Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
15
अध्याय 15 / 154

Adhyāya 15

3 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय १५

श्लोक 2.2.1

॥ लोकेषु पञ्चविधँ सामोपासीत पृथिवी हिंकारः ।अग्निः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथ आदित्यः प्रतिहारो द्यौर्निधनमित्यूर्ध्वेषु

|| lokeShu pa~nchavidha{\m+} sAmopAsIta pR^ithivI hiMkAraH | agniH prastAvo.antarikShamudgItha AdityaH pratihAro dyaurnidhanamityUrdhveShu

हिन्दी अर्थ

बृष्टिमे पांच भ्रकारके सामकी उपासना करे । प्वीय वायु हकार है मेष जो उन्न होता है- वह प्रस्ताव है, जो बरसता है वह उद्गीथ है, जो चमकता ओर गजना करता है वह भरतिहार है वृष्टो पञ्चविधं सामोपासीत; वष्टिम पच भकारके सामकी लोकस्यतेिनिभितलादानन उपासना करे । रोकरकी स्थिति वृष्टे कारण होनेसे इसङ्ा जोक उदृहाति तन्निधनं वष॑ति हास्से वर्षयति ह य

English

Let a man meditate on the fivefold Sâman as the five worlds. The hiṅkâra is, the earth, the prastâva the fire, the udgîtha the sky, the pratihâra the sun, the nidhana heaven; so in an ascending line.

अध्याय १५

श्लोक 2.2.2

अथावृत्तेषु द्यौर्हिंकार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी निधनम्

athAvR^itteShu dyaurhiMkAra AdityaH prastAvo.antarikShamudgItho.agniH pratihAraH pR^ithivI nidhanam

हिन्दी अर्थ

मेधजो जल 3 हण करता है-यह निधन है । जो इते इस प्रका जाननेगटा पुरुप वृष्टिमे पंच प्रकारके सामकी उपासना करता है उक्षे लियि वर्षा होती है ओर वह स्वयं भी वर्षा करा लेता है हे यह निधन हे, क्योंकि समाक समा्षिसामान्यात्‌ फल्षुपा- इन दोनोंकी समानता है मर सनस्य वर्षति हास्म इच्छातः । कायं है । अन इस जटविषयक पोच प्रकारक्ती सामोपास्तना स हिकारो यद्रषति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स

English

In a descending line, the hiṅkâra is heaven, the prastâva the sun, the udgîtha the sky, the pratihâra the fire, the nidhana the earth.

अध्याय १५

श्लोक 2.2.3

कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च य एतदेवं विद्वाँल्लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते

kalpante hAsmai lokA UrdhvAshchAvR^ittAshcha ya etadevaM vidvA{\m+}llokeShu pa~nchavidhaM sAmopAste

हिन्दी अर्थ

सव प्रकारके जलम पोच प्रकारके सामको उपासना करे । मेष जो घनीभावको प्रप्त होता है- वह ्हिकार है, वह जो बरसता है-वह ्र्ताव्‌ है, नदिया जो पूव॑की ओर बहती है, वह उद्गीथ है तथा जो सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामो- । सव प्रकारके जलम पांच परकार- के सामक उपासना करे । सम्पूर्ण जक वृष्टिपूवक ही होते है हइस- जो इसे इस भकार जाननेवाख परुष सव भकारके जलो पम सामक उपासना करता ह वह जलम नहं मरता ओर जरते सर्फ

English

The worlds in an ascending and in a descending line belong to him who knowing this meditates on the fivefold Sâman as the worlds .

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 15
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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