Kurma Purana· Kūrma Purāṇa
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अध्याय 36 / 95

Book 1 - Adhyaya 36

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अध्याय ३६

श्लोक 1

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्र्यां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चत्रिंशो ऽध्यायः मार्कण्डेय उवाच षष्टिस्तीर्थसहस्त्राणि षष्टिस्तीर्थशतानि च ।माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायमुनसंगमम्

iti śrīkūrmapurāṇe ṣaṭsāhastryāṃ saṃhitāyāṃ pūrvavibhāge pañcatriṃśo 'dhyāyaḥ mārkaṇḍeya uvāca ṣaṣṭistīrthasahastrāṇi ṣaṣṭistīrthaśatāni ca / māghamāse gamiṣyanti gaṅgāyamunasaṃgamam

हिन्दी अर्थ

यथोक्तकारिणः सर्वे सर्वे भूतहिते रताः यजन्ति विविधेर्यज्ञेत्रह्माणं परमेष्ठिनम्। तेषां च ब्रह्मसायुज्यं सारूप्यं च सलोकता

English

O excellent Brahmanas, on one occasion while he stayed there, Vyasa, of unmeasured splendour wandered for the sake of alms but he did not get anything.

अध्याय ३६

श्लोक 2

गवां शतसहस्त्रस्य सम्यग् दत्तस्य यत् फलम् ।प्रयागे माघमासे तु त्र्यहं स्नातस्य तत् फलम्

gavāṃ śatasahastrasya samyag dattasya yat phalam / prayāge māghamāse tu tryahaṃ snātasya tat phalam

हिन्दी अर्थ

क्रौञ्चो वामनकश्चैव तृतीयश्चान्धकारकः। देवावृच्य विविन्दश्च पुण्डरीकस्तथैव च।

English

Then the sage was overwhelmed by great anger. He said "I shall create obstacles for all men staying here whereby their achievement will become deficient."

अध्याय ३६

श्लोक 3

गङ्गायमुनयोर्मध्ये कार्षाग्निं यस्तु साधयेत् ।अहीनाङ्गो ऽप्यरोगश्च पञ्चेन्द्रियसमन्वितः

gaṅgāyamunayormadhye kārṣāgniṃ yastu sādhayet / ahīnāṅgo 'pyarogaśca pañcendriyasamanvitaḥ

हिन्दी अर्थ

ख्यातिश्च पुण्डरीका च नद्यः प्राधान्यतः स्मृताः पुष्कराः पुष्कला धन्यास्तिष्यास्तस्य क्रमेण वै।

English

At the very same instant, the great goddess, the sharer of half the body of Sankara, assumed human form and appeared there out of affection.

अध्याय ३६

श्लोक 4

यावन्ति रोमकूपाणि तस्य गात्रेषु मानद ।तावद् वर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोके महीयते

yāvanti romakūpāṇi tasya gātreṣu mānada / tāvad varṣasahastrāṇi svargaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

तथा ककुद्वान्-ये सात (कुल) पर्वत हैं। योनी, तोया,

English

Then the great goddess told him again—"O sage, since you are irascible, you must not stay here as you are always ungrateful."

अध्याय ३६

श्लोक 5

ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत् ।स भुक्त्वा विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं भजते पुनः

tataḥ svargāt paribhraṣṭo jambūdvīpapatirbhavet / sa bhuktvā vipulān bhogāṃstat tīrthaṃ bhajate punaḥ

हिन्दी अर्थ

हे द्विजो! इस (शाल्मलि) द्वीपमें ब्राह्मण कपिल वर्णके और क्षत्रिय अरुण वर्णके कहे गये हैं। वैश्य पीतवर्णके तथा वृषल (शूद्र) कृष्ण वर्णके बतलाये गये हैं। शाल्मलद्वीपके दुगुने विस्तारमें चारों ओरसे सुरोदसागरको

English

Thus addressed, the holy lord realised the great goddess Siva through meditation. With humility he bowed down, eulogised her with excellent hymns and said:

अध्याय ३६

श्लोक 6

जलप्रवेशं यः कुर्यात् संगमे लोकविश्रुते ।राहुग्रस्तो यथा सोमो विमुक्तः सर्वपातकैः

jalapraveśaṃ yaḥ kuryāt saṃgame lokaviśrute | rāhugrasto yathā somo vimuktaḥ sarvapātakaiḥ

अध्याय ३६

श्लोक 7

सोमलोकमवाप्नोति सोमेन सह मोदते ।षष्टिं वर्षसहस्त्राणि षष्टिं वर्षशतानि च

somalokamavāpnoti somena saha modate / ṣaṣṭiṃ varṣasahastrāṇi ṣaṣṭiṃ varṣaśatāni ca

हिन्दी अर्थ

आवेष्टित कर कुशद्वीप स्थित है। विद्रुम, हेम, द्युतिमान्, पर्वत हैं । यहाँ धुतपापा, शिवा, पवित्रा, संमता, विद्युदम्भा और मही (नामक) जलसे पूर्ण नदियाँ हैं ॥ १८--२१॥

English

O Sankari, be pleased to permit me to enter the city on the Astami and Caturdasi (eighth and the fourteenth) day." saying 'so be it', the goddess permitted him and disappeared.

अध्याय ३६

श्लोक 8

स्वर्गतः शक्रलोके ऽसौ मुनिगन्धर्वसेवितः ।ततो भ्रष्टस्तु राजेन्द्र समृद्धे जायते कुले

svargataḥ śakraloke 'sau munigandharvasevitaḥ / tato bhraṣṭastu rājendra samṛddhe jāyate kule

हिन्दी अर्थ

हे विप्रो! यहाँ मणिके समान स्वच्छ जलवाली अन्य भी सैकड़ों नदियाँ हैं। इनमें देवता आदि ईशान ब्रह्माकी उपासना करते हैं। विप्रो! वहाँके ब्राह्मण द्रविण,

English

Thus the holy sage Vyasa, the ancient great Yogi realised the good points of the holy centre, and stayed near it.

अध्याय ३६

श्लोक 9

अधः शिरास्त्वयोधारामुर्ध्वपादः पिबेन्नरः ।शतं वर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोके महीयते

adhaḥ śirāstvayodhārāmurdhvapādaḥ pibennaraḥ / śataṃ varṣasahastrāṇi svargaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

हैं । यहाँके सभी लोग विशिष्ट ज्ञानसे सम्पन्न, मैत्री आदि गुणोंसे समन्वित, विहित कर्माको करनेवाले तथा सभी प्राणियोंके हित-चिन्तनमें लगे रहते हैं। ये विविध यज्ञोंद्वारा परमेष्ठी ब्रह्माका यजन करते हैं और उन्हें ब्रह्माका सायुज्य, सारूप्य तथा सालोक्य (मोक्ष) प्राप्त होता है

English

It is after knowing that Vyasa was stationed in the holy centre, that the learned men resorted to it. Hence a man should by all means, reside in Varanasi.

अध्याय ३६

श्लोक 10

तस्माद् भ्रष्टस्तु राजेन्द्र अग्निहोत्री भवेन्नरः ।भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तत् तीर्थं भजते पुनः

tasmād bhraṣṭastu rājendra agnihotrī bhavennaraḥ / bhuktvā tu vipulān bhogāṃstat tīrthaṃ bhajate punaḥ

हिन्दी अर्थ

हे विप्रो! कुशद्वीपके दुगुने विस्तारमें चारों ओर घृतसमुद्रको आवेष्टित करके क्रौञ्चद्वीप स्थित है। क्रौञ्च, वामनक, अन्धकारक, देवावृत्, विविन्द, पुण्डरीक तथा दुन्दुभिस्वन नामक सात पर्वत यहाँ कहे गये

English

He who reads the greatness of Avimukta, listens to it or narrates it to the quiescent Brahmanas, attains the Supreme goal.

अध्याय ३६

श्लोक 11

यः स्वदेहं विकर्तेद् वा शकुनिभ्यः प्रयच्छति ।विहगैरुपभुक्तस्य शृणु तस्यापि यत्फलम्

yaḥ svadehaṃ vikarted vā śakunibhyaḥ prayacchati / vihagairupabhuktasya śṛṇu tasyāpi yatphalam

हिन्दी अर्थ

हैं। गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति तथा पुण्डरीक-ये प्रधान नदियाँ यहाँ कही गयी हैं। क्रमशः पुष्कर, पुष्कल, धन्य तथा तिष्य नामसे यहाँ कहे जाते हैं

English

Cf. Mt. 5, 111.14, NP. II. 63.127-28.

अध्याय ३६

श्लोक 12

शतं वर्षसहस्त्राणि सोमलोके महीयते ।ततस्तस्मात् परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः

śataṃ varṣasahastrāṇi somaloke mahīyate / tatastasmāt paribhraṣṭo rājā bhavati dhārmikaḥ

हिन्दी अर्थ

अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभि: । व्रतोपवासैर्विविधैरहोमैः स्वाध्यायतर्पणैः

English

Cf. Mt. 5, 111.14, NP. II. 63.127-28.

अध्याय ३६

श्लोक 13

गुणवान् रूपसंपन्नो विद्वान् सुप्रियवाक्यवान् ।भुक्त्वा तु विपुलान् भोगांस्तततीर्थं भजते पुनः

guṇavān rūpasaṃpanno vidvān supriyavākyavān / bhuktvā tu vipulān bhogāṃstatatīrthaṃ bhajate punaḥ

हिन्दी अर्थ

सलोकता च सामीप्यं जायते तत्प्रसादतः उदयो रैवतश्चैव श्यामाकोऽस्तगिरिस्तथा। आम्बिकेयस्तथा रम्यः केशरी चेति पर्वताः

English

Cf. Mt. 5, 111.14, NP. II. 63.127-28.

अध्याय ३६

श्लोक 14

उत्तरे यमुनातीरे प्रयागस्य तु दक्षिणे ।ऋणप्रमोचनं नाम तीर्थं तु परमं स्मृतम्

uttare yamunātīre prayāgasya tu dakṣiṇe / ṛṇapramocanaṃ nāma tīrthaṃ tu paramaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

सुकुमारी कुमारी च नलिनी रेणुका तथा। इक्षुका धेनुका चैव गभस्तिश्चेति निम्नगाः

English

Cf. Mt. 5, 111.14, NP. II. 63.127-28.

अध्याय ३६

श्लोक 15

एकरात्रोषितः स्नात्वा ऋणैस्तत्र प्रमुच्यते ।सूर्यलोकमवाप्नोति अनृणश्च सदा भवेत्

ekarātroṣitaḥ snātvā ṛṇaistatra pramucyate / sūryalokamavāpnoti anṛṇaśca sadā bhavet

हिन्दी अर्थ

अनामया ह्यशोकाश्च रागद्वेषविवर्जिताः यजन्ति सततं देवं सर्वलोकेकसाक्षिणम्। ब्रतोपवासैर्विविधैर्देवदेवं दिवाकरम्

English

Cf. Mt. 5, 111.14, NP. II. 63.127-28.

अध्याय ३६

श्लोक 4-2

जलप्रवेशं यः कुर्यात् संगमे लोकविश्रुते ।राहुग्रस्तो यथा सोमो विमुक्तः सर्वपातकैः

jalapraveśaṃ yaḥ kuryāt saṃgame lokaviśrute / rāhugrasto yathā somo vimuktaḥ sarvapātakaiḥ

हिन्दी अर्थ

सात नदियाँ मनुष्योंका पाप हरण करनेवाली कही गयी हैं। है द्विजश्रेष्ठो! उनमें (यहाँके निवासियोंमें) न लोभ है, न क्रोध है और न (यहाँ) युगकी व्यवस्था ही है। यहाँके सभी लोग रोगरहित होकर जीवित रहते हैं। यहाँके सभी वर्णोके लोग निरन्तर सनातन वायुदेवका यजन करते हैं, इन्हें उन (वायुदेव)-का सायुज्य, सारूप्य तथा सालोक्य (नामक मोक्ष) प्राप्त होता है ॥ १४--१७॥

English

Then the great goddess told him again—"O sage, since you are irascible, you must not stay here as you are always ungrateful."

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

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