श्लोक 6.1
आकाशवदनन्तोऽहं घटवत्प्राकृतं जगत् । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ १ ॥
उपाय सीढ़ी है; जो आप पहले से हैं, उसे त्याग, ग्रहण या लय से बनाना नहीं पड़ता।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअध्याय 6 · छठा प्रकरण
लय के उपदेश के बाद अनुभव का कथन: आकाश, समुद्र, सीप और सूत के चार उदाहरणों से एक ही बात कही जाती है कि इस ज्ञान में न त्याग, न ग्रहण, न लय की ज़रूरत है।
पाँचवें प्रकरण में अष्टावक्र ने लय के चार चिंतन बताए थे। पुस्तक की भावार्थ-टीका बताती है कि छठे प्रकरण में गुरु अपने अनुभव को दिखाते हुए लय आदि की असंभवता बताता है। इस प्रकरण में पुस्तक कोई वक्ता-लेबल नहीं छापती; अधिकांश श्लोकों में बोलने वाले जनक हैं, पर 6.3 के भावार्थ में पुस्तक में वक्ता ‘अष्टावक्रजी’ छपा है (इसे असंगति के रूप में दर्ज किया गया है)।
चारों श्लोक एक ही पंक्ति पर समाप्त होते हैं: ‘इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः’, यानी ऐसे ज्ञान में न त्याग है, न ग्रहण, न लय। हर श्लोक में एक नया उदाहरण है: आकाश और घड़ा (6.1), समुद्र और लहरें (6.2), सीप और चाँदी (6.3), और माला के मोतियों में सूत व आकाश में नीलिमा (6.4)। पुस्तक के अनुसार हर नया उदाहरण पिछले उदाहरण की किसी कमी को पूरा करता है।
इस प्रकरण में सबसे ज़रूरी सावधानी यह है कि ‘न त्याग, न ग्रहण’ का अर्थ जीवन के काम छोड़ देना, अभ्यास को बेकार कहना या ज़िम्मेदारियों से मुँह मोड़ना नहीं है। यह भीतर की पहचान के बारे में है।
यदि मैं उपाय (त्याग, ग्रहण, लय) से बनी कोई चीज़ नहीं, तो उपायों से मेरा संबंध कैसा होना चाहिए?
पुस्तक के अनुसार छठे प्रकरण में आत्मा को आकाश, समुद्र, सीप और सूत जैसे अधिष्ठान के रूप में बताया गया है, और जगत् को घड़े, लहर, चाँदी और मोतियों की तरह उसी पर प्रतीत होने वाला। इस ज्ञान में त्याग, ग्रहण या लय किसी की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि जो पहले से है उसे क्रिया से बनाना नहीं पड़ता। यह परम दृष्टि है; व्यावहारिक जीवन में अभ्यास, पढ़ाई, देखभाल, संबंध और ज़िम्मेदारियाँ बनी रहती हैं।
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आकाशवदनन्तोऽहं घटवत्प्राकृतं जगत् । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ १ ॥
उपाय सीढ़ी है; जो आप पहले से हैं, उसे त्याग, ग्रहण या लय से बनाना नहीं पड़ता।
पूरी व्याख्या पढ़ेंमहोदधिरिवाहं स प्रपञ्चो वीचिसन्निभः । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ २ ॥
लहर समुद्र से अलग नहीं; अनुभव चेतना से अलग नहीं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअहं स शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद्विश्वकल्पना । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ३ ॥
चाँदी की चमक सीप की नहीं; कल्पना की चमक आत्मा की नहीं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि । इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ४ ॥
सबमें और सबको एक ही जागरूकता में देखना आत्मीयता का आधार है, श्रेष्ठता का नहीं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंछठा प्रकरण अनुभव का कथन है। पाँचवें में लय के चिंतन बताए गए थे। अब कहा जाता है कि जो जान चुका है कि वह आकाश की तरह अनन्त है और जगत् घड़े की तरह रचा हुआ है, उसके लिए त्याग, ग्रहण या लय की ज़रूरत नहीं रहती। फिर समुद्र और लहर का उदाहरण आता है, ताकि घड़े से दो चीज़ों का भ्रम न हो। उसके बाद सीप और चाँदी का उदाहरण आता है, ताकि लहर से आत्मा के बदलने का भ्रम न हो। अंत में माला के मोतियों में सूत और आकाश में नीलिमा के उदाहरण से कहा जाता है कि मैं सबमें हूँ और सब मुझमें हैं। हर उदाहरण पिछले की कमी पूरी करता है। यह परम दृष्टि है, इसमें अभ्यास, कर्तव्य और देखभाल की जगह बनी रहती है।
पाँच मिनट आराम से बैठिए। चार उदाहरण बारी-बारी याद कीजिए: आकाश और घड़ा, समुद्र और लहर, सीप और चाँदी, माला और सूत। हर एक के साथ अपने किसी अनुभव को रखिए और देखिए कि उसे जानने वाला कैसा है। किसी निष्कर्ष की जल्दी न करें। यह कोई चिकित्सा या उपचार नहीं, केवल एक चिंतन-अभ्यास है। कोई असुविधा या भारीपन बढ़े तो तुरंत रुकें और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात करें।
पुस्तक में इस प्रकरण में वक्ता का नाम छपा नहीं है। अधिकांश श्लोकों के संदर्भ से वक्ता जनक हैं; 6.3 के भावार्थ में पुस्तक में वक्ता ‘अष्टावक्रजी’ छपा है, जिसे असंगति के रूप में दर्ज किया गया है।
नहीं। यह इस बारे में है कि जो आप पहले से हैं, उसे क्रिया से बनाना नहीं पड़ता। अभ्यास, पढ़ाई और देखभाल बनी रहती हैं।
पुस्तक के अनुसार हर उदाहरण में कोई कमी रहती है, जिसे अगला उदाहरण पूरा करता है, जैसे घड़े से दो चीज़ों का भ्रम, और लहर से आत्मा के बदलने का भ्रम।
यहाँ ‘मैं’ वह जागरूकता है जो सबमें एक है, जैसे माला के मोतियों में सूत। यह अपने को सबसे बड़ा मानना या दूसरों पर अधिकार जताना नहीं है।
पुस्तक जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है। यह अनुभव को नकारती नहीं और दुख की उपेक्षा की अनुमति नहीं देती।
पुस्तक के भावार्थ में यह वाक्य ‘अष्टावक्रजी’ से जोड़ा गया है, जबकि प्रकरण के बाकी श्लोक जनक के कथन के रूप में हैं। पाठ जैसा छपा है वैसा रखा गया है और असंगति सम्पादकीय समीक्षा के लिए दर्ज है।