अध्याय २१
श्लोक 1
॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे विंशतितमो ऽध्याय ॥ नर्प् २० ॥ अनुसर्गश् च सर्गश् च त्वया चित्रा कथेरिता वंशमन्वन्तरे ब्रूहि वंशानुचरितं च मे
|| iti śrīnarasiṃhapurāṇe viṃśatitamo 'dhyāya || narp 20 || anusargaś ca sargaś ca tvayā citrā katheritā vaṃśamanvantare brūhi vaṃśānucaritaṃ ca me
हिन्दी अर्थ
उनके इस प्रकार कहनेपर राजाके हितमें सदा लगे रहनेवाले सर्वधर्मज्ञ मुनिवर वसिष्ठजीने तपमें आसक्तचित्त उन नरेशसे कहा--' महाराज! यदि तुम परमात्मा नारायणका साक्षात्कार करना चाहते हो तो तपस्या और शुभकर्मोके द्वारा उन भगवान् जनार्दनकी आराधना करो। कोई भी पुरुष तपस्या किये बिना देवदेव जनार्दनका दर्शन नहीं पा सकता। इसलिये तुम तपस्याके द्वारा उनका पूजन करो। यहाँसे पाँच योजन दूर सरयूके तटपर पूर्व और दक्षिण
English
Description of Suryavamsa