta, you told about Sarga and Anusarga, highlighted the eccentric stories, and it is requested that a description on the dynasty of kings, Manvantara and the clanology (Varhs'anucai'ita) should also be added so that all of us could know this all.

अध्याय २१

श्लोक 4

आदौ तावद् ब्रह्मा ब्रह्मणो मरीचिः ।मरीचेः कश्यपः कश्यपाद् आदित्यः

ādau tāvad brahmā brahmaṇo marīciḥ | marīceḥ kaśyapaḥ kaśyapād ādityaḥ

हिन्दी अर्थ

अद्यापि न निवर्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः इत्येवमुक्तो मुनिना स राजा

English

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अध्याय २१

श्लोक 5

ःआदित्यान् मनुः ।ःमनोर् इक्ष्वाकुः इक्ष्वाकोर् विकुक्षिः ।ःविकुक्षेर् द्योतः द्योताद् वेनो वेनात् पृथुः पृथोः पृथाश्वः

ḥādityān manuḥ | ḥmanor ikṣvākuḥ ikṣvākor vikukṣiḥ | ḥvikukṣer dyotaḥ dyotād veno venāt pṛthuḥ pṛthoḥ pṛthāśvaḥ

हिन्दी अर्थ

गतः पुरात् स्वात् तपसे धृतात्मा आश्रम है। वह स्थान नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त तथा विविध भाँतिके पुष्पोंसे परिपूर्ण है। राजन्! अपने बुद्धिमान् एवं नीतिज्ञ मन्त्री अर्जुनको राज्यका भार तथा सारा कार्य-कलाप सौंप, तत्पश्चात्

English

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अध्याय २१

श्लोक 6

पृथाश्वाद् असंख्याताश्वः ।असंख्याताश्वान् मान्धाता

pṛthāśvād asaṃkhyātāśvaḥ | asaṃkhyātāśvān māndhātā

हिन्दी अर्थ

गणनायक भगवान् विनायककी स्तुति एवं आराधना करके तपस्याकी सिद्धिरूप प्रयोजनकी इच्छा मनमें लेकर यहाँसे उस आश्रमकी यात्रा करो और वहाँ पहुँचकर तपस्यामें संलग्न हो जाओ। तपस्वीका वेष धारणकर, साग और फल-मूलका आहार करते हुए, भगवान् नारायणके ध्यानमें तत्पर रहकर सदा ही ' ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।'--इस मन्त्रका जप करो। यह 'द्वादशाक्षर'-संज्ञक मन्त्र अभीष्टको सिद्ध

English

Suta said- The royal dynasty has been described in detail in the womb of Puranas but I will tell you in brief, the dynasty of kings, Manvantara and Vamsanucarita here. O learned Brahmin, listen to this description with all hermits gathered here for the same.

अध्याय २१

श्लोक 7

मान्धातुः पुरुकुत्सः पुरुकुत्साद् दृषदो दृषदाद् अभिशंभुः

māndhātuḥ purukutsaḥ purukutsād dṛṣado dṛṣadād abhiśaṃbhuḥ

हिन्दी अर्थ

करनेवाला है। प्राचीन कालके ऋषियोंने इस मन्त्रका जप करके परम सिद्धि प्राप्त की है। चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रह जा-जाकर पुनः लौट आते हैं, परंतु द्वादशाक्षर-मन्त्रका चिन्तन करनेवाले पुरुष आजतक नहीं लौटे-भगवानूको पाकर आवागमनसे मुक्त हो गये। नरेश्वर! बाह्य इन्द्रियोंको हृदयमें स्थापितकर तथा मनको सूक्ष्म परात्मतत्त्वमें स्थिर करके इस मन्त्रका जप करो; इससे तुम्हें भगवान् मधुसूदनका दर्शन होगा। इस

English

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अध्याय २१

श्लोक 8

अभिशंभोर् दारुणो दारुणात् सगरः

abhiśaṃbhor dāruṇo dāruṇāt sagaraḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकार इस समय तुम्हारे पूछनेपर मैंने तपरूप कर्मसे भगवानूकी प्रापिका उपाय बतलाया; अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, करो' मुनिवर वसिष्ठके इस प्रकार कहनेपर वे राजा इक्ष्वाकु अपने श्रेष्ठ मन्त्रीको भूमण्डलके राज्यका भार सौंपकर, पुष्मोंद्वारा गणेशजीका पूजन तथा स्तवन करके, तपस्या करनेका दृढ़ निश्चय मनमें लेकर, अपने

English

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अध्याय २१

श्लोक 9

सगराद् धर्यश्वो हर्यश्वाद् धारीतः

sagarād dharyaśvo haryaśvād dhārītaḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीनरसिंहयुराणे इक्ष्वाकुचरित्रे चतुर्विशोऽध्यायः इक्ष्वाकुको तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुप्रतिमाकी प्राप्ति

English

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अध्याय २१

श्लोक 10

हारीताद् रोहिताश्वो रोहिताश्वाद् अंशुमान् ।अंशुमतो भगीरथः

hārītād rohitāśvo rohitāśvād aṃśumān | aṃśumato bhagīrathaḥ

हिन्दी अर्थ

भरद्वाजजीने पूछा-महामते! उन महात्मा राजाने किस प्रकार गणेशजीका स्तवन किया ? तथा उन्होंने जिस यथा तेन तपस्तसं तन्मे वद महामत्ते॥ ९ प्रकार तपस्या की, उसका आप मुझसे वर्णन करें

English

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अध्याय २१

श्लोक 11

भगीरथात् सौदासः सौदासाच् छत्रुंदमः

bhagīrathāt saudāsaḥ saudāsāc chatruṃdamaḥ

हिन्दी अर्थ

चतुर्थीदिवसे राजा स्नात्वा त्रिषवणं द्विज। रक्ताम्ब्रधरो भूत्वा रक्तगन्धानुलेपनः नमस्कृत्य महादेवं स्तोष्येऽहं तं विनायकम्

English

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अध्याय २१

श्लोक 12

शत्रुंदमाद् अनरण्यः अनरण्याद् दीर्घबाहुः दीर्घबाहोर् अजः

śatruṃdamād anaraṇyaḥ anaraṇyād dīrghabāhuḥ dīrghabāhor ajaḥ

हिन्दी अर्थ

आम्बिकेय शूर्पकर्णं प्रचण्डं च विनायकम् आरक्तं दण्डिनं चैव वह्निवक्त्रं हुतप्रियम्। अनर्चितो विघ्नकरः सर्वकार्येषु यो नृणाम्

English

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अध्याय २१

श्लोक 13

अजाद् दशरथः ।दशरथाद् रामः रामाल् लवः लवात् पद्मः

ajād daśarathaḥ | daśarathād rāmaḥ rāmāl lavaḥ lavāt padmaḥ

हिन्दी अर्थ

सूर्यकोटिप्रतीकाशं भिन्नाञ्नसमप्रभम्। बुद्धं सुनिर्मलं शान्तं नमस्यामि विनायकम् विरूपाय नमस्तेऽस्तु नमस्ते ब्रह्मचारिणे। भक्तस्तुताय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक

English

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अध्याय २१

श्लोक 14

पद्माद् अनुपर्णः ।अनुपर्णाद् वस्त्रपाणिः

padmād anuparṇaḥ | anuparṇād vastrapāṇiḥ

हिन्दी अर्थ

त्वया पुराण पूर्वेषां देवानां कार्यसिद्धये। गजरूपं समास्थाय त्रासिताः सर्वदानवाः इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुप्रतिमाकी प्राप्ति

English

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अध्याय २१

श्लोक 15

ःवस्त्रपाणेः शुद्धोदनः ।ःशुद्धोदनाद् बुधः ।ःबुधाद् आदित्यवंशो निवर्तते

ḥvastrapāṇeḥ śuddhodanaḥ | ḥśuddhodanād budhaḥ | ḥbudhād ādityavaṃśo nivartate

हिन्दी अर्थ

सूतजी बोले-द्विज! गणेश-चतुर्थीके दिन राजाने त्रिकाल स्नान करके रक्तवस्त्र धारण किया और लाल चन्दन लगाकर मनोहर लाल फूलों तथा रक्तचन्दनमिश्रित जलसे गणेशजीको स्नान कराके विधिवत् उनका पूजन किया। स्नान करानेके बाद उनके श्रीअङ्गोंमें लाल चन्दन लगाया। फिर रक्तपुष्पोंसे उनकी पूजा की। तदनन्तर उन्हें घृत और चन्दन मिला हुआ धूप निवेदन किया। अन्तमें हल्दी, घी और गुडखण्डके मेलसे तैयार

English

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अध्याय २१

श्लोक 16

सूर्यवंशभवास् ते प्राधान्येन प्रकीर्तिताः ।* यैर् इयं पृथिवी भुक्ता धर्मतः क्षत्रियैः पुरा

sūryavaṃśabhavās te prādhānyena prakīrtitāḥ /* yair iyaṃ pṛthivī bhuktā dharmataḥ kṣatriyaiḥ purā

हिन्दी अर्थ

किया हुआ मधुर नैवेद्य अर्पण किया। इस प्रकार सुन्दर विधिपूर्वक भगवान् विनायकका पूजन करके राजाने उनकी स्तुति आरम्भ की इक्ष्वाकु बोले--मैं महान् देव गणेशजीको प्रणाम करके उन विश्नराजका स्तवन करता हूँ, जो महान् देवता एवं गर्णोके स्वामी हैं, शूरवीर तथा अपराजित हैं और ज्ञानवृद्धि करानेवाले हैं। जो एक, दो तथा चार दाँतोंवाले

English

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अध्याय २१

श्लोक 17

सूर्यस्य वंशः कथितो मया मुने समुद्गता यत्र नरेश्वराः पुरा मयोच्यमानाञ् छशिनः समाहितः शृणुष्व वंशे ऽथ नृपान् अनुत्तमान्

sūryasya vaṃśaḥ kathito mayā mune samudgatā yatra nareśvarāḥ purā mayocyamānāñ chaśinaḥ samāhitaḥ śṛṇuṣva vaṃśe 'tha nṛpān anuttamān

हिन्दी अर्थ

हैं, जिनकी चार भुजाएँ हैं, जो तीन नेत्रोंसे युक्त और हाथमें त्रिशूल धारण करते हैं, जिनके नेत्र रक्तवर्ण हैं, जो वर देनेवाले हैं, जो माता पार्वतीके पुत्र हैँ, जिनके सूप-जैसे कान हैँ, जिनका वर्ण कुछ-कुछ लाल है, जो दण्डधारी तथा अग्निमुख हैँ एवं जिन्हें होम प्रिय है तथा जो प्रथम पूजित न होनेपर मनुष्योके सभी कार्योमें विन्नकारी होते हैं, उन भीमकाय और उग्र स्वभाववाले पार्वतीनन्दन गणेशजीको मैं नमस्कार करता हूँ। जो

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_narasiMhapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता · Identifier:

Narasimha Purana — Chapter 21

नृसिंहपुराण

संस्कृत संस्करण · Sanskrit Edition:

Imported text; printed edition not recorded

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प्रकाशक अथवा पुरालेखागार · Archive:

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गणना पद्धति टिप्पणी · Numbering System:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.