अध्याय २४
श्लोक 2.11.1
॥ मनो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतम्
|| mano hiMkAro vAkprastAvashchakShurudgIthaH shrotraM pratihAraH prANo nidhanametadgAyatraM prANeShu protam
हिन्दी अर्थ
अभ्राणि संप्लवन्ते स हिंकारो मेधो जायते स बादर एकत्रित होते है-- यह हकार है । मेव उलत्न होता ै- यह प्रस्ताव है । जरः षरसता है- यह उदुगीथ है । बिजली चमक्षी ओर कट़कती है- यह पतिहार है तथा वृष्टिका उपसंहार होता है-- अभ्राण्यन्म्रणान्भेष उद्क- ज्षारण कनके कारण बादल. का नाम “अग्नः है तथा नर्ते से्ततवात् । उक्ताथमन्यत् । करनेवाले होनेसे वे “मेषः करति
English
The hiṅkâra is mind, the prastâva speech, the udgîtha sight, the pratihâra hearing, the nidhana breath. That is the Gâyatra Sâman, as interwoven in the (five) prânas .