Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
22
अध्याय 22 / 119

Adhyaya 22

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अध्याय २२

श्लोक 1

रजेः पञ्च शतान्य् आसन् पुत्राणाम् अमितौजसाम् ।देवैर् अभ्यर्थितो दैत्यान् हत्वेन्द्रायाददाद् दिवम् ॥ इन्द्रस् तस्मै पुनर् हत्वा गृहीत्वा चरणौ रजेः ।आत्मानम् अर्पयाम् आस प्रह्रादाद्यरिशङ्कितः ॥ पितर्य् उपरते पुत्रा याचमानाय नो ददुः ।गुरुणा हूयमाने ऽग्नौ बलभित् तनयान् रजेः ।अवधीद् ध्वंसितान् मार्गान् न कश् चिद् अवशेषितः ।अरोगश् च भवेत् तात यावज्जीवम् अकल्मषः ।नहुषस्य तु दायादाः षड् इन्द्रोपमतेजसः यतिर् ययातिः संयातिर् आयातिर् यातिर् उद्धवः उत्पन्नाः पितृकन्यायां विरजायां महौजसः ।षड् इमे नहुषस्यासन्न् इन्द्रयाणीव देहिनः ।सुयातिः षष्ठस् तेषां वै ययातिःपार्थिवो ऽभवत् ।यतिर् ज्येष्ठस् तु तेषां वै ययातिस् तु ततः परम्

rajeḥ pañca śatāny āsan putrāṇām amitaujasām | devair abhyarthito daityān hatvendrāyādadād divam || indras tasmai punar hatvā gṛhītvā caraṇau rajeḥ | ātmānam arpayām āsa prahrādādyariśaṅkitaḥ || pitary uparate putrā yācamānāya no daduḥ | guruṇā hūyamāne 'gnau balabhit tanayān rajeḥ | avadhīd dhvaṃsitān mārgān na kaś cid avaśeṣitaḥ | arogaś ca bhavet tāta yāvajjīvam akalmaṣaḥ | nahuṣasya tu dāyādāḥ ṣaḍ indropamatejasaḥ yatir yayātiḥ saṃyātir āyātir yātir uddhavaḥ utpannāḥ pitṛkanyāyāṃ virajāyāṃ mahaujasaḥ | ṣaḍ ime nahuṣasyāsann indrayāṇīva dehinaḥ | suyātiḥ ṣaṣṭhas teṣāṃ vai yayātiḥpārthivo 'bhavat | yatir jyeṣṭhas tu teṣāṃ vai yayātis tu tataḥ param

हिन्दी अर्थ

आधे निगले हुए) सर्पके मस्तकमें चिपकी हुई श्रेष्ठमणि लटकती थी, जो अपने तेजसे शीतल किरणवाले चन्द्रमाकी पंखोंसे लीलापूर्वक आकाशको घेरकर इस तरह खड़े थे, मानो प्रलयकालमें इन्द्रधनुषसे युक्त हुए दो मेघखण्डोंसे आकाश घिर गया हो। श्रीहरिकी ध्वजामें चिह्॒के रूपमें छिपे हुए पक्षिराज गरुड़ नीली, पीली और लाल रंगकी पताकाओंसे अलंकृत थे। उनका आधारभूत ध्वजदण्ड बहुत विशाल था॥ ४३--४७ ॥ उस समय समस्त देवता और तपोधन मुनि भगवान् गदाधरके पीछे-पीछे चलने और श्रेष्ठ मन्त्रमयी स्तुतियोंद्वार उनका स्तवन करने लगे॥ ४८ ॥ देवताओंकी वह सेना कुबेरके द्वारा सुसड्रठित की गयी थी। यमराज उसके आगे-आगे चलनेवाले सेनानायक थे। जलके स्वामी वरुणने समुद्ररूपसे उसको सब ओरसे घेर रखा था तथा देवराज इन्द्र स्वयं उपस्थित

English

⁹⁴ A Sacrificial vase made in the shape of the Indian fig-leave, and of the wood of the Flacourtia sapida.

अध्याय २२

श्लोक 2

ककुत्स्थकन्यां गां नाम न लेभे स यतिस् तदा राज्यं नैच्छद् यतिः पित्रा दत्तं तत्परिणामवित् ।यत्र प्रविष्टः पुरुष आत्मानं नावबुध्यते ।तेनासौ मोक्षम् आस्थाय ब्रह्मभूतो ऽभवन् मुनिः

kakutsthakanyāṃ gāṃ nāma na lebhe sa yatis tadā rājyaṃ naicchad yatiḥ pitrā dattaṃ tatpariṇāmavit | yatra praviṣṭaḥ puruṣa ātmānaṃ nāvabudhyate | tenāsau mokṣam āsthāya brahmabhūto 'bhavan muniḥ

हिन्दी अर्थ

होकर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। चन्द्रमाकी प्रभाओंसे वह सारा सैन्यसमूह उज्ज्वल एवं निर्मल दिखायी देता था। वायुके वेगपूर्वक चलनेसे उसमें बड़ा गम्भीर शब्द होता था और उस सेनामें खड़े हुए अग्निदेव बड़े वेगसे प्रज्जलित हो रहे थे। ऐसी देवसेना वहाँ हैत्योंके साथ युद्ध करनेके सब कुछ सहन करनेमें समर्थ और नित्य प्रकाशमान हैं, उन भगवान् विष्णुके तेजसे व्याप्त हुई देवताओंकी वह बलवती सेना उत्साहसम्पन्न हो युद्धके लिये तैयार हो गयी॥ ५१॥ उस समय अड्-िराके पुत्र देवगुरु बृहस्पतिने स्तुति करके कहा--'देवताओंका कल्याण हो।' फिर हैत्योंके गुरु शुक्राचार्य भी बोल उठे--' हैत्योंका मड़ल हो'

English

⁹⁵ Fit or proper to be offered in oblation. An offering to the gods.

अध्याय २२

श्लोक 3

पितरि ध्वंसिते स्थानाद् इन्द्राण्या धर्षणाद् द्विजैः ।प्रापितो ऽजगरत्वं वै ययातिर् अभवन् नृपः ।तेषां ययातिः पञ्चानां विजित्य वसुधाम् इमाम् देवयानीम् उशनसः सुतां भार्याम् अवाप ह शर्मिष्ठाम् आसुरीं चैव तनयां वृषपर्वणः

pitari dhvaṃsite sthānād indrāṇyā dharṣaṇād dvijaiḥ | prāpito 'jagaratvaṃ vai yayātir abhavan nṛpaḥ | teṣāṃ yayātiḥ pañcānāṃ vijitya vasudhām imām devayānīm uśanasaḥ sutāṃ bhāryām avāpa ha śarmiṣṭhām āsurīṃ caiva tanayāṃ vṛṣaparvaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वीण आश्चर्यवतारकामये चतुश्चत्वारिंशोउध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आश्चर्यवारकामय संग्रामविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ देवासुर-संग्राम एवं और्व अग्निकी उत्पत्ति दानवा हैवतेः: सार्द्ध नानाप्रहरणोद्यता:। समीयुर्युध्यमाना वै पर्वता: पर्वतैरिव

English

⁹⁶ An oblation or offering of food to deceased ancestors.

अध्याय २२

श्लोक 4

यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत द्रुह्युं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी

yaduṃ ca turvasuṃ caiva devayānī vyajāyata druhyuṃ cānuṃ ca pūruṃ ca śarmiṣṭhā vārṣaparvaṇī

हिन्दी अर्थ

धर्माधर्मसमायुक्त॑ दर्पण. विनयेन च ततो रथेः प्रजविभिरवहनैश्व प्रचोदितेः। उत्पतद्धिश्न गगनं सासिहस्तैः समन्तत: तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम्। जगतस्त्रासजननं युगसंवर्तकोपमम् स्वहस्तमुक्ते: परिधै: क्षिप्यमाणैश् पर्वतेः। दानवाः समरे जदूुर्देवानिन्द्रपुरोगमान्

English

⁹⁷ Hymns recited at the time of the celebration of a religious

अध्याय २२

श्लोक 5

तस्य शक्रो ददौ प्रीतो रथं परमभास्वरम् असङ्गं काञ्चनं दिव्यं दिव्यैः परमवाजिभिः युक्तं मनोजवैः शुभ्रैर् येन भार्यां समुद्वहत्

tasya śakro dadau prīto rathaṃ paramabhāsvaram asaṅgaṃ kāñcanaṃ divyaṃ divyaiḥ paramavājibhiḥ yuktaṃ manojavaiḥ śubhrair yena bhāryāṃ samudvahat

हिन्दी अर्थ

ते वध्यमाना बलिभिर्दानवैर्जितकाशिभिः । विषण्णमनसो देवा जम्मुराति परां मृधे॥ तेडस्त्रजालै: प्रमथिता: परिघेर्भिन्नमस्तका: । भिन्नोरस्का दितिसुतैर्वेमू रक्त ब्रणैर्बहु बैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! एक-दूसरेपर विजय पानेकी इच्छावाले देवताओं और असुरोंकी उन सेनाओंमें उस समय घोर युद्ध आरम्भ हो गया दानव-सैनिक नाना प्रकारके हथियार उठाये देवताओंके साथ युद्ध करते हुए उनसे भिड़ गये, मानो एक श्रेणीके पर्वत दूसरी श्रेणीके पर्वतोंसे टकरा रहे हैं

English

⁹⁸ A sacrificial post or pillar usually made of bamboos or the wood of the Khadira to which the victim at a sacrifice is bound.

अध्याय २२

श्लोक 6

स तेन रथमुख्येन षड्रात्रेणाजयन् महीम् ययातिर् युधि दुर्धर्षस् तथा देवान् सवासवान्

sa tena rathamukhyena ṣaḍrātreṇājayan mahīm yayātir yudhi durdharṣas tathā devān savāsavān

हिन्दी अर्थ

प्रतीत होता था, मानो धर्म और अधर्म परस्पर जूझ रहे हों, दर्प और विनय एक-दूसरेसे लड़ रहे हों तदनन्तर रथोंके वेगपूर्वक दौड़ने, घोड़ोंक एड़ लगाकर भगाये जाने, चारों ओर तलवार हाथमें लिये योद्धाओंके आकाशमें उछलने, मुसलोंके फेंके जाने, बाणोंके चलाने, धनुषोंके खींचे जाने और मुदूरोंक गिराये जानेसे प्रलयकालकी अग्निके समान सम्पूर्ण जगत्को त्रास देने लगा॥ ४--६॥ उस समरादड्भणमें समस्त दानव अपने हथोंसे छोड़े गये परिघों और फेंके जाते हुए पर्वतशिखरोंकी चोटसे इन्द्र आदि देवताओंको घायल करने लगे युद्धस्थलमें अपनी विजयसे उललसित एवं सुशोभित होनेवाले महाबली दानवोंकी मार खाकर समस्त देवता मन-ही-मन खिन्न हो उठे, उन्हें बड़ी पीड़ा हुई

English

⁹⁹ Fuel, wood, grass, &c., so employed for enkindling fire.

अध्याय २२

श्लोक 7

स रथः पौरवाणां तु सर्वेषाम् अभवत् तदा यावत् तव सनामा वै पौरवो जनमेजय

sa rathaḥ pauravāṇāṃ tu sarveṣām abhavat tadā yāvat tava sanāmā vai pauravo janamejaya

हिन्दी अर्थ

हैत्योंने अपने अस्त्रसमूहोंसे देवताओंको मथ डाला, परिघोंकी मारसे उनके मस्तक फोड़ डाले और वक्ष:स्थल विदीर्ण कर दिये। उस समय देवता अपने घावोंसे बहुत रक्त बहा रहे थे॥ ९॥ हैत्योंने फन्दोंके जाल बिछाकर उन्हें इतना घायल कर दिया कि वे अपने अड्ोंसे रक्तकी धारा बहाने लगे। दानवोंकी मायाके वशीभूत होकर वे हिलने-डुलनेकी भी शक्ति खो बैठे असुरोंने देवताओंकी सेनाके सारे प्रयत्त और आयुध निष्फल कर दिये। उस समय वह सेना मन्त्रशक्तिसे स्तम्भित की हुई-सी प्रतीत होती थी, प्राणशून्य मुर्दे- जैसे दिखायी देती थी मायापाशान् विकर्षश्न भिन्‍्दन् वज़ेण ताउ्शरान्। शक्रो हैत्यबलं घोर विवेश बहुलोचन:

English

¹⁰⁰ A ladle or spoon.

अध्याय २२

श्लोक 8

कुरोः पौत्रस्य राज्ये तु राज्ञः पारिक्षितस्य ह ब्रह्महत्यायुतः पाप इन्द्रः क्रुद्धो ऽहरद् रथम् ।जगाम स रथो नाशं शापाद् गर्गस्य धीमतः

kuroḥ pautrasya rājye tu rājñaḥ pārikṣitasya ha brahmahatyāyutaḥ pāpa indraḥ kruddho 'harad ratham | jagāma sa ratho nāśaṃ śāpād gargasya dhīmataḥ

हिन्दी अर्थ

स हैत्यान् प्रमुखे हत्वा तद् दानवबलं महत्। तामसेनास्त्रजालेन तमोभूतमथाकरोत् तेडन्योन्यं नावबुध्यन्त देवान् वा दानवानपि। घोरेण तमसा55विष्टा: पुरुहृतस्य तेजसा वपूंषि हैत्यसंघानां तमोभूतान्यपातयन् हैत्यानां तदघनीभूतमन्धकारमहार्णवम्। प्रविष्ट॑ बलमुत्रस्त॑ तमोभूतमिवाब॒भौ

English

¹⁰¹ The juice of a plant of the same name used for drinking purposes.

अध्याय २२

श्लोक 9

गर्गस्य हि सुतं बालं स राजा जनमेजयः वाक्क्रूरं हिंसयाम् आस ब्रह्महत्याम् अवाप सः

gargasya hi sutaṃ bālaṃ sa rājā janamejayaḥ vākkrūraṃ hiṃsayām āsa brahmahatyām avāpa saḥ

हिन्दी अर्थ

युगान्ताग्रिमिवात्युग्रां सृष्टामौर्वेण वह्निना शशंसुर्वज्रिणे देवा: संतप्ता: शरणैषिण: चोदितो देवराजेन वरुणो वाक्यमत्रवीत् पुरा ब्रह्मर्षिज: शक्र तपस्तेपेडतिदारुणम्। ऊर्बो मुनि: सतेजस्वी सदृशो ब्रह्मणो गुणै:

English

¹⁰² A wooden frame round the hole in which a sacrificial fire is

अध्याय २२

श्लोक 10

स लोहगन्धी राजर्षिः परिधावन्न् इतस् ततः पौरजानपदैस् त्यक्तो न लेभे शर्म कर्हिचित्

sa lohagandhī rājarṣiḥ paridhāvann itas tataḥ paurajānapadais tyakto na lebhe śarma karhicit

हिन्दी अर्थ

तब बहुसंख्यक नेत्रोंसे सुशोभित होनेवाले देवराज इन्द्रने अपने वज्रसे हैत्योंके माया-पाशोंको हटाते और उनके चलाये हुए बाणोंको काटते हुए उनकी घोर सेनामें प्रवेश किया॥ १२॥ उन्होंने सामने खड़े हुए हैत्योंको मारकर दानवोंको उस विशाल वाहिनीपर तामसास्त्रका जाल-सा बिछा दिया और उसे अन्धकारसे अभिभूत कर डाला॥ १३॥ इन्द्रके प्रभावसे घोर अन्धकारमें डूबे हुए हैत्य न तो आपसमें ही किसीको जान पाते थे और न देवताओं अथवा दानवोंको ही पहचान पाते थे हैत्योंके मायापाशसे मुक्त हुए श्रेष्ठ देवताओंने प्रयत्षशील होकर उन हैत्यसमूहोंके अन्धकारसे आच्छन्न हुए शरीरोंको धरतीपर गिराना आरम्भ किया॥ १५ ॥ अन्धकारसे नीली कान्ति धारण करनेवाले वे दानव देवताओंकी मार

English

¹⁰³ Those who perform sacrifices.

अध्याय २२

श्लोक 11

ततः स दुःखसंतप्तो नालभत् संविदं क्व चित् इन्द्रोतं शौनकं राजा शरणं प्रत्यपद्यत

tataḥ sa duḥkhasaṃtapto nālabhat saṃvidaṃ kva cit indrotaṃ śaunakaṃ rājā śaraṇaṃ pratyapadyata

हिन्दी अर्थ

खाकर मूच्छित हो पंख कटे हुए पर्वतोंके समान धराशायी होने लगे॥ १६॥ अन्धकारके महासागरमें डूबी हुई हैत्योंकी वह घनीभूत सेना अत्यन्त भयभीत हो गयी मय नामक दानवने इन्द्रके द्वारा फैलायी हुई उस तामसी मायाको नष्ट करते हुए एक महामायाकी सृष्टि की, जो और्व नामक अग्नि (बड़वानल)-के द्वारा रची गयी थी और प्रलयकालकी अग्निके समान अत्यन्त भयंकर थी॥ १८॥ मयके द्वारा फैलायी हुई उस मायाने सारे अन्धकारको जलाकर भस्म कर दिया; फिर तो हैत्योंके शरीर दमक उठे और वे तत्काल युद्धके लिये खड़े हो गये ॥ १९॥ अब तो देवतालोग और्वी मायाके सम्पर्कमें आकर दग्ध होने लगे और ठंढे जलमें शयन करनेके लिये चन्द्रमेके समीप गये॥ २०॥ वे सब देवता और्वके तेजसे झुलसकर अपना तेज खो बैठे। उन्होंने अत्यन्त संतप्त होकर शरण पानेकी इच्छासे इन्द्रके पास जाकर

English

¹⁰⁴ A kind of sacrifice.

अध्याय २२

श्लोक 12

याजयाम् आस चेन्द्रोतः शौनको जनमेजय अश्वमेधेन राजानं पावनार्थं द्विजोत्तमाः स लोहगन्धो व्यनशत् तस्यावभृथम् एत्य ह

yājayām āsa cendrotaḥ śaunako janamejaya aśvamedhena rājānaṃ pāvanārthaṃ dvijottamāḥ sa lohagandho vyanaśat tasyāvabhṛtham etya ha

हिन्दी अर्थ

पुकार की॥ २१॥ जब मयासुरकी मायासे सारी सेना संतप्त हो उठी और दानव भी उसे जलाने लगे, तब देवराजके द्वारा उसकी शान्तिके लिये प्रेरित होनेपर वरुणने इस प्रकार कहा वरुण बोले--देवेन्द्र ! पूर्वकालमें ऊर्ब नामसे प्रसिद्ध एक तेजस्वी मुनि थे, जो ब्रह्मर्षि भृगुके पुत्र थे। वे गुणोंमें ब्रह्माजीके समान थे। उन्होंने अत्यन्त दारुण तप करना आरम्भ किया उपतस्थुर्मुनिगणा देवा ब्रह्मर्षिभि: सह ऋषिं विज्ञापयामास पुरा परमतेजसम्

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 13

स च दिव्यो रथो राजन् वसोश् चेदिपतेस् तदा दत्तः शक्रेण तुष्टेन लेभे तस्माद् बृहद्रथः

sa ca divyo ratho rājan vasoś cedipates tadā dattaḥ śakreṇa tuṣṭena lebhe tasmād bṛhadrathaḥ

हिन्दी अर्थ

तमूचुब्रह्मऋषयो वचन ब्रह्मसम्मितम्। ऋषिवंशेषु भगवज्छन्नमूलमिदं कुलम् एकस्त्वमनपत्यश्च गोत्र यन्नानुवर्तसे। कौमारं ब्रतमास्थाय क्लेशमेवानुवर्तसे कुलेषूच्छिन्नमूलेषु तेषु नो नास्ति कारणम्। भवांस्तु तपसा श्रेष्ठ: प्रजापतिसमदुति: स एवमुक्तो मुनिभिर्मुनिर्ममसि ताडितः। जगह तानृषिगणान् वचन चेदमब्नवीतू

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 14

बृहद्रथात् क्रमेणैव गतो बार्हद्रथं नृपम् ।ततो हत्वा जरासंधं भीमस् तं रथम् उत्तमम् प्रददौ वासुदेवाय प्रीत्या कौरवनन्दन

bṛhadrathāt krameṇaiva gato bārhadrathaṃ nṛpam | tato hatvā jarāsaṃdhaṃ bhīmas taṃ ratham uttamam pradadau vāsudevāya prītyā kauravanandana

हिन्दी अर्थ

यथायं शाश्वतो धर्मो मुनीनां विहितः पुरा। सदा55र्ष सेवतां कर्म वन्‍्यमूलफलाशिनाम् ब्रह्मचर्य सुचरितं ब्रह्मणमपि चालयेतू जैसे सूर्य इस अव्यय (प्रवाहरूपसे सदा रहनेवाले) जगतू्को सदा तपाते रहते हैं, उसी प्रकार वे भी अपनी तपस्यासे सबको ताप देने लगे। तब ब्रह्मर्षियोंसहित हिरण्यकशिपु भी, जो समस्त दानवोंका स्वामी था, किसी समय उन परम तेजस्वी महर्षिके पास आया और उनसे शान्तिके लिये प्रार्थना करता रहा; यह प्राचीन कालकी बात है॥ २५॥ ब्रह्मर्षियोंने उनसे यह वेदतुल्य

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 15

सप्तद्वीपां ययातिस् तु जित्वा पृथ्वीं ससागराम् व्यभजत् पञ्चधा राज्यं पुत्राणां नाहुषस् तदा

saptadvīpāṃ yayātis tu jitvā pṛthvīṃ sasāgarām vyabhajat pañcadhā rājyaṃ putrāṇāṃ nāhuṣas tadā

हिन्दी अर्थ

बात कही--' भगवन्! ऋषियोंके वंशोंमें आपके इस कुलकी जड़ कट-सी गयी है'॥ २६ ॥ एकमात्र आप ही अपने कुलमें बचे हैं और आपके कोई संतान नहीं है तो भी आप गोत्रका अनुसरण नहीं करते हैं--उसकी 'परम्पराको बनाये रखनेके लिये कोई प्रयत्न नहीं करते हैं। केवल नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका ब्रत धारण करके तपस्याजनित क्लेशका ही अनुगमन कर रहे हैं॥२७॥ “विप्रवर ! विशुद्ध अन्तःकरणवाले मुनियोंके बहुत-से ऐसे गोत्र या कुल हैं, जो एक शरीर (एक व्यक्ति)-पर ही अवलम्बित रहे हैं और संतान न होनेके कारण जड़से अलग होकर नष्ट हो गये हैं॥२८॥ मूलके ही नष्ट हो जानेसे उन कुलोंकी वृद्धिका हमारे देखनेमें कोई कारण नहीं रह गया है, परंतु आप तो (अपनी भावी वंशपरम्पराके मूलरूपमें विद्यमान ही हैं। आपके रहते इस कुलका उच्छेद नहीं होना चाहिए। आप) तपकी दृष्टिसे श्रेष्ठ हैं और तेज एवं कान्तिमें भी प्रजापतियोंके तुल्य हैं

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 16

दिशि दक्षिणपूर्वस्यां तुर्वसुं मतिमान् नृपः प्रतीच्याम् उत्तरस्यां तु द्रुह्युं चानुंच नाहुषः

diśi dakṣiṇapūrvasyāṃ turvasuṃ matimān nṛpaḥ pratīcyām uttarasyāṃ tu druhyuṃ cānuṃca nāhuṣaḥ

हिन्दी अर्थ

अतः आप अपने वंशको चलानेका उद्योग कीजिये और अपने द्वारा अपने-आपको बढ़ाइये। अपने ओजस्वी तेज (वीर्य)-का (योग्य पत्नीमें) आधान कीजिये और ऐसा करके पुत्ररूपमें अपने दूसरे शरीरको प्रकट कीजिये उन महर्षियोंके ऐसा कहनेपर ऊर्ब मुनिके हृदयमें गहरा धक्का लगा। वे उन ऋषियोंकी निन्‍दा करने लगे और इस प्रकार बोले-- ॥ ३१ ॥ महात्माओ ! जो वनके फल- मूल खाकर रहते हैं और सदा आर्षशास्त्रोंमें बताये हुए सत्कर्मका सेवन करते हैं, उन हम-जैसे ऋषि-मुनियोंके लिये तो प्राचीन कालसे इस तप एवं ब्रह्मचर्यरूप सनातनधर्मका ही विधान किया गया है॥ ३२॥ ब्राह्मण- कुलमें उत्पन्न होकर ब्राह्मण-धर्मका अनुसरण करनेवाले द्विजके द्वारा इस ब्रह्मचर्य-ब्रतका यदि भलीभाँति आचरण किया जाय तो यह ब्रह्माजीको भी विचलित कर सकता है

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 17

दिशि पूर्वोत्तरस्यां तु यदुं ज्येष्ठं न्ययोजयत् मध्ये पूरुं च राजानम् अभ्यषिञ्चत् स नाहुषः

diśi pūrvottarasyāṃ tu yaduṃ jyeṣṭhaṃ nyayojayat madhye pūruṃ ca rājānam abhyaṣiñcat sa nāhuṣaḥ

हिन्दी अर्थ

अम्बुभक्षा वायुभक्षा दन्‍्तोलूखलिकास्तथा। अश्मकुट्टा दशनपा:ः पश्ञातपतपाश्च ये एते तपसि तिष्ठन्तो ब्रतैरपि सुदुष्करैः। ब्रह्मचर्य पुरस्कृत्य प्रार्थयन्ते परां गतिम् ब्रह्मचर्याद ब्राह्मणस्य ब्राह्मणत्वं विधीयते। एवमाहुः परे लोके ब्रह्म ब्रह्मविदों जना: ब्रह्मचर्य स्थितं धैर्य ब्रह्मचयें स्थितं तप: । ये स्थिता ब्रह्मचयेषु ब्राह्मणास्ते दिवि स्थिता:

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 18

तैर् इयं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना यथाप्रदेशम् अद्यापि धर्मेण परिपाल्यते प्रजास् तेषां पुरस्तात् तु वक्ष्यामि नृपसत्तम

tair iyaṃ pṛthivī sarvā saptadvīpā sapattanā yathāpradeśam adyāpi dharmeṇa paripālyate prajās teṣāṃ purastāt tu vakṣyāmi nṛpasattama

हिन्दी अर्थ

नास्ति लोके यशोमूलं ब्रह्मचर्यात् परं तपः ब्रह्मचर्येण वर्तेत किमतः परम तपः अयोगे केशहरणमसंकल्पे ब्रतक्रिया। अब्नह्मचर्ये चर्या च त्रयं स्थाद् दम्भसंज्ञितम् यदेयं ब्रह्मणा सृष्टा मनसा मानसी प्रजा

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 19

धनुर् न्यस्य पृषत्कांश् च पञ्चभिः पुरुषर्षभैः जिगाय पृथिवीं सर्वां सप्तद्वीपवतीं नृपः ।परवान् अभवद् राजा भारम् आवेश्य बन्धुषु

dhanur nyasya pṛṣatkāṃś ca pañcabhiḥ puruṣarṣabhaiḥ jigāya pṛthivīṃ sarvāṃ saptadvīpavatīṃ nṛpaḥ | paravān abhavad rājā bhāram āveśya bandhuṣu

हिन्दी अर्थ

सृजध्व॑ मानसान् पुत्रान् प्राजापत्येन कर्मणा “जो गृहस्थ-आश्रममें निवास करते हैं, उन ब्राह्मणोंके लिये ही शास्त्रमें यज्ञ कराना, वेद पढ़ाना और दान ग्रहण करना-ये तीन वृत्तियाँ बतायी गयी हैं। हम-जैसे ऊर्ध्वरता वनवासियोंके लिये तो वनके फल-मूल ही जीविकाके साधन हैं ॥ ३४॥ कुछ लोग केवल जल या वायु पीकर ही रहते हैं, कुछ दाँतोंस ही ओखली और मूसलका काम लेते हैं अर्थात् दाँत रहनेपर भूसीसहित नीवार आदिको चबा लेते हैं। ये ही 'दशनप' कहलाते हैं। परंतु जिनके दाँत नहीं हैं, वे पत्थरोंसे ही कूट- पीसकर वन्य वस्तुओंको खाते हैं। कुछ पश्चाग्रिके तापका सेवन करते हैं ॥ ३५॥ ये अत्यन्त दुष्कर ब्रतोंका आचरण करते हुए भी तपस्यामें लगे रहते और मुख्यतः

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 20

निक्षिप्तशस्त्रः पृथिवीं निरीक्ष्य पृथिवीपतिः प्रीतिमान् अभवद् राजा ययातिर् अपराजितः

nikṣiptaśastraḥ pṛthivīṃ nirīkṣya pṛthivīpatiḥ prītimān abhavad rājā yayātir aparājitaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मचर्य-ब्रतका पालन करके उत्कृष्ट गतिको पाना चाहते हैं॥ ३६ ॥ ' ब्रह्मचर्यके पालनसे ही ब्राह्मणको ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है। इसी तरह ब्रह्मवेत्ता पुरुषोंका कहना है कि ब्रह्मचर्यका पालन ही परलोकमें ब्रह्मको प्राप्तिका मुख्य साधन है॥ ३७॥ ब्रह्मचर्यमें धर्यकी स्थिति है और ब्रह्मचर्यमें ही तप प्रतिष्ठित है। जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्यमें दृढ़तापूर्वक स्थित हैं, वे ब्रह्मलोकमें ही विराजमान हैं॥ ३८ ॥ योगके बिना सिद्धि नहीं मिलती और सिद्धिके बिना यश नहीं प्राप्त होता है। यशका मूल कारण है तप; परंतु इस जगत्में ब्रह्मचर्यसे बढ़कर दूसरा कोई तप नहीं है॥३९॥ अतः इन्द्रिय-समुदायको तथा शब्द आदि सूक्ष्म भूतरूप उसके विषयसमूहको वशमें करके ब्रह्मचर्य- पालनपूर्वक रहे। इससे बढ़कर और कौन-सा तप हो सकता है?॥४०॥ अवश्यकर्तव्य ध्यानरूप योगके अभावमें भी सिर मुड़ा लेना, परलोक सुधारनेका संकल्प न रहनेपर भी केवल लोकरंजनके लिये कृच्छु आदि

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 21

एवं विभज्य पृथिवीं ययातिर् यदुम् अब्रवीत् जरां मे प्रतिगृह्णीष्व पुत्र कृत्यान्तरेण वै

evaṃ vibhajya pṛthivīṃ yayātir yadum abravīt jarāṃ me pratigṛhṇīṣva putra kṛtyāntareṇa vai

हिन्दी अर्थ

ब्रतोंका आचरण करना तथा ब्रह्मकी प्राप्तिको लक्ष्य बनाकर नियमित वेदाध्ययनके बिना ही ब्रह्मचर्यके नियमोंका आश्रय लेना--ये तीनों दम्भ कहलाते हैं जब ब्रह्माजीने मनके द्वारा मानसी प्रजा (सनत्कुमार आदि) - की सृष्टि की थी, उस समय स्त्री कहाँ थी? स्त्री- पुरुषका संयोग कहाँ था? और चित्तकी विकृति (कामातुरता) भी कहाँ थी 2॥ ४२ ॥ महर्षियो! आपलोग अमेय आत्मबलसे सम्पन्न हैं, यदि आपमें तपस्याकी शक्ति हो तो आप प्रजापतिके समान कर्म करके मानसिक पुत्र उत्पन्न करें' यदिदं लुप्तधर्मार्थ युष्माभिरिह्ठ निर्भये:। व्याहतं सद्धिरत्यर्थमसद्धिरिव मे मति:

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 22

तरुणस् तव रूपेण चरेयं पृथिवीम् इमाम् जरां त्वयि समाधाय तं यदुः प्रत्युवाच ह

taruṇas tava rūpeṇa careyaṃ pṛthivīm imām jarāṃ tvayi samādhāya taṃ yaduḥ pratyuvāca ha

हिन्दी अर्थ

ममन्थेकेन दर्भेण पुत्रस्य प्रभवारणिम् जगतो निधनाकादुक्षी पुत्रो उग्रि: समपद्यत ऊर्वस्योरुं विनिर्भिद्या औवों नामान्तको5नल:। दिधक्षन्रिव लोकांस्त्रीज्ज्ञे परमकोपनः निर्दहन्निव भूतानि ववृधे सो5न्तको5नल:

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 23

नोत्सहे जरया स्थातुम् अन्तरा प्राप्तया तव ।अविदित्वा सुखं ग्राम्यं वैतृष्ण्यं नैति पूरुषः ।अनिर्दिष्टा मया भिक्षा ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुता अनपाकृत्य तां राजन् न ग्रहीष्यामि ते जराम्

notsahe jarayā sthātum antarā prāptayā tava | aviditvā sukhaṃ grāmyaṃ vaitṛṣṇyaṃ naiti pūruṣaḥ | anirdiṣṭā mayā bhikṣā brāhmaṇasya pratiśrutā anapākṛtya tāṃ rājan na grahīṣyāmi te jarām

हिन्दी अर्थ

एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा सर्वलोकपतिः प्रभु: । आजमगाम मुनिर्यत्र व्यसृजत् पुत्रमुत्तमम् और्वकोपाग्रिसंतप्ताल्‍लोकां श्व ऋषिभि: सह तमुवाच ततो ब्रह्मा मुनिमूर्व सभाजयन्। धार्यतां पुत्रज॑ तेजो लोकानां हितकाम्यया। अस्थापत्यस्थ ते विप्र करिष्ये साहाममुत्तमम् “तपस्वीको तो अपने मनसे कल्पित योनिमें ही मानसिक संकल्पसे गर्भाधान करना चाहिए। स्त्रीके साथ संयोग अथवा बवीर्यका आधान--यह तपस्वी पुरुषोंका नियम नहीं बताया गया है॥४४॥ आपलोग सज्जन हैं

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 24

जराया बहवो दोषाः पानभोजनकारिताः तस्माज् जरां न ते राजन् ग्रहीतुम् अहम् उत्सहे

jarāyā bahavo doṣāḥ pānabhojanakāritāḥ tasmāj jarāṃ na te rājan grahītum aham utsahe

हिन्दी अर्थ

तो भी निरे असज्जनोंके समान आपने निःशड्डू होकर यहाँ यह धर्म और अर्थसे शून्य बात कह डाली है, ऐसा मेरा विचार है॥ ४५॥ अच्छा! देखिये, मैं अभी मनोमय वपु (योनि)-का निर्माण करके स्त्री सहवासके बिना ही अपने शरीरसे उत्पन्न होनेवाले ऐसे पुत्रकी सृष्टि कर रहा हूँ, जिसकी अन्तरात्मा अत्यन्त उद्दीप्त होगी इस प्रकार मेरा यह शरीर वनवासीके लिये उचित इस विधानके द्वारा ही मेरे दूसरे स्वरूप (पुत्र)-को जन्म देगा, जो समस्त प्रजाको जलाकर भस्म कर देनेकी इच्छा रखता होगा॥ ४७॥ ऐसा कहकर तपके आवेशमें भरे हुए ऊर्व मुनिने अपनी जाँघको अग्निमें डाल दिया और पुत्रकी उत्पत्तिक लिये अरणिरूप उस जाँघको एक कुशसे मथने लगे॥ ४८॥ उस समय सहसा उनके ऊरु (जाँघ)-का भेदन करके एक अग्निस्वरूप पुत्र

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 25

सन्ति ते बहवः पुत्रा मत्तः प्रियतरा नृप प्रतिग्रहीतुं धर्मज्ञ पुत्रम् अन्यं वृणीष्व वै

santi te bahavaḥ putrā mattaḥ priyatarā nṛpa pratigrahītuṃ dharmajña putram anyaṃ vṛṇīṣva vai

हिन्दी अर्थ

उत्पन्न हुआ, जो बिना ईंधनके ही ज्वालामालाओंसे अलंकृत था। वह समस्त संसारके विनाशकी इच्छा रखता था॥४९॥ ऊर्वकी जाँघचको चीरकर जो वह लोक-विनाशक परम क्रोधी अनल प्रकट हुआ था, वह और्वके नामसे विख्यात हुआ। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह तीनों लोकोंको दग्ध कर डालना चाहता हो॥ ५०॥ उसने उत्पन्न होते ही प्रदीप्त वाणीमें अपने पितासे कहा--'तात! मुझे भूख सता रही है, मेरे आहारके लिये यह सम्पूर्ण जगत् मुझे अर्पित कर दीजिये'॥ ५१॥ वह कालरूप अग्नि समस्त प्राणियोंको दग्ध-सा करता हुआ बढ़ने लगा। अपनी स्वर्गतक पहुँचनेवाली ज्वालाओंके द्वारा वह दसों दिशाओंमें फैलता जा रहा था॥५२॥ इसी बीचमें सब लोकोंके स्वामी भगवान् ब्रह्मा उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ ऊर्व मुनिने अपने श्रेष्ठ पुत्रको उत्पन्न किया था॥ ५३॥ उन्होंने देखा कि ऊर्वकी जाँघ पुत्ररूप अग्रिसे देदीप्यमान हो रही है

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 26

स एवम् उक्तो यदुना राजा कोपसमन्वितः उवाच वदतां श्रेष्ठो ययातिर् गर्हयन् सुतम्

sa evam ukto yadunā rājā kopasamanvitaḥ uvāca vadatāṃ śreṣṭho yayātir garhayan sutam

हिन्दी अर्थ

और और्वकी क्रोधाग्रिसे ऋषियोंसहित तीनों लोक संतप्त हो उठे हैं॥ ५४॥ तब ब्रह्मा ऊर्व मुनिका सत्कार करते हुए उनसे कहने लगे--'विप्रवर! तुम लोकोंका हित करनेकी इच्छासे अपने पुत्रके तेजको रोके रहो। मैं तुम्हारे इस पुत्रकी उत्तम सहायता करूँगा' प्रभावकाले सम्प्राप्ते काइसक्षितव्ये समागमे । भगवंस्तर्पितः पुत्र: कै्हव्यै: प्राप्स्पते सुखम् सहितौ विचरिष्यावो लोकानिति पुनः पुनः

English

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अध्याय २२

श्लोक 27

क आश्रमस् तवान्यो ऽस्ति को वा धर्मो विधीयते माम् अनादृत्य दुर्बुद्धे यद् अहं तव देशिकः

ka āśramas tavānyo 'sti ko vā dharmo vidhīyate mām anādṛtya durbuddhe yad ahaṃ tava deśikaḥ

हिन्दी अर्थ

एषो5ग्रिरन्‍्तकाले तु सलिलाशी मया कृतः। दहन: सर्वभूतानां सदेवासुररक्षसाम् प्रतियातस्ततो ब्रह्मा ते चर सर्वे महर्षय:। और्वस्थाग्ने: प्रभावज्ञा: स्वां स्वां गतिमुपाश्रिता: भगवन्नद्धुतमिदं निर्वत्तं लोकसाक्षिकम्। तपसा ते मुनिश्रेष्ट परितुष्ट:ः पितामह: भृत्य इत्यवगन्तव्य: एलाघ्योउस्मि यदि कर्मणा

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 28

एवम् उक्त्वा यदुं तात शशापैनं स मन्युमान् अराज्या ते प्रजा मूढ भवित्रीति नराधिप

evam uktvā yaduṃ tāta śaśāpainaṃ sa manyumān arājyā te prajā mūḍha bhavitrīti narādhipa

हिन्दी अर्थ

'वक्ताओंमें श्रेष्ठ! तुम मेरे इस तथ्य वचनको भी सुनो। मैं इसे अमृतके समान भोजन और रहनेके लिये स्थान भी दूँगा' ऊर्वने कहा--'आज मैं धन्य हूँ। मेरे ऊपर आपका बड़ा अनुग्रह है, जो आप यहाँ पधारकर मेरे पुत्रपर परम अनुग्रह करनेके लिये ऐसी सलाह दे रहे हैं॥ ५७॥ भगवन्! जब इसका यौवनकाल उपस्थित होगा और इसके लिये भोजनकी व्यवस्था वाञ्छनीय होगी, तब यह किस हविसे तृप्त होकर सुख पायेगा? इसका निवासस्थान कहाँ होगा ? इस महान् शक्तिशाली पुत्रकी शक्तिके अनुरूप आप किस भोजनकी व्यवस्था ब्रह्माजीनी कहा--विप्रवर! जिसकी आकृति घोड़ीके मुखके समान है, समुद्रके उस मुखमें इसका निवास होगा। जल मेरी योनि (उत्पत्तिका स्थान) है और उस (समुद्र एवं उसके मुख)-का स्वरूप भी जलमय ही

English

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अध्याय २२

श्लोक 29

स तुर्वसुं स द्रुह्युं च अनुं च भरतर्षभ एवम् एवाब्रवीद् राजा प्रत्याख्यातश् च तैर् अपि

sa turvasuṃ sa druhyuṃ ca anuṃ ca bharatarṣabha evam evābravīd rājā pratyākhyātaś ca tair api

हिन्दी अर्थ

है॥ ६० ॥ उसी जलको में तुम्हारे पुत्रके लिये हविष्यरूपमें अर्पित करता हूँ और उसके लिये रहनेका स्थान भी वही होगा। यह जलमय हविष्यका पान करता हुआ सदा वहीं रहे ॥ ६१॥ सुब्रत! तदनन्तर प्राणियोंका प्रलयकाल आनेपर यह और मैं दोनों साथ-साथ सम्पूर्ण लोकोंमें बास्म्बार विचरेंगे॥ ६२॥ इस अग्रिको मैंने जलाहारी बना दिया। यह प्रलयके समय देवता, राक्षत और असुर आदि समस्त प्राणियोंको भस्म करनेवाला होगा तब “एवमस्तु' कहकर उस और्व नामक अग्निने अपनी ज्वालाओंको समेट लिया और पिताके शरीरमें यशरूपी तेजको स्थापित करके उसी क्षण समुद्रके मुखमें प्रवेश किया॥ ६४॥ तब ब्रह्माजी लौट गये तथा और्व अग्निके प्रभावको जाननेवाले वे सब महर्षि भी अपने-अपने स्थानको चले गये॥ ६५॥ इस अद्भुत घटनाको देखकर हिरण्यकशिपुने ऊर्वको साष्टाड़ प्रणाम करके उनका पूजन किया और यह बात कही--॥ ६६॥ “भगवन्

English

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अध्याय २२

श्लोक 30

शशाप तान् अपि क्रुद्धो ययातिर् अपराजितः यथा ते कथितं पूर्वं मया राजर्षिसत्तम

śaśāpa tān api kruddho yayātir aparājitaḥ yathā te kathitaṃ pūrvaṃ mayā rājarṣisattama

हिन्दी अर्थ

आपने समस्त लोकोंके सामने यह अद्भुत बात कर दिखायी। मुनिश्रेष्ठ आपकी तपस्यासे पितामह ब्रह्मा भी बहुत संतुष्ट हैं ॥ ६७॥ महाव्रत! यदि आप मेरे कर्मोंको देखकर मुझे प्रशंसाके योग्य समझते हों तो मुझे अपने पुत्रका और अपना किड्डूर समझें! “अत: मुनिश्रेष्ट! मैं शरणमें आकर आपकी ही यदि सीदे मुनिश्रेष्ठ तवैव स्थात् पराजय: ॥ ६९ आराधनामें तत्पर हूँ। आप मुझपर कृपादृष्टि कीजिये। यदि

English

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अध्याय २२

श्लोक 31

एवं शप्त्वा सुतान् सर्वांश् चतुरः पूरुपूर्वजान् तद् एव वचनं राजा पूरुम् अप्य् आह भारत

evaṃ śaptvā sutān sarvāṃś caturaḥ pūrupūrvajān tad eva vacanaṃ rājā pūrum apy āha bhārata

हिन्दी अर्थ

एवमस्त्विति तां गृह्य प्रणम्य मुनिपुड्भवम्। जगाम त्रिदिवं हृष्ट:ः कृतार्थों दानवेश्वर: सैषा दुर्विषहा माया देवैरपि दुरासदा। औवेंण निर्मिता पूर्व पावकेनोर्वसूनुना तस्समिस्तु व्युत्थिते हैत्ये निरवीयषा न संशय: । शापो ह्स्या: पुरा दत्त: सृष्टा येनेव तेजसा यद्येषा प्रतिहन्तव्या कर्तव्यों भगवान् सुखी। दीयतां मे सखा शक्र तोययोनिर्निशाकर:

English

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अध्याय २२

श्लोक 32

तरुणस् तव रूपेण चरेयं पृथिवीम् इमाम् जरां त्वयि समाधाय त्वं पूरो यदि मन्यसे

taruṇas tava rūpeṇa careyaṃ pṛthivīm imām jarāṃ tvayi samādhāya tvaṃ pūro yadi manyase

हिन्दी अर्थ

मैं कष्टमें पड़ा तो यह आपकी ही पराजय होगी ' ऊर्व मुनिने कहा--सुब्रत ! तुम मुझे अपना गुरु या पिता मान रहे हो, अत: मैं धन्य हूँ, यह तुम्हारा मुझपर महान् अनुग्रह है। मेरी इस तपस्याके प्रभावसे अब तुम्हें यहाँ कोई भय नहीं होगा॥ ७० ॥ साथ ही तुम मेरे पुत्रके द्वारा रची हुई इस मायाको ग्रहण करो। इस ईंधनरहित अग्निमयी मायाका स्पर्श करना साक्षात् अग्निके लिये भी कठिन होगा॥ ७१ ॥ यह (माया) तुम्होीरे जीवनकालतक सदा तुम्हारे वंशजोंके वशमें होकर रहेगी और शत्रुओंका दमन करते समय यह अपने पक्षवालोंकी रक्षा तथा शत्रुओंका संहार करेगी॥ ७२॥ तब “एवमस्तु' कहकर दानवराजने उस मायाको ग्रहण कर लिया और प्रसन्न हो कृतार्थताका अनुभव करता हुआ उन मुनिवरको प्रणाम

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 33

को नु लोके मनुष्येन्द्र पितुर् आत्मकृतः पुमान् ।प्रतिकर्तुं क्षमो यस्य प्रसादाद् विन्दते परम् ॥ अधमो ऽश्रद्धया कुर्याद् अकर्तोच्चरितं पितुः ।सो ऽपि तद्वयसा कामाञ् जुजुषो ऽव्याहतेन्द्रयः ।स जरां प्रतिजग्राह पितुः पूरुः प्रतापवान् ययातिर् अपि रूपेण पूरोः पर्यचरन् महीम्

ko nu loke manuṣyendra pitur ātmakṛtaḥ pumān | pratikartuṃ kṣamo yasya prasādād vindate param || adhamo 'śraddhayā kuryād akartoccaritaṃ pituḥ | so 'pi tadvayasā kāmāñ jujuṣo 'vyāhatendrayaḥ | sa jarāṃ pratijagrāha pituḥ pūruḥ pratāpavān yayātir api rūpeṇa pūroḥ paryacaran mahīm

हिन्दी अर्थ

करके स्वर्गको चला गया वरुण कहते हैं--इस प्रकार प्राचीन कालमें ऊर्व ऋषिके पुत्र और्ब नामक अग्निने इस मायाको रचा था, जो देवताओंके लिये भी दुःसह एवं दुर्जय है यह हैत्य अब संसारसे उठ गया है। अतः यह माया निर्बल हो गयी है, इसमें कोई संदेह नहीं है; क्योंकि जिन्होंने अपने तेजसे इसको रचा था, उन्होंने ही इसको शाप भी दिया था (कि यह माया हिरण्यकशिपुके जीवनतक ही बलवती रहेगी) ॥ ७५॥ इन्द्रदेव! यदि आपको इस मायाका संहार करना है और अपनेको प्रसन्न करना है तो आप मुझे जलके उत्पत्तिस्थान चन्द्रमाको मेरी सहायताके लिये दीजिये॥ ७६॥ मैं चन्द्रमाके सहयोगसे और (अपने

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 34

स मार्गमाणः कामानाम् अन्तं भरतसत्तम विश्वाच्या सहितो रेमे वने चैत्ररथे प्रभुः

sa mārgamāṇaḥ kāmānām antaṃ bharatasattama viśvācyā sahito reme vane caitrarathe prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

अधीनस्थ) जलचर जीवोंसे घिरा रहकर आपकी कृपासे इस मायाका अवश्य ही नाश कर डालूँगा इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि और्वाग्रिसम्भवो नाम पदञ्जञचत्वारिंशो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें और्व अग्निके उत्पत्तिविषयक पैतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ इन्द्रद्वारा चन्द्रमाकी स्तुति, चन्द्रदेव और वरुणदेवके द्वारा हैत्यसेनाका संहार, मयदानवद्वारा मायाका प्रयोग, पवन और अग्नमिदेवका हैत्यसेनाके साथ संग्राम और कालनेमिका रणमें आगमन

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 35

यदावितृप्तः कामानां भोगेषु च नराधिपः ।स यदा ददृशो कामान् वर्धमानान् महीपतिः ततः पूरोः सकाशाद् वै स्वां जरां प्रत्यपद्यत

yadāvitṛptaḥ kāmānāṃ bhogeṣu ca narādhipaḥ | sa yadā dadṛśo kāmān vardhamānān mahīpatiḥ tataḥ pūroḥ sakāśād vai svāṃ jarāṃ pratyapadyata

हिन्दी अर्थ

त्वन्मयं सर्वलोकानां रसं रसविदो विदुः परिवर्तस्यहोरात्रं काल॑ जगति योजयन् लोकच्छायामयं लक्ष्म तवाड्ढे शशसंज्ञितम्। न विदुः सोमदेवाउपि ये चर नक्षत्रयोगिन: अब्दकृत् कालयोगात्मा ईज्यो यज्ञरसोउव्ययः

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 36

वरं चास्मै ददौ प्रीतो विपुलं वंशम् ईश्वरः ।आचन्द्रार्कग्रहा भूमिर् भवेद् इति मतिर् मम ।अपौरवा न तु मही भविष्यति कदा चन ।तत्र गाथा महाराज शृणु गीता ययातिना याभिः प्रत्याहरेत् कामान् सर्वशो ऽङ्गानि कूर्मवत्

varaṃ cāsmai dadau prīto vipulaṃ vaṃśam īśvaraḥ | ācandrārkagrahā bhūmir bhaved iti matir mama | apauravā na tu mahī bhaviṣyati kadā cana | tatra gāthā mahārāja śṛṇu gītā yayātinā yābhiḥ pratyāharet kāmān sarvaśo 'ṅgāni kūrmavat

हिन्दी अर्थ

त्वं कान्ति: कान्तवपुषां त्वं सोम: सोमवृत्तिनाम्। सौम्यस्त्वं सर्वभूतानां तिमिरष्रस्त्वमृक्षराट् वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब सामने ही स्थित, हिमसे आयुधका काम लेनेवाले चन्द्रमाको समझाने लगे इन्द्रने कहा--सोम! आप जाइये और पाशधारी वरुणकी सहायता कीजिये। ऐसा करनेसे असुरोंका संहार और देवताओंकी विजय होगी॥ २॥ आपका पराक्रम अनृपम है। आप ग्रह-नक्षत्रोंके अधिपतियोंके भी अधिपति

English

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अध्याय २२

श्लोक 37

स सुखी धृतिमान् धन्यः परत्रेह च मोदते ।न जातु कामः कामानाम् उपभोगेन शाम्यति हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते

sa sukhī dhṛtimān dhanyaḥ paratreha ca modate | na jātu kāmaḥ kāmānām upabhogena śāmyati haviṣā kṛṣṇavartmeva bhūya evābhivardhate

हिन्दी अर्थ

हैं। रसके तत्त्वको जाननेवाले विद्वानोंका यह अनुभव है कि सब प्राणियोंमें जो रस है, वह आपका ही है॥३॥ समुद्रके समान आपके मण्डलकी क्षय-वृद्धि सदा अव्यक्त रहती है। आप संसारमें कालको प्रवर्तित करते हुए दिन और रात्रिका परिवर्तन करते रहते हैं सोम आपके अड्ढू (मण्डलके मध्य )-में पृथ्वीलोकको छाया (प्रतिबिम्ब) ही शश नामक चिह्न है। नक्षत्रोंका विचार करनेवाले विद्वान् और चन्द्रोपासक भी आपको (वास्तविक रूपमें) नहीं जान सकते॥५॥ आप आदित्यपथसे भी ऊर्ध्वदेशमें और सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डलोंके भी ऊपर स्थित रहते हैं। आप अपने (तेजोमय) शरीरके द्वारा अन्धकारको दूर कर समस्त संसारको प्रकाशित करते हैं॥६॥ आपकी किरणें श्रेतवर्णकी हैं। आपका

English

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अध्याय २२

श्लोक 38

यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्व् अमङ्गलं ।समदृष्टेस् तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिशः ।यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः नालम् एकस्य तत् सर्वम् इति मत्वा शमं व्रजेत्

yadā na kurute bhāvaṃ sarvabhūteṣv amaṅgalaṃ | samadṛṣṭes tadā puṃsaḥ sarvāḥ sukhamayā diśaḥ | yat pṛthivyāṃ vrīhiyavaṃ hiraṇyaṃ paśavaḥ striyaḥ nālam ekasya tat sarvam iti matvā śamaṃ vrajet

हिन्दी अर्थ

शरीर हिममय है। आप नक्षत्रोंक स्वामी, शशके चिह्से युक्त, संवत्सररूप (काल)-के रचयिता, कालयोगस्वरूप, पूजनीय, (वर्षा आदिके रूपमें) यज्ञके रस और अव्यय (प्रवाहरूपसे नित्य) हैं॥ ७॥ आप (अन्नादि) ओषधियोंके स्वामी, क्रियाओं और जलके उत्पत्तिस्थान तथा स्वभावसे ही शीतलता धारण करनेवाले हैं। आपकी किरणें शीतल हैं। आप अमृतके आधार हैं, चपल हैं। आपका वाहन श्रेतवर्णका है॥ ८॥ आप ही कान्तिमान् शरीरवाले नर- नारियों और देवताओंकी कान्ति हैं और सोमसे जीविका चलानेवाले देवसमूहके लिये आप ही सोम हैं। आप सभी प्राणियोंके लिये सौम्य हैं, अन्धकारका नाश करनेवाले हैं तथा नक्षत्रोंक राजा हैं यन्मां वदसि युद्धार्थ देवराज जगत्पते। एष वर्षामि शिशिरं हैत्यमायापकर्षणम्

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 39

उत्पन्नस्य रुरोः शृङ्गं वर्धमानस्यवर्धते ।यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म संपद्यते तदा

utpannasya ruroḥ śṛṅgaṃ vardhamānasyavardhate | yadā bhāvaṃ na kurute sarvabhūteṣu pāpakam karmaṇā manasā vācā brahma saṃpadyate tadā

हिन्दी अर्थ

ततो हिमकरोत्सूष्टा: सबाष्पा हिमवृष्टय: । वेष्टयन्ति सम तान् घोरान् हैत्यान् मेघणणा इब जगत संवर्तकाम्भोहैः प्रवृष्टरेव संवृतम् शमयामासतुर्मायां देवौ हैतेयनिर्मिताम् न शेकुश्चलितुं देत्या विशिरस्का इवाद्रय:

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 40

यदान्येभ्यो न बिभेति यदा चास्मान् न बिभ्यति यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म संपद्यते तदा

yadānyebhyo na bibheti yadā cāsmān na bibhyati yadā necchati na dveṣṭi brahma saṃpadyate tadā

हिन्दी अर्थ

तेषां तु दिवि हैत्यानां विपरीतप्रभाणि च। विमानानि विचित्राणि निपतन्त्युत्पतन्ति च अतः आप सेना लेकर (युद्धके लिये) तैयार खड़े हुए इन वरुणदेवके साथ जाइये और समराज्गणमें जिससे हम जल रहे हैं, उस आसुरी मायाको शान्त कीजिये सोमने कहा--देवराज! जगत्पते! आप युद्धके लिये मुझसे जो कुछ कह रहे हैं, उसके अनुसार मैं अभी हैत्योंकी मायाको नष्ट करनेके लिये हिमकी वर्षा करता हूँ॥ ११॥ देखिये, इस महासमरमें ये दानव किस प्रकार मेरे बरसाये हुए ओलोंसे दग्ध होते हैं। हिमसे आवेष्टित होनेपर कैसे इनकी माया नष्ट होती है और किस तरह इनका सारा मद उतर जाता है

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 41

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर् या न जीर्यति जीर्यतः ।यो ऽसौप्राणान्तिको रोगस् तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥ जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।धनाशा जीविताशा च जीर्यतो ऽपि न जीर्यति ॥ यच् च कामसुखं लोके यच् च दिव्यं महत् सुखम् ।तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ।तां तृष्णां दुःखनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत् ।चक्षुःश्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैकातरुणायते ।एवम् उक्त्वा स राजर्षिः सदारः प्राविशद् वनम् कालेन महता चापि चचार विपुलं तपः

yā dustyajā durmatibhir yā na jīryati jīryataḥ | yo 'sauprāṇāntiko rogas tāṃ tṛṣṇāṃ tyajataḥ sukham || jīryanti jīryataḥ keśā dantā jīryanti jīryataḥ | dhanāśā jīvitāśā ca jīryato 'pi na jīryati || yac ca kāmasukhaṃ loke yac ca divyaṃ mahat sukham | tṛṣṇākṣayasukhasyaite nārhataḥ ṣoḍaśīṃ kalām | tāṃ tṛṣṇāṃ duḥkhanivahāṃ śarmakāmo drutaṃ tyajet | cakṣuḥśrotre ca jīryete tṛṣṇaikātaruṇāyate | evam uktvā sa rājarṣiḥ sadāraḥ prāviśad vanam kālena mahatā cāpi cacāra vipulaṃ tapaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! तदनन्तर चन्द्रमाकी छोड़ी हुई सुन्दर भापसहित ओलोंकी वर्षने मेघोंकी भाँति उन भयंकर हैत्योंको जकड़ना आरम्भ कर दिया॥ १३॥ उस महायुद्धमें पाशधारी वरुण और श्रेत किरणोंवाले चन्द्रमा पाशसे मारकर और ओले गिराकर दानवोंका संहार करने लगे॥ १४॥ पाश और हिमका प्रहार करनेवाले वे दोनों जलके स्वामी वरुण और सोम जलकी वर्षा करते हुए क्षोभमें भरे हुए दो समुद्रोंक समान संग्राममें विचरने लगे॥ १५ ॥ उन दोनोंके द्वारा की गयी जलवर्षासे आप्लावित हुई वह दानवोंकी सेना प्रलयकालमें प्रबल वर्षा करनेवाले संवर्तक मेघोंके द्वारा अनन्त जलराशिमें डुबाये गये जगत्के समान दीखने लगी॥ १६॥ (इस प्रकार) चन्द्रदेव और वरुणदेव दोनों उस युद्धमें अपनी किरणों और पाशोंका प्रयोग करके हैत्योंकी रची हुई मायाका शमन करने लगे

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 42

भृगुतुङ्गे तपश् चीर्त्वा तपसो ऽन्ते महायशाः अनश्नन् देहम् उत्सृज्य सदारः स्वर्गम् आप्तवान्

bhṛgutuṅge tapaś cīrtvā tapaso 'nte mahāyaśāḥ anaśnan deham utsṛjya sadāraḥ svargam āptavān

हिन्दी अर्थ

शीतल किरणोंवाले चन्द्रमाके (हिम) जलसे अकड़े हुए और (वरुणके) पाशोंसे जकड़े हुए हैत्य रणमें शिखरहीन पर्वतोंकी भाँति हिल-डुल भी न सके॥ १८ ॥ शीतरश्मि चन्द्रमाकी मार खाकर हिमसे पीड़ित हुए हैत्य पृथ्वीपर गिरने लगे। उनके सारे अज्ग बर्फसे ढक गये थे। उस समय वे उष्णतारहित अग्रिके समान जान पड़ते थे फिर तो स्वर्गमें हैत्योंके विचित्र विमान प्रभाहीन होकर गिरने और गिरकर उछलने लगे॥ २०॥ मायावी दानव मयने देखा कि स्वर्गमें बहुत-से दानवोंको पाशधारी वरुणने जकड़ लिया है और बहुतोंको शीतल किरणोंवाले चन्द्रमाने बर्फसे ढक दिया है

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 43

तस्य वंशे महाराज पञ्च राजर्षिसत्तमाः यैर् व्याप्ता पृथिवी सर्वा सूर्यस्येव गभस्तिभिः

tasya vaṃśe mahārāja pañca rājarṣisattamāḥ yair vyāptā pṛthivī sarvā sūryasyeva gabhastibhiḥ

हिन्दी अर्थ

पादपोत्कटकूटाग्रां कन्दराकीर्णकाननाम् सिंहव्याप्रगजाकीर्णा नदन्तीमिव यूथपैः। ईहामृगगणाकीर्णा पवनाघूर्णितद्रुमाम् निर्मितां स्वेन पुत्रेण क्रोज्लेन दवि कामगाम्। प्रथितां पार्वती मायां ससृजे दानवोत्तम: निजलद्चे देवसंघांस्तान् दानवां श्राप्पजीवयतू

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 44

यदोस् तु शृणु राजर्षे वंशं राजर्षिसत्कृतम् यत्र नारायणो जज्ञे हरिर् वृष्णिकुलोद्वहः

yados tu śṛṇu rājarṣe vaṃśaṃ rājarṣisatkṛtam yatra nārāyaṇo jajñe harir vṛṣṇikulodvahaḥ

हिन्दी अर्थ

नैशाकरी वारुणी च मायेउन्तर्दधतस्ततः। अश्मभिश्चायसघनै: कीर्णा देवगणा रणे नानिरुद्धों द्रुमगणैर्देवोडदृश्यत संयुगे कालज्ञ: कालमेघाभ: समैक्षत् कालमाहवे। देवासुरविमर्द स द्र॒ष्टुकामो जनार्दनः 38 पक्काश्क्रावषएप्रात्मा5०टाणा9 छा

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

अध्याय २२

श्लोक 45

स्वस्थः प्रजावान् आयुष्मान् कीर्तिमांश् च भवेन् नरः धन्यस्य महतो धर्म्यं श्रीमतो धीमतस्तथा ।ययातेश् चरितं नित्यम् इदं शृण्वन् नराधिप

svasthaḥ prajāvān āyuṣmān kīrtimāṃś ca bhaven naraḥ dhanyasya mahato dharmyaṃ śrīmato dhīmatastathā | yayāteś caritaṃ nityam idaṃ śṛṇvan narādhipa

हिन्दी अर्थ

तब उस दानव-शिरोमणिने स्वर्गमें अपने पुत्र क्रौद्के द्वारा निर्मित सुप्रसिद्ध पार्वती मायाकों प्रकट किया, जो इच्छानुसार सर्वत्र पहुँच जानेवाली थी। वह शिलाओंका विशाल जाल-सा बिछा देती थी, भारी- भारी चट्टानोंको गिराकर उनके धमाकेकी आवाजके रूपमें मानो अट्टटास करती थी। उन शिलाओंके शिरोभाग वृक्षोंके कारण खुरदरे हो रहे थे। उस पार्वती मायाके काननप्रान्त गुफाओंसे व्याप्त थे। वहाँ सिंह, व्याप्र और बड़े-बड़े गजराज भरे हुए थे। यूथपतियोंके चिग्घाड़ने या दहाड़नेके शब्दसे मानो वह माया सिंहनाद-सा करती प्रतीत होती थी। उस मायामयी पर्वतमालामें सब ओर भेड़िये भरे थे। वहाँके वृक्ष प्रचण्ड वायुके झोंके खाकर झूम रहे थे॥ २२--२४॥ उस पार्वती मायाने चट्टानोंके टकरानेकी आवाजसे, पत्थरोंकी वर्षासे और गिरते हुए वृक्षसमूहोंसे देवसमुदायको मारना आरम्भ किया। इससे हैत्योंके जीमें-जी आया॥ २५॥ उस हैत्यकी मायाके

English

¹⁰⁵ A measure of time equal to thirty Kalas or four minutes.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता · Identifier:

Harivamsha Purana — Chapter 22

हरिवंशपुराण

संस्कृत संस्करण · Sanskrit Edition:

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गणना पद्धति टिप्पणी · Numbering System:

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