Brihadaranyaka Upanishad· Bṛhadāraṇyakopaniṣad
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अध्याय 40 / 45

Adhyāya 40

1 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ1 श्लोक

अध्याय ४०

श्लोक 1

॥ अमृतस् सम्भवति पञ्चदशं ब्राह्मणम् ।[V.xv.1] हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।तत्त्वम् पूषन्न् अपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ।पूषन्न् एकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।समूह तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि ।योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ।वायुरनिलममृतम् अथेदं भस्मान्तँ शरीरम् ।ॐ३ क्रतो स्मर कृतँ स्मर क्रतो स्मर कृतँ स्मर ।अग्ने नय सुपथा रायेऽस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम

|| amR^itas sambhavati pa~nchadashaM brAhmaNam . ##[V.xv.1]## hiraNmayena pAtreNa satyasyApihitaM mukham | tattvam pUShann apAvR^iNu satyadharmAya dR^iShTaye | pUShann ekarShe yama sUrya prAjApatya vyUha rashmIn | samUha tejo yatte rUpa.n kalyANatama.n tatte pashyAmi | yo.asAvasau puruShaH so.ahamasmi | vAyuranilamamR^itam athedaM bhasmAnta{\m+} sharIram | AUM3 krato smara kR^ita{\m+} smara krato smara kR^ita{\m+} smara | agne naya supathA rAye.asmAn vishvAni deva vayunAni vidvAn.h| yuyodhyasmajjuhurANameno bhUyiShThAM te nama uktiM vidhema

हिन्दी अर्थ

उस गायत्रीका उपस्थान -ह गायत्रि ! तु तरैलोक्यरूप प्रथम पादस एकपदी है, तोनों वेदलूप द्वितीय पादसे द्विपदी हे, प्राण, अपान जौर व्यानरूप तीसरे पादसे त्रिपदो है ओर तुरीय पादे चतुष्पदी उपस्थानयुपेत्य स्थानं नपस्करण- मनेन भन्त्रेण । कों म ५ वह्‌ मन्व कोन-सा है ? सो श्रुति इ्थाह--है गायतपरसि मवक्षि वतलाती हहे गायत्रि । तु गायत्रीके मुखविधानके लिये श्रथ॑वाद ग(यत्या ञुखविधानायाथंबाद गायत्रीका मरुखविधान करनेके उच्यते-- लिये अथंवाद कहा जाता है--

English

The face of the True (the Brahman) is covered with a golden disk . Open that, O Pûshan , that we may see the nature of the True .

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

No variant readings are recorded for this text.

संशोधन इतिहास · Correction History:

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