Brihadaranyaka Upanishad· Bṛhadāraṇyakopaniṣad
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अध्याय 2 / 45

Chapter 2 — Maitreyi and the Love of Self

द्वितीय अध्याय

4 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय २

श्लोक 1

न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति ।आत्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति

na vā are patyuḥ kāmāya patiḥ priyo bhavati | ātmanastu kāmāya patiḥ priyo bhavati

हिन्दी अर्थ

अरे! पति की कामना से पति प्रिय नहीं होता; आत्मा की कामना से पति प्रिय होता है।

English

Verily, it is not for the sake of the husband that the husband is dear, but for the sake of the Self that the husband is dear.

अध्याय २

श्लोक 2

आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ।मैत्रेयि आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम्

ātmā vā are draṣṭavyaḥ śrotavyo mantavyo nididhyāsitavyaḥ | maitreyī ātmano vā are darśanena śravaṇena matyā vijñānenedaṃ sarvaṃ viditam

हिन्दी अर्थ

हे मैत्रेयि! आत्मा को देखना चाहिए, सुनना चाहिए, मनन करना चाहिए, और ध्यान करना चाहिए। आत्मा के दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान से यह सब जाना जाता है।

English

The Self, O Maitreyi, should be seen, heard, reflected upon, and meditated upon. Verily, by seeing, hearing, reflecting upon and knowing the Self, all this is known.

अध्याय २

श्लोक 3

न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति ।आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति

na vā are sarvasya kāmāya sarvaṃ priyaṃ bhavati | ātmanastu kāmāya sarvaṃ priyaṃ bhavati

हिन्दी अर्थ

अरे! सब कुछ के लिए सब कुछ प्रिय नहीं होता। आत्मा के लिए ही सब कुछ प्रिय होता है।

English

Truly, it is not for the sake of all that all is dear — but for the sake of the Self that all is dear.

अध्याय २

श्लोक 7

अहं ब्रह्मास्मि

ahaṃ brahmāsmi

हिन्दी अर्थ

मैं ब्रह्म हूँ।

English

I am Brahman.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/brihadaaraNyaka.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Brihadaranyaka Upanishad — Chapter 2
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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