अध्याय १३
श्लोक 1
इत्य् उक्तो ऽहं भगवता देवदेवेन भास्वता सनत्कुमारेण पुनः पृष्टवान् देवम् अव्ययम्
ity ukto 'haṃ bhagavatā devadevena bhāsvatā sanatkumāreṇa punaḥ pṛṣṭavān devam avyayam
हिन्दी अर्थ
संतुष्ट करते रहते थे॥३८॥ इससे महादेवी पार्वती तो प्रसन्न रहती थीं, परंतु उनकी माता मेनाको संतोष नहीं होता था। वे महादेवी पार्वती तथा भगवान् शट्भूरकी बारम्बार निन््दा ही करती थीं॥३९॥ उन्होंने एक दिन कहा--'उमे ! तेरे पति महादेव और उनके पार्षद सभी अनाचारी हैं। साथ ही वे भोलेनाथ सदाके दरिद्र हैं। शील तो उनमें नाममात्रको भी नहीं है '॥ ४० ॥ वरदायिनी उमा माताके ऐसा कहनेपर स्त्रीस्वभाववश कुपित हो उठीं और किश्ञित् मुसकराकर महादेवजीके पास आयी ॥ ४१॥ उस समय उनका मुख मलिन हो रहा था। निकट आकर देवीने महादेवजीसे कहा--देव! अब मैं यहाँ (नैहरमें) नहीं रहूँगी। आप मुझे अपने घर ले चलें'॥ ४२॥ कुरुनन्दन! पार्वतीजीके कथनानुसार कार्य करनेके लिये महादेवजीने सम्पूर्ण लोकोंपर दृष्टिपात किया। उन महातेजस्वी महेश्वरने पृथ्वीपर अपने रहनेके लिये सिद्धिक्षेत्र वारणसीपुरीको पसंद किया। परंतु उस नगरीमें
English
⁵² A reciter of the prayers &c. of the Sama Veda.