Durga Saptashati· Durgā Saptaśatī
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अध्याय 1 / 13

Chapter 1 — The Awakening of Mahakali

प्रथम चरित्र — महाकाली

104 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ104 श्लोक

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अध्याय १

श्लोक 1.1

ॐ ऐं मार्कण्डेय उवाच

OM aiM mArkaNDeya uvAcha

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी बोले--

English

Om! Reverence to Chandika. Markandeya spoke:

अध्याय १

श्लोक 1.2

सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः ।निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद्गदतो मम

sAvarNiH sUryatanayo yo manuH kathyate.aShTamaH | nishAmaya tadutpattiM vistarAdgadato mama

हिन्दी अर्थ

सूर्यके पुत्र सावर्णि जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्तिकी कथा विस्तारपूर्वक कहता हूँ, सुनो

English

Surya's son Savarni is he who is called the eighth Manu. Hear about his birth, as I tell it at full length,

अध्याय १

श्लोक 1.3

महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः ।स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः

mahAmAyAnubhAvena yathA manvantarAdhipaH | sa babhUva mahAbhAgaH sAvarNistanayo raveH

हिन्दी अर्थ

महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिप: । स बभूव महाभाग: सावर्णिस्तनयो रवे:

English

how by reason of the authority of the Great Illusion that illustrious son of the Sun, Savarni, became the king of the eighth manvantara.

अध्याय १

श्लोक 1.4

स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः ।सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले

svArochiShe.antare pUrvaM chaitravaMshasamudbhavaH | suratho nAma rAjAbhUtsamaste kShitimaNDale

हिन्दी अर्थ

स्वारोचिषे&न्तरे पूर्व चैत्रवंशसमुद्धव: । सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले

English

In times ago in the Svarochisha period, a king named Suratha, sprung of the race of Chaitra, reigned over the whole earth.

अध्याय १

श्लोक 1.5

तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ।बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा

tasya pAlayataH samyak prajAH putrAnivaurasAn | babhUvuH shatravo bhUpAH kolAvidhvaMsinastadA

हिन्दी अर्थ

वे प्रजाका अपने औरस पुत्रोंकी भाँति धर्मपूर्वक पालन करते थे; फिर भी उस समय कोलाविध्वंसीः नामके क्षत्रिय उनके शत्रु हो गये

English

And while he guarded his subjects duly as if they were his own children, there arose hostile kings, who did not destroy the Kolas.

अध्याय १

श्लोक 1.6

तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः ।न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः

tasya tairabhavad yuddhamatiprabaladaNDinaH | nyUnairapi sa tairyuddhe kolAvidhvaMsibhirjitaH

हिन्दी अर्थ

राजा सुरथकी दण्डनीति बड़ी प्रबल थी। उनका शत्रुओंके साथ संग्राम हुआ। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्यामें कम थे तो भी राजा सुरथ युद्धमें उनसे परास्त हो गये

English

He, the bearer of a very powerful sceptre, had war with them, and was defeated in war by them, inferior though they were, those non-destroyers of the Kolas.

अध्याय १

श्लोक 1.7

ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत् ।आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः

tataH svapuramAyAto nijadeshAdhipo.abhavat | AkrAntaH sa mahAbhAgastaistadA prabalAribhiH

हिन्दी अर्थ

तब वे युद्धभूमिसे अपने नगरको लौट आये और केवल अपने देशके राजा होकर रहने लगे (समूची पृथ्वीसे अब उनका अधिकार जाता रहा) किंतु वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओंने उस समय महाभाग राजा सुरथपर आक्रमण कर दिया

English

Then coming to his own city he reigned as king over his own country. That illustrious king was attacked then by those powerful enemies.

अध्याय १

श्लोक 1.8

अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः ।कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः

amAtyairbalibhirduShTairdurbalasya durAtmabhiH | kosho balaM chApahR^itaM tatrApi svapure tataH

हिन्दी अर्थ

राजाका बल क्षीण हो चला था; इसलिये उनके दुष्ट, बलवान एवं दुरात्मा मन्त्रियोंने वहाँ उनकी राजधानीमें भी राजकीय सेना और खजानेको वहाँसे हथिया लिया

English

His powerful and corrupt ministers, who were evil-disposed to a weak person, thereupon robbed him of treasury and army even there in his own city.

अध्याय १

श्लोक 1.9

ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः ।एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम्

tato mR^igayAvyAjena hR^itasvAmyaH sa bhUpatiH | ekAkI hayamAruhya jagAma gahanaM vanam

हिन्दी अर्थ

सुरथका प्रभुत्व नष्ट हो चुका था, इसलिये वे शिकार खेलनेके बहाने घोड़ेपर सवार हो वहाँसे अकेले ही एक घने जड़लमें चले गये

English

Hence the king, deprived of his sovereignty, departed alone on horseback to a dense forest under the pretence of hunting.

अध्याय १

श्लोक 1.10

स तत्राश्रममद्राक्षीद्द्विजवर्यस्य मेधसः ।प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम्

sa tatrAshramamadrAkShIddvijavaryasya medhasaH | prashAntashvApadAkIrNaM munishiShyopashobhitam

हिन्दी अर्थ

स तत्राश्रममद्राक्षीद्‌ द्विजवर्यस्य मेधस: । प्रशान्तश्चापदाकीर्ण मुनिशिष्योपशोभितम्‌

English

There he saw the hermitage of the noble twice-born Medhas, inhabited by wild animals which were peaceful, graced by the muni's disciples.

अध्याय १

श्लोक 1.11

तस्थौ कञ्चित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृतः ।इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन् मुनिवराश्रमे

tasthau ka~nchitsa kAlaM cha muninA tena satkR^itaH | itashchetashcha vicharaMstasmin munivarAshrame

हिन्दी अर्थ

तस्थौ कंचित्स काल॑ च मुनिना तेन सत्कृत: । इतश्रैतश्न विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे

English

And he dwelt there some time, honoured by the muni, roaming hither and thither in that fine hermitage of the muni.

अध्याय १

श्लोक 1.12

सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टमानसः ।मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत्

so.achintayattadA tatra mamatvAkR^iShTamAnasaH | matpUrvaiH pAlitaM pUrvaM mayA hInaM puraM hi tat

हिन्दी अर्थ

फिर ममतासे आकृष्टचित्त होकर उस आश्रममें इस प्रकार चिन्ता करने लगे-- 'पूर्वकालमें मेरे पूर्वजोंने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मदकी वर्षा करनेवाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओंके अधीन होकर न जाने किन भोगोंको भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पानेसे सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओंका अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगोंके द्वारा सदा खर्च होते रहनेके कारण अत्यन्त कष्टसे जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा।' ये तथा और कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधाके आश्रमके निकट एक वैश्यको देखा और उससे पूछा--'भाई! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने-से दिखायी देते हो?” राजा सुरथका यह प्रेमपूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्यने विनीत-भावसे उन्हें प्रणाम करके कहा--

English

He fell into thought there then, his mind being distraught by selfishness, egotistical: 'Lost indeed is the city which I guarded formerly, and which was guarded by my forefathers.'

अध्याय १

श्लोक 1.13

मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा ।न जाने स प्रधानो मे शूरो हस्ती सदामदः

madbhR^ityaistairasadvR^ittairdharmataH pAlyate na vA | na jAne sa pradhAno me shUro hastI sadAmadaH

हिन्दी अर्थ

फिर ममतासे आकृष्टचित्त होकर उस आश्रममें इस प्रकार चिन्ता करने लगे-- 'पूर्वकालमें मेरे पूर्वजोंने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मदकी वर्षा करनेवाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओंके अधीन होकर न जाने किन भोगोंको भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पानेसे सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओंका अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगोंके द्वारा सदा खर्च होते रहनेके कारण अत्यन्त कष्टसे जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा।' ये तथा और कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधाके आश्रमके निकट एक वैश्यको देखा और उससे पूछा--'भाई! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने-से दिखायी देते हो?” राजा सुरथका यह प्रेमपूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्यने विनीत-भावसे उन्हें प्रणाम करके कहा--

English

'Whether it is guarded righteously or not by those my servants of wicked conduct, I know not. My chief war-elephant, always ardent,'

अध्याय १

श्लोक 1.14

मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते ।ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः

mama vairivashaM yAtaH kAn bhogAnupalapsyate | ye mamAnugatA nityaM prasAdadhanabhojanaiH

हिन्दी अर्थ

फिर ममतासे आकृष्टचित्त होकर उस आश्रममें इस प्रकार चिन्ता करने लगे-- 'पूर्वकालमें मेरे पूर्वजोंने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मदकी वर्षा करनेवाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओंके अधीन होकर न जाने किन भोगोंको भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पानेसे सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओंका अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगोंके द्वारा सदा खर्च होते रहनेके कारण अत्यन्त कष्टसे जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा।' ये तथा और कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधाके आश्रमके निकट एक वैश्यको देखा और उससे पूछा--'भाई! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने-से दिखायी देते हो?” राजा सुरथका यह प्रेमपूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्यने विनीत-भावसे उन्हें प्रणाम करके कहा--

English

'has passed into the power of my foes; what pleasures will he obtain? They who were my constant followers, favoured with grace, riches and food,'

अध्याय १

श्लोक 1.15

अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम् ।असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम्

anuvR^ittiM dhruvaM te.adya kurvantyanyamahIbhR^itAm | asamyagvyayashIlaistaiH kurvadbhiH satataM vyayam

हिन्दी अर्थ

फिर ममतासे आकृष्टचित्त होकर उस आश्रममें इस प्रकार चिन्ता करने लगे-- 'पूर्वकालमें मेरे पूर्वजोंने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मदकी वर्षा करनेवाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओंके अधीन होकर न जाने किन भोगोंको भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पानेसे सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओंका अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगोंके द्वारा सदा खर्च होते रहनेके कारण अत्यन्त कष्टसे जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा।' ये तथा और कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधाके आश्रमके निकट एक वैश्यको देखा और उससे पूछा--'भाई! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने-से दिखायी देते हो?” राजा सुरथका यह प्रेमपूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्यने विनीत-भावसे उन्हें प्रणाम करके कहा--

English

'now assuredly pay court to other kings. The treasure which I amassed with great difficulty, squandered continually by those men addicted to unbecoming expenditure,'

अध्याय १

श्लोक 1.16

सञ्चितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति ।एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः

sa~nchitaH so.atiduHkhena kShayaM kosho gamiShyati | etachchAnyachcha satataM chintayAmAsa pArthivaH

हिन्दी अर्थ

फिर ममतासे आकृष्टचित्त होकर उस आश्रममें इस प्रकार चिन्ता करने लगे-- 'पूर्वकालमें मेरे पूर्वजोंने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मदकी वर्षा करनेवाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओंके अधीन होकर न जाने किन भोगोंको भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पानेसे सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओंका अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगोंके द्वारा सदा खर्च होते रहनेके कारण अत्यन्त कष्टसे जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा।' ये तथा और कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधाके आश्रमके निकट एक वैश्यको देखा और उससे पूछा--'भाई! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने-से दिखायी देते हो?” राजा सुरथका यह प्रेमपूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्यने विनीत-भावसे उन्हें प्रणाम करके कहा--

English

'will go to waste.' These and other matters the king thought of continually.

अध्याय १

श्लोक 1.17

तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः ।स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्चागमनेऽत्र कः

tatra viprAshramAbhyAshe vaishyamekaM dadarsha saH | sa pR^iShTastena kastvaM bho hetushchAgamane.atra kaH

हिन्दी अर्थ

फिर ममतासे आकृष्टचित्त होकर उस आश्रममें इस प्रकार चिन्ता करने लगे-- 'पूर्वकालमें मेरे पूर्वजोंने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मदकी वर्षा करनेवाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओंके अधीन होकर न जाने किन भोगोंको भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पानेसे सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओंका अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगोंके द्वारा सदा खर्च होते रहनेके कारण अत्यन्त कष्टसे जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा।' ये तथा और कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधाके आश्रमके निकट एक वैश्यको देखा और उससे पूछा--'भाई! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने-से दिखायी देते हो?” राजा सुरथका यह प्रेमपूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्यने विनीत-भावसे उन्हें प्रणाम करके कहा--

English

Near the brahman's hermitage there he saw a solitary vaishya, and asked him, 'Ho! who art thou? and what is the reason of thy coming here?'

अध्याय १

श्लोक 1.18

सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे ।इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम्

sashoka iva kasmAttvaM durmanA iva lakShyase | ityAkarNya vachastasya bhUpateH praNayoditam

हिन्दी अर्थ

फिर ममतासे आकृष्टचित्त होकर उस आश्रममें इस प्रकार चिन्ता करने लगे-- 'पूर्वकालमें मेरे पूर्वजोंने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मदकी वर्षा करनेवाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओंके अधीन होकर न जाने किन भोगोंको भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पानेसे सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओंका अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगोंके द्वारा सदा खर्च होते रहनेके कारण अत्यन्त कष्टसे जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा।' ये तथा और कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधाके आश्रमके निकट एक वैश्यको देखा और उससे पूछा--'भाई! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने-से दिखायी देते हो?” राजा सुरथका यह प्रेमपूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्यने विनीत-भावसे उन्हें प्रणाम करके कहा--

English

'Why appearest thou as if full of sorrow, as if afflicted in mind?' Hearing this speech of the king, which was uttered in friendly mood,

अध्याय १

श्लोक 1.19

प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम्

pratyuvAcha sa taM vaishyaH prashrayAvanato nR^ipam

हिन्दी अर्थ

फिर ममतासे आकृष्टचित्त होकर उस आश्रममें इस प्रकार चिन्ता करने लगे-- 'पूर्वकालमें मेरे पूर्वजोंने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मदकी वर्षा करनेवाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओंके अधीन होकर न जाने किन भोगोंको भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पानेसे सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओंका अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगोंके द्वारा सदा खर्च होते रहनेके कारण अत्यन्त कष्टसे जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा।' ये तथा और कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधाके आश्रमके निकट एक वैश्यको देखा और उससे पूछा--'भाई! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने-से दिखायी देते हो?” राजा सुरथका यह प्रेमपूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्यने विनीत-भावसे उन्हें प्रणाम करके कहा--

English

the vaishya, bowing respectfully, replied to the king.

अध्याय १

श्लोक 1.20

वैश्य उवाच

vaishya uvAcha

हिन्दी अर्थ

वैश्य (समाधि) बोले:

English

The vaishya spoke:

अध्याय १

श्लोक 1.21

समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले

samAdhirnAma vaishyo.ahamutpanno dhaninAM kule

हिन्दी अर्थ

राजन! मैं धनियोंके कुलमें उत्पन्न एक वैश्य हूँ। मेरा नाम समाधि है

English

I am a vaishya, Samadhi by name, born in a family of wealthy folk.

अध्याय १

श्लोक 1.22

पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः ।विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम्

putradArairnirastashcha dhanalobhAdasAdhubhiH | vihInashcha dhanairdAraiH putrairAdAya me dhanam

हिन्दी अर्थ

मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रोंने धनके लोभसे मुझे घरसे बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्रसे वज्चित हूँ। मेरे विश्वसनीय बन्धुओंने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है, इसलिये दु:ःखी होकर मैं वनमें चला आया हूँ। यहाँ रहकर मैं इस बातको नहीं जानता कि मेरे पुत्रोंकी, सत्रीकी और स्वजनोंकी कुशल है या नहीं। इस समय घरमें वे कुशलसे रहते हैं अथवा उन्हें कोई कष्ट है?

English

I have been cast out by my sons and wife, who are wicked through greed for wealth; and bereft of riches, wife and sons, my wealth taken by them,

अध्याय १

श्लोक 1.23

वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः ।सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम्

vanamabhyAgato duHkhI nirastashchAptabandhubhiH | so.ahaM na vedmi putrANAM kushalAkushalAtmikAm

हिन्दी अर्थ

वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्नाप्तबन्धुभि: । सो<हं न वेदिम पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम्‌

English

I have come to the forest, unhappy and cast out by my trusted kinsmen. In this state I know not the welfare or misfortune of my sons,

अध्याय १

श्लोक 1.24

प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः ।किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम्

pravR^ittiM svajanAnAM cha dArANAM chAtra saMsthitaH | kiM nu teShAM gR^ihe kShemamakShemaM kiM nu sAmpratam

हिन्दी अर्थ

मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रोंने धनके लोभसे मुझे घरसे बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्रसे वज्चित हूँ। मेरे विश्वसनीय बन्धुओंने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है, इसलिये दु:ःखी होकर मैं वनमें चला आया हूँ। यहाँ रहकर मैं इस बातको नहीं जानता कि मेरे पुत्रोंकी, सत्रीकी और स्वजनोंकी कुशल है या नहीं। इस समय घरमें वे कुशलसे रहते हैं अथवा उन्हें कोई कष्ट है?

English

nor the tidings of my family nor of my wife, and here I dwell. Is welfare theirs at home now, or ill-luck?

अध्याय १

श्लोक 1.25

कथं ते किं नु सद्वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः

kathaM te kiM nu sadvR^ittA durvR^ittAH kiM nu me sutAH

हिन्दी अर्थ

वे मेरे पुत्र कैसे हैं? क्‍या वे सदाचारी हैं अथवा दुराचारी हो गये हैं

English

How are they? Are my sons living good or evil lives?

अध्याय १

श्लोक 1.26

राजोवाच

rAjovAcha

हिन्दी अर्थ

राजाने पूछा--

English

The king spoke:

अध्याय १

श्लोक 1.27

यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः

yairnirasto bhavA.NllubdhaiH putradArAdibhirdhanaiH

हिन्दी अर्थ

जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदिने धनके कारण तुम्हें घरसे निकाल दिया, उनके प्रति तुम्हारे चित्तमें इतना स्नेह क्यों है?

English

Those covetous folk, thy sons and wife and others, who have cast thee out from thy wealth—

अध्याय १

श्लोक 1.28

तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम्

teShu kiM bhavataH snehamanubadhnAti mAnasam

हिन्दी अर्थ

जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदिने धनके कारण तुम्हें घरसे निकाल दिया, उनके प्रति तुम्हारे चित्तमें इतना स्नेह क्यों है?

English

why dost thou, Sir, fix thy mental affection on them?

अध्याय १

श्लोक 1.29

वैश्य उवाच

vaishya uvAcha

हिन्दी अर्थ

वैश्य (समाधि) बोले:

English

The vaishya spoke:

अध्याय १

श्लोक 1.30

एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः

evametadyathA prAha bhavAnasmadgataM vachaH

हिन्दी अर्थ

एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वच:

English

This very thought has occurred to me, just as thou hast uttered it, Sir.

अध्याय १

श्लोक 1.31

किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः ।यैः सन्त्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः

kiM karomi na badhnAti mama niShThuratAM manaH | yaiH santyajya pitR^isnehaM dhanalubdhairnirAkR^itaH

हिन्दी अर्थ

किंतु क्‍या करूँ, मेरा मन निछ्ठरता नहीं धारणा करता। जिन्होंने धनके लोभमें पड़कर पिताके प्रति स्नेह, पतिके प्रति प्रेम तथा आत्मीय जनके प्रति अनुरागको तिलाञ्जलि दे मुझे घरसे निकाल दिया है, उन्हींके पति मेरे हृदयमें इतना स्नेह है। महामते! गुणहीन बन्धुओंके प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार प्रेममग्न हो रहा है, यह क्या है--इस बातको मैं जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी साँसें ले रहा हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित हो रहा है

English

What can I do? My mind does not entertain implacability towards those who, abandoning affection for a father, have driven me out in their greed for riches.

अध्याय १

श्लोक 1.32

पतिस्वजनहार्दं च हार्दितेष्वेव मे मनः ।किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते

patisvajanahArdaM cha hArditeShveva me manaH | kimetannAbhijAnAmi jAnannapi mahAmate

हिन्दी अर्थ

किंतु क्‍या करूँ, मेरा मन निछ्ठरता नहीं धारणा करता। जिन्होंने धनके लोभमें पड़कर पिताके प्रति स्नेह, पतिके प्रति प्रेम तथा आत्मीय जनके प्रति अनुरागको तिलाञ्जलि दे मुझे घरसे निकाल दिया है, उन्हींके पति मेरे हृदयमें इतना स्नेह है। महामते! गुणहीन बन्धुओंके प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार प्रेममग्न हो रहा है, यह क्या है--इस बातको मैं जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी साँसें ले रहा हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित हो रहा है

English

My mind, which bears affection as of a master to his family, is affectionate to those very persons. I do not comprehend, although I know it, O high-minded Sir,

अध्याय १

श्लोक 1.33

यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु ।तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते

yatpremapravaNaM chittaM viguNeShvapi bandhuShu | teShAM kR^ite me niHshvAso daurmanasyaM cha jAyate

हिन्दी अर्थ

किंतु क्‍या करूँ, मेरा मन निछ्ठरता नहीं धारणा करता। जिन्होंने धनके लोभमें पड़कर पिताके प्रति स्नेह, पतिके प्रति प्रेम तथा आत्मीय जनके प्रति अनुरागको तिलाञ्जलि दे मुझे घरसे निकाल दिया है, उन्हींके पति मेरे हृदयमें इतना स्नेह है। महामते! गुणहीन बन्धुओंके प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार प्रेममग्न हो रहा है, यह क्या है--इस बातको मैं जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी साँसें ले रहा हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित हो रहा है

English

how it is that the mind is prone to love even towards worthless kinsmen. On their account my sighs flow and distress of mind arises.

अध्याय १

श्लोक 1.34

करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम्

karomi kiM yanna manasteShvaprItiShu niShThuram

हिन्दी अर्थ

उन लोगोंमें प्रेमका सर्वथा अभाव है तो भी उनके प्रति जो मेरा मन निष्ठुर नहीं हो पाता, इसके लिये क्या करूँ

English

What can I do, since my mind is not relentless to those unloving relatives?

अध्याय १

श्लोक 1.35

मार्कण्डेय उवाच

mArkaNDeya uvAcha

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--

English

Markandeya spoke:

अध्याय १

श्लोक 1.36

ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ

tatastau sahitau vipra taM muniM samupasthitau

हिन्दी अर्थ

ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ

English

Thereupon they both approached the muni together, O brahman—

अध्याय १

श्लोक 1.37

समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः ।कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम्

samAdhirnAma vaishyo.asau sa cha pArthivasattamaH | kR^itvA tu tau yathAnyAyaM yathArhaM tena saMvidam

हिन्दी अर्थ

समाधिर्नाम वैश्यो5सौ स च पार्थिवसत्तम: । कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथा तेन संविदम्‌

English

the vaishya named Samadhi and the noble king—and having both observed the etiquette worthy of him, as was proper,

अध्याय १

श्लोक 1.38

उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ

upaviShTau kathAH kAshchichchakraturvaishyapArthivau

हिन्दी अर्थ

उपविष्टौ कथा: काश्रिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवो

English

they sat down and held various discourse, the vaishya and the king.

अध्याय १

श्लोक 1.39

राजोवाच

rAjovAcha

हिन्दी अर्थ

राजाने कहा--

English

The king spoke:

अध्याय १

श्लोक 1.40

भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत्

bhagavaMstvAmahaM praShTumichChAmyekaM vadasva tat

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, उसे बताइये

English

Adorable Sir! I desire to ask thee one thing; tell me that,

अध्याय १

श्लोक 1.41

दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना ।ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि

duHkhAya yanme manasaH svachittAyattatAM vinA | mamatvaM gatarAjyasya rAjyA~NgeShvakhileShvapi

हिन्दी अर्थ

मेरा चित्त अपने अधीन न होनेके कारण वह बात मेरे मनको बहुत दुःख देती है। मुनिश्रेष्ठ! जो राज्य मेरे हाथसे चला गया है, उसमें और उसके सम्पूर्ण अज्जोंमें मेरी ममता हो रही है

English

since it tends to afflict my mind without producing submissiveness of my intellect. Though I have lost my kingdom, I have a selfish feeling for it, even with regard to all the requisites of regal administration,

अध्याय १

श्लोक 1.42

जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम ।अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः

jAnato.api yathAj~nasya kimetanmunisattama | ayaM cha nikR^itaH putrairdArairbhR^ityaistathojjhitaH

हिन्दी अर्थ

जानतो<पि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम । अयं च निकृत:ः पुत्रैदरिर्भुत्यैस्तथोज्झित:

English

although I know what it is, yet like one who is ignorant—how is this, O best of munis? And this man has been set at nought and cast off by his children, wife and servants,

अध्याय १

श्लोक 1.43

स्वजनेन च सन्त्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति ।एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ

svajanena cha santyaktasteShu hArdI tathApyati | evameSha tathAhaM cha dvAvapyatyantaduHkhitau

हिन्दी अर्थ

स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति । एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदु:खितौ

English

and when forsaken by his family he is nevertheless exceedingly full of affection towards them. Thus he and I also are both excessively unhappy;

अध्याय १

श्लोक 1.44

दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ ।तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि

dR^iShTadoShe.api viShaye mamatvAkR^iShTamAnasau | tatkimetanmahAbhAga yanmoho j~nAninorapi

हिन्दी अर्थ

जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है, उस विषयके लिये भी हमारे मनमें ममताजनित आकर्षण पैदा हो रहा है। महाभाग! हम दोनों समझदार हैं; तो भी हममें जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है? विवेकशून्य पुरुषकी भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता प्रत्यक्ष दिखायी देती है

English

our minds are drawn by selfish thoughts to this matter, even though we perceive the faults in it. How happens this then, illustrious Sir, that we are deluded although aware of it,

अध्याय १

श्लोक 1.45

ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता

mamAsya cha bhavatyeShA vivekAndhasya mUDhatA

हिन्दी अर्थ

जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है, उस विषयके लिये भी हमारे मनमें ममताजनित आकर्षण पैदा हो रहा है। महाभाग! हम दोनों समझदार हैं; तो भी हममें जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है? विवेकशून्य पुरुषकी भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता प्रत्यक्ष दिखायी देती है

English

and that this state of delusion besets me and him, who are each blind in respect of discrimination?

अध्याय १

श्लोक 1.46

ऋषिरुवाच

R^iShiruvAcha

हिन्दी अर्थ

ऋषि बोले--

English

The rishi spoke:

अध्याय १

श्लोक 1.47

ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे

j~nAnamasti samastasya jantorviShayagochare

हिन्दी अर्थ

महाभाग! विषयमार्गका ज्ञान सब जीवोंको है

English

Every animal has this knowledge in objects cognizable by the senses,

अध्याय १

श्लोक 1.48

विषयाश्च महाभाग यान्ति चैवं पृथक्पृथक् ।दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे

viShayAshcha mahAbhAga yAnti chaivaM pR^ithakpR^ithak | divAndhAH prANinaH kechidrAtrAvandhAstathApare

हिन्दी अर्थ

विषयश्चः महाभाग यातिः चैवं पृथक्‌ पृथक्‌ । दिवान्धा: प्राणिन: केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे

English

and an object of sense reaches it thus in divers ways, illustrious Sir! Some living beings are blind by day, and others are blind at night;

अध्याय १

श्लोक 1.49

केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः ।ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम्

kechiddivA tathA rAtrau prANinastulyadR^iShTayaH | j~nAnino manujAH satyaM kiM tu te na hi kevalam

हिन्दी अर्थ

केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टय: । ज्ञानिनो मनुजा: सत्यं किंः तु ते न हि केवलम्‌

English

some living beings can see equally well by day and at night. Mankind know what is true, but not they alone indeed,

अध्याय १

श्लोक 1.50

यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः ।ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम्

yato hi j~nAninaH sarve pashupakShimR^igAdayaH | j~nAnaM cha tanmanuShyANAM yatteShAM mR^igapakShiNAm

हिन्दी अर्थ

पशु-पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं। मनुष्योंकी समझ भी वैसी ही होती है, जैसी उन मृग और पक्षियोंकी होती है

English

because cattle, birds, wild animals and other creatures all certainly know it; and men have the same knowledge which those wild animals and birds have,

अध्याय १

श्लोक 1.51

मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः ।ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु

manuShyANAM cha yatteShAM tulyamanyattathobhayoH | j~nAne.api sati pashyaitAn pata~NgA~nChAvacha~nchuShu

हिन्दी अर्थ

तथा जैसी मनुष्योंकी होती है, वैसी ही उन मृग-पक्षी आदिकी होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्राय: दोनोंमें समान ही हैं। समझ होनेपर भी इन पक्षियोंको तो देखो, ये स्वयं भूखसे पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चोंकी चोंचमें कितने चावसे अन्नके दाने डाल रहे हैं! नरश्रेष्ठ) क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकारका बदला पानेके लिये पुत्रोंकी अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझकी कमी नहीं है, तथापि वे संसारकी स्थिति (जन्म-मरणकी परम्परा) बनाये रखनेवाले भगवती महामायाके प्रभावद्वारा ममतामय भँवरसे युक्त मोहके गहरे गर्तमें गिराये जाते हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुकी योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हींसे यह जगत्‌ मोहित हो रहा है। वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियोंके भी चित्तको बलपूर्वक खींचकर मोहमें डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर जगतके सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको मुक्तिके लिये वरदान देती हैं। वे ही परा विद्या, संसार- बन्धन और मोक्षकी हेतुभूता सनातनी देवी तथा सम्पूर्ण ईश्वरोंकी भी अधीश्वरी हैं

English

and equally both wild animals and birds have the other knowledge which those men have. Though they have such knowledge, look at these birds,

अध्याय १

श्लोक 1.52

कणमोक्षादृतान् मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा ।मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति

kaNamokShAdR^itAn mohAtpIDyamAnAnapi kShudhA | mAnuShA manujavyAghra sAbhilAShAH sutAn prati

हिन्दी अर्थ

तथा जैसी मनुष्योंकी होती है, वैसी ही उन मृग-पक्षी आदिकी होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्राय: दोनोंमें समान ही हैं। समझ होनेपर भी इन पक्षियोंको तो देखो, ये स्वयं भूखसे पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चोंकी चोंचमें कितने चावसे अन्नके दाने डाल रहे हैं! नरश्रेष्ठ) क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकारका बदला पानेके लिये पुत्रोंकी अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझकी कमी नहीं है, तथापि वे संसारकी स्थिति (जन्म-मरणकी परम्परा) बनाये रखनेवाले भगवती महामायाके प्रभावद्वारा ममतामय भँवरसे युक्त मोहके गहरे गर्तमें गिराये जाते हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुकी योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हींसे यह जगत्‌ मोहित हो रहा है। वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियोंके भी चित्तको बलपूर्वक खींचकर मोहमें डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर जगतके सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको मुक्तिके लिये वरदान देती हैं। वे ही परा विद्या, संसार- बन्धन और मोक्षकी हेतुभूता सनातनी देवी तथा सम्पूर्ण ईश्वरोंकी भी अधीश्वरी हैं

English

which, though distressed by hunger themselves, are yet because of that same delusion assiduous in dropping grains into the beaks of their young ones. Human beings are full of longings towards their children, O hero;

अध्याय १

श्लोक 1.53

लोभात् प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्यसि ।तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः

lobhAt pratyupakArAya nanvetAn kiM na pashyasi | tathApi mamatAvartte mohagarte nipAtitAH

हिन्दी अर्थ

लोभाप्प्रत्युपकाराय नन्वेतान:ं कि न पश्यसि । तथापि ममतावरत्ते मोहगर्ते निपातिता:

English

do they not pass from greed for self unto mutual benefaction? Dost thou not perceive this? Nevertheless they are hurled into the whirlpool of selfishness, which is the pit of delusion,

अध्याय १

श्लोक 1.54

महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा ।तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः

mahAmAyAprabhAveNa saMsArasthitikAriNA | tannAtra vismayaH kAryo yoganidrA jagatpateH

हिन्दी अर्थ

तथा जैसी मनुष्योंकी होती है, वैसी ही उन मृग-पक्षी आदिकी होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्राय: दोनोंमें समान ही हैं। समझ होनेपर भी इन पक्षियोंको तो देखो, ये स्वयं भूखसे पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चोंकी चोंचमें कितने चावसे अन्नके दाने डाल रहे हैं! नरश्रेष्ठ) क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकारका बदला पानेके लिये पुत्रोंकी अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझकी कमी नहीं है, तथापि वे संसारकी स्थिति (जन्म-मरणकी परम्परा) बनाये रखनेवाले भगवती महामायाके प्रभावद्वारा ममतामय भँवरसे युक्त मोहके गहरे गर्तमें गिराये जाते हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुकी योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हींसे यह जगत्‌ मोहित हो रहा है। वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियोंके भी चित्तको बलपूर्वक खींचकर मोहमें डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर जगतके सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको मुक्तिके लिये वरदान देती हैं। वे ही परा विद्या, संसार- बन्धन और मोक्षकी हेतुभूता सनातनी देवी तथा सम्पूर्ण ईश्वरोंकी भी अधीश्वरी हैं

English

through the power of the Great Illusion, which makes worldly existence permanent. Marvel not then at this. This is the contemplation-sleep of the lord of the world,

अध्याय १

श्लोक 1.55

महामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत् ।ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा

mahAmAyA hareshchaiShA tayA sammohyate jagat | j~nAninAmapi chetAMsi devI bhagavatI hi sA

हिन्दी अर्थ

महामाया हरेश्लैषा* तया संमोहाते जगत्‌ । ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा

English

and the Great Illusion that comes from Hari; by it the world is completely deluded. Verily she, the adorable goddess, the Great Illusion,

अध्याय १

श्लोक 1.56

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्

balAdAkR^iShya mohAya mahAmAyA prayachChati | tayA visR^ijyate vishvaM jagadetachcharAcharam

हिन्दी अर्थ

तथा जैसी मनुष्योंकी होती है, वैसी ही उन मृग-पक्षी आदिकी होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्राय: दोनोंमें समान ही हैं। समझ होनेपर भी इन पक्षियोंको तो देखो, ये स्वयं भूखसे पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चोंकी चोंचमें कितने चावसे अन्नके दाने डाल रहे हैं! नरश्रेष्ठ) क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकारका बदला पानेके लिये पुत्रोंकी अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझकी कमी नहीं है, तथापि वे संसारकी स्थिति (जन्म-मरणकी परम्परा) बनाये रखनेवाले भगवती महामायाके प्रभावद्वारा ममतामय भँवरसे युक्त मोहके गहरे गर्तमें गिराये जाते हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुकी योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हींसे यह जगत्‌ मोहित हो रहा है। वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियोंके भी चित्तको बलपूर्वक खींचकर मोहमें डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर जगतके सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको मुक्तिके लिये वरदान देती हैं। वे ही परा विद्या, संसार- बन्धन और मोक्षकी हेतुभूता सनातनी देवी तथा सम्पूर्ण ईश्वरोंकी भी अधीश्वरी हैं

English

forcibly drawing the minds even of those who know, presents them to delusion. By her is created this whole universe, both moveable and immoveable;

अध्याय १

श्लोक 1.57

सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये ।सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी

saiShA prasannA varadA nR^iNAM bhavati muktaye | sA vidyA paramA mukterhetubhUtA sanAtanI

हिन्दी अर्थ

तथा जैसी मनुष्योंकी होती है, वैसी ही उन मृग-पक्षी आदिकी होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्राय: दोनोंमें समान ही हैं। समझ होनेपर भी इन पक्षियोंको तो देखो, ये स्वयं भूखसे पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चोंकी चोंचमें कितने चावसे अन्नके दाने डाल रहे हैं! नरश्रेष्ठ) क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकारका बदला पानेके लिये पुत्रोंकी अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझकी कमी नहीं है, तथापि वे संसारकी स्थिति (जन्म-मरणकी परम्परा) बनाये रखनेवाले भगवती महामायाके प्रभावद्वारा ममतामय भँवरसे युक्त मोहके गहरे गर्तमें गिराये जाते हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुकी योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हींसे यह जगत्‌ मोहित हो रहा है। वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियोंके भी चित्तको बलपूर्वक खींचकर मोहमें डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर जगतके सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको मुक्तिके लिये वरदान देती हैं। वे ही परा विद्या, संसार- बन्धन और मोक्षकी हेतुभूता सनातनी देवी तथा सम्पूर्ण ईश्वरोंकी भी अधीश्वरी हैं

English

she it is who, when propitious, bestows boons on men with a view to their final emancipation. She is Knowledge supreme, the eternal cause of final emancipation,

अध्याय १

श्लोक 1.58

संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी

saMsArabandhahetushcha saiva sarveshvareshvarI

हिन्दी अर्थ

तथा जैसी मनुष्योंकी होती है, वैसी ही उन मृग-पक्षी आदिकी होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्राय: दोनोंमें समान ही हैं। समझ होनेपर भी इन पक्षियोंको तो देखो, ये स्वयं भूखसे पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चोंकी चोंचमें कितने चावसे अन्नके दाने डाल रहे हैं! नरश्रेष्ठ) क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकारका बदला पानेके लिये पुत्रोंकी अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझकी कमी नहीं है, तथापि वे संसारकी स्थिति (जन्म-मरणकी परम्परा) बनाये रखनेवाले भगवती महामायाके प्रभावद्वारा ममतामय भँवरसे युक्त मोहके गहरे गर्तमें गिराये जाते हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुकी योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हींसे यह जगत्‌ मोहित हो रहा है। वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियोंके भी चित्तको बलपूर्वक खींचकर मोहमें डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर जगतके सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको मुक्तिके लिये वरदान देती हैं। वे ही परा विद्या, संसार- बन्धन और मोक्षकी हेतुभूता सनातनी देवी तथा सम्पूर्ण ईश्वरोंकी भी अधीश्वरी हैं

English

and the cause of the bondage of worldly existence; she indeed is the queen over all lords.

अध्याय १

श्लोक 1.59

राजोवाच

rAjovAcha

हिन्दी अर्थ

राजाने पूछा--

English

The king spoke:

अध्याय १

श्लोक 1.60

भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान्

bhagavan kA hi sA devI mahAmAyeti yAM bhavAn

हिन्दी अर्थ

राजोवाच ॥/ ५९ ॥ भगवन्‌ का हि सा देवी महामायेति यां भवान्‌

English

Adorable Sir! Who then is that goddess whom thou stylest Mahamaya?

अध्याय १

श्लोक 1.61

ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज ।यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा

bravIti kathamutpannA sA karmAsyAshcha kiM dvija | yatprabhAvA cha sA devI yatsvarUpA yadudbhavA

हिन्दी अर्थ

ब्रवीति कथामुत्पन्ना सा* कर्मास्याश्न किं द्विज । यत्प्रभावा३ च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भधवा

English

How was she born, and what is her sphere of action, O brahman? And what is her disposition, and what is her nature, and whence did she originate, the goddess—

अध्याय १

श्लोक 1.62

तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर

tatsarvaM shrotumichChAmi tvatto brahmavidAM vara

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌! जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं? ब्रह्म! उनका आविर्भाव कैसे हुआ? तथा उनके चरित्र कौन-कौन हैं? ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! उन देवीका जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो और जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ

English

all that I wish to hear from thee, O thou most learned in sacred knowledge!

अध्याय १

श्लोक 1.63

ऋषिरुवाच

R^iShiruvAcha

हिन्दी अर्थ

ऋषि बोले--

English

The rishi spoke:

अध्याय १

श्लोक 1.64

नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम्

nityaiva sA jaganmUrtistayA sarvamidaM tatam

हिन्दी अर्थ

राजन! वास्तवमें तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत्‌ उन्हींका रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्वको व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकारसे होता है। वह मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोकमें उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्पके अन्तमें जब सम्पूर्ण जगत्‌ एकार्णवमें निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान्‌ विष्णु शेषनागकी शय्या बिछाकर योगनिद्राका आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानोंकी मैलसे दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभके नामसे विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्माजीका वध करनेको तैयार हो गये। भगवान्‌ विष्णुके नाभिकमलमें विराजमान प्रजापति ब्रह्माजीने जब उन दोनों भयानक असुरोंको अपने पास आया और भगवान्‌को सोया हुआ देखा तो एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान्‌ विष्णुको जगानेके लिये उनके नेत्रोंमें निवास करनेवाली योगनिद्राका स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्वकी अधीश्वरी, जगत्‌को धारण करनेवाली, संसारका पालन और संहार करनेवाली तथा तेज:स्वरूप भगवान्‌ विष्णुकी अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवीकी भगवान्‌ ब्रह्मा स्तुति करने लगे

English

She exists eternally, embodied as the world. By her this universe was stretched forth.

अध्याय १

श्लोक 1.65

तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम ।देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा

tathApi tatsamutpattirbahudhA shrUyatAM mama | devAnAM kAryasiddhyarthamAvirbhavati sA yadA

हिन्दी अर्थ

तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम । देवानां कार्यसिद्धियर्थमाविर्भवति सा यदा

English

Nevertheless her origin is in many ways; hear it from me. When she reveals herself in order to accomplish the purposes of the gods,

अध्याय १

श्लोक 1.66

उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते ।योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते

utpanneti tadA loke sA nityApyabhidhIyate | yoganidrAM yadA viShNurjagatyekArNavIkR^ite

हिन्दी अर्थ

राजन! वास्तवमें तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत्‌ उन्हींका रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्वको व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकारसे होता है। वह मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोकमें उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्पके अन्तमें जब सम्पूर्ण जगत्‌ एकार्णवमें निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान्‌ विष्णु शेषनागकी शय्या बिछाकर योगनिद्राका आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानोंकी मैलसे दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभके नामसे विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्माजीका वध करनेको तैयार हो गये। भगवान्‌ विष्णुके नाभिकमलमें विराजमान प्रजापति ब्रह्माजीने जब उन दोनों भयानक असुरोंको अपने पास आया और भगवान्‌को सोया हुआ देखा तो एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान्‌ विष्णुको जगानेके लिये उनके नेत्रोंमें निवास करनेवाली योगनिद्राका स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्वकी अधीश्वरी, जगत्‌को धारण करनेवाली, संसारका पालन और संहार करनेवाली तथा तेज:स्वरूप भगवान्‌ विष्णुकी अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवीकी भगवान्‌ ब्रह्मा स्तुति करने लगे

English

it is then said in the world that she is born; she is also named the Eternal One. When the universe was converted into absolute ocean, and the adorable lord Vishnu,

अध्याय १

श्लोक 1.67

आस्तीर्य शेषमभजत् कल्पान्ते भगवान् प्रभुः ।तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ

AstIrya sheShamabhajat kalpAnte bhagavAn prabhuH | tadA dvAvasurau ghorau vikhyAtau madhukaiTabhau

हिन्दी अर्थ

राजन! वास्तवमें तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत्‌ उन्हींका रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्वको व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकारसे होता है। वह मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोकमें उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्पके अन्तमें जब सम्पूर्ण जगत्‌ एकार्णवमें निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान्‌ विष्णु शेषनागकी शय्या बिछाकर योगनिद्राका आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानोंकी मैलसे दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभके नामसे विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्माजीका वध करनेको तैयार हो गये। भगवान्‌ विष्णुके नाभिकमलमें विराजमान प्रजापति ब्रह्माजीने जब उन दोनों भयानक असुरोंको अपने पास आया और भगवान्‌को सोया हुआ देखा तो एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान्‌ विष्णुको जगानेके लिये उनके नेत्रोंमें निवास करनेवाली योगनिद्राका स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्वकी अधीश्वरी, जगत्‌को धारण करनेवाली, संसारका पालन और संहार करनेवाली तथा तेज:स्वरूप भगवान्‌ विष्णुकी अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवीकी भगवान्‌ ब्रह्मा स्तुति करने लगे

English

stretching Shesha out, wooed the sleep of contemplation at the end of the kalpa, then two terrible Asuras, the renowned Madhu and Kaitabha,

अध्याय १

श्लोक 1.68

विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ ।स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः

viShNukarNamalodbhUtau hantuM brahmANamudyatau | sa nAbhikamale viShNoH sthito brahmA prajApatiH

हिन्दी अर्थ

राजन! वास्तवमें तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत्‌ उन्हींका रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्वको व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकारसे होता है। वह मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोकमें उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्पके अन्तमें जब सम्पूर्ण जगत्‌ एकार्णवमें निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान्‌ विष्णु शेषनागकी शय्या बिछाकर योगनिद्राका आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानोंकी मैलसे दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभके नामसे विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्माजीका वध करनेको तैयार हो गये। भगवान्‌ विष्णुके नाभिकमलमें विराजमान प्रजापति ब्रह्माजीने जब उन दोनों भयानक असुरोंको अपने पास आया और भगवान्‌को सोया हुआ देखा तो एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान्‌ विष्णुको जगानेके लिये उनके नेत्रोंमें निवास करनेवाली योगनिद्राका स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्वकी अधीश्वरी, जगत्‌को धारण करनेवाली, संसारका पालन और संहार करनेवाली तथा तेज:स्वरूप भगवान्‌ विष्णुकी अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवीकी भगवान्‌ ब्रह्मा स्तुति करने लगे

English

springing from the root of Vishnu's ear, sought to slay Brahma. Brahma the Prajapati stood on the lotus that grew from Vishnu's navel;

अध्याय १

श्लोक 1.69

दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम् ।तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयः स्थितः

dR^iShTvA tAvasurau chograu prasuptaM cha janArdanam | tuShTAva yoganidrAM tAmekAgrahR^idayaH sthitaH

हिन्दी अर्थ

राजन! वास्तवमें तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत्‌ उन्हींका रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्वको व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकारसे होता है। वह मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोकमें उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्पके अन्तमें जब सम्पूर्ण जगत्‌ एकार्णवमें निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान्‌ विष्णु शेषनागकी शय्या बिछाकर योगनिद्राका आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानोंकी मैलसे दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभके नामसे विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्माजीका वध करनेको तैयार हो गये। भगवान्‌ विष्णुके नाभिकमलमें विराजमान प्रजापति ब्रह्माजीने जब उन दोनों भयानक असुरोंको अपने पास आया और भगवान्‌को सोया हुआ देखा तो एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान्‌ विष्णुको जगानेके लिये उनके नेत्रोंमें निवास करनेवाली योगनिद्राका स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्वकी अधीश्वरी, जगत्‌को धारण करनेवाली, संसारका पालन और संहार करनेवाली तथा तेज:स्वरूप भगवान्‌ विष्णुकी अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवीकी भगवान्‌ ब्रह्मा स्तुति करने लगे

English

and seeing those two fierce Asuras and sleeping Janardana, standing with heart solely thereon intent, in order to awaken Hari, he extolled that Sleep of contemplation

अध्याय १

श्लोक 1.70

विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम् ।विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्

vibodhanArthAya harerharinetrakR^itAlayAm | vishveshvarIM jagaddhAtrIM sthitisaMhArakAriNIm

हिन्दी अर्थ

विबोधनार्थाय हरेहरिनेत्रकृतालयाम्‌ः । विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्‌

English

which had made its dwelling in Hari's eyes—the Queen of the universe, the supporter of the world, the cause of permanence and dissolution—

अध्याय १

श्लोक 1.71

निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः

nidrAM bhagavatIM viShNoratulAM tejasaH prabhuH

हिन्दी अर्थ

राजन! वास्तवमें तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत्‌ उन्हींका रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्वको व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकारसे होता है। वह मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोकमें उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्पके अन्तमें जब सम्पूर्ण जगत्‌ एकार्णवमें निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान्‌ विष्णु शेषनागकी शय्या बिछाकर योगनिद्राका आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानोंकी मैलसे दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभके नामसे विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्माजीका वध करनेको तैयार हो गये। भगवान्‌ विष्णुके नाभिकमलमें विराजमान प्रजापति ब्रह्माजीने जब उन दोनों भयानक असुरोंको अपने पास आया और भगवान्‌को सोया हुआ देखा तो एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान्‌ विष्णुको जगानेके लिये उनके नेत्रोंमें निवास करनेवाली योगनिद्राका स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्वकी अधीश्वरी, जगत्‌को धारण करनेवाली, संसारका पालन और संहार करनेवाली तथा तेज:स्वरूप भगवान्‌ विष्णुकी अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवीकी भगवान्‌ ब्रह्मा स्तुति करने लगे

English

the lord of splendour extolled Vishnu's adorable Sleep, incomparable.

अध्याय १

श्लोक 1.72

ब्रह्मोवाच

brahmovAcha

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजी बोले:

English

Brahma spoke:

अध्याय १

श्लोक 1.73

त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका

tvaM svAhA tvaM svadhA tvaM hi vaShaT.hkAraH svarAtmikA

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्‍्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार--इन तीन मात्राओंके रूपमें तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओंके अतिरिक्त जो विन्दुरूपा नित्य अर्धथमात्रा है, जिसका विशेष रूपसे उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्डको धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत्‌की सृष्टि होती है। तुम्हींसे इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्पके अन्तमें सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत्‌की उत्पत्तिके समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तके समय संहार-रूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणोंको उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ही और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड़्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शड्ख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ--ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो--इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर--सबसे परे रहनेवाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्‌-असत्‌रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगतकी सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान्‌को भी जब तुमने निद्राके अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति करनेमें यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान्‌ शंकरको तथा भगवान्‌ विष्णुको भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अतः तुम्हारी स्तुति करनेकी शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावोंसे ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो और जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुको शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान्‌ असुरोंको मार डालनेकी बुद्धि उत्पन्न कर दो

English

You are Shri (prosperity), You are Ishvari (sovereignty), You are Hri (modesty), You are Buddhi (intelligence), characterized by knowledge. You are Lajja (shame/conscience), Pushti (nourishment), Tushti (satisfaction), Shanti (peace), and Kshanti (patience/forbearance).

अध्याय १

श्लोक 1.74

सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ।अर्धमात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्याविशेषतः

sudhA tvamakShare nitye tridhA mAtrAtmikA sthitA | ardhamAtrA sthitA nityA yAnuchchAryAvisheShataH

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्‍्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार--इन तीन मात्राओंके रूपमें तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओंके अतिरिक्त जो विन्दुरूपा नित्य अर्धथमात्रा है, जिसका विशेष रूपसे उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्डको धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत्‌की सृष्टि होती है। तुम्हींसे इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्पके अन्तमें सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत्‌की उत्पत्तिके समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तके समय संहार-रूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणोंको उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ही और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड़्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शड्ख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ--ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो--इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर--सबसे परे रहनेवाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्‌-असत्‌रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगतकी सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान्‌को भी जब तुमने निद्राके अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति करनेमें यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान्‌ शंकरको तथा भगवान्‌ विष्णुको भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अतः तुम्हारी स्तुति करनेकी शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावोंसे ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो और जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुको शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान्‌ असुरोंको मार डालनेकी बुद्धि उत्पन्न कर दो

English

thou art the nectar of the gods, the two eternal letters; thou existest having the three-fold matras for thy soul; thou existest half a matra in duration, yet eternal, which cannot be uttered specifically;

अध्याय १

श्लोक 1.75

त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ।त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत् सृज्यते जगत्

tvameva sandhyA sAvitrI tvaM devi jananI parA | tvayaitaddhAryate vishvaM tvayaitat sR^ijyate jagat

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्‍्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार--इन तीन मात्राओंके रूपमें तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओंके अतिरिक्त जो विन्दुरूपा नित्य अर्धथमात्रा है, जिसका विशेष रूपसे उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्डको धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत्‌की सृष्टि होती है। तुम्हींसे इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्पके अन्तमें सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत्‌की उत्पत्तिके समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तके समय संहार-रूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणोंको उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ही और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड़्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शड्ख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ--ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो--इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर--सबसे परे रहनेवाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्‌-असत्‌रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगतकी सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान्‌को भी जब तुमने निद्राके अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति करनेमें यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान्‌ शंकरको तथा भगवान्‌ विष्णुको भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अतः तुम्हारी स्तुति करनेकी शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावोंसे ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो और जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुको शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान्‌ असुरोंको मार डालनेकी बुद्धि उत्पन्न कर दो

English

thou art the Sandhya, the Savitri, thou art the divine mother sublime. By thee indeed everything is maintained, by thee this world is created,

अध्याय १

श्लोक 1.76

त्वयैतत् पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ।विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने

tvayaitat pAlyate devi tvamatsyante cha sarvadA | visR^iShTau sR^iShTirUpA tvaM sthitirUpA cha pAlane

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्‍्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार--इन तीन मात्राओंके रूपमें तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओंके अतिरिक्त जो विन्दुरूपा नित्य अर्धथमात्रा है, जिसका विशेष रूपसे उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्डको धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत्‌की सृष्टि होती है। तुम्हींसे इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्पके अन्तमें सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत्‌की उत्पत्तिके समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तके समय संहार-रूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणोंको उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ही और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड़्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शड्ख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ--ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो--इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर--सबसे परे रहनेवाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्‌-असत्‌रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगतकी सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान्‌को भी जब तुमने निद्राके अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति करनेमें यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान्‌ शंकरको तथा भगवान्‌ विष्णुको भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अतः तुम्हारी स्तुति करनेकी शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावोंसे ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो और जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुको शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान्‌ असुरोंको मार डालनेकी बुद्धि उत्पन्न कर दो

English

by thee it is protected, O goddess! and thou dost always consume it at the end. At its emanation thou didst take the form of creation, and in protecting it thou hast the form of permanence,

अध्याय १

श्लोक 1.77

तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ।महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः

tathA saMhR^itirUpAnte jagato.asya jaganmaye | mahAvidyA mahAmAyA mahAmedhA mahAsmR^itiH

हिन्दी अर्थ

तथा संहृतिरूपान्ते जगतो5स्य जगन्मये । महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृति:

English

and at the end of this world thou wilt have the form of contraction, O thou who containest the world! Thou art the Great Knowledge, the Great Illusion, the Great Intellect, the Great Memory,

अध्याय १

श्लोक 1.78

महामोहा च भवती महादेवी महेश्वरी ।प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी

mahAmohA cha bhavatI mahAdevI maheshvarI | prakR^itistvaM cha sarvasya guNatrayavibhAvinI

हिन्दी अर्थ

महामोहा च भवती महादेवी महासुरीः । प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी

English

and the Great Delusion, the Lady, the Great Goddess, the Great Demon-queen. And thou art the original source of the universe, the exciting cause of the three qualities;

अध्याय १

श्लोक 1.79

कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ।त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा

tvaṃ śrīstvamaīśvarī tvaṃ hrīstvaṃ buddhirbodhalakṣaṇā | lajjā puṣṭistathā tuṣṭistvaṃ śāntiḥ kṣāntireva ca

हिन्दी अर्थ

तुम श्री हो, ईश्वरी हो, ह्री (लज्जा) हो, बोधस्वरूपा बुद्धि हो। तुम लज्जा हो, पुष्टि हो, तुष्टि हो, शांति हो, और क्षांति (सहनशीलता) हो।

English

You are Shri (prosperity), You are Ishvari (sovereignty), You are Hri (modesty), You are Buddhi (intelligence), characterized by knowledge. You are Lajja (shame/conscience), Pushti (nourishment), Tushti (satisfaction), Shanti (peace), and Kshanti (patience/forbearance).

अध्याय १

श्लोक 1.80

लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ।खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा

lajjA puShTistathA tuShTistvaM shAntiH kShAntireva cha | khaDginI shUlinI ghorA gadinI chakriNI tathA

हिन्दी अर्थ

लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्ति: क्षान्तिरेव च । खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा

English

thou art Shame, Nourishment, and Contentment, Tranquillity and Patience also. Thou art terrible, armed with sword, with spear, with club, and with discus,

अध्याय १

श्लोक 1.81

शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा ।सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी

sha~NkhinI chApinI bANabhushuNDIparighAyudhA | saumyA saumyatarAsheShasaumyebhyastvatisundarI

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्‍्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार--इन तीन मात्राओंके रूपमें तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओंके अतिरिक्त जो विन्दुरूपा नित्य अर्धथमात्रा है, जिसका विशेष रूपसे उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्डको धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत्‌की सृष्टि होती है। तुम्हींसे इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्पके अन्तमें सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत्‌की उत्पत्तिके समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तके समय संहार-रूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणोंको उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ही और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड़्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शड्ख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ--ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो--इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर--सबसे परे रहनेवाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्‌-असत्‌रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगतकी सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान्‌को भी जब तुमने निद्राके अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति करनेमें यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान्‌ शंकरको तथा भगवान्‌ विष्णुको भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अतः तुम्हारी स्तुति करनेकी शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावोंसे ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो और जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुको शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान्‌ असुरोंको मार डालनेकी बुद्धि उत्पन्न कर दो

English

with conch, with bow, and having as weapons arrows, slings and an iron mace. Thou art gentle, yea more than gentle, exceedingly beautiful beyond all gentle things;

अध्याय १

श्लोक 1.82

परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ।यच्च किञ्चित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके

parAparANAM paramA tvameva parameshvarI | yachcha ki~nchitkvachidvastu sadasadvAkhilAtmike

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्‍्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार--इन तीन मात्राओंके रूपमें तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओंके अतिरिक्त जो विन्दुरूपा नित्य अर्धथमात्रा है, जिसका विशेष रूपसे उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्डको धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत्‌की सृष्टि होती है। तुम्हींसे इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्पके अन्तमें सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत्‌की उत्पत्तिके समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तके समय संहार-रूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणोंको उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ही और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड़्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शड्ख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ--ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो--इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर--सबसे परे रहनेवाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्‌-असत्‌रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगतकी सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान्‌को भी जब तुमने निद्राके अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति करनेमें यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान्‌ शंकरको तथा भगवान्‌ विष्णुको भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अतः तुम्हारी स्तुति करनेकी शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावोंसे ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो और जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुको शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान्‌ असुरोंको मार डालनेकी बुद्धि उत्पन्न कर दो

English

thou art indeed beyond the highest and the lowest, Queen supreme! And whatever or wherever a thing is, whether good or bad, O thou who art the soul of everything,

अध्याय १

श्लोक 1.83

तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे मया ।यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत्

tasya sarvasya yA shaktiH sA tvaM kiM stUyase mayA | yayA tvayA jagat.hsraShTA jagatpAtyatti yo jagat

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्‍्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार--इन तीन मात्राओंके रूपमें तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओंके अतिरिक्त जो विन्दुरूपा नित्य अर्धथमात्रा है, जिसका विशेष रूपसे उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्डको धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत्‌की सृष्टि होती है। तुम्हींसे इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्पके अन्तमें सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत्‌की उत्पत्तिके समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तके समय संहार-रूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणोंको उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ही और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड़्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शड्ख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ--ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो--इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर--सबसे परे रहनेवाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्‌-असत्‌रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगतकी सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान्‌को भी जब तुमने निद्राके अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति करनेमें यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान्‌ शंकरको तथा भगवान्‌ विष्णुको भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अतः तुम्हारी स्तुति करनेकी शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावोंसे ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो और जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुको शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान्‌ असुरोंको मार डालनेकी बुद्धि उत्पन्न कर दो

English

thou art the energy which all that possesses. Can I extol thee more than this? By thee, who art such, he indeed who created the world, who protects the world, who consumes the world,

अध्याय १

श्लोक 1.84

सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ।विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च

so.api nidrAvashaM nItaH kastvAM stotumiheshvaraH | viShNuH sharIragrahaNamahamIshAna eva cha

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्‍्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार--इन तीन मात्राओंके रूपमें तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओंके अतिरिक्त जो विन्दुरूपा नित्य अर्धथमात्रा है, जिसका विशेष रूपसे उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्डको धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत्‌की सृष्टि होती है। तुम्हींसे इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्पके अन्तमें सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत्‌की उत्पत्तिके समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तके समय संहार-रूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणोंको उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ही और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड़्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शड्ख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ--ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो--इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर--सबसे परे रहनेवाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्‌-असत्‌रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगतकी सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान्‌को भी जब तुमने निद्राके अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति करनेमें यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान्‌ शंकरको तथा भगवान्‌ विष्णुको भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अतः तुम्हारी स्तुति करनेकी शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावोंसे ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो और जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुको शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान्‌ असुरोंको मार डालनेकी बुद्धि उत्पन्न कर दो

English

is brought under the dominion of sleep. Who is able here to extol thee? Since Vishnu, I and Shiva

अध्याय १

श्लोक 1.85

कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् ।सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता

kAritAste yato.atastvAM kaH stotuM shaktimAn bhavet | sA tvamitthaM prabhAvaiH svairudArairdevi saMstutA

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्‍्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार--इन तीन मात्राओंके रूपमें तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओंके अतिरिक्त जो विन्दुरूपा नित्य अर्धथमात्रा है, जिसका विशेष रूपसे उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्डको धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत्‌की सृष्टि होती है। तुम्हींसे इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्पके अन्तमें सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत्‌की उत्पत्तिके समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तके समय संहार-रूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणोंको उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ही और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड़्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शड्ख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ--ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो--इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर--सबसे परे रहनेवाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्‌-असत्‌रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगतकी सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान्‌को भी जब तुमने निद्राके अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति करनेमें यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान्‌ शंकरको तथा भगवान्‌ विष्णुको भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अतः तुम्हारी स्तुति करनेकी शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावोंसे ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो और जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुको शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान्‌ असुरोंको मार डालनेकी बुद्धि उत्पन्न कर दो

English

have been made by thee to assume bodies, who then may be powerful enough to extol thee? Being such, do thou, O goddess, lauded thus with thy exalted powers,

अध्याय १

श्लोक 1.86

मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ ।प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु

mohayaitau durAdharShAvasurau madhukaiTabhau | prabodhaM cha jagatsvAmI nIyatAmachyuto laghu

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्‍्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार--इन तीन मात्राओंके रूपमें तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओंके अतिरिक्त जो विन्दुरूपा नित्य अर्धथमात्रा है, जिसका विशेष रूपसे उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्डको धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत्‌की सृष्टि होती है। तुम्हींसे इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्पके अन्तमें सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत्‌की उत्पत्तिके समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तके समय संहार-रूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणोंको उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ही और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड़्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शड्ख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ--ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो--इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर--सबसे परे रहनेवाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्‌-असत्‌रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगतकी सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान्‌को भी जब तुमने निद्राके अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति करनेमें यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान्‌ शंकरको तथा भगवान्‌ विष्णुको भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अतः तुम्हारी स्तुति करनेकी शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावोंसे ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो और जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुको शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान्‌ असुरोंको मार डालनेकी बुद्धि उत्पन्न कर दो

English

bewitch these two unassailable Asuras, Madhu and Kaitabha, and let the imperishable master of the world be lightly brought back to consciousness,

अध्याय १

श्लोक 1.87

बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ

bodhashcha kriyatAmasya hantumetau mahAsurau

हिन्दी अर्थ

देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्‍्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार--इन तीन मात्राओंके रूपमें तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओंके अतिरिक्त जो विन्दुरूपा नित्य अर्धथमात्रा है, जिसका विशेष रूपसे उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्डको धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत्‌की सृष्टि होती है। तुम्हींसे इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्पके अन्तमें सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत्‌की उत्पत्तिके समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तके समय संहार-रूप धारण करनेवाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह-रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणोंको उत्पन्न करनेवाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ही और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड़्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शड्ख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ--ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो--इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर--सबसे परे रहनेवाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्‌-असत्‌रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगतकी सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान्‌को भी जब तुमने निद्राके अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति करनेमें यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान्‌ शंकरको तथा भगवान्‌ विष्णुको भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अतः तुम्हारी स्तुति करनेकी शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावोंसे ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो और जगदीश्वर भगवान्‌ विष्णुको शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान्‌ असुरोंको मार डालनेकी बुद्धि उत्पन्न कर दो

English

and let him rouse up his intelligence to slay these two great Asuras!

अध्याय १

श्लोक 1.88

ऋषिरुवाच

R^iShiruvAcha

हिन्दी अर्थ

ऋषि कहते हैं--

English

The rishi spoke:

अध्याय १

श्लोक 1.89

एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा

evaM stutA tadA devI tAmasI tatra vedhasA

हिन्दी अर्थ

ऋषिरुवाच ॥/ ८८ ॥/ एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा

English

Then the goddess of darkness, extolled thus by the Creator there

अध्याय १

श्लोक 1.90

विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ ।नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः

viShNoH prabodhanArthAya nihantuM madhukaiTabhau | netrAsyanAsikAbAhuhR^idayebhyastathorasaH

हिन्दी अर्थ

विष्णो: प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ । नेत्रास्यनासिकाबाहुह्नदये भ्यस्तथोरस:

English

in order to awaken Vishnu to slay Madhu and Kaitabha, issued forth from his eyes, mouth, nose, arms and heart and breast,

अध्याय १

श्लोक 1.91

निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः

nirgamya darshane tasthau brahmaNo.avyaktajanmanaH | uttasthau cha jagannAthastayA mukto janArdanaH

हिन्दी अर्थ

राजन! जब ब्रह्माजीने वहाँ मधु और कैटभको मारनेके उद्देश्यसे भगवान्‌ विष्णुको जगानेके लिये तमोगुणकी अधिष्ठात्री देवी योगनिद्राकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे भगवानके नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष:स्थलसे निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीकी दृष्टिके समक्ष खड़ी हो गयीं। योगनिद्रासे मुक्त होनेपर जगतके स्वामी भगवान्‌ जनार्दन उस एकार्णवके जलमें शेषनागकी शय्यासे जाग उठे। फिर उन्होंने उन दोनों असुरोंको देखा। वे दुरात्मा मधु और कैटभ अत्यन्त बलवान तथा पराक्रमी थे और क्रोधसे लाल आँखें किये ब्रह्माजीको खा जानेके लिये उद्योग कर रहे थे। तब भगवान्‌ श्रीहरिने उठकर उन दोनोंके साथ पाँच हजार वर्षोतक केवल बाहुयुद्ध किया। वे दोनों भी अत्यन्त बलके कारण उन्मत्त हो रहे थे। इधर महामायाने भी उन्हें मोहमें डाल रखा था; इसलिये वे भगवान्‌ विष्णुसे कहने लगे--“हम तुम्हारी वीरतासे संतुष्ट हैं। तुम हमलोगोंसे कोई वर माँगो”

English

and stood in the sight of Brahma whose birth is inscrutable; and Janardana, master of the world, being quitted by her, rose up

अध्याय १

श्लोक 1.92

एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ ।मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ

ekArNave.ahishayanAttataH sa dadR^ishe cha tau | madhukaiTabhau durAtmAnAvativIryaparAkramau

हिन्दी अर्थ

राजन! जब ब्रह्माजीने वहाँ मधु और कैटभको मारनेके उद्देश्यसे भगवान्‌ विष्णुको जगानेके लिये तमोगुणकी अधिष्ठात्री देवी योगनिद्राकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे भगवानके नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष:स्थलसे निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीकी दृष्टिके समक्ष खड़ी हो गयीं। योगनिद्रासे मुक्त होनेपर जगतके स्वामी भगवान्‌ जनार्दन उस एकार्णवके जलमें शेषनागकी शय्यासे जाग उठे। फिर उन्होंने उन दोनों असुरोंको देखा। वे दुरात्मा मधु और कैटभ अत्यन्त बलवान तथा पराक्रमी थे और क्रोधसे लाल आँखें किये ब्रह्माजीको खा जानेके लिये उद्योग कर रहे थे। तब भगवान्‌ श्रीहरिने उठकर उन दोनोंके साथ पाँच हजार वर्षोतक केवल बाहुयुद्ध किया। वे दोनों भी अत्यन्त बलके कारण उन्मत्त हो रहे थे। इधर महामायाने भी उन्हें मोहमें डाल रखा था; इसलिये वे भगवान्‌ विष्णुसे कहने लगे--“हम तुम्हारी वीरतासे संतुष्ट हैं। तुम हमलोगोंसे कोई वर माँगो”

English

from his serpent-couch in the universal ocean; and he saw those two then, Madhu and Kaitabha, evil of soul, excelling in heroism and prowess,

अध्याय १

श्लोक 1.93

क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ ।समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः

krodharaktekShaNAvattuM brahmANaM janitodyamau | samutthAya tatastAbhyAM yuyudhe bhagavAn hariH

हिन्दी अर्थ

क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ । समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान्‌ हरि:

English

red-eyed through anger, fully prepared to devour Brahma. Thereupon the adorable lord Hari rose up and fought with those two,

अध्याय १

श्लोक 1.94

पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः ।तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ

pa~nchavarShasahasrANi bAhupraharaNo vibhuH | tAvapyatibalonmattau mahAmAyAvimohitau

हिन्दी अर्थ

राजन! जब ब्रह्माजीने वहाँ मधु और कैटभको मारनेके उद्देश्यसे भगवान्‌ विष्णुको जगानेके लिये तमोगुणकी अधिष्ठात्री देवी योगनिद्राकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे भगवानके नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष:स्थलसे निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीकी दृष्टिके समक्ष खड़ी हो गयीं। योगनिद्रासे मुक्त होनेपर जगतके स्वामी भगवान्‌ जनार्दन उस एकार्णवके जलमें शेषनागकी शय्यासे जाग उठे। फिर उन्होंने उन दोनों असुरोंको देखा। वे दुरात्मा मधु और कैटभ अत्यन्त बलवान तथा पराक्रमी थे और क्रोधसे लाल आँखें किये ब्रह्माजीको खा जानेके लिये उद्योग कर रहे थे। तब भगवान्‌ श्रीहरिने उठकर उन दोनोंके साथ पाँच हजार वर्षोतक केवल बाहुयुद्ध किया। वे दोनों भी अत्यन्त बलके कारण उन्मत्त हो रहे थे। इधर महामायाने भी उन्हें मोहमें डाल रखा था; इसलिये वे भगवान्‌ विष्णुसे कहने लगे--“हम तुम्हारी वीरतासे संतुष्ट हैं। तुम हमलोगोंसे कोई वर माँगो”

English

striking them with his arms, for five thousands of years. And they, exceedingly frenzied with their power, deluded by the Great Illusion,

अध्याय १

श्लोक 1.95

उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम्

uktavantau varo.asmatto vriyatAmiti keshavam

हिन्दी अर्थ

राजन! जब ब्रह्माजीने वहाँ मधु और कैटभको मारनेके उद्देश्यसे भगवान्‌ विष्णुको जगानेके लिये तमोगुणकी अधिष्ठात्री देवी योगनिद्राकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे भगवानके नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष:स्थलसे निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीकी दृष्टिके समक्ष खड़ी हो गयीं। योगनिद्रासे मुक्त होनेपर जगतके स्वामी भगवान्‌ जनार्दन उस एकार्णवके जलमें शेषनागकी शय्यासे जाग उठे। फिर उन्होंने उन दोनों असुरोंको देखा। वे दुरात्मा मधु और कैटभ अत्यन्त बलवान तथा पराक्रमी थे और क्रोधसे लाल आँखें किये ब्रह्माजीको खा जानेके लिये उद्योग कर रहे थे। तब भगवान्‌ श्रीहरिने उठकर उन दोनोंके साथ पाँच हजार वर्षोतक केवल बाहुयुद्ध किया। वे दोनों भी अत्यन्त बलके कारण उन्मत्त हो रहे थे। इधर महामायाने भी उन्हें मोहमें डाल रखा था; इसलिये वे भगवान्‌ विष्णुसे कहने लगे--“हम तुम्हारी वीरतासे संतुष्ट हैं। तुम हमलोगोंसे कोई वर माँगो”

English

exclaimed to Keshava, 'Choose a boon from us!'

अध्याय १

श्लोक 1.96

श्रीभगवानुवाच

shrIbhagavAnuvAcha

हिन्दी अर्थ

श्रीभगवान्‌ बोले--

English

The adorable god spoke:

अध्याय १

श्लोक 1.97

भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि

bhavetAmadya me tuShTau mama vadhyAvubhAvapi

हिन्दी अर्थ

यदि तुम दोनों मुझपर प्रसन्न हो तो अब मेरे हाथसे मारे जाओ। बस, इतना-सा ही मैंने वर माँगा है। यहाँ दूसरे किसी वरसे क्‍या लेना है

English

Be ye both now content with me; ye must both be slain by me!

अध्याय १

श्लोक 1.98

किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मया

kimanyena vareNAtra etAvaddhi vR^itaM mayA

हिन्दी अर्थ

यदि तुम दोनों मुझपर प्रसन्न हो तो अब मेरे हाथसे मारे जाओ। बस, इतना-सा ही मैंने वर माँगा है। यहाँ दूसरे किसी वरसे क्‍या लेना है

English

What need is there of any other boon here? Thus much indeed is my choice.

अध्याय १

श्लोक 1.99

ऋषिरुवाच

R^iShiruvAcha

हिन्दी अर्थ

ऋषि कहते हैं--

English

The rishi spoke:

अध्याय १

श्लोक 1.100

वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत्

va~nchitAbhyAmiti tadA sarvamApomayaM jagat

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार धोखेमें आ जानेपर जब उन्होंने सम्पूर्ण जगत्‌में जल-ही-जल देखा तब कमलनयन भगवानसे कहा--“जहाँ पृथ्वी जलमें डूबी हुई न हो--जहाँ सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो”

English

Gazing then at the entire world, which was nothing but water, those two, who had been thus tricked,

अध्याय १

श्लोक 1.101

विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः ।आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता

vilokya tAbhyAM gadito bhagavAn kamalekShaNaH | AvAM jahi na yatrorvI salilena pariplutA

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार धोखेमें आ जानेपर जब उन्होंने सम्पूर्ण जगत्‌में जल-ही-जल देखा तब कमलनयन भगवानसे कहा--“जहाँ पृथ्वी जलमें डूबी हुई न हो--जहाँ सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो”

English

spoke to the adorable lotus-eyed god: 'Slay us where the earth is not overwhelmed with water.'

अध्याय १

श्लोक 1.102

ऋषिरुवाच

R^iShiruvAcha

हिन्दी अर्थ

ऋषि कहते हैं--

English

The rishi spoke:

अध्याय १

श्लोक 1.103

तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता ।कृत्वा चक्रेण वै छिन्ने जघने शिरसी तयोः

tathetyuktvA bhagavatA sha~NkhachakragadAbhR^itA | kR^itvA chakreNa vai Chinne jaghane shirasI tayoH

हिन्दी अर्थ

ऋषिरुवाच ॥/ १०२ ॥/ तथेत्युक्त्वा भगवता शड्खचक्रगदाभूता । कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयो:

English

'Be it so,' said the adorable wielder of the conch, discus and club; and cutting them with his discus, he clove them both asunder, heads and buttocks.

अध्याय १

श्लोक 1.104

एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम् ।प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः शृणु वदामि ते

evameShA samutpannA brahmaNA saMstutA svayam | prabhAvamasyA devyAstu bhUyaH shR^iNu vadAmi te

हिन्दी अर्थ

तब “तथास्तु' कहकर शड्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवानने उन दोनोंके मस्तक अपनी जाँघपर रखकर चक्रसे काट डाले। इस प्रकार ये देवी महामाया ब्रह्माजीकी स्तुति करनेपर स्वयं प्रकट हुई थीं। अब पुनः तुमसे उनके प्रभावका वर्णन करता हूँ, सुनो

English

Thus was she born, when praised by Brahma himself. Now listen again; I tell thee of this goddess' majesty.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_devii/durga700.itx · प्राप्त 4/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Durga Saptashati — Chapter 1
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.